कश्मीरी लोगों और उनके अधिकारों पर बर्बर हमले की निंदा करें!

संपादक महोदय,

“कश्मीरी लोगों और उनके अधिकारों पर बर्बर हमले की निंदा करें!” इस लेख में कश्मीर की मौजूदा हालत का गहरा विश्लेषण किया गया है।

5 अगस्त, 2019 को हिन्दोस्तान की संसद ने राष्ट्रपति के एक आदेश और एक प्रस्ताव के ज़रिया जम्मू और कश्मीर को दिए गए विशेष दर्जे को समाप्त कर दिया, ताकि हिन्दोस्तान के संविधान के सभी कानून अब इस इलाके के लोगों पर भी लागू हों। यह क़दम उठाने से पहले राज्य में कई लोगों को हिरासत में लिया गया और संचार के तमाम माध्यमों को बंद कर दिया गया। ये हालात पिछले 40 दिनों से बरकरार हैं।

लेकिन तमाम अन्य आतंरिक और बाहरी मसलों के अलावा भयानक आर्थिक मंदी की हालत में, इस क़दम को उठाने के पीछे हिन्दोस्तान के सरमायदारों की मंशा क्या है, इसके बारे में जो बातें आपने रखी हैं, वे शायद ही किसी और ने बताई हों।

इस क़दम के पीछे गहरी भू-राजनीति और हिन्दोस्तान के सरमायदारों का दुनिया के स्तर पर एक बड़ी ताक़त बनकर उभरने का संघर्ष छुपा हुआ है। कश्मीर के बंटवारे और विवाद की स्थिति हिन्दोस्तानी सरमायदारों के लिए एक ऐसी बेड़ी थी जिसे बर्तानवी साम्राज्यवादियों ने बड़ी ही सफलतापूर्वक लगायी थी और जिसे अमरीका और यहां तक कि 60 के दशक के बाद चीन ने बरकरार रखने के भूमिका अदा की थी।

बर्तानवी हुक्मरान हिन्दोस्तान को एक कमज़ोर देश के रूप में रखना चाहते थे, जिसे वे आसानी से अपने हित में इस्तेमाल कर सकते थे, और जिसे सोवियत यूनियन के खि़लाफ़ अड्डे बतौर इस्तेमाल कर सकें और पश्चिम एशिया में तेल से संबंधित अपने हितों की रक्षा कर सकें। इस लक्ष्य के साथ उन्होंने हिन्दोस्तान का सांप्रदायिक बंटवारा किया और रजवाड़ों को अपनी “पसंद” से भारत या पाकिस्तान में जाने की आज़ादी दी।

बस्तीवादी हुकूमत के अंत के बाद हिन्दू भारत, मुस्लिम पाकिस्तान और तमाम रजवाड़ों का एक ढीला-ढाला संघ, इस रूप में एक कमज़ोर हिन्दोस्तान बर्तानवी बस्तीवादियों के लिए सबसे अच्छी स्थिति थी। हिन्दोस्तानी सरमायदारों को बंटवारा स्वीकार करने के लिये मजबूर किया गया। लेकिन ऐसा करते हुए उन्होंने अपने इलाके में एक केंद्रीकृत राज्य का गठन किया और जल्दी ही 500 से अधिक रजवाड़ों को इसमें शामिल कर लिया। लेकिन उसके लिए कश्मीर एक कांटा बना रहा, जिसका इस्तेमाल साम्राज्यवादी हिन्दोस्तान को दक्षिण-एशिया तक सीमित रखने के लिए करते रहे और न जंग और न ही शांति की स्थिति बनाये रखी।

अब हिन्दोस्तानी इजारेदार पूंजीपतियों के बढ़ते साम्राज्य को देखते हुए उन्होंने कश्मीर की स्थिति को औपचारिक रूप से बदलने का फैसला लिया। उनको इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि ऐसा करते हुए उन्होंने कश्मीर की स्थानीय पार्टियों के हितों को चोट पहुंचाई है और कश्मीरी लोगों के अधिकारों पर प्रतिबंध लगाये हैं। उनका खयाल है कि ऐसा करते हुए उन्होंने कश्मीर में अमरीका, ब्रिटेन और चीन द्वारा संभावित दखलंदाज़ी पर रोक लगायी है। जहां तक कश्मीरी लोगों के राष्ट्रीय अधिकारों का सवाल है, उसे बेरहमी से कुचल दिया गया है, जिस तरह से हिन्दोस्तानी राज्य ने हिन्दोस्तान के तमाम अन्य राष्ट्रों के अधिकारों को कुचला है।

भवदीय,

एस.के., धारवाड़

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Oct 1-15 2019    Letters to Editor    Rights     2019   

पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

 

5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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