हुक्मरान वर्गों का ख़तरनाक साम्राज्यवादी रास्ता

संपादक महोदय,

मज़दूर एकता लहर के 1-15 सितम्बर, 2019 के अंक में प्रकाशित “हिन्दोस्तान के हुक्मरान वर्ग का ख़तरनाक साम्राज्यवादी रास्ता” वर्तमान स्थिति का बेहतर विश्लेषण है और हिन्दोस्तान के बहुसंख्य मेहनतकश लोगों की दयनीय स्थिति को साफ दर्शाता है। यह भी सच है कि प्रधानमंत्री मोदी देश में चल रहे सबतरफा आर्थिक संकट को छुपाने की कोशिश कर रहे हैं और झूठे सपने दिखाकर लोगों को गुमराह करने की कोशिश कर रहे हैं। 1947 में तथाकथित आज़ादी के बाद से सत्ताधारी पार्टियां यही काम करती आई हैं। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, जो कि सबसे लंबे अरसे के लिए प्रधानमंत्री रहे, उन्होंने भी 14 अगस्त, 1947 की रात को दिए गए अपने बहुचर्चित भाषण “ट्रिस्ट विथ डेस्टिनी” में यह बात कही थी।

“... आज भविष्य हमें पुकार रहा है। हम किस दिशा में जायेंगे और हमारी क्या कोशिश होगी? हम आम आदमी, किसान, मज़दूर के लिए आज़ादी और अवसर देंगे; हम ग़रीबी, अज्ञानता और बीमारी के खि़लाफ़ लड़ेंगे; हम एक समृद्ध, लोकतांत्रिक और प्रगतिशील राष्ट्र का निर्माण करेंगे; हम ऐसे सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक संस्थानों को जन्म देंगे, जो हर एक महिला और पुरुष के लिए इंसाफ और परिपूर्ण जीवन सुनिश्चित करेंगे...”

नेहरू ने अपनी भाषण देने की कला का बखूबी इस्तेमाल करते हुए लोगों को इस बात का विश्वास दिलाया कि उनकी अगुवाई में एक नए समाजवादी हिन्दोस्तान का निर्माण किया जा रहा है। आज़ादी से बाद 60 वर्षों से अधिक समय के लिए कांग्रेस पार्टी सत्ता में थी और उसने जो कुछ किया वह सिर्फ टाटा, बिरला के हितों की हिफ़ाज़त करने के लिए था। बड़ी बेशर्मी के साथ लंबे समय के लिए कांग्रेस पार्टी ने “ग़रीबी हटाओ” के नारे को अलग-अलग तरीके से इस्तेमाल किया और बाद में इसे “कांग्रेस का हाथ, आम आदमी के साथ” बना दिया, ताकि आम लोगों को बेवकूफ बनाया जा सके। एक ऐसा हिन्दोस्तान जहां सभी के लिए अच्छी गुणवत्ता की शिक्षा और रोज़गार हासिल हो, ऐसा हिन्दोस्तान केवल एक सपना बनकर रहा गया है। 1977 में इमरजेंसी के बाद जनता पार्टी जैसे नाम की जो पार्टियां सत्ता में आईं, जिनके नाम में जनता शब्द था, ऐसी पार्टियों ने यह भ्रम फैलाया कि मौजूदा व्यवस्था के भीतर ऐसी पार्टी हो सकती है, जो हिन्दोस्तान के लोगों की सेवा करेगी। हाल ही के वर्षों में ऐसा ही भ्रम आम आदमी पार्टी ने फैलाया, जो 2011 में अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार-विरोधी अभियान का इस्तेमाल करते हुए दिल्ली में सत्ता में आई थी।

प्रधानमंत्री मोदी और उसकी पार्टी, जिनके पीछे देश और दुनिया के बड़े पूंजीपतियों का धनबल और बहुबल है, आज टेक्नोलॉजी से चलाये जा रहे बहुतेरे मडिया प्लेटफार्म का इस्तेमाल करते हुए, ऐसा ही भ्रम फैलाने में अधिक सक्षम है। इतना सबूत काफी है यह साबित करने के लिए कि हमारे देश की मौजूदा व्यवस्था केवल मुट्ठीभर पूंजीपतियों और औद्योगिक घरानों की सेवा के लिए बनायी गयी है, जबकि देश के लोगों की तकलीफें आसमान छू रही हैं।

आशा, नयी दिल्ली


संपादक महोदय

मज़दूर एकता लहर के 1-15 सितम्बर के अंक में प्रकाशित पार्टी का बयान बहुत ही जोरदार और प्रभावी है। इस बयान में कई ऐसी बातें हैं जिनपर मैं अपनी बात रखना चाहूंगी, लेकिन इस समय में केवल इस बात पर अपने विचार पेश करना चाहती हूं, कि क्या हिन्दोस्तानी राज्य और उसका संविधान वाकई में धर्मनिरपेक्ष और लोकतान्त्रिक है? इसी सवाल से एक और सवाल जुड़ा हुआ है - “क्या हमारे देश के लोगों को अपनी पसंद की सरकार चुनने की आज़ादी है”

धर्म निरपेक्षता का अर्थ है समाज के मामलों में धर्म के प्रभाव और उसकी सत्ता को मिटाना, लेकिन हमारे देश में ऐसा नहीं हुआ है। हिन्दोस्तानी राज्य ने अपने सांप्रदायिक चेहरे को छुपाने के लिए हमेशा धर्म निरपेक्षता के मुखौटे का इस्तेमाल किया है। यह राज्य लोगों को बांटने, उनके बीच तनाव और आपसी शक पैदा करने और सांप्रदायिक कत्लेआम आयोजित करने के लिए धर्म का इस्तेमाल करता रहता है। सांप्रदायिक नफ़रत या गुनाहों के पीछे लोग कभी नहीं होते हैं, बार-बार यही साबित हुआ है कि यह सब कुछ राज्य द्वारा आयोजित किया जाता है।

जो राज्य सांप्रदायिक गुनाह आयोजित करता है, फिर वही राज्य हमें “सहिष्णुता” और “सद्भावना” के प्रवचन सुनाता है। यदि मैं किसी अल्पसंख्यक समूह या समुदाय से हूं, तो फिर मुझ पर शक किया जा सकता है और राज्य के पास ताक़त है कि वह मुझे केवल शक के आधार पर जेल की सलाखों के पीछे डाल सकता है। क्यों हमें धर्म, जाति, संप्रदाय और भाषा के आधार पर पहचाना जाता है? यह जानकारी क्यों हमारे स्कूल और अन्य जन-सेवाओं के रिकॉर्ड में शामिल की जाती है? क्यों मेरा काम मेरी जाति के आधार पर तय की जाता है? बार-बार इस राज्य को “धर्मनिरपेक्ष” कहने से सच्चाई बदल नहीं जाती।

जहां तक लोकतंत्र का सवाल है, आज तक किसी भी चुनाव में मुझे या मेरे पड़ोसियों को, या मेरे समुदाय को, कभी भी यह मौका नहीं मिला कि हम यह तय कर सकें कि हमारा प्रतिनिधि बनने की किस व्यक्ति में क़ाबिलियत है। एक ऐसा व्यक्ति जो हमारे बीच का हो, जो लोगों के विकास के बारे में सोचता हो, जो लोगों के अधिकारों और हितों के लिए लड़ता हो, जो अपने काम का ब्योरा अपने मतदाताओं को देता हो? हर बार कोई न कोई पार्टी अपना उम्मीदार हम पर थोपती है और उसे धनबल और बाहुबल के आधार पर जिताती है और उसे हमारा प्रतिनिधि घोषित करती है। जो लोग हमारा प्रतिनिधित्व करने का दावा करते हैं, उन्होंने लोगों के लिए कुछ नहीं किया होता है और इसके विपरीत उन्होंने लोगों के खि़लाफ़ तमाम तरह के गुनाह और जुर्म किये होते हैं। यदि यह सच है तो फिर हम कैसे कह सकते हैं कि हम अपनी पसंद की सरकार चुनते हैं। यह सरासर झूठ है। इस राजनीतिक प्रक्रिया में वोट देने को “लोकतंत्र” नहीं कहा जा सकता।

इस तरह के लोकतंत्र और धर्म निरपेक्षता का बार-बार पर्दाफ़ाश करना ज़रूरी है, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग अपने ज़मीर के आधार पर क़दम उठाते हुए इस “लोकतंत्र और धर्म निरपेक्षता” के खि़लाफ़ आवाज़ उठायें और संगठित हों।

आपका पाठक,

सुनिल, दिल्ली

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Oct 1-15 2019    Letters to Editor    Rights     2019   

पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

 

5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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