प्रधानमंत्री मोदी की अमरीका यात्रा : हिन्दोस्तानी हुक्मरान वर्ग और अमरीकी साम्राज्यवादियों के बीच रणनैतिक गठबंधन की पुष्टि

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की 22-27 सितम्बर की अमरीका यात्रा दोनों देशों के हुक्मरान वर्गों के बीच लगातार मजबूत होते जा रहे रणनैतिक गठबंधन का हिस्सा थी।

हिन्दोस्तान के प्रधानमंत्री के निमंत्रण को स्वीकार करते हुए, अमरीका के राष्ट्रपति ने ह्युस्टन, टेक्सास में अमरीका-निवासी हिन्दोस्तानियों की एक बहुत धूम-धाम से प्रचारित रैली में भाग लिया। उस कार्यक्रम में अमरीका की रिपब्लिकन पार्टी और डेमोक्रेटिक पार्टी, दोनों के नेता उपस्थित थे, जिससे फिर साबित होता है कि अमरीकी साम्राज्यवादी सरमायदार हिन्दोस्तान-अमरीका रणनैतिक गठबंधन को मजबूत करना कितना महत्वपूर्ण मानते हैं। इजारेदार पूंजीपतियों के नियंत्रण में हिन्दोस्तानी मीडिया ने, हिन्दोस्तान के बड़े सरमायदारों के विचारों को प्रकट करते हुए, हिन्दोस्तान-अमरीका संबंध के मजबूत होने पर खुशियां जाहिर कीं।

अमरीका हिन्दोस्तान के साथ अपना रणनैतिक गठबंधन मजबूत करना चाहता है ताकि एशिया पर अपना संपूर्ण वर्चस्व स्थापित करने के अपने उद्देश्य को हासिल कर सके। इसके लिए अमरीका चीन को आगे बढ़ने से रोकना चाहता है, रूस को कमज़ोर करना चाहता है और ईरान को अलग-थलग करना चाहता है। हिन्दोस्तान के बड़े सरमायदार खुद एशिया में सबसे बड़ी शक्ति बनना चाहते हैं। इस मंसूबे को हासिल करने में उनकी सबसे ज्यादा स्पर्धा चीन के साथ है। हिन्दोस्तान के हुक्मरान अमरीका के साथ रणनैतिक गठबंधन को मजबूत करके अपना उद्देश्य पूरा करना चाहते हैं।

इस समय, अमरीका और चीन के बीच में व्यापार युद्ध चल रहा है। हिन्दोस्तान के सरमायदार इस मौके का फायदा उठाकर, अपने बाज़ारों का विस्तार करना चाहते हैं। अमरीका ईरान के खि़लाफ़ लगातार भड़काऊ हरकतें करता जा रहा है और ईरान पर हमला करने के लिए पश्चिम एशियाई देशों का सैनिक गठबंधन बनाने की कोशिश कर रहा है। यह हिन्दोस्तान के सरमायदारों के लिए चिंता का विषय है। अमरीका अफ़गानिस्तान में अपने हितों को बरकरार रखने के लिए पाकिस्तान की मदद चाहता है। हिन्दोस्तान के सरमायदारों को अफ़गानिस्तान में किसी ऐसी नयी व्यवस्था से आपत्ति है जिसमें पाकिस्तान की भूमिका बढ़ जायेगी। पाकिस्तान कोशिश कर रहा है कि अमरीका कश्मीर के मुद्दे को लेकर हिन्दोस्तान पर दबाव डाले। इन सारी गतिविधियों के चलते, मोदी ने अमरीका की यात्रा की।

अमरीकी साम्राज्यवादियों ने हमेशा ही हिन्दोस्तान और पाकिस्तान को आपस में लड़वाने की नीति अपनाई है। ऐसा करके वे इस इलाके में अपने वहशी हस्तक्षेप को जायज़ ठहराते हैं। कश्मीर को लेकर हिन्दोस्तान और पाकिस्तान के आपसी विवाद का अमरीका ने अपने फायदे के लिए खूब दुरुपयोग किया है। इस बार भी अमरीका के राष्ट्रपति ट्रम्प की बातों में यह बहुत स्पष्ट था। जबकि ट्रम्प ने दोनों देशों को आपस में शांति क़ायम करने की सलाह देने का खूब ड्रामा किया, तो इसके पीछे अमरीका दोनों देशों को भर-भर कर हथियार देता रहता है और अपने इरादों को हासिल करने के लिए, दोनों देशों के हुक्मरानों को आपस में भिड़ाता रहता है। अमरीका की खुफिया एजेंसियों ने तरह-तरह के आतंकवादी गिरोहों को स्थापित कर रखा है और उन्हें ढेर सारे हथियार दे रखे हैं। इन आतंकवादी गिरोहों के सहारे अमरीकी खुफिया एजेंसियां नियमित तौर पर आतंकवादी हमले आयोजित करती हैं, यह सुनिश्चित करने के लिए कि हिन्दोस्तान और पाकिस्तान अपने आपसी विवादास्पद मुद्दों को शांतिपूर्ण तरीके से हल न कर पाएं।

इस बात का बहुत सारा सबूत है कि अमरीका ही सारी दुनिया में आतंकवाद का सरगना है। यह जानी-मानी बात है कि अमरीका ने दुनिया के अलग-अलग भागों में अपने रणनैतिक हितों को बढ़ावा देने के लिए, अनेक आतंकवादी गिरोहों को प्रशिक्षण दे रखा है। पर इसके बावजूद, अमरीकी साम्राज्यवादी बार-बार यह झूठा प्रचार दोहराते रहते हैं कि मुसलमान लोग और इस्लामी देश आतंकवादी हैं, ताकि उनके खि़लाफ़ हमलावर जंग छेड़ना जायज़ ठहराया जा सके। ट्रम्प और मोदी, दोनों ने “आतंकवाद पर जंग” के प्रति अपनी वचनबद्धता का ऐलान किया। जबकि अमरीका के राष्ट्रपति ने ईरान को दुनिया में आतंकवाद का सबसे बड़ा प्रश्रयकर्ता बताया, तो हिन्दोस्तान के प्रधानमंत्री ने वही आरोप पाकिस्तान पर लगाया।

मोदी और ट्रम्प, दोनों ने अपने-अपने देशों में “अवैध” आप्रवासियों के खि़लाफ़ आवाज़ उठाई। अमरीका में निवासी कई हिन्दोस्तानी लोग आप्रवासन-विरोधी कानूनों और राज्य द्वारा आयोजित नफ़रत-भरे अपराधों के शिकार बने हैं और बनते रहते हैं। परन्तु उनकी दयनीय स्थिति के बारे में मोदी को कोई चिंता नहीं है।

हिन्दोस्तान के सरमायदारों के लिए, अमरीका के साथ यह संबंध बहुत महत्वपूर्ण है। अमरीका विदेशी पूंजी, प्रौद्योगिकी और पूंजीनिवेश के लिए हिन्दोस्तान का एक प्रमुख स्रोत है। अमरीका हिन्दोस्तानी सेना के लिए आधुनिकतम प्रौद्योगिकी का एक मुख्य आपूर्तिकर्ता है। मोदी की अमरीका यात्रा के दौरान, हिन्दोस्तानी सरमायदारों ने हिन्दोस्तान को अमरीकी साम्राज्यवादियों के लिए एक आकर्षक बाज़ार बतौर पेश किया। मोदी ने हिन्दोस्तान को प्रत्यक्ष विदेशी पूंजीनिवेश के लिए एक आकर्षक स्थान बनाने में अपनी सरकार के क़दमों पर रोशनी डाली। उन्होंने 5 खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था हासिल करने के लिए, विदेशी पूंजीनिवेश व निर्यात को बढ़ाने के अपनी सरकार के क़दमों की खूब चर्चा की। उन्होंने अमरीकी कंपनियों को हिन्दोस्तान में, खास तौर पर ऊर्जा व रक्षा क्षेत्रों तथा कई अन्य क्षेत्रों में और ज्यादा पूंजीनिवेश करने के लिए, बड़े जोर-शोर से आह्वान दिया।

बीते कुछ महीनों में, हिन्दोस्तान और अमरीका के बीच में, दुतरफा व्यापार के कई मुद्दों पर विवाद खड़े हो गए हैं। अमरीका ने हिन्दोस्तान को जी.एस.पी. की सूची से निलंबित कर दिया है और इस्पात व एल्युमीनियम के उत्पादों पर शुल्क लगा दिए हैं, जबकि हिन्दोस्तान ने अपनी तरफ से कुछ अमरीकी उत्पादों पर शुल्क लगाये हैं। हालांकि दोनों देशों के अफ़सरों के बीच में इन विवादास्पद मुद्दों पर अब बातचीत चल रही है, पर यह स्पष्ट था कि दोनों देशों के हुक्मरान अपने बढ़ते रणनैतिक गठबंधन के रास्ते में इन विवादों को रुकावट नहीं बनने देना चाहते हैं।

ट्रम्प ने इस बात पर बहुत खुशी जाहिर की कि मोदी ने 17 प्रमुख अमरीकी ऊर्जा कंपनियों के उच्चाधिकारियों के साथ चर्चा की और हिन्दोस्तान ने अमरीका से तेल व प्राकृतिक गैस खरीदने का फैसला किया है। ट्रम्प ने रक्षा और सुरक्षा पर हिन्दोस्तान के साथ बढ़ते सहयोग का जिक्र किया और बताया कि इस समय हिन्दोस्तान अमरीका से लगभग 18 अरब डॉलर की रक्षा सामग्रियों की खरीदी करता है तथा आने वाले दिनों में कई और नए रक्षा सौदे किये जाने वाले हैं। ट्रम्प ने हिन्द-प्रशांत महासागर क्षेत्र में हिन्दोस्तान और अमरीका की सेनाओं की बढ़ती आपसी निर्भरता व सहयोग पर ज़ोर दिया और कुछ दिनों बाद होने जा रहे, हिन्दोस्तान व अमरीका की जल-थल-नौ सेनाओं के ‘टाइगर ट्रायम्फ’ नामक संयुक्त अभ्यास का जिक्र किया।

मोदी की अमरीका यात्रा फिर से दिखाती है कि हिन्दोस्तान के बड़े सरमायादार देश को एक ख़तरनाक साम्राज्यवादी रास्ते पर ले जा रहे हैं। यह “इस्लामी आतंकवाद” के खि़लाफ़ लड़ने के झंडे तले, अमरीका के साथ गठबंधन बनाकर, तेज़ गति से फ़ौजीकरण करने और नाजायज़ कब्ज़ाकारी जंगों में हिस्सा लेने का रास्ता है। इस रास्ते पर चलकर, हमारे हुक्मरान विदेशों में हिन्दोस्तानी पूंजीपतियों के बाज़ारों और प्रभाव क्षेत्रों को विस्तृत करना चाहते हैं और दुनिया पर अपना प्रभुत्व जमाकर बैठी हुयी बड़ी ताक़तों के विशिष्ठ गिरोह में हिन्दोस्तान को शामिल करना चाहते हैं। ट्रम्प ने सबके सामने मोदी की सरकार के लिए जो समर्थन दर्शाया, उससे स्पष्ट होता है कि इस समय अमरीकी साम्राज्यवादी यह मानते हैं कि अपनी हुक्मशाही के तले एक-ध्रुवीय दुनिया स्थापित करने के उनके विश्वव्यापी इस्लाम-विरोधी, समाज-विरोधी और जंग-फरोश हमले को क़ामयाब करने के लिए, दूसरी बार चुनाव जीत कर आयी हुयी, मोदी की अगुवाई वाली भाजपा सरकार उनका सबसे बेहतर वफादार मित्र है। वे हिन्द-प्रशांत महासागर इलाके में अपना वर्चस्व जमाने के इरादों को बढ़ावा देने के लिए, हिन्दोस्तानी हुक्मरान वर्ग के साथ इस रणनैतिक गठबंधन को मजबूत कर रहे हैं।

हमारा हुक्मरान वर्ग अपने साम्राज्यवादी मंसूबों को पूरा करने के लिए अमरीका का समर्थन पाने की कोशिश कर रहा है। परन्तु अमरीका कभी भी, दुनिया के किसी भी देश का भरोसेमंद मित्र नहीं रहा है। अमरीकी साम्राज्यवादी अपने खुदगर्ज़ हितों के अनुसार दूसरे देशों के साथ गठबंधन बनाते और तोड़ते हैं। वे किसी देश का समर्थन सिर्फ तब तक करते हैं, जब तक अपनी दादागिरी जमाने का उनका लक्ष्य पूरा न हो। उसी देश के साथ अमरीका के गठबंधन बनाने के फायदे जब ख़त्म हो जाते हैं, तो उसे तहस-नहस करने में अमरीका को कोई झिझक नहीं होती।

अगर हिन्दोस्तान अमरीका का भरोसेमंद मित्र बन जाता है, तो इसका मतलब है कि हम अमरीका के अपराधी साम्राज्यवादी जंग में उसके सांझेदार होंगे। यह हिन्दोस्तानी लोगों के हितों के बिलकुल खि़लाफ़ है। यह अमरीकी दादागिरी के विरोध में संघर्ष कर रहे सभी राष्ट्रों और लोगों के हितों के खि़लाफ़ है। हमारे हुक्मरानों के इस ख़तरनाक साम्राज्यवादी रास्ते का हमें जमकर विरोध करना होगा।

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Oct 1-15 2019    Voice of the Party    Privatisation    Rights     War & Peace     2019   

टिप्पणी

प्रधानमंत्री की अमरीका यात्रा हिन्दोस्तान के सरमायदार वर्ग के साम्राज्यवादी मंसूबों को आगे बढ़ाती है

मज़दूर एकता लहर के 1-15 अक्तूबर, 2019 के अंक में प्रकाशित मुख्य लेख “प्रधानमंत्री की अमरीकी यात्रा”, हिन्दोस्तान के सरमायदारों के चरित्र, अमरीकी साम्राज्यवादियों के लक्ष्य और इससे उभरने वाले ख़तरों के विश्लेषण में एक महत्वपूर्ण योगदान है।

इस लेख में प्रस्तुत तीन प्रमुख बातों को मैं उजागर करना चाहूंगा:

हिन्दोस्तान के सरमायदार वर्ग के साम्राज्यवादी मंसूबे हैं और वह दुनिया में खुद अपना प्रभाव क्षेत्र बनाने की कोशिश कर रहा है। हिन्दोस्तानी सरमायदार रोज़ अपने इस साम्राज्यवादी चरित्र का प्रदर्शन करता रहता है, जहां वह दुनिया के सबसे बड़े साम्राज्यवादी देशों के साथ टकराव और समझौते का रास्ता अपनाता है और दक्षिण एशिया में अपने पड़ोसी देशों के बीच सबसे बड़ी ताक़त बनकर उभरने की कोशिश कर रहा है। साम्राज्यवाद का एक प्रमुख गुण है - पूंजी का निर्यात, जिससे अधिकतम मुनाफ़ा कमाया जा सके। पिछले दो दशकों में हिन्दोस्तान के इजारेदार पूंजीपति घरानों द्वारा पूंजी का निर्यात तेज़ी से बढ़ा है। 2001-02 से 2011-12 के बीच विदेशों में किया गया प्रत्यक्ष पूंजी निवेश (ओवरसीज फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट) 30 गुना से बढ़कर, 1 अरब अमरीकी डॉलर से 30.9 अरब अमरीकी डॉलर तक पहुंच गया था। 2017 से 2018 के बीच हिन्दोस्तानी कंपनियों द्वारा लंदन में प्रत्यक्ष पूंजी निवेश में 255 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। 2017 के अंत तक हिन्दोस्तानियों द्वारा विदेश में किया गया सकल प्रत्यक्ष पूंजी निवेश (ओ.एफ.डी.आई.) 155 अरब अमरीकी डॉलर था। हिन्दोस्तानी कंपनियां विदेशों में मुख्य तौर से कंपनियों के विलयन और अधिग्रहण में पूंजी निवेश करती हैं।

जैसे कि इस लेख में बताया गया है हिन्दोस्तानी राज्य अपने साम्राज्यवादी मंसूबों को हासिल करने के लिए अमरीकी साम्राज्यवाद की सांझेदारी चाहता है, और अमरीकी साम्राज्यवाद भी एशिया पर अपना सम्पूर्ण वर्चस्व जमाने के रणनैतिक लक्ष्य को हासिल करने के लिए इस सांझेदारी का इस्तेमाल चीन पर नकेल कसने, रूस को कमज़ोर करने और ईरान को अकेला करने के लिए कर रहा है। इसलिए अमरीकी साम्राज्यवादियों के साथ हिन्दोस्तानी सरमायदारों की बढ़ती दोस्ती के संभावित परिणामों का विश्लेषण करते हुए इन बातों का ध्यान रखना बेहद ज़रूरी है। यह सांझेदारी शांति के लिये बिलकुल नहीं है, बल्कि यह अमरीकी साम्राज्यवादियों के वैश्विक लक्ष्य और हिन्दोस्तानी हुक्मरानों के साम्राज्यवादी मंसूबों को हासिल करने के हिंसक इरादों को आगे बढ़ाती है।

इसके अलावा अमरीका के साथ रणनैतिक सांझेदारी के ज़रिये हिन्दोस्तान अमरीकी साम्राज्यवादियों के चुंगल में फंसता जा रहा है और उनकी वैश्विक रणनीति का हिस्सा बनाता जा रहा है। जैसे कि मज़दूर एकता लहर में पहले भी बताया जा चुका है कि हिन्दोस्तान ने अमरीका के साथ कई महत्वपूर्ण सैनिकी समझौतों पर हस्ताक्षर किये हैं। हिन्दोस्तान ने अमरीका के साथ चार में से तीन ऐसे समझौतों पर हस्ताक्षर किये हैं जिसे अमरीका किसी भी देश के साथ सैनिकी सांझेदारी के लिए बुनियादी समझौते मानता है। 2002 में हिन्दोस्तान ने अमरीका के साथ सैनिकी जानकारी की आम सुरक्षा के लिए समझौता (जी.एस.ओ.एम.आई.ए.), और 2016 में लॉजिस्टिक एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट (एल.ई.एम.ओ.ए.) पर हस्ताक्षर किये। 2018 में संचार संगतता और सुरक्षा समझौते (कॉमकासा) (सी.ओ.एम.सी.ए.एस.ए.) पर हस्ताक्षर किये गए। चौथे समझौते, बुनियादी विनिमय और सहयोग समझौता (बी.इ.सी.ए.) पर हस्ताक्षर करने के लिए हिन्दोस्तान का हुक्मरान वर्ग प्रतिबद्ध है। इसके अलावा हिन्दोस्तान और अमरीका के सशस्त्र बल पहले ही हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में संयुक्त सैनिकी अभ्यास करते रहे हैं।

इन सभी बातों से यह साफ़ हो जाता है कि हिन्दोस्तान और अमरीकी साम्राज्यवादियों के बीच गहराता रिश्ता हिन्दोस्तान को अमरीका द्वारा अपने रणनैतिक हितों के लिए चलाये गए युद्धों में घसीटे जाने की संभावना को बढ़ता है।

आपका पाठक

पी.के., जमुनिया, बिहार

अंग्रेजी

टिप्पणी

संपादक महोदय,

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की 22-27 सितम्बर की अमरीका यात्रा के विषय पर मज़दूर एकता लहर के अंक 1-15 अक्तूबर में एक लेख छपा है। जिसका शीर्षक है “हिन्दोस्तानी हुक्मरान वर्ग और अमरीकी साम्राज्यवादियों के बीच रणनैतिक गठबंधन की पुष्टि”। यह लेख बहुत ही स्पष्ट और सरल तरीके लिखा गया है। इसको पढ़कर यह साफ हो जाता है कि हिन्दोस्तान के बड़े पूंजीपतियों के साम्राज्यवादी इरादे क्या हैं? अमरीका के इजारेदार साम्राज्यवादी पूंजीपतियों के इरादे क्या हैं? ये दोनों देश एक-दूसरे को अपने बाज़ार के रूप में देख रहे हैं।

एक तरफ अमरीका अपने तेल के बाज़ार का विस्तार करने के लिये हिन्दोस्तान को तेल देने की पेशकश करता है। तो दूसरी तरफ हिन्दोस्तान के पूंजीपति अमरीका और चीन के व्यापार युद्ध का फ़ायदा उठाकर अमरीकी बाज़ार में अपना स्थान पाना चाहते हैं।

इसलिये दोनों देश एक दूसरे को सम्मान देने का नाटक कर रहे हैं। अपने हितों को साधने के लिये हिन्दोस्तान के प्रधानमंत्री ने अमरीकी राष्ट्रपति को अमरीका-निवासी हिन्दोस्तानियों की रैली में भाग लेने के लिये आमंत्रित किया। तो दूसरी ओर ट्रंप ने भी अपने पूंजीपतियों के हित के लिये इस निमंत्रण को स्वीकार किया। जबकि उस कार्यक्रम में वहां की रिपब्लिकन पार्टी और डेमोक्रेटिक पार्टी, दोनों के नेता उपस्थित थे।

इन क़दमों से अमरीका हिन्दोस्तान के साथ अपना रणनैतिक गठबंधन मजबूत करना चाहता है ताकि एशिया पर अपना संपूर्ण वर्चस्व स्थापित कर सके। अमरीका चीन को आगे बढ़ने से रोकना चाहता है, रूस को कमज़ोर करना चाहता है और ईरान को अलग-थलग करना चाहता है। हिन्दोस्तान के बड़े सरमायदार खुद एशिया में सबसे बड़ी शक्ति बनना चाहते हैं। अमरीकी साम्राज्यवादी बहुत ही चालाक गिद्ध की तरह हैं। वे गिद्ध की तरह अपने चारे को ऊपर से निगलने की कोशिश कर रहे हैं।

हमें ध्यान रखना होगा कि अमरीकी साम्राज्यवादियों ने हमेशा ही हिन्दोस्तान और पाकिस्तान को आपस में लड़वाने की नीति अपनाई है। ऐसा करके वे इस इलाके में अपने वहशी हस्तक्षेप को जायज़ ठहराते हैं। कश्मीर को लेकर हिन्दोस्तान और पाकिस्तान के आपसी विवाद का अमरीका ने अपने फायदे के लिए खूब दुरुपयोग किया है। अमरीका की खुफिया एजेंसियों ने तरह-तरह के आतंकवादी गिरोहों को स्थापित कर रखा है और उन्हें ढेर सारे हथियार दे रखे हैं। इन आतंकवादी गिरोहों के सहारे अमरीकी खुफिया एजेंसियां नियमित तौर पर आतंकवादी हमले आयोजित करती हैं, यह सुनिश्चित करने के लिए कि हिन्दोस्तान और पाकिस्तान अपने आपसी विवादास्पद मुद्दों को शांतिपूर्ण तरीके से हल न कर पाएं।

अमरीका की इन सभी कारगुजारियों से मुक्ति पाने के लिये, हमें अमरीका की दोगली चाल के चंगुल से अपने देश को निकालना होगा। यदि अमरीका और हमारे देश के पूंजीपतियों के साम्राज्यवादी मंसूबों पर मज़दूर वर्ग ने रोक नहीं लगाई तो हमारे देश के लोगों को भारी नुकसान उठाना पड़ेगा। इसके विनाशकारी परिणाम होंगे।

आपक पाठक

रोशन सिंह, बलिया

अंग्रेजी

पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

 

5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

(Click thumbnail to download PDF)

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)