हरियाणा विधानसभा चुनाव

सरमायदारों के मज़दूर-विरोधी, किसान-विरोधी, समाज-विरोधी और राष्ट्र-विरोधी कार्यक्रम को हराने के लिए संगठित हो!

पूंजीवादी पार्टियों के उम्मीदवारों को ठुकरायें!

लोगों के अधिकारों के लिए लड़ने वाले उम्मीदवारों को चुनाव में जिताओ!

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केंद्रीय समिति का आह्वान, 5 अक्तूबर, 2019

21 अक्तूबर, 2019 को 90 सदस्यों वाली हरियाणा राज्य विधानसभा के लिए चुनाव होंगे। पूंजीपति वर्ग की दो प्रमुख पार्टियां भाजपा और कांग्रेस इन चुनावों में हिस्सा ले रही हैं। इनके अलावा हरियाणा के पूंजीपति और बड़े ज़मीनदारों का प्रतिनिधित्व करने वाली कई अन्य पार्टियां भी हिस्सा ले रही हैं जिनमें इंडियन नेशनल लोक दल और जननायक जनता पार्टी शामिल हैं।

पूंजीपतियों की इन पार्टियों के उम्मीदवारों को चुनौती देने के लिए कई ऐसे संगठन अपने उम्मीदवार चुनावी मैदान में उतार रहे हैं जिन्होंने लोगों के अधिकारों के लिए लगातार संघर्ष किया है। इनमें कई कम्युनिस्ट पार्टियों और संगठनों समेत जन संघर्ष मंच हरियाणा के उम्मीदवार और ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता शामिल हैं।

ये चुनाव ऐसे समय पर हो रहे हैं जब देश में गहरा आर्थिक संकट चल रहा है। जैसे-जैसे उत्पादन गतिहीन या धीमा होता जा रहा है बेरोज़गारी बढ़ती जा रही है। ऑटो, गारमेंट तथा अन्य क्षेत्रों में लाखों मज़दूरों को नौकरी से निकाला गया है। चूँकि हरियाणा ऑटो और गारमेंट एक्सपोर्ट उद्योग का एक प्रमुख केंद्र है, यहां इस संकट का बेहद गहरा असर हुआ है।

अभी पांच महीने पहले अमरीकी पूंजीपतियों के साथ मिलकर हिन्दोस्तान के इजारेदार पूंजीपति आम चुनावों के ज़रिये भाजपा को फिर से चुनकर, सत्ता में लाये हैं। भाजपा को वापस सत्ता पर इसलिये बिठाया गया है ताकि वह हिन्दोस्तानी और विदेशी पूंजीपतियों द्वारा मज़दूर वर्ग के शोषण, किसानों की लूट और देश के प्राकृतिक संसाधनों की लूट को तेज़ करने के लिए सब-तरफा क़दम उठाये।

अमरीकी साम्राज्यवादियों ने भाजपा को सत्ता में लाने में बहुत अहम भूमिका अदा की, जिससे कि वे अपनी हुक्मशाही के तले एक-ध्रुवीय दुनिया बनाने के लिए चलाये जा रहे इस्लाम-विरोधी, समाज-विरोधी और जंग-फरोश हमले में हिन्दोस्तान को अपना मित्र बना सके।

पिछले पांच महीनों में केंद्र सरकार ने हिन्दोस्तानी और विदेशी इजारेदार पूंजीपतियों द्वारा निर्धारित अजेंडे को पूरी ताक़त से लागू किया है।

केंद्र सरकार ने रक्षा उत्पादन, कोयला और अन्य रणनैतिक क्षत्रों को 100 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश के लिए खोल दिया है। इंजन और कोच कारखानों के निजीकरण को और चुनिंदा रेल मार्गों पर निजी कंपनियों को रेल सेवा चलाने की इजाज़त देते हुए केंद्र सरकार ने भारतीय रेल के निजीकरण को और आगे बढ़ाया है। सरकार श्रम कानूनों में इस तरह के बदलाव कर रही है जिससे मज़दूर अपने मौजूदा समय में हासिल अधिकारों से भी वंचित हो जायेंगे, जिसमें अपनी पसंद की यूनियन बनाने का अधिकार भी शामिल है। केंद्र सरकार विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए खुदरा व्यापार के क्षेत्र को भी खोल रही है जिससे कई किसान और छोटे व्यापारी बर्बाद हो जायेंगे।

केंद्र सरकार ने राजकीय आतकंवाद और सांप्रदायिक दमन में सब-तरफा बढ़ोतरी की है। असहमति को अपराध करार दिया जा रहा है। लोगों को अपने विचारों के लिए प्रताड़ित किया जा रहा है। पाकिस्तान की खि़लाफ़ अंध-राष्ट्रवादी और जंग-फरोश प्रचार को बढ़ाया जा रहा है। जम्मू और कश्मीर में राजकीय आतंकवाद अप्रत्याशित स्तर पर पहुंच गया है और इसको जायज़ साबित करने के लिए कश्मीरी लोगों पर “इस्लामिक आतंकवादी” और “पाकिस्तानी एजेंट” का लेबल लगाया जा रहा है। देशभर में यह प्रचार चलाया जा रहा है कि “विदेशी” हमारे लोगों के रोज़गार को, ज़मीन और अन्य बेशक़ीमती संसाधनों को हमसे छीन रहे हैं। इस ख़तरनाक अभियान में इस्लाम धर्म को मानने वाले लोगों को निशाना बनाया जा रहा है। केंद्र सरकार हिन्दोस्तान अमरीकी रणनैतिक सैनिकी गठबंधन को पूरी ताक़त के साथ मजबूत कर रही है।

कुल मिलाकर देखें तो केंद्र सरकार पूरी ताक़त के साथ इजारेदार पूंजीपतियों और विदेशी साम्राज्यवादियों के समाज-विरोधी और राष्ट्र-विरोधी अजेंडे को लागू कर रही है।

हरियाणा हिन्दोस्तानी और विदेशी इजारेदार पूंजीपतियों के लिए एक प्रमुख औद्योगिक केंद्र है। यह खाद्यानों का उत्पादन करने वाला एक प्रमुख राज्य भी है। हमारे देश के इजारेदार पूंजीपति हरियाणा में एक ऐसी सरकार को सत्ता में लाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं जो पूरी तरह से केंद्र सरकार के साथ तालमेल में चल रही हो, ताकि मज़दूर-विरोधी, किसान-विरोधी, समाज-विरोधी और राष्ट्र-विरोधी कार्यक्रम को सबसे कार्यक्षम तरीके से लागू किया जा सके।

हरियाणा के बहुसंख्य लोगों की हालत बेहद दयनीय है।

हरियाणा सरकार मज़दूर वर्ग विरोधी कानून पारित करने में सबसे आगे रही है, जिससे पूंजीपतियों के लिए अधिकतम मुनाफ़े सुनिश्चित किये जा सकें। मज़दूरों को अपनी पसंद की यूनियन बनाने के अधिकार से वंचित किया गया है। ठेका मज़दूरी आम बात हो गयी है। पूंजीपतियों द्वारा मज़दूरों को मनमर्ज़ी से नौकरी पर रखने, किसी भी समय निकाल देने और कंपनी को बंद करने की इजाज़त दी गयी है। रोडवेज़, बिजली वितरण, उच्च शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, कृषि सेवा - हर क्षेत्र जहां अधिकतम मुनाफ़े बनाये जा सकते हैं, उनका निजीकरण किया गया है।

हरियाणा के किसान जो कि पूरे देश का पेट भरते हैं, खुद अपने लिए रोज़गार की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर पा रहे हैं। वे अपनी ज़मीन का जबरदस्ती से किये जा रहे अधिग्रहण के खि़लाफ़ संघर्ष करते आ रहे हैं। वे मांग कर रहे हैं कि सरकार उनकी फसलों के लिए लाभकारी मूल्य की गारंटी दे और इन मूल्यों पर अनाज की खरीदी के लिए एक तंत्र की स्थापना करे। लेकिन सरकार ने उनकी हर एक जायज़ मांग को अनसुना कर दिया है।

नोटबंदी और जी.एस.टी. की वजह से बहुत बड़े पैमाने पर छोटे उद्यम बर्बाद हो गए हैं। बहुराष्ट्रीय ई-व्यापार कंपनियों ने हजारों की संख्या में छोटे व्यापारियों और दुकानदारों के रोज़गारों को बर्बाद कर दिया है।

एक ओर है राज्य के कुछ “विकसित” इलाके और दूसरी ओर हैं अधिकांश रिहायशी और देहाती इलाके जहां जीवन के लिए ज़रूरी सुविधाओं का सख्त अभाव है। दोनों के बीच बहुत अंतर है। मज़दूरों और किसानों के बच्चों को निजी इंजीनियरिंग, मेडिकल कालेजों और अन्य शिक्षा संस्थानों में भारी फीस चुकानी पड़ रही है और रोज़गार मिलने की कोई गारंटी नहीं है; बहुसंख्य जनसमुदाय के लिए सार्वजनिक अस्पताल या स्वास्थ्य सुविधाएं मौजूद नहीं हैं, लेकिन सबसे बड़े इजारेदारों के अस्पतालों के लिए सरकार द्वारा मुफ्त में ज़मीनें दी गयी हैं।

नौजवानों को भयंकर और बढ़ती बेरोज़गारी का सामना करना पड़ रहा है। एक सुरक्षित नौकरी पाने के लिए लोग इस कदर बेताब हैं कि सितम्बर 2019 में हरियाणा सरकार में ग्रुप “सी” के तहत क्लर्क की नौकरी के लिए 17 लाख नौजवानों ने परीक्षा दी, जबकि सरकार ने केवल 4,800 पदों के लिए विज्ञापन निकाला था।

हरियाणा के लोगों की समस्याओं की जड़, शोषण और लूट की यह पूंजीवादी व्यवस्था है और इसकी हिफ़ाज़त करने वाली ये राजनीतिक व्यवस्था है। अर्थव्यवस्था को लोगों की बढ़ती ज़रूरतों को पूरा करने की दिशा में नहीं चलाया जा रहा है। इसके विपरीत अर्थव्यवस्था को पूंजीपति वर्ग के मुनाफ़ों की लालच को पूरा करने की दिशा में चलाया जा रहा है। मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था अर्थव्यवस्था की इस दिशा की हिफ़ाज़त करती है। ये राजनीतिक व्यवस्था मज़दूरों, किसानों और नौजवानों के अधिकारों के संघर्षं को कुचलने का काम करती है। ये राजनीतिक व्यवस्था हिन्दोस्तानी और विदेशी पूंजीपतियों द्वारा लोगों का शोषण और दमन करने के तथाकथित अधिकार की हिफ़ाज़त करने के लिए वहशी हिंसा का इस्तेमाल करती है।

30 वर्षों से लागू किये जा रहे उदारीकरण और निजीकरण के रास्ते भूमंडलीकरण के पूंजीवादी कार्यक्रम के चलते एक छोर पर विशालकाय दौलत जमा होती जा रही है तो दूसरे छोर पर ग़रीबी। मज़दूरों के अति-शोषण और किसानों की दिन-दहाड़े लूट के ज़रिये बड़े पूंजीपतियों और बड़ी ज़मीनों के मालिकों ने बहुत बड़े पैमाने पर दौलत हासिल कर ली है।

समाज की दौलत पैदा करने वाले सभी मज़दूरों और किसानों को इस हद तक लूटा गया है कि अब उनके पास जीने के लिए ज़रूरी वस्तुएं खरीदने के लिये पैसे तक नहीं बचे हैं।

मौजूदा गहरे आर्थिक संकट का यही कारण है।

पूंजीवादी शोषण के साथ-साथ महिलाओं का दमन, जाति के आधार पर भेदभाव और दमन ने हमारे देश के लोगों की ज़िन्दगी को नरक बना दिया है। बालिका-भ्रूण हत्या और विकृत लिंगानुपात हमारे देश में महिलाओं की दयनीय स्थिति को दर्शाता है।

इन चुनावों में कांग्रेस पार्टी और अन्य पूंजीवादी विपक्षी पार्टियां लोगों की दयनीय हालत पर घड़ीयाली आंसू बहा रही हैं। लेकिन ये सभी पार्टियां इस सच्चाई को छुपाती हैं कि इस समस्या की जड़ पूंजीवादी व्यवस्था है। ये पार्टियां ऐसा दिखावा करती हैं जैसे कि समस्या सत्ताधारी पार्टी में है, न कि मौजूदा व्यवस्था में। असलियत तो यह है कि मौजूदा व्यवस्था में चाहे जो पार्टी सत्ता में आये, उसे पूंजीपति वर्ग के हितों की हिफ़ाज़त करनी होगी। लोगों का अनुभव यही दिखता है कि हर एक पार्टी जो सत्ता में रही है उसने पूरी ताक़त के साथ पूंजीपति वर्ग के कार्यक्रम को लागू किया है और मज़दूरों और किसानों के अधिकारों पर हमला किया है। उनका इतिहास यही दिखाता है कि ये पार्टियां देश के सबसे बड़े पूंजीपतियों, हरियाणा के पूंजीपतियों और बड़े ज़मीनदारों के हितों का प्रतिनिधित्व करती हैं। ये पार्टियां लोगों को बेवकूफ बनाने के लिए अपना अलग कार्यक्रम होने का दावा करती हैं। असलियत में ये सारी पार्टियां पूंजीपतियों का कार्यक्रम ही लागू करती हैं।

हमारे देश में मौजूदा राजनीतिक सत्ता मज़दूरों, किसानों और विशाल जनसमुदाय पर सरमायदारों की हुकूमत की हिफ़ाज़त करती है। असलियत तो यह है कि जब तक राजनीतिक सत्ता पूंजीपति वर्ग के हाथों में है, तब तक एक ही कार्यक्रम हो सकता है। यह कार्यक्रम है, हिन्दोस्तानी और विदेशी पूंजीपति वर्ग का कार्यक्रम। जब मज़दूर वर्ग मेहनतकश किसानों के साथ गठबंधन में राजनीतिक सत्ता अपने हाथों में लेगा, तब हमारे देश में दूसरा कार्यक्रम होगा। वह कार्यक्रम होगा, मज़दूर वर्ग का कार्यक्रम।

प्रतिनिधित्व वाली जनतंत्र की व्यवस्था दरअसल लोगों पर सरमायदारों की हुकूमत को जायज़ बनाने का काम करती है। केवल उसी पार्टी या पार्टियों के गठबंधन को सत्ता में बैठने का मौका दिया जाता है जो पूरी वफादारी के साथ सरमायदारों के कार्यक्रम को लागू करेगा। चुनाव सरमायदारों के हाथों में सिर्फ एक साधन मात्र है जिससे वे आपसी अंतर्विरोधों को हल करते हैं और ऐसी पार्टी या पार्टियों के गठबंधन को सत्ता में बैठाते हैं जो उस समय लोगों को बेवकूफ बनाने में सबसे क़ाबिल है।

अपने रोज़गार और अधिकारों पर हमलों का प्रतिरोध करते हुए मज़दूर वर्ग को एक एकजुट राजनीतिक ताक़त बनना होगा और किसानों और तमाम मेहनतकश लोगों को समाज में बुनियादी परिवर्तन के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द लामबंध करना होगा। मज़दूर वर्ग की अगुवाई में सभी दबे-कुचले लोगों के एकजुट मोर्चे को राजनीतिक सत्ता अपने हाथों में लेनी होगी और हिन्दोस्तान का नव-निर्माण करना होगा।

नव-निर्माण का अर्थ है एक नए संविधान पर आधारित एक ऐसे नए राज्य की स्थापना करना जो सभी लोगों के मानव अधिकारों की हिफ़ाज़त की गारंटी देगा। प्रतिनिधित्व पर आधारित इस बहुपार्टीवादी जनतंत्र की जगह पर एक आधुनिक जनतंत्र की स्थापना करनी होगी जहां संप्रभुता लोगों में निहित होगी। सभी मेहनतकश लोगों की बढ़ती ज़रूरतों को पूरा करना और उनके जीवन के स्तर को लगातार ऊंचा करना, इसे ही सामाजिक उत्पादन की चालक शक्ति बनाना होगा।

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी हरियाणा के सभी मतदाताओं से आह्वान करती है कि इस राज्य के विधानसभा चुनावों में वे ऐसे उम्मीदवारों को चुनें जो इस पूंजीवादी व्यवस्था का पर्दाफाश करेंगे और एक ऐसे कार्यक्रम के लिए काम करेंगे जो सभी मेहनतकश लोगों के लिए सुख और सुरक्षा सुनिश्चित करेगा।

हिन्दोस्तान के नव-निर्माण का संघर्ष, ज़िंदाबाद!

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हरियाणा राज्य विधानसभा चुनाव 2019    नव-निर्माण    बहुपार्टीवादी प्रतिनिधित्ववादी लोकतंत्र    Oct 16-31 2019    Statements    Political Process     2019   

पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

 

5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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