सरकार के समाज-विरोधी सुधारों के खि़लाफ़ बैंक कर्मियों का संघर्ष

ऑल इंडिया बैंक एम्प्लाइज़ एसोसिएशन (ए.आई.बी.ई.ए.) और बैंक एम्प्लाइज़ फेडरेशन ऑफ इंडिया (बी.ई.एफ.आई.), जिनके झंडे तले सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (पी.एस.बी.) के अधिकतम कर्मचारी संगठित हैं, ने 22 अक्तूबर को देशव्यापी हड़ताल की आह्वान किया है। यह हड़ताल दस सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के घोषित विलयन का विरोध करने के लिए तथा वेतन वृद्धि की मांग करने के लिए की जा रही है। आंदोलित कर्मचारी यह मांग कर रहे हैं कि सरकार कर्ज़ा न चुकाने वाले कॉर्पोरेट घरानों के खि़लाफ़ सख्त कार्यवाही करे और पूरे कर्ज़े की वापसी सुनिश्चित करने के क़दम ले। वे ग्राहकों पर लागू किये गए कठोर सेवा शुल्कों को ख़त्म करने और बैंक में जमा बचत के धन पर ब्याज दर में वृद्धि की मांग कर रहे हैं। वे रोज़गार की सुरक्षा और रिक्त स्थानों पर नियुक्ति की मांग कर रहे हैं।

मज़दूर एकता लहर ने ए.आई.बी.ई.ए. के उपाध्यक्ष और दिल्ली स्टेट बैंक एम्प्लाइज फेडरेशन के जनरल सेक्रेटरी, कामरेड बी.एस. शर्मा के साथ बात की। बैंकिंग क्षेत्र में सरकार जो सुधार लाने की कोशिश कर रही है, उनके बारे में समझाते हुए, उन्होंने बताया कि उनका संघर्ष न सिर्फ बैंक कर्मियों बल्कि पूरे समाज के हितों की हिफ़ाज़त में है। साक्षात्कार के मुख्य अंश यहां प्रकाशित किये जा रहे हैं।

म.ए.ल.: हाल में कई सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का विलयन किया गया है। इससे बैंकिंग सेवाओं तथा बैंक कर्मियों पर क्या असर पड़ेगा?

बी.एस. शर्मा: सरकार बैंकों के विलयन को जायज़ ठहराने के लिए यह औचित्य दे रही है कि वे “विश्व स्तरीय बैंक” बन जायेंगे। वित्त मंत्री ने दावा किया है कि विलयन से इन बैंकों की राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय पहुंच बढ़ जायेगी। बैंकों के पास ज्यादा पूंजी होगी और वे ज्यादा आसानी से उधार दे सकेंगे। परन्तु आर्थिक संकट की वर्तमान हालतों में उधार की मांग काफी घट गयी है। हमें इस समय इतने बड़े पैमाने पर बैंकों का विलयन करने की ज़रूरत समझ में नहीं आ रही है।

बैंकों के विलयन से उनके काम-काज पर कई तरह के असर पड़ते हैं। ग्राहकों का बैंक पर भरोसा घट जाता है, जिससे ग्राहक कम हो जाते हैं। हर विलयन के बाद, कर्मचारियों को देश की अलग-अलग शाखाओं में ट्रान्सफर किया जाता है व अनेक कर्मचारियों की नौकरियां चली जाती हैं। अनेक वरिष्ठ कर्मियों पर वी.आर.एस. लेने का दबाव डाला जाता है। मिसाल के तौर पर, हाल के महीनों में स्टेट बैंक की कई प्रांतीय शाखाओं के बंद हो जाने से, लगभग 5-6 लाख कर्मचारी वी.आर.एस. लेने को मजबूर किये गए हैं।

जब बैंकों का विलयन होता है, तो कई शाखाओं, खास कर ग्रामीण व दूर-दराज के इलाकों की शाखाओं को बंद कर दिया जाता है। हमारी ग्रामीण आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा आज भी बैंकिंग सेवाओं से वंचित है और साहूकारों का शिकार बनती हैं। एक तरफ सरकार लोगों को बैंक खाते खोलने को प्रोत्साहित कर रही है और दूसरी तरफ, लोगों को बैंकिंग सेवाओं से और ज्यादा वंचित कर रही है।

विलयन को सही ठहराते हुए, सरकार कहती है कि “बड़े बैंक फेल नहीं होंगे”। परन्तु 2008 के वैश्विक संकट के समय हमने दुनिया के बड़े-बड़े निजी बैंकों को गिरते देखा था। बैंकों के विलयन से बैंक घोटाले और जनता के धन की लूट कम नहीं हुयी है। इसके साथ-साथ, भारतीय रिज़र्व बैंक निजी बैंकों को लाइसेंस देता जा रहा है।

म.ए.ल.: बैंकिंग क्षेत्र के वर्तमान संकट से लोग किस तरह प्रभावित हुए हैं?

बी.एस. शर्मा: बैंकिंग क्षेत्र के संकट का कारण देकर, सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में बचत धन पर ब्याज दर को कम कर रही है। इस समय स्टेट बैंक 1 लाख रुपए की बचत पर 3.25 प्रतिशत ब्याज दर दे रहा है, जबकि मुद्रास्फीति दर 3.5 प्रतिशत है। यानी, लोगों की असली आमदनी घट रही है। यह मेहनतकशों पर बहुत बड़ा हमला है, खास कर वरिष्ठ नागरिकों व सेवानिवृत्त लोगों पर, जिनकी रोज़ी-रोटी बैंक बचत के ब्याज पर निर्भर है। इसके साथ-साथ, पहले निःशुल्क प्रदान की जाने वाली तमाम बैंक सेवाओं पर अब भारी सेवा शुल्क लगाये जाते हैं।

ब्याज दर घटाने की असली वजह है कि अब सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक बड़े-बड़े कॉर्पोरेट घरानों को कम ब्याज दर पर करोड़ों-करोड़ों के उधार दे सकेंगे। और ऐसा किया जा रहा है, हालांकि बहुत सारे कॉर्पोरेट घरानों ने अपने कर्जे़ नहीं चुकाए हैं।

म.ए.ल.: कॉर्पोरेट घरानों के न चुकाए गए कर्ज़ों की वजह से बैंकों पर लोगों का भरोसा काफी कम हो गया है। बैंक कर्मियों ने मांग की थी कि सरकार कर्जे़ न चुकाने वाले कॉर्पोरेट घरानों के नाम सार्वजनिक करे, परन्तु ऐसा नहीं किया गया है। इस विषय पर संघर्ष को आप कैसे आगे बढ़ा रहे हैं?

बी.एस. शर्मा: हमने मांग की है कि सरकार दोषी कॉर्पोरेट घरानों को दंड देने तथा पूरे कर्ज़े वापस लेने के लिए कठोर कानून लागू करे। परन्तु, अब तक, न चुकाए गए कर्ज़ों की मात्रा बढ़ती जा रही है जबकि कर्ज़ वसूली न के बराबर हुयी है।

सरकार ने जो दिवालियापन कानून (इन्सोलवेंसी एंड बैन्क्रप्टसी कोड) लागू किया है, वह दोषी कॉर्पोरेट घरानों को आसानी से बच निकलने का रास्ता दिलाने और कर्ज़ों का पूरा बोझ लोगों पर लादने का एक तरीका है। इसकी वजह से, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को भारी नुक्सान उठाने पड़ रहे हैं। इसके चलते, बैंक ब्याज दर घटा रहे हैं और भारी सेवा शुल्क लागू कर रहे हैं।

भारी जन-विरोध के कारण, सरकार को प्रस्तावित एफ.आर.डी.आई. बिल को वापस लेना पड़ा है, जिसमें यह (बेयिल इन) शर्त रखी गयी थी कि अगर बैंक दिवाला हो जाता है तो उसे बचाने के लिए ग्राहकों का बचत का पैसा लिया जायेगा। हमने इस बिल का डटकर विरोध किया। हालिया पी.एम.सी. बैंक घोटाला जनता को लूटने में कॉर्पोरेट घरानों और तरह-तरह के नेताओं की भूमिका को फिर सामने ला रहा है।

म.ए.ल.: बैंकिंग क्षेत्र में निजीकरण की ओर सरकार क्या क़दम ले रही है? इससे बैंक कर्मचारियों और जनता पर क्या असर पड़ेगा?

बी.एस. शर्मा: बैंकिंग क्षेत्र में निजी बैंकों का हिस्सा बढ़ता जा रहा है जबकि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का हिस्सा घटता जा रहा है। सरकार और कॉर्पोरेट मीडिया प्रचार करती हैं कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक घाटे में हैं, उनकी सक्षमता कम है, वे भ्रष्टाचार-ग्रस्त हैं, आदि, ताकि बैंकिंग क्षेत्र में और ज्यादा निजी खिलाड़ियों को लाया जा सके। पर दुनियाभर में देखें तो कई निजी क्षेत्र के बैंक बड़े-बड़े भ्रष्टाचार कांडों में लिप्त हुए हैं।

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक ग्रामीण और दूर-दराज़ के इलाकों में बैंकिंग सेवा प्रदान करते हैं, जबकि निजी बैंकों का काम-काज मुख्यतः शहरों में होता है, जहां उनके मुनाफ़े ज्यादा होते हैं। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों पर हमेशा यह दबाव डाला जाता है कि सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों तथा कॉर्पोरेट घरानों की परियोजनाओं के लिए सस्ती दर पर उधार दें। ये क़दम सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के लिए संकट पैदा कर रहे हैं।

म.ए.ल.: सरकार ने हाल में यह घोषणा की है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के कर्मियों को उनके बकाया वेतन के कुछ हिस्से का भुगतान किया जायेगा, हालांकि बैंक कर्मियों की यूनियनों और सरकार के बीच वेतन वृद्धि को लेकर बातचीत अभी तक किसी नतीजे पर नहीं पहुंची है। इस क़दम के बारे में आप क्या सोचते हैं?

बी.एस. शर्मा: सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के कर्मचारी 2017 से वेतन वृद्धि का इंतजार कर रहे हैं। 2017 से अब तक, हमारे यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस और प्रबंधकों की ओर से इंडियन बैंक्स एसोसिएशन के बीच 30 बार बातचीत हो चुकी है, परन्तु इसका कोई नतीजा नहीं निकला है। पिछली बार 15 प्रतिशत वृद्धि हुयी थी। अब इंडियन बैंक्स एसोसिएशन 12 प्रतिशत देने को राज़ी है। हम इससे ज्यादा वृद्धि की मांग कर रहे हैं। इंडियन बैंक्स एसोसिएशन ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के लगभग 8.5 लाख कर्मचारियों के लिए प्रस्तावित परफॉरमेंस लिंक्ड पे स्कीम (पी.एल.पी.), यानी क़ामयाबी से जुड़ी वेतन वृद्धि योजना, की पुनः समीक्षा करने का सुझाव दिया है। इससे बैंक कर्मियों की वेतन वृद्धि से संबंधित चिंताएं और बढ़ गयी हैं।

आम तौर पर, यूनियनों और प्रबंधकों के बीच वेतन समझौता हो जाने के बाद ही कर्मचारियों को बकाया वेतन दिया जाता है। हम मानते हैं कि सरकार का यह क़दम ट्रेड यूनियनों के प्रबंधकों के साथ सौदा करने के अधिकार पर हमला है। सरकार इसके ज़रिये, हमारे संघर्ष को ख़त्म करने की कोशिश कर रही है।

म.ए.ल.: बैंकिंग क्षेत्र में सरकार द्वारा प्रस्तावित सुधारों के बारे में आपके क्या विचार हैं?

बी.एस. शर्मा: सरकार बैंकिंग क्षेत्र का निजीकरण करना चाहती है। सरकार के प्रस्तावित सुधारों का मक़सद है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों तथा उनकी सारी संपत्तियों को निजी कंपनियों को बेच दिया जाये। यह बड़े-बड़े देशी-विदेशी कॉर्पोरेट घरानों और वित्त संस्थानों के हित के लिए किया जा रहा है। इससे ग़रीबों, सभी मेहनतकशों, किसानों और ग्रामीण आबादी को बहुत नुक्सान होगा। इससे बैंक कर्मियों के काम की हालतों पर भी नकारात्मक असर होगा। हमारे वेतन घटा दिये जायेंगे और बहुत सारे कर्मचारी बेरोज़गार हो जायेंगे।

हम मानते हैं कि ये प्रस्तावित क़दम पूरे समाज के हितों के ख़िलाफ़ हैं। हम इनका जमकर विरोध कर रहे हैं।

म.ए.ल.: सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के वर्तमान संकट और सरकार के प्रस्तावित सुधारों के खि़लाफ़ बैंक कर्मियों के संघर्ष के बारे में हमें जानकारी देने के लिए हम आपके बहुत आभारी हैं।

बड़े-बड़े देशी-विदेशी कॉर्पोरेट घरानों के हित में सरकार द्वारा किये जा रहे सब तरफा हमले के खि़लाफ़, देशभर के मज़दूरों के संघर्ष में आपके संघर्ष का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। हम इस संघर्ष में आपके साथ हैं और आपकी सफलता की शुभकामना करते हैं।

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Defeat Privatisation    Oct 16-31 2019    Struggle for Rights    Privatisation    2019   

पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

 

5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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