कर्मचारी भविष्य निधि कानून में बदलाव:

केन्द्र सरकार अपने मज़दूर-विरोधी रास्ते पर क़ायम

श्रम व रोज़गार मंत्रालय ने घोषणा की है कि वह 1952 के कर्मचारी भविष्य निधि एवं विविध प्रावधान कानून में संशोधन करने जा रहा है। इस संशोधन का उद्देश्य है, कर्मचारी भविष्य निधि (ई.पी.एफ.) में मज़दूरों व मालिकों के योगदान में कटौती करना। प्रस्ताव है कि मज़दूरों व मालिकों, दोनों का योगदान वेतन व मंहगाई भत्ते के 12 प्रतिशत से घटाकर 10 प्रतिशत कर देना।

भविष्य निधि खातों में ब्याज की दर बैंकों के बचत खातों और यहां तक कि मियादी जमा खातों की ब्याज दरों से काफी अधिक होता है। साथ ही हर साल जो ब्याज राशि में जुड़ जाता है, उस पर कोई कर नहीं लगता है। कर्मचारी भविष्य निधि मज़दूरों को सेवानिवृत्ति पर जीवन निर्वाह के लिये एक बड़ी रकम उपलब्ध कराती है। इसके अलावा, जमा राशि का एक अंश मज़दूर, बच्चों की शादी, घर निर्माण जैसे बड़़े खर्चों के लिये सेवानिवृत्ति के पहले भी निकाल सकते हैं।

अगर संशोधन विधेयक पास कर दिया जाता है तो मज़दूरों के ई.पी.एफ. खाते में मासिक योगदान में 16.7 प्रतिशत कमी होगी जिसका असर उसी अनुपात में सेवानिवृत्ति पर मिलने वाली रकम पर भी होगा। मज़दूरों के मासिक वेतन में मात्र दो प्रतिशत की बढ़ोतरी हो सकती है। अतः मज़दूरों को लंबे तौर पर बहुत बड़ा घाटा है जबकि फ़ायदा न के बराबर है। अगर एक मज़दूर वेतन में मिले अतिरिक्त धन को बैंक में भी जमा करा ले, तो आज की दरों के हिसाब से, 30 साल के बाद वह जमा राशि ई.पी.एफ. में उतने अतिरिक्त योगदान से बनी जमा राशि का मात्र एक चौथाई होगी।

ट्रेड यूनियनों ने इस संशोधन का विरोध किया है और ध्यान दिलाया है कि ई.पी.एफ. मज़दूरों के लिये सेवानिवृत्ति सुरक्षा के साथ-साथ बुरे वक्त के लिये राहत देन वाला पैसा भी होता है।

सरकार अपने प्रस्ताव को बेचने के लिये प्रचार कर रही है कि इससे हर महीने मज़दूरों की जेबों में ज्यादा पैसे आयेंगे। उसकी आशा है कि मज़दूर इस संशोधन को मान जायेंगे क्योंकि अधिकतर मज़दूरों को, बेरोज़गारी व वेतन कम होने के दबाव के रहते, बहुत मुश्किल आर्थिक परिस्थिति से गुजरना पड़ रहा है।

यूनियनों ने यह भी बताया है कि इस विधेयक में और भी प्रावधान हैं जो मज़दूर-विरोधी हैं। उदाहरण के लिये एक प्रावधान है कि मालिक को पांच साल के बकाया से अधिक राशि जमा नहीं करनी होगी जबकि उसने पांच साल से ज्यादा से भी अपना योगदान न भरा हो। विधेयक का मसौदा अभी तक आम तौर पर उपलब्ध नहीं है।

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी केन्द्र सरकार की निंदा करती है कि वह एक ऐसा संशोधन लाने की कोशिश में है जो पूंजिपतियों के फायदे के लिये मज़दूरों को नुकसान पहुंचायेगा।   

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Oct 16-31 2019    Struggle for Rights    Rights     2019   

पार्टी के दस्तावेज

8 जनवरी, 2020 की सर्व हिन्द आम हड़ताल को सफल करें!

मज़दूर एकता कमेटी का आह्वान

देश की दिशा पूंजीपतियों की अमीरी को बढ़ा रही है और मज़दूर, किसान व सभी मेहनतकशों को ग़रीबी में धकेल रही है। इस रास्ते का विरोध करने के लिए और देश की दौलत पर अपने अधिकार का दावा करने के लिए यह हड़ताल आयोजित की जा रही है।

मेहनतकशों का है यह नारा, हम हैं इसके मालिक! हिन्दोस्तान हमारा!

thumbपूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है। इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को। यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब, मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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