प्याज उत्पादकों की रोज़ी-रोटी पर हमला

सितंबर 2019 में देशभर के अधिकांश शहरों में प्याज की खुदरा क़ीमतें 200 प्रतिशत से अधिक बढ़ गईं। सितंबर में ज्यादातर शहरों में दाम 80 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गये, जबकि जुलाई से अगस्त के दौरान प्याज 20 से 25 रुपये प्रति किलो पर था। इसके जवाब में सरकार ने सभी प्रकार के प्याज निर्यात पर रोक लगा दी, प्याज व्यापारियों के भण्डारण पर सीमा लगा दी और कुछ जगहों पर केंद्रीय भंडार में रखा गया भंडार भी बाज़ार में निकाल दिया गया।

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प्याज की बढ़ती क़ीमतों पर सरकार की इस प्रतिक्रिया से किसान काफी नाराज़ हैं। नासिक जिले के लासलगांव में देश के सबसे बड़े थोक बाज़ार में किसानों के विरोध के बाद प्याज की बिक्री रोक दी गई। किसानों ने ए.पी.एम.सी. के सामने विरोध प्रदर्शन आयोजित किया जिससे प्याज की बिक्री को पूरी तरह रोकना पड़ा। इसके अलावा मुंबई-आगरा महामार्ग पर उमरन में और नासिक-औरंगाबाद महामार्ग पर विंसूर में ’रास्ता रोको’ आयोजित किया गया।

प्याज का उत्पादन करने वाले किसान बेहद नाराज़ हैं क्योंकि प्याज से होने वाली उनकी आमदनी पर गहरा असर पड़ा है। प्याज के उत्पादकों को पहले ही कम उत्पादन का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि भारी बारिश की वजह से केवल 20-30 प्रतिशत फ़सल ही बच पायी है। नवंबर-दिसंबर 2018 में प्याज की क़ीमतों में गिरावट के कारण भारी नुकसान सहने के बाद, कई किसानों ने आगामी रबी के मौसम में प्याज की फ़सल पहले ही कम कर दी थी। इस फ़सल में भी मार्च से जुलाई तक कम भाव आए। बीज, खाद और परिवहन की बढ़ती लागत, बाढ़ और बेमौसम बारिश से किसान और भी प्रभावित हुए हैं। राज्य सरकार गर्मियों में पानी की कमी और मानसून में बाढ़ से हुए फ़सल के नुकसान के लिए उन्हें किसी भी प्रकार की सहायता देने में असफल रही। तथ्य यही है कि बदलती सरकारों ने किसानों को उपज और फ़सल के नुकसान के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की लंबे समय से चली आ रही मांग को अनसुना किया है। हालांकि प्याज के निर्यात पर रोक और भण्डारण सीमा को लागू करना क्षणभर के लिए समाधान रूपी दिखता है, लेकिन इसने क़ीमतों में उतार-चढ़ाव के मूल कारण को उजागर नहीं किया है।

किसान हमेशा से ही बाज़ार पर निर्भर रहे हैं और व्यापारियों द्वारा क़ीमतों में गड़बड़ी के शिकार होते रहे हैं। जब प्याज की क़ीमतें बढ़ती हैं तो किसानों को कोई भी फ़ायदा नहीं होता, लेकिन क़ीमतें गिरने से किसानों को भारी नुकसान का सामना करना पड़ता है। प्याज के निर्यात पर रोक लगाए जाने से वे बहुत प्रभावित हुए हैं। यह एक जाना-माना तथ्य है कि किसानों को उनकी उपज के अधिकांश भाग के लिए जो आय प्राप्त होती है, वह उनके उत्पादन की लागत को भी पूरी नहीं कर पाती। उन्हें अक्सर अपनी उपज को थोक व्यापारियों को बहुत ही कम क़ीमतों में बेचने के लिए मजबूर होना पड़ता है। हाल ही में कई बार, उन्हें अपने उत्पादन का एक हिस्सा सड़क पर फेंकने के लिए मजबूर होना पड़ा है क्योंकि क़ीमतें इस स्तर तक गिर जाती हैं, कि उपज के परिवहन की लागत मंडियों की क़ीमत से भी अधिक हो जाती है। इस साल में भी कुछ ऐसा ही हुआ जब किसानों को अपनी उपज 2 से 3 रुपये प्रति किलोग्राम के नुकसान पर बेचने के लिए मजबूर होना पड़ा था।

मध्य प्रदेश के नीमच जिले के भीमसुख गांव का एक किसान 2 दिसंबर, 2018 के दिन अपनी 20 क्विंटल प्याज को बाज़ार ले गया था। वहां पर उसे अपनी उपज को 50 से 80 पैसे प्रति किलो की दर पर बेचना पड़ा इसका मतलब है कि उसे अपने पूरे उत्पाद के लिए केवल 1000 रुपये मिले। उसने प्याज को बाज़ार तक ले जाने के लिए 600 रुपये खर्च किए थे। उसके पास इतने सारे प्याज के भंडारण की कोई सुविधा भी नहीं थी; क़ीमत न मिलने से नाराज़ होकर उसने इस प्याज को जानवरों को खिला दिया। इसके बाद उसने प्याज का उत्पादन बंद कर दिया। नौ महीनों बाद, जब क़ीमतें बढ़ गयी हैं तब उसके पास कोई प्याज नहीं है!

यह स्थिति एक बार फिर से कृषि उत्पादकों के हितों के साथ-साथ शहरों में काम करने वाले लोगों के हितों की रक्षा के लिए राज्य द्वारा अपने कर्तव्य में असफल होने के मुद्दे को उठाती है। प्याज की क़ीमतों को नियंत्रित करने के नाम पर राज्य द्वारा उठाये गए क़दम शहर के लोगों के गुस्से से खुद को बचाने के लिए हैं। लेकिन इन क़दमों की वजह से प्याज के बढ़े हुए दामों की मार प्याज उत्पादकों को झेलनी पड़ रही है।

राज्य को किसानों के हितों की रक्षा करनी होगी। इसके लिए फ़सल की कटाई के समय प्याज की सारी फ़सल को लाभकारी दाम पर ख़रीदी की गारंटी देनी होगी, और सभी उत्पादन केन्द्रों के करीब प्रभावी तरीके से इसका भण्डारण करने के लिए ढांचा तैयार करना होगा। ऐसा करने से ही बड़े व्यापारियों, बड़े रिटेल चैनों की जकड़ को और खरीदी और दाम में की जा रही गड़बड़ी को ख़त्म किया जा सकेगा।

इसके बाद, एक सार्वजनिक वितरण व्यवस्था बनाई जानी चाहिए जो लोगों के लिए सस्ती क़ीमतों पर अच्छी गुणवत्ता में प्याज सहित सभी आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति करेगी। इसके उलट, आज जो भी सार्वजनिक वितरण व्यवस्था मौजूद है, राज्य उसे व्यवस्थित रूप से ख़त्म करने के लिए क़दम उठा रहा है। ऐसा करने से जब बाज़ार में वस्तुओं की कमी होती है तब मेहनतकश लोगों को जमाखोरों की दया पर छोड़ दिया जाता है और जब अधिक उत्पादन होता है तब फ़सल ख़रीदी की गारंटी के अभाव में उत्पादक को नुकसान उठाना पड़ता है।

किसान द्वारा झेले जा रहे संकट तब तक समाप्त नहीं होंगे जब तक कि उनकी आजीविका को सुरक्षित रखने के लिए अर्थव्यवस्था का पुर्नगठन नहीं किया जाता। यह एकमात्र तरीक़ा है जिससे कृषि उत्पादकों को इंसान लायक जीवन की गारंटी दी जाएगी और आम आबादी को अच्छी गुणवत्ता और सस्ती क़ीमतों पर आवश्यक वस्तुएं प्रदान की जाएंगी। इस सांझे उद्देष्य के लिए एक क़दम है, जिसमें मज़दूरों और किसानों को एक साथ जुड़कर एक नई व्यवस्था की स्थापना के लिए संघर्ष करना चाहिए। एक नई व्यवस्था जो शहरों और ग्रामीण इलाकों के सभी मेहनतकशों के हित में काम करेगी और उनकी सुख-सुरक्षा सुनिष्चित करेगी।

 

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Oct 16-31 2019    Struggle for Rights    Rights     2019   

पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

 

5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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