पी.एम.सी. बैंक घोटाला : पूंजीपतियों और बैंक प्रबंधन की सांठ-गांठ से लोगों के धन की लूट

26 सितम्बर, 2019 को बैंक के खातों में गड़बड़ी नज़र आने की वजह से भारतीय रिज़र्व बैंक ने पंजाब एंड महाराष्ट्र कोआपरेटिव (पी.एम.सी.) बैंक के प्रबंध निदेशक और निदेशक मंडल को निलंबित कर दिया। पी.एम.सी. बैंक का मुख्यालय मुंबई में स्थित है। रिज़र्व बैंक ने अपनी इजाज़त बगैर पी.एम.सी. बैंक को किसी भी कर्ज़ का नवीकरण करने या नए कर्ज़ देने पर रोक लगा दी। बैंक के खाताधारकों को बताया गया कि वह अगले 6 महीनों में बैंक से ज्यादा से ज्यादा केवल 1000 रुपये ही निकाल सकते हैं। इससे बैंक के 9 लाख से अधिक खाताधारकों को बड़ा धक्का लगा और गुस्सा आया, जिनकी जमापूंजी बैंक में फंस गयी है।

pmc_depositor_ withdrawing_moneyShocked bank depositors queue to get their money
pmc_depositors_demonstrationDepositors demonstrate in front PMC Bank

पी.एम.सी. बैंक देश के 10 सबसे बड़े सहकारी बैंकों में से एक है। 31 मार्च, 2019 को इसके पास कुल 11,617 करोड़ रुपये की राशि जमा थी और 8,383 करोड़ रुपये का बकाया कर्ज़ था। छः राज्यों में इसकी 137 शाखाएं थीं, जिनमें से एक-तिहाई मुंबई में स्थित थी।

अब तक की गयी जांच से पता चलता है कि पिछले कई वर्षों से बैंक के साथ बहुत बड़ी धोखाधड़ी की जाती रही है। पी.एम.सी. बैंक के अधिकारी 2008 से अगस्त 2019 तक रिज़र्व बैंक में साल दर साल फर्ज़ी दस्तावेज़ जमा करते रहे ताकि उसके गैर-निष्पादित कर्ज़ को छुपाया जा सके। हाल में की गई जांच से यह पता चला है कि केवल एक कंपनी, हाउसिंग डेवलपमेंट एंड इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड (एच.डी.आई.एल.) के पास बैंक का 6,500 करोड़ का कर्ज़ बकाया है, जो कि बैंक के कुल कर्ज़ का 73 प्रतिशत है। यह पूरी तरह से रिज़र्व बैंक के नियमों के खि़लाफ़ था।

एच.डी.आई.एल. और पी.एम.सी. के बीच सांठ-गांठ को छुपाने के लिए बैंक प्रबंधन ने एच.डी.आई.एल. के 44 कर्ज़ खातों को 21,049 दिखावटी खातों में बदल लिया था। पी.एम.सी. बैंक और एच.डी.आई.एल. के अधिकारियों के खि़लाफ़ दर्ज़ की गयी एफ.आई.आर. में 4,355 करोड़ रुपये के गबन और जानबूझकर किये गए नुकसान के आरोप के साथ-साथ एच.डी.आई.एल. के खि़लाफ़ धोखाधड़ी का आरोप लगाया है।

खाताधारकों के लिए सबसे नुकसानदेह बात यह है कि एच.डी.आई.एल. ने 21 अगस्त को खुद को दिवालिया करार देने की अर्जी दी है। इसलिए अब कर्ज़ों की रकम वापस आने की कोई गुंजाईश नहीं है। जमा राशि बीमा एवं क्रेडिट गारंटी (डी.आई.सी.जी.सी.) के तहत जमाकर्ता को 1 लाख रुपये तक की सुरक्षा मिलती है, लेकिन हजारों जमाकर्ताओं के लिए यह छोटी सी संतावना किसी काम की नहीं है। बैंक में जमा कुल राशि की केवल 44 प्रतिशत तक की रकम ही इस बीमा के दायरे में आएगी।

व्यक्तिगत जमाकर्ताओं के अलावा 1500 क्रेडिट कोआपरेटिव सोसाइटियों ने पी.एम.सी. बैंक में अपना पैसा जमा किया हुआ है। हाऊसिंग सोसाइटियों की दसों लाखों रुपये की रकम इस बैंक में फंस गयी है।

पी.एम.सी. के जमाकर्ताओं के गुस्से की कोई सीमा नहीं रही जब उन्हें पता चला कि बैंक के अध्यक्ष वार्यम सिंह, एच.डी.आई.एल. और एक और अन्य सहयोगी कंपनी के प्रमोटर वाधवन परिवार के पारीवारिक-मित्र हैं। वार्यम सिंह कई वर्षों के लिए दोनों ही कंपनियों के निदेशक मंडल का हिस्सा भी थे।

पी.एम.सी. बैंक के जमाकर्ताओं को हो रही भारी मुसीबत के चलते मुंबई में कई बार विरोध प्रदर्शन आयोजित किये जा चुके हैं। बैंक के खाताधारक और कर्मचारी दोनों ही पी.एम.सी. बैंक और रिज़र्व बैंक को इस संकट के लिए ज़िम्मेदार मानते है। बैंक की एक सबसे पुरानी खाताधारक दामिनी पटेल ने बताया कि “बैंक के एक निदेशक रणजीत सिंह, चार-बार भाजपा की ओर से विधायक रह चुके सरदार तारा सिंह के पुत्र हैं। यह एक खुला राज़ है कि पी.एम.सी. बैंक रिज़र्व बैंक के नियमों का बेधड़क उल्लंघन इसलिए कर पाया और लोगों के पैसों का अपनी मनमर्ज़ी से इस्तेमाल कर पाया क्योंकि उसे अपनी राजनीतिक पार्टी से संरक्षण प्राप्त था। और अब वही लोग हमें अपना विरोध प्रदर्शन करने से भी रोक रहे हैं।”

एक अन्य खाताधारक ने बताया कि “यह त्योहारों का समय है। मोदी सरकार ने हम सभी को ‘पेपर-लेस’ लेन-देन करने के लिए मजबूर किया। आज हम न केवल ‘पेपर-लेस’ बल्कि पूरी तरह से ‘कैश-लेस’ है, यानी कंगाल हो गए हैं।” तनाव और इलाज के लिए बैंक से अपना पैसा नहीं निकाल पाने की वजह से तीन खाताधारक अपनी जान गंवा चुके हैं।

जमाकर्ता चाहते हैं कि राज्य सरकार इस मामले में हस्तक्षेप करे। कई हाउसिंग सोसाईटियां सरकार को दोष दे रही हैं, जिसने सोसाईटियों का सारा पैसा इन सहकारी बैंकों में जमा करने के लिए मजबूर किया। कई लोगों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उनकी सुनवाई करने या कोई हस्तक्षेप से साफ इंकार कर दिया है।

शुरुआत में रिज़र्व बैंक ने खाताधारकों को छः महीने में केवल 1000 रुपये निकालने की अनुमति दी थी। लेकिन लोगों के विरोध प्रदर्शन की वजह से इस सीमा को 1,000 रुपये से बढ़ाकर 10,000 रुपये करने पर मजबूर होना पड़ा और बाद में उसे 25,000 रुपये कर दिया गया।

पी.एम.सी. बैंक जमाकर्ता एसोसिएशन का गठन किया गया है। एसोसिएशन ने मुंबई उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की है जिसमें सभी खाताधारकों के लिए उनकी 100 प्रतिशत रकम की सुरक्षा की गारंटी की मांग की है, न कि केवल एक लाख रुपये तक।

एक समय ऐसा था जब पी एम.सी. को एक मजबूत बैंक मना जाता था और इस वजह से तीन कमजोर सहकारी बैंकों, कोल्हापुर जनता सहकारी बैंक लिमिटेड (कोल्हापुर), जयशिवराय सहकारी बैंक लिमिटेड (नांदेड) और चेतना सहकारी बैंक (कर्नाटक) इनका 2008, 2009 और 2010 में पी.एम.सी. बैंक के साथ विलय किया गया था।

पी.एम.सी. बैंक के मामले में यह बिलकुल स्पष्ट है कि लोगों की जीवनभर की जमा पूंजी को लूटने के लिए एच.डी.आई.एल. के पूंजीपति मालिकों ने बैंक के निदेशकों के साथ साठ-गांठ की। लोगों ने यह पैसा बैंक में इस भरोसे के साथ रखा था कि उनका पैसा बैंक में सुरक्षित है और ज़रूरत के समय उपलब्ध रहेगा। किसी एक कर्ज़दार को दिए जाने वाले कर्ज़ के लिए रिज़र्व बैंक के नियमों के तहत लगाई गयी सीमा का खुल्लम-खुल्ला उल्लंघन किया गया। इसके अलावा बैंक के नियामक संस्थान - आंतरिक एवं कानूनी ऑडिटर, रिज़र्व बैंक और राज्य सरकार अपनी ज़िम्मेदारी पूरी करने में नाक़ामयाब रहे।

सहकारी बैंक

जिन सहकारी समितियों को बैंक की तरह चलाया जाता है वे सहकारी बैंक होती हैं। इनका जन्म सहकारी क्रेडिट समितियों की संकल्पना से हुआ, जहां किसी एक समुदाय/समूह के लोग मिलकर अपनी बचत की रकम को एकत्रित करके निधि के रूप रखते हैं। ज़रूरत पड़ने पर इस निधि से किसी भी सदस्य को कम ब्याज दर पर कर्ज़ दिया जाता है। इस तरह के बैंकों ने शहरी इलाकों में छोटे व्यापार और स्थानीय समुदायों को बैंकिंग सेवाएं प्रदान करने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है।

शुरुआती दौर में सहकारी बैंकों को सहयोग के सिद्धांत के आधार पर चलाया जाने वाला एक उद्यम माना जाता था। ये सिद्धांत थे - आपसी मदद, फैसले लेने की जनतांत्रिक प्रणाली और खुली सदस्यता। आज के दौर में ये बैंक किसी अन्य बैंकिंग संस्थान की तरह बन गए हैं जहां अधिक धनबल और राजनीतिक रुतबे वाले लोग बैंकों पर अपना वर्चस्व चलाते हैं और इस संगठन को अपने निजी हितों को पूरा करने के लिए इस्तेमाल करते हैं। बिना किसी सज़ा के डर के ऑडिट एवं अन्य नियमों का उल्लंघन किया जाता है। नियामक संस्थाएं इन कानूनों और नियमों का उल्लंघन करने वालों के साथ सांठ-गांठ में चलती हैं और भोली-भाली जनता इनका शिकार बनती है।

महाराष्ट्र में जहां सहकारी बैंक आंदोलन की शुरुआत हुई थी, वहां ये बैंक राजनीतिक पार्टियों और पूंजीपतियों के हाथों में एक कठपुतली बन गए हैं। सहकारी बैंकों और संस्थाओं पर नियंत्रण का मतलब है राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक सत्ता पर पूरा नियंत्रण। इन सहकारी बैंकों और संस्थाओं के निदेशक और अध्यक्ष राज्य और देश के स्तर के चुनावों में उम्मीदवार बनकर खड़े होते हैं। चीनी के कारखानों, सूत कताई मिलों, कृषि-आधारित उत्पादों, क्रेडिट सोसाइटी और बैंकों की हजारों सहकारी संस्थाओं को विशाल वित्तीय एवं राजनीतिक सत्ता के केन्द्रों में परिवर्तित किया गया है।

इन बैंकों को निजी जागीर की तरह चलाया जाता है, जहां दोस्तों और रिश्तेदारों को अलाभकारी परियोजनों के लिए कर्ज़ दिए जाते हैं, जिससे जमाकर्ताओं को बहुत जोखिम होता है और अंत में ये बैंक बर्बाद हो जाते हैं।

इन सहकारी बैंकों की वित्तीय निगरानी के लिए भारतीय रिज़र्व बैंक ज़िम्मेदार है, लेकिन इसके प्रबंधन की निगरानी राज्य और केंद्र सरकार द्वारा की जाती है। इस तरह के दोहरे नियंत्रण के चलते इन सहकारी बैंकों को आसानी से धोखाधड़ी और लूट का निशाना बनाया जा सकता है।

 

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Nov 1-15 2019    Struggle for Rights    Rights     2019   

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