बी.एस.एन.एल. के एक्जीक्यूटिव्स एसोसियेशन के महासचिव कामरेड सेबास्टिन के साथ साक्षात्कार

बी.एस.एन.एल. के निजीकरण की सरकार की योजना का विरोध करें

सार्वजनिक क्षेत्र की टेलीकाम सेवा प्रदाता कंपनी, भारत संचार निगम लिमिटेड (बी.एस.एन.एल.) के निजीकरण को उचित ठहराने के लिये सरकार काफी प्रचार करती आयी है। इस सरकारी कंपनी की विशाल सम्पत्ति को सरकार बड़े इजारेदार पूंजीवादी घरानों के हाथों में कौड़ियों के दाम पर बेच देना चाहती है। बी.एस.एन.एल. के कर्मचारी इस क़दम के विरोध में संघर्ष कर रहे हैं।

मज़दूर एकता लहर ने कामरेड सेबास्टिन जो बी.एस.एन.एल. एक्जीक्यूटिव्स एसोसियेशन के महासचिव हैं, के साथ साक्षात्कार किया। उन्होंने कंपनी के इतिहास, अपने देश के टेलीकाम क्षेत्र के विकास के बारे में और बी.एस.एन.एल. के निजीकरण के वर्तमान क़दमों के बारे में विस्तार से समझाया। हम उनके साथ हुई वार्ता के कुछ अंश यहां पेश कर रहे हैं।

मज़दूर एकता लहर (म.ए.ल.) : बी.एस.एन.एल. की शुरुआत कब हुई थी?

का. सेबास्टिन : हिन्दोस्तानी सरकार के दूरसंचार विभाग की विभिन्न शाखाओं के निगमीकरण के ज़रिये बी.एस.एन.एल. की स्थापना 10 जनवरी, 2000 को की गयी थी।

म.ए.ल. : बी.एस.एन.एल. के शुरुआती उद्देश्य क्या थे?

का. सेबास्टिन : टेलीकाम क्षेत्र को विकसित करने में बढ़ावा देने के लिये सरकार ने बी.एस.एन.एल. को शुरू किया था। इसे एक सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम बतौर विकसित किया गया था जो निजी कंपनियों के साथ-साथ टेलीकाम क्षेत्र में सेवा प्रदान करेगा। यह भी सोच थी कि बी.एस.एन.एल. एक नियामक की भूमिका भी अदा करेगा, जो अपने देश के टेलीकाम क्षेत्र की सभी कंपनियों के लिये संचालन के मानक स्थापित करेगा। इसकी स्थापना के साथ ही टेलीकाम क्षेत्र के 3.25 लाख कर्मचारियों को वेतन देने की ज़िम्मेदारी बी.एस.एन.एल. को दे दी गयी।

म.ए.ल. : आज बी.एस.एन.एल. की सम्पत्ति का मूल्य कितना होगा? यह किस प्रकार की सम्पत्ति है?

का. सेबास्टिन : दिल्ली और मुंबई सहित, देश के हर शहर, कस्बे और गांव के प्रमुख इलाकों में बी.एस.एन.एल. की ज़मीनें हैं। इसकी सम्पत्ति भारतीय रेल के बाद दूसरे स्थान पर है। 2014 की सरकारी दर पर ए, बी व सी1 श्रेणी के नगरों में ही इसकी ज़मीन की क़ीमत 1,15,000 करोड़ रुपये थी। आज की क़ीमतों पर, छोटे शहरों व गांवों में स्थित ज़मीनों को मिलाकर, इनका मूल्य 3,00,000 करोड़ रु. से भी ज्यादा है।

बी.एस.एन.एल. के पास सबसे ज्यादा फाइबर नेटवर्क है जो 7.5 लाख किमी से भी ज्यादा है। बी.एस.एन.एल. का फाइबर पूरे देश के कोने-कोने में फैला हुआ है। तुलना में रिलायंस जियो का फाइबर नेटवर्क 3.25 लाख किमी है, एयरटेल का 2.5 लाख किमी और वोडाफोन-आयडिया का 1.6 लाख किमी है।

बी.एस.एन.एल. के पास 66,000 टावर हैं जो अन्य टेलीकाम आपरेटरों की तुलना में तीसरे नम्बर पर है।

म.ए.ल. : 2008-09 तक बी.एस.एन.एल. एक मुनाफ़ेदार उद्यम रहा है। इसे घाटे में चलने वाला बनाने के लिये कौन से क़दम जिम्मेदार हैं?

का. सेबास्टिन : सरकार ने बी.एस.एन.एल. को ग्रामीण व देश के दूर-दराज़ के इलाकों में टेलीकाम सेवा प्रदान कराने की ज़िम्मेदारी सौंपी थी। ग्रामीण व देश के दूर-दराज़ के इलाकों में बी.एस.एन.एल. 17 से 18 हजार टेलीफोन एक्सचेंजों की देखरेख करता है। सन 2000 में, केन्द्रीय मंत्रीमंडल ने घोषणा कर दी थी कि सरकार ”बी.एस.एन.एल. की वित्तीय व्यवहारिकता की ज़िम्मेदारी लेगी“, यानी कि दूर-दराज़ के इलाकों में सेवा प्रदान करने से होने वाले घाटे को सरकार वहन करेगी। लेकिन 2006 के बाद, सरकार द्वारा दी जाने वाली सहायता ख़त्म कर दी गयी। दूसरी तरफ, सरकार ने टेलीकाम क्षेत्र में निजी कंपनियों के हितों को आगे बढ़ाने के बहुत से क़दम लिये।

इंटरकनेक्ट यूसेज चार्ज (आई.यू.सी.) एक मोबाइल टेलीकाम कंपनी द्वारा दूसरी टेलीकाम कंपनी को तब दिया जाता है जब उस कंपनी का कॉल दूसरी कंपनी के ज़रिये पूरी होती है। सरकार ने आई.यू.सी. को बहुत घटाया ताकि निजी टेलीकाम कंपनियों को फ़ायदा हो।

2006 तक, बी.एस.एन.एल. का प्रति वर्ष मुनाफ़ा 5000 से 6000 करोड़ रुपये था। इसकी सेवा का प्रसार एयरटेल के बराबर था। 2007-2013 के बीच में सरकार ने तरह-तरह के बहाने देकर, बी.एस.एन.एल. के चार मोबाइल टेंडर रद्द कर दिए, जिनकी क्रमशः 455 लाख, 930  लाख, 2007-2013 के बीच में सरकार ने तरह-तरह के बहाने देकर, बी.एस.एन.एल. के चार मोबाइल टेंडर रद्द कर दिये, जिनकी क्रमशः 455 लाख, 930  लाख,  150 लाख और 50 लाख मोबाइल कनेक्शनों की क्षमता थी। 2013 तक सरकार ने बी.एस.एन.एल. को चीन में उत्पादित उपकरणों को सीमावर्ती इलाकों में इस्तेमाल करने पर रोक लगा रखी थी, जबकि निजी कंपनियों पर ऐसी कोई रोक नहीं थी। इससे देश के उत्तरी व पूर्वी इलाकों में बी.एस.एन.एल. के विस्तार में बहुत रुकावट आई। 2013 में इन प्रतिबंधों को हटाने के बाद 2016 तक बी.एस.एन.एल. में बढ़ोतरी आई।

2016 के सितम्बर में, वर्तमान सरकार के समर्थन व प्रोत्साहन में, रिलायंस जियो ने अपनी सेवाओं की शुरुआत की। टेलीकाम नियामक प्राधिकार (टी.आर.ए.आई.) के ज़रिये सरकार ने रिलायंस जियो को 6 महीने के लिये निःशुल्क सेवा प्रदान करने की अनुमति दी (जबकि उसके अपने नियमों के अनुसार निःशुल्क सेवा सिर्फ 3 महीनों के लिये ही दी जा सकती है।) उसने रिलायंस जियो के परभक्षी मूल्य निर्धारण को नज़र अंदाज़ किया।

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इसका यह नतीजा हुआ कि, पिछले तीन वर्षों में दूसरे निजी क्षेत्र की टेलीकाम कंपनियां के मुनाफे़ 40 से 45 प्रतिशत घट गये हैं जो बी.एस.एन.एल. के घाटे से बहुत ज्यादा हैं। एयरसेल, रिलायंस इन्फोकाम, टाटा टेलीसर्विसेज, डोकोमो, टेलीनॉर, सिस्टेमा तथा अन्य कई कंपनियों को बंद करना पड़ा है जबकि वोडाफोन व आइडिया का विलय हो गया है।

सरकार ने बी.एस.एन.एल. को 4जी नीलामी में इस बहाने से भाग नहीं लेने दिया कि वह सार्वजनिक क्षेत्र का उद्यम है और उसे निजी कंपनियों के साथ खुली नीलामी में भाग नहीं लेना चाहिये। दरअसल, ऐसा निजी कंपनियों के हित में किया गया था और यह दिखाने के लिये कि बी.एस.एन.एल. दूसरी कंपनियों के मुक़ाबले “अच्छी सेवा प्रदान करने में असमर्थ” है ताकि उसे बंद करने की वजह बतौर दिखाया जा सके। बी.एस.एन.एल. मज़दूरों के लंबे आंदोलन के बाद, 2017 में ही संचार मंत्री ने स्वीकार किया कि बी.एस.एन.एल. को 4जी स्पेक्ट्रम दिया जाना चाहिये। परन्तु अभी तक ऐसा नहीं किया गया है।

सरकार ने बी.एस.एन.एल. को अपने कारोबार को बढ़ाने के लिये सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से ऋण लेने पर रोक लगाई रखी है। दूसरी निजी क्षेत्र की टेलीकाम कंपनियों को एक लाख करोड़ से भी अधिक के ऋण लेने दिये गये हैं जबकि बैंकों से लिये उनके पहले के बड़े-बड़े ऋण हैं। निजी कंपनियों के ऋण 4,25,000 करोड़ से भी अधिक हैं (वोडाफोन आइडिया का 1,18,000 करोड़, एयरटेल के 1,08,000 करोड़ और रिलायंस जियो के 1,12,000 करोड़ के ऋण शामिल हैं)। दूसरी तरफ बी.एस.एन.एल. पर बैंकों से लिये ऋण सबसे कम हैं, तकरीबन 20,000 करोड़ रुपये।

बी.एस.एन.एल. के निदेशक मंडल के रिक्त पदों को सरकार नियमित तौर पर नहीं भर रही है। कुछ पदों को अस्थायी रूप से भरा गया है। कम से कम एक पद पिछले 6 साल से खाली पड़ा है।

म.ए.ल. : बी.एस.एन.एल. को निजी हाथों में बेचने की सफाई में सरकार व मीडिया क्या प्रचार कर रहे हैं?

का. सेबास्टिन : सरकार व मीडिया यह कह रहे हैं कि सरकारी टेलीकाम कंपनी की अब कोई ज़रूरत नहीं है क्योंकि निजी कंपनियां ज़रूरी सेवाएं प्रदान कर रही हैं। वे यह भी दावा कर रहे हैं कि बी.एस.एन.एल. एक घाटे में चलने वाली कंपनी है जबकि पिछले 19 वर्षों में बी.एस.एन.एल. का कुल मिलाकर घाटा सिर्फ 16,613 करोड रुपये है और कंपनी की शुद्ध सम्पत्ति 3,50,000 करोड़ रुपये है।

सरकार एक और बहाना दे रही है कि बी.एस.एन.एल. को चलाने का मतलब राज्य के खजाने को तेज़ी से खाली करना। यह सरासर झूठ है। पिछले 19 वर्षों से बी.एस.एन.एल. सरकार के टेलीकाम विभाग के 3,25,000 कर्मचारियों का वेतन, जिन्हें अक्तूबर 2000 में बी.एस.एन.एल. में ले लिया गया था, अपनी सेवा से कमाये धन से देता आया है (जो अब तक करीब 1,50,000 करोड़ रुपये है)। इसके अलावा, बी.एस.एन.एल. ने हजारों करोड़ों रुपयों का भुगतान स्पैक्ट्रम शुल्क, लाईसेंस शुल्क, यू.एस.ओ. फंड योगदान, आयकर, सेवाकर, जी.एस.टी., पेंशन योगदान, इत्यादि के लिये किया है।

जैसे-जैसे सरकार बी.एस.एन.एल. को निजी हाथों में बेचने की तैयारी कर रही है, वह प्रचार कर रही है कि बी.एस.एन.एल. को बचाना नामुमकिन है। यह सच नहीं है। 2014-15, 2015-16 और 2016-17 में भी, परभक्षी मूल्य निर्धारण वाली नीति के साथ रिलायंस जियों की शुरुआत तक, यानी कि लगातार तीन सालों तक, बी.एस.एन.एल. ने परिचालन मुनाफ़ा कमाया है। अगर रिलायंस जिओ को सरकार परभक्षी मूल्य निर्धारण करने की अनुमति नहीं देती, तो 2019-20 तक बी.एस.एन.एल. मुनाफ़ेदार कंपनी बन जाती। बी.एस.एन.एल. ही है जो दूसरी कंपनियों से भी ज्यादा रिलायंस जियो को टक्कर दे रही है। हाल ही में शुरू किये गये रिलायंस जियो गीगा फाइबर प्लान्स भी पूरी तरह असफल हो गये हैं क्योंकि बी.एस.एन.एल. के एफ.टी.टी.एच. प्लान्स रिलायंस जियो के प्लान्स से 5 गुना बेहतर हैं। बी.एस.एन.एल. के कर्मचारी बहुत ही मेधावी हैं और अपने काम के प्रति समर्पित हैं।

म.ए.ल. : निजी हाथों में बी.एस.एन.एल. के बिकने के बाद लोगों के हितों पर क्या प्रभाव पड़ेगा, खास तौर पर ग्रामीण इलाकों में रहने वाले या दूर-दराज के इलाकों में रहने वाले लोगों पर?

का. सेबास्टिन : बी.एस.एन.एल. को निजी हाथों में बेचना पूरी तरह लोगों के हितों के खि़लाफ़ है।

देश के ग्रामीण व दूर-दराज के इलाकों में, सरहदी इलाकों में और उच्च सुरक्षा वाले स्थानों में बी.एस.एन.एल. ही एकमात्र विश्वसनीय टेलीकाम सेवा प्रदाता है। बी.एस.एन.एल. का फाइबर नेटवर्क देश के कोने-कोने तक जाता है। उदाहरण के लिये, जम्मू और कश्मीर में मौजूदा हालातों में, सरकारी कर्मियों व घाटी में तैनात सुरक्षा बलों को सेवा प्रदान करने के लिये सरकार पूरी तरह से बी.एस.एन.एल. पर निर्भर है। सभी सुरक्षा बल, बैंक, डाकखाने, राष्ट्रीय मिशन परियोजनाएं, इत्यादि सिर्फ बी.एस.एन.एल. की सेवाओं का इस्तेमाल करते हैं।

पूरा भारतनेट नेटवर्क व डिजिटल इंडिया परियोजना पूरी तरह से बी.एस.एन.एल. पर निर्भर है। हिन्दोस्तानी सेना की नेटवर्क फॉर स्पैक्ट्रम परियोजना बी.एस.एन.एल. द्वारा दी जा रही है। सशस्त्र बलों को बिना रुकावट नेटवर्क प्रदान करने में बी.एस.एन.एल. की बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका है।

प्राकृतिक आपदाओं के दौरान व दूसरी आपात्कालीन परिस्थितियों में सरकारी एजेंसियां पूरी तरह से बी.एस.एन.एल. पर निर्भर रहती हैं, मुश्किल परिस्थितियों में सारे कर्मचारी सेवा प्र्रदान करते हैं। निजी कंपनियां ऐसी परिस्थितियों में सेवा प्रदान नहीं करती क्योंकि वहां बड़ा मुनाफ़ा कमाना संभव नहीं होता है।

बी.एस.एन.एल. की भूमिका टेलीकाम उद्योग में शुल्कों के नियामन में भी है। अगर बी.एस.एन.एल. नहीं होता था तो निजी कंपनियां अपनी आपसी सांठ-गांठ बनाकर आने व जाने वाली कॉलों की दर को बहुत बढ़ा देतीं, जैसा कि इस क्षेत्र में बी.एस.एन.एल. के आने के पहले होता था।

म.ए.ल. : अभी बी.एस.एन.एल. के कर्मचारियों को किस परिस्थिति का सामना करना पड़ रहा है?

का. सेबास्टिन : सभी तरह के भुगतानों में देरी हो रही है चाहे वह कर्मचारियों का वेतन के लिये हो, दूसरे कार्यों के लिये हो, बिजली बिल भरने के लिये हो, किराया देने के लिये हो या विक्रेताओं के लिये हो। कर्मचारी बहादुरी से जनता के प्रति ज़िम्मेदारी को निभाने के लिये काम करते जा रहे हैं। लेकिन अब धैर्य टूटने लगा है।

म.ए.ल. : निजीकरण से कर्मचारियों पर क्या असर होगा?

का. सेबास्टिन : बी.एस.एन.एल. में 1,63,000 नियमित कर्मचारी हैं। इनमें से 38,000 सन 2000 के बाद नियुक्त किये गये हैं। वे 25 से 45 वर्ष की उम्र के हैं। अगर बी.एस.एन.एल. का निजीकरण होता है तो वे सब अपनी नौकरी खो देंगे। इसके अलावा एक लाख और लोग हैं जिनकी जीविका बी.एस.एन.एल. में ठेके के काम या दूसरे अनियमित काम की मज़दूरी पर चलती है। ये छोटे-छोटे कारखानों में काम करने वाले मज़दूर हैं जो बी.एस.एन.एल. को माल बेचते हैं।

म.ए.ल. : आने वाले समय में संघर्ष या कार्यवाइयों का क्या रास्ता होगा?

का. सेबास्टिन : दिवाली तक हम आशा करते हैं कि सरकार बी.एस.एन.एल. के पुनर्जीवन की किस योजना का प्रस्ताव रखेगी। अगर यह समय पर नहीं होता, तब नवम्बर के मध्य से बी.एस.एन.एल. के कर्मचारी एम.टी.एन.एल. के कर्मचारियों के साथ मिलकर अलग-अलग तरह के आंदोलन करेंगे। एम.टी.एन.एल. के कर्मचारियों पर भी निजीकरण की तलवार लटक रही है।

म.ए.ल. : केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों ने 8 जनवरी, 2020 को एक सर्व हिन्द हड़ताल का बुलावा दिया है। इसका एक अहम अजेंडा निजीकरण के ख़िलाफ़ संघर्ष है। क्या बी.एस.एन.एल. के कर्मचारी इस आंदोलन में भाग लेने की तैयारी कर रहे हैं?

का. सेबास्टिन : ऐतिहासिक तौर पर बी.एस.एन.एल. के कर्मचारी केन्द्रीय ट्रेड यूनियने द्वारा हड़ताल के हर बुलावे में भाग लेते आये हैं। इस बार अफ़सरों के संगठन ने भी इस हड़ताल में शामिल होने का ऐलान किया है। 8 जनवरी, 2020 की हड़ताल में हम अवश्य जोशपूर्ण तरीके से भाग लेने वाले हैं और निजीकरण के खि़लाफ़ अपना विरोध प्रकट करने वाले हैं।

म.ए.ल. : का. सेबास्टिन बी.एस.एन.एल. के निजीकरण के बारे में सरकार की योजनाओं की सच्चाई को उजागर करने के लिये हम आपको धन्यवाद देना चाहते हैं। हम आपके संघर्ष का पूरी तरह से समर्थन करते हैं और सरकार द्वारा किये जा रहे निजीकरण को वापस कराने के संघर्ष में, हम आपको सफलता की शुभकामना देते हैं।

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Nov 1-15 2019    Struggle for Rights    Rights     2019   

पार्टी के दस्तावेज

8 जनवरी, 2020 की सर्व हिन्द आम हड़ताल को सफल करें!

मज़दूर एकता कमेटी का आह्वान

देश की दिशा पूंजीपतियों की अमीरी को बढ़ा रही है और मज़दूर, किसान व सभी मेहनतकशों को ग़रीबी में धकेल रही है। इस रास्ते का विरोध करने के लिए और देश की दौलत पर अपने अधिकार का दावा करने के लिए यह हड़ताल आयोजित की जा रही है।

मेहनतकशों का है यह नारा, हम हैं इसके मालिक! हिन्दोस्तान हमारा!

thumbपूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है। इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को। यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब, मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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