कामरेड सुभाष मराठे, महासचिव, बी.पी.सी.एल क्रेडिट सोसाइटी, मुंबई के साथ साक्षात्कार

भारत पेट्रोलियम के निजीकरण के फैसले की हम निंदा करते हैं!

मज़दूर एकता लहर (म.ए.ल.): क्या आप 26 अक्तूबर, 2019 को मुंबई में आयोजित तेल एवं पेट्रोलियम मज़दूरों के राष्ट्रीय अधिवेशन में बारे में हमें कुछ बतायेंगे?

BPCL workers demonstration

कामरेड सुभाष मराठे (एस.एम.): यह अधिवेशन ओ.एन.जी.सी., आई..सी., और एच.पी.सी.एल. में काम कर रहे मज़दूरों की विभिन्न ट्रेड यूनियनों द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किया गया था। इसमें से कुछ यूनियनें अन्य संगठनों से जुड़ी हैं तो कुछ स्वतंत्र हैं। इस सम्मेलन में देशभर से तेल एवं पेट्रोलियम क्षेत्र के सार्वजनिक उपक्रमों के मज़दूरों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया।

इसके अलावा ऑर्डनेन्स फैक्ट्री, रेल, राज्य परिवहन, बैंक और गोदी (डॉक) के मज़दूरों के प्रतिनिधि भी इस अधिवेशन में शामिल हुए।

...: सरकार द्वारा बी.पी.सी.एल. का निजीकरण करने के इरादे के प्रति यूनियनों की क्या प्रतिक्रिया है?

एस.एम.: हम पेट्रोलियम क्षेत्र के मज़दूर यह साफ देख रहे हैं कि सरकार सभी कार्यकुशल और मुनाफ़ेदार सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को पहले बीमार बनाने और उसके बाद उनका निजीकरण करने की नीति अपना रही है।

यही हाल तेल एवं पेट्रोलियम क्षेत्र के सार्वजनिक उपक्रमों का है। एच.पी.सी.एल और बी.पी.सी.एल. का निजीकरण करने का फैसला 2016 में ही ले लिया गया था। उस समय पुराने पड़ चुके कानूनों को बदलकर नए कानून बनाने के नाम पर केंद्र सरकार ने 2016 में “निरस्त एवं संशोधन अधिनियम 2016” पारित किया था। इस अधिनियम की वजह से “187 कालबाह्य और निष्क्रिय कानूनों को जो कानून की किताबों में बेकार पड़े हुए हैं” उनको ख़त्म कर दिया गया था। कानून के इस संशोधन के साथ सरकार ने 1976 के उस अधिनियम को भी ख़त्म कर दिया जिसके तहत उस समय की ब्रिटिश कंपनी बर्मा शैल और अमरीकी कंपनी एस्सो का राष्ट्रीकरण करते हुए क्रमशः बी.पी.सी.एल. और एच.पी.सी.एल. बनायी गयीं।

2003 में अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई में राजग की सरकार ने बी.पी.सी.एल. और एच.पी.सी.एल. में सरकार की 51 प्रतिशत हिस्सेदारी में से 34 प्रतिशत हिस्सेदारी को किसी रणनैतिक सांझेदार को बेचने के साथ उसका प्रबंध नियंत्रण देना चाहती थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस पर रोक लगा दी और बताया कि बी.पी.सी.एल. और एच.पी.सी.एल. का निजीकरण तभी संभव होगा जब 1976 के राष्ट्रीकरण अधिनियम में संसद से संशोधन लाया जाये।

अब सरकार ने बी.पी.सी.एल. और एच.पी.सी.एल. का राष्ट्रीकरण करने वाले अधिनियम को निरस्त कर दिया है और वह इन दोनों कंपनियों को बेचने की योजना बना रही है। यह गौरतलब है कि 2016 में जब सरकार ने “निरस्त एवं संशोधन अधिनियम” को संसद में पारित किया था उस समय तेल एवं पेट्रोलियम उद्योग को इसके बारे में कोई जानकारी नहीं थी, मीडिया में भी इसको उजागार नहीं किया गया और न ही यूनियनों से मशवरा किया गया। इस सरकार ने बी.पी.सी.एल. और एच.पी.सी.एल. के राष्ट्रीकरण करने के कानून को बेहद गैर-जनतान्त्रिक और गुप्त तरीके़ से ख़त्म किया है।

26 अक्तूबर, 2019 को मुंबई में हुए अधिवेशन में सरकार द्वारा तेल एवं पेट्रोलियम, रक्षा, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक, बीमा कंपनियों, रेल, पोर्ट, सार्वजनिक परिवहन इत्यादि का निजीकरण करने के फैसले की निंदा की।

...: बी.पी.सी.एल. के पास क्या-क्या संपत्ति है?

एस.एम.: बी.पी.सी.एल. के पास चार रिफाइनरी है, जिनकी कुल क्षमता 38.3 एम.एम.टी. (मिलियन मेट्रिक टन) प्रति वर्ष है। यह मुंबई, नुमालिगेर (असम), कोचीन (केरल) और बीना (मध्य प्रदेश) में स्थित है। इसके पास 77 प्रमुख इंस्टालेशन एवं डिपो हैं जहां से पेट्रोलियम उत्पादों का भंडारण और वितरण किया जाता है, 55 एल.पी.जी. बॉटलिंग प्लांट हैं, 2241 किलोमीटर लंबी उत्पाद लाइन है, 56 हवाई अड्डों पर एविएशन फीलिंग स्टेशन हैं, 4 लुब्रिकेंट प्लांट और लुब्रिकेंट गोदाम हैं और प्रमुख बंदरगाहों पर कच्चे तेल और तैयार उत्पादों की ढुलाई के लिए सुविधाएं हैं। इसके अलावा हिन्दोस्तान और विदेश में इसकी 11 सब्सिडियरी कंपनियां हैं, और 22 जॉइंट वेंचर कंपनियां हैं। इसके अतिरिक्त देशभर में छोटे-बड़े सभी शहरों में महंगे इलाकों में बी.पी.सी.एल. की विशाल ज़मीनें हैं। देश में पेट्रोलियम उत्पादों की मार्केटिंग में बी.पी.सी.एल. की 24 प्रतिशत हिस्सेदारी है।

बी.पी.सी.एल. की सबसे प्रमुख संपत्ति इसकी “ब्रांड वैल्यू” है, जिसे बरसों की मेहनत से बनाया गया है। ई.टी. एनर्जी वल्र्ड, एक “एक्सपर्ट ओपिनियन” सर्वे के मुताबिक “बी.पी.सी.एल. के पास देश में दूसरी सबसे बड़ी ऊर्जा रिटेल कंपनी बनने का अवसर प्राप्त है”।

इस वक्त बी.पी.सी.एल. देशभर में 48,182 करोड़ रुपये लागत की परियोजनाओं पर काम कर रही है जिसमें नुमालिगर रिफाइनरी की 6 एम.एम.टी.. विस्तार योजना शामिल है। 2017 से बी.पी.सी.एल. को महारत्न कंपनी का दर्ज़ा दिया गया है। देशभर में चार तेल कंपनियों बी.पी.सी.एल., एच.पी.सी.एल., .आई.एल. और ओ.एन.जी.सी. में से केवल बी.पी.सी.एल. को ही यह दर्ज़ा हासिल।

...: बी.पी.सी.एल की वित्तीय ताक़त कितनी है?

एस.एम.: अपनी स्थापना से ही बी.पी.सी.एल. डिविडेंड और अप्रत्यक्ष करों, बिक्री कर, इत्यादि के रूप में राष्ट्रीय राजस्व में अपना योगदान देती आई है। 2014-15, 2015-16, 2017-18, और 2018-19 के दौरान बी.पी.सी.एल ने क्रमशः 5085 करोड़, 7056 करोड़, 8039 करोड़ और 7976 करोड़ रुपयों का शुद्ध मुनाफ़ा (कर देने के बाद का मुनाफ़ा) कमाया है। पिछले चार वित्तीय वर्षों में बी.पी.सी.एल. ने 15,000 करोड़ रुपये का डिविडेंड दिया है। पिछले वित्तीय वर्ष में ही बी.पी.सी.एल. ने सरकारी खजाने में 96,000 करोड़ रुपये का योगदान करों के रूप में किया है। इसके अलावा बी.पी.सी.एल. के पास 34,000 करोड़ रुपयों का भंडार एवं अधिशेष जमा है। इस कंपनी का असली मूल्य 2 लाख करोड़ रुपयों से अधिक है।

...: एच.पी.सी.एल. की क्या स्थति है?

एस.एम.: एच.पी.सी.एल. के पास 18 एम.एम.टी.. की रिफाइनिंग क्षमता है। पिछले वर्ष इस कंपनी ने 3 लाख करोड़ रुपयों की बिक्री की और 7218 करोड़ रुपयों का मुनाफ़ा कमाया है।

2017 में केंद्र सरकार ने ओ.एन.जी.सी. को एच.पी.सी.एल. में सरकार की 51.1 प्रतिशत हिस्सेदारी को 36,915 करोड़ रुपयों की बेहद ऊंची क़ीमत कर खरीदने को मजबूर किया। 2017-18 में अपने विनिवेश लक्ष्य को हासिल करने के लिए सरकार ने यह क़दम उठाया। लेकिन इस क़दम से ओ.एन.जी.सी. पर विपरीत असर हुआ, जो एक कर्ज़मुक्त कंपनी से अब कर्ज़ में डूबी हुई कंपनी बन गयी है, जिसके खाते का नगदी भंडार पूरी तरह से ख़त्म हो गया है। एच.पी.सी.एल. में सरकार की हिस्सेदारी को खरीदने के लिए ओ.एन.जी.सी. को 25,000 करोड़ रुपये का कर्ज़ उठाना पड़ा। ऐसी संभावना है कि जल्दी ही एच.पी.सी.एल. में अपनी खरीदी हुई हिस्सेदारी को ओ.एन.जी.सी. किसी देशी या विदेशी निजी कंपनी बेच देगी।

...: बी.पी.सी.एल. और एच.पी.सी.एल. में कितने मज़दूर काम करते हैं?

एस.एम.: बी.पी.सी.एल. में 12,000 स्थायी और 20,000 ठेका मजदूर हैं। एच.पी.सी.एल. में 11,000 स्थायी और 31,000 ठेका मज़दूर हैं। ये दोनों ही कंपनियां अपने स्थायी मज़दूरों को घटाने और ठेका मज़दूरों को बढ़ाने की कोशिश कर रही है और ऐसा करने के लिए अब तक तीन बार स्वेच्छिक सेवा निवृत्ति योजना चलायी गयी है।

...: आपकी समझ में बी.पी.सी.एल. और एच.पी.सी.एल. को कौन सी कंपनी खरीद सकती है?

एस.एम.: 2002 में जब अटल बिहारी वाजपेयी की राजग सरकार ने बी.पी.सी.एल. और एच.पी.सी.एल. का निजीकरण करने की कोशिश की उस समय रिलायंस इंडस्ट्रीज, इंग्लैंड की बी.पी., कुवैत पेट्रोलियम, मलेशिया की पेट्रोनास, शैल-सऊदी अरामको का गठबंधन और एस्सार आयल इन कंपनियों ने बी.पी.सी.एल. और एच.पी.सी.एल. को खरीदने में दिलचस्पी दिखाई थी। जैसे कि ऊपर बताया गया है, उस समय मज़दूरों के विरोध और सुप्रीम कोर्ट के फैसले की वजह से इनके निजीकरण को रोकना पड़ा था।

इस दौरान कई बड़ी विदेशी निजी तेल एवं गैस कंपनियां हिन्दोतानी बाज़ार में प्रवेश कर चुकी हैं। हाल ही में फ्रांस की विशाल कंपनी टोटल एस.. ने अदानी गैस में 37.4 प्रतिशत हिस्सेदारी खरीदने का ऐलान किया है। यह कंपनी वाहनों और घर में खाना पकाने के लिए कंप्रेस्ड नेचुरल गैस (सी.एन.जी.) का खुदरा व्यापार करती है, और इसके अलावा यह आयात के लिए टर्मिनल विकसित करने और देशभर में पेट्रोल स्टेशन बनाने का काम करती है।

रिलायंस इंडस्ट्रीज द्वारा चलाये जा रहे तेल और गैस के कुओं में इंग्लैंड की विशाल तेल कंपनी बी.पी.पी.एल.सी. के पास 30 प्रतिशत हिस्सेदारी है। इसके अलावा इन कंपनियों ने देशभर में 5,550 पेट्रोल पंप बनाने के लिए एक जॉइंट वेंचर (संयुक्त उद्यम) बनाया है। रिलायंस ने घोषणा की है कि सऊदी अरामको गुजरात में उसके रिफाइनिंग और पेट्रोकेमिकल संपत्तियों में 1 लाख करोड़ रुपये मूल्य की हिस्सेदारी खरीदने की योजना बना रही है। इस वर्ष की शुरुआत में कनाडा स्थित ब्रूकफील्ड एसेट मैनेजमेंट की इंडिया इन्फ्रास्ट्रक्चर ट्रस्ट ने रिलायंस की नुकसान में चल रही कंपनी ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन को 13,000 करोड़ रुपयों में खरीद लिया। 14 अक्तूबर, 2019 को ओ.एन.जी.सी. ने एक विशाल अमरीकी कंपनी एक्सान मोबिल के साथ तेल की खोज और उत्पादन के लिए एक समझौता ज्ञापन (मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग-एम..यू.) पर हस्ताक्षर किये।

ये साफ है कि रिलायंस इंडस्ट्रीज एक या अधिक विदेशी तेल कंपनियों के साथ सांठ-गांठ में बी.पी.सी.एल. और एच.पी.सी.एल. को खरीद लेगी, यदि सार्वजनिक क्षेत्र के मज़दूर और ट्रेड यूनियन आंदोलन का संयुक्त विरोध इनको रोकने में नाकामयाब रहता है।

...: तेल उद्योग पर निजीकरण का क्या प्रतिकूल असर होगा?

एस.एम.: आज रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (आर.आई.एल.) के पास 62 एम.एम.टी.. की रिफाइनिंग क्षमता है। यदि रिलायंस बी.पी.सी.एल. और एच.पी.सी.एल को खरीद लेती है तो उसकी कुल क्षमता 120 एम.एम.टी.. हो जाएगी और वह देश में तेल के क्षेत्र में इजारेदार कंपनी बन जाएगी।

आज देश में 75 प्रतिशत ऊर्जा मार्केटिंग कारोबार टीम सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों आई..सी.एल., बी.पी.सी.एल, और एच.पी.सी.एल. के पास है। अपने इस बल के आधार पर सरकार तेल की क़ीमतों पर नियंत्रण रख सकती है। लेकिन एक बार यह नियंत्रण रिलायंस या किसी अन्य विदेशी कंपनी के हाथों में आ जाता है तो हम कल्पना कर सकते हैं कि देश में तेल और अन्य चीजों की क़ीमतें कैसे आसमान छुएंगी।

इसके अलावा हमें इस बात को याद रखना चाहिये कि 1976 में किन परिस्थितियों के बीच बर्मा शैल और एस्सो का राष्ट्रीकरण करते हुए बी.पी.सी.एल. और एच.पी.सी.एल. को बनाया गया था। 1971 में हिन्दोस्तान-पाकिस्तान युद्ध के दौरान ब्रिटिश कंपनी बर्मा शैल ने देश में एविएशन टरबाइन फ्यूल (.टी.एफ.) के उत्पादन को बंद कर दिया था। ऐसा करने से भारतीय वायु सेना के लड़ाकू विमानों को लगने वाले तेल की आपूर्ति बंद हो गयी। ऐसे समय में इराक हिन्दोस्तान की मदद के लिए सामने आया और लड़ाकू विमानों को लगने वाले ए.टी.एफ. की आपूर्ति की। इस कारण सरकार ने तेल एवं पेट्रोलियम उद्योग के निगमीकरण का फैसला लिया। अतीत के इन तमाम सबकों को भूलते हुए सरकार फिर से तेल एवं गैस उद्योग को निजी हाथों में बेचने की तैयारी कर रही है।

इसके अलावा एक बार ये कंपनियां निजी हाथों में चली गयीं तो मज़दूरों के काम के हालातों में भारी गिरावट आएगी। ये कंपनियां मज़दूरों को निर्धारित अवधि के ठेके (फिक्स्ड टर्म कॉन्ट्रैक्ट) पर नौकरी देंगी, जिसमें काम के घंटे बढ़ जायेंगे और वेतन में गिरावट आएगी।

...: निजीकरण का विरोध करने की आपकी क्या योजना है?

एस.एम.: 26 अक्तूबर 2019 को हुए सम्मेलन में निम्नलिखित कार्य योजना बनाई गयी गयी है और बी.पी.सी.एल. और एच.पी.सी.एल. के सभी मज़दूरों को इसमें सक्रियता से हिस्सा लेने का आह्वान किया गया है। इस कार्य योजना में पूरे तेल और पेट्रोलियम क्षेत्र की सार्वजनिक कंपनियों के मज़दूरों को एकजुटता दिखाने और सभी दस केंद्रीय ट्रेड यूनियनों और राष्ट्रीय फेडरेशनो और कॉन्फेडरेशनों के संयुक्त मंच से समर्थन का आह्वान किया है।

  • 5 नवंबर, 2019 को देशभर में बी.पी.सी.एल. और एच.पी.सी.एल. की तमाम यूनिटों में सभी स्थायी और ठेका मज़दूरों की आम सभा का आयोजन करना।
  • 11 नवंबर, 2019 को सभी यूनियनों द्वारा हड़ताल की सूचना देना।
  • 11-17 नवंबर, 2019 के बीच देशभर में विरोध सप्ताह का आयोजन करना जिसमें रैली, मार्च, गेट मीटिंग, इत्यादि का आयोजन करना। मज़दूरों और उनके परिजनों के बीच पर्चे बांटना, पोस्टर लगाना और जनसभाएं आयोजित करना।
  • 20 नवंबर, 2019 को दिल्ली में पेट्रोलियम मज़दूरों का अगला राष्ट्रीय अधिवेशन, जहां बड़ी तादाद में मज़दूर हिस्सा लेंगे। केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के नेताओं और सांसदों को अधिवेशन को संबोधित करने के लिए बुलाया जायेगा।
  • 26 नवंबर, 2019 को देशभर में बी.पी.सी.एल. और एच.पी.सी.एल. की सभी रिफाइनरी, क्षेत्रीय मुख्यालयों और काम के स्थानों पर दिन भर विशाल धरना प्रदर्शन आयोजित किया जायेगा।
  • 28 नवंबर, 2019 को देशभर में बी.पी.सी.एल. और एच.पी.सी.एल. के सभी रिफाइनरी, मार्केटिंग और पाइपलाइन मज़दूरों द्वारा एक-दिवसीय सांकेतिक हड़ताल।

यदि सरकार इसके बावजूद भी निजीकरण की योजना को आगे बढ़ाती है तो निजीकरण को हर हालत में रोकने के लिए कई दिनों की हड़ताल का आयोजन किया जायेगा।

...: इस साक्षात्कार के लिए आपका धन्यवाद और हम आपके संघर्ष का पूरा समर्थन करते हैं और अपने इस अख़बार के माध्यम से आपके संघर्ष का देशभर में प्रचार करेंगे।

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Nov 16-30 2019    Struggle for Rights    Rights     2019   

पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

 

5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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