सिखों के जनसंहार की 35वीं बरसी पर दिल्ली में जनसभा

1984 में हुए सिखों के जनसंहार को न तो हम कभी भूलेंगे और न ही कभी माफ़ करेंगे! गुनहगारों को सज़ा मिलनी ही चाहिए!

“1984 में हुए सिखों के जनसंहार को न तो हम कभी भुलाने देंगे और न ही कभी माफ़ करेंगे!” यह ऐलान हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के प्रवक्ता कामरेड प्रकाश राव ने दिल्ली में आयोजित जनसभा में किया। वह 1984 में हुए सिखों के जनसंहार की 35वीं बरसी पर 1 नवम्बर, 2019 को दिल्ली में जंतर-मंतर पर आयोजित जनसभा को संबोधित कर रहे थे। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद के उन भयानक 72 घंटों को याद करते हुए उन्होेंने बताया कि यह जनसंहार सिखों के खि़लाफ़़ हिन्दुओं की स्वतः स्फूर्त प्रतिक्रिया नहीं थी जैसे कि सरकारी प्रचार में बताने की कोशिश की जाती है, बल्कि यह राज्य द्वारा सोच-समझकर बड़े ही सुनियोजित तरीके से आयोजित की गई सांप्रदायिक हिंसा और आतंक की कार्यवाही थी। अपने संबोधन में उन्होंने 1857 के ग़दर, 1915 में हिन्दोस्तान ग़दर पार्टी की अगुवाई में आयोजित विद्रोह और पूरे बस्तीवाद-विरोधी संघर्ष के दौरान हिन्दू, मुस्लिम, सिख और हिन्दोस्तान के तमाम धर्मों और सम्प्रदायों के लोगों की लड़ाकू एकता को उजागर किया।

Meeting in Jantar Mantar

उन्होंने बताया कि हिन्दोस्तान के लोगों की इस एकता से डरकर बर्तानवी बस्तीवादी हुक्मरानों ने “बांटो और राज करों” की नीति अपनाई। हिन्दोस्तान के लोगों को धर्म, जाति और अन्य विविधताओं के आधार पर बांटने के लिए उन्होंने बड़े ही सुनियोजित तरीके से काम किया ताकि लोगों के बीच सांप्रदायिक टकराव आयोजित किया जा सके और फिर “कानून और व्यवस्था” बहाल करने के बहाने वे इसमें दखलंदाज़ी कर सके। आज़ादी के बाद हमारे हुक्मरान इसी नीति को और भी अधिक कुशलता से लागू करते आये हैं।

1 नवम्बर की इस जनसभा का आयोजन लोक राज संगठन के साथ कई अन्य संगठनों ने मिलकर किया था, जो इस जनसंहार के शिकार लोगों को इंसाफ दिलाने के लिए लंबे समय से लगातार संघर्ष करते आये हैं और भविष्य में ऐसे हादसों को रोकने के लिए कानूनी और राजनीतिक उपायों की पैरवी करते आये हैं।

“1984 के गुनहगारों को सज़ा दें!”, “राज्य द्वारा आयोजित सांप्रदायिक हिंसा और बंटवारे की राजनीति के ख़िलाफ़ एकजुट हों!”, “एक पर हमला, सब पर हमला!” - एक बड़े बैनर पर लिखे हुए इन नारों में सभा में भाग लेने वालों की भावनाओं का समावेश था। “बांटो और राज करो की राजनीति मुर्दाबाद!”, “राज्य द्वारा आयोजित सांप्रदायिक हिंसा और राजकीय आतंकवाद को एकजुट होकर ख़त्म करें!”, “राजकीय आतंकवाद मुर्दाबाद!”, “हिन्दोस्तानी राज्य सांप्रदायिक है, लोग सांप्रदायिक नहीं!”, आदि नारे लिखे हुये बैनर और प्लाकार्ड कार्यकर्ताओं के हाथों में और सभा स्थल के चारों तरफ दिख रहे थे।

सभा के सामूहिक रूप से आयोजक थे लोक राज संगठन, वेलफेयर पार्टी ऑफ इंडिया, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी, लोक पक्ष, यूनाइटेड मुस्लिम फ्रंट, सर्वहारा लोक पक्ष, हिन्द नौजवान एकता सभा, सिटीजन्स फॉर डेमोक्रेसी, आल इंडिया कैथोलिक यूनियन, न्यू डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया, देशीय मक्कल सकती कच्ची, पुरोगामी महिला संगठन, सिख फोरम, सी.पी.आई. (एम-एल) न्यू प्रोलेतेरियन, आल इंडिया मजलिस ए मुशावरत (दिल्ली) तथा अन्य।

सहभागी संगठनों के प्रतिनिधियों ने जनसंहार पर अपने विचार रखे और आगे क्या करना चाहिए, उस पर अपने सुझाव दिए। सभा को संबोधित करने वालों में थे लोक राज संगठन के अध्यक्ष एस. राघवन, बिरजू नायक और सुचरिता, द सिख फोरम से प्रताप सिंह, कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी से कामरेड प्रकाश राव, वेलफेयर पार्टी ऑफ इंडिया से सिराज़ तालिब, लोक पक्ष से कामरेड के.के. सिंह, सी.पी.आई.(एम-एल) न्यू प्रोलेतारियन से कामरेड सिद्धान्तकर, सर्वहारा लोकपक्ष से कामरेड सिद्धांत, आल इंडिया मजलिस ए मुशावरत (दिल्ली) से अब्दुल राशिद, देशीय मक्कल सकती कच्ची से महेश्वरन, न्यू डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया से एडवोकेट अरूण माझी, हिन्द नौजवान एकता सभा से लोकेश, तथा अन्य।

अन्य सभी संगठनों के वक्ताओं ने विस्तार से बताया कि किस तरह यह जनसंहार राज्य द्वारा बड़े ही सुनियोजित तरीके से आयोजित किया गया था और न कि “सिखों के ख़िलाफ़ हिन्दुओं का बदला” था, जो अपने आप फूट पड़ा। इस जनसंहार की योजना महीनों पहले तैयार की गयी थी। ऐसे बहुत सारे सबूत हैं जो यह दिखाते हैं कि इसकी पूरी योजना सत्ता के सबसे ऊंचे स्तर पर की गयी थी और इसमें सत्ताधारी पार्टी सहित, मंत्रीमंडल, सुरक्षा अधिकारी और नौकरशाही शामिल थे। इस कत्लेआम को अंजाम देने के लिए पूरी राज्य मशीनरी का इस्तेमाल किया गया था। इस जनसंहार की जांच करने के लिए गठित कई आयोगों की रिपोर्ट से यह बात साफ़ नज़र आती है।

यह जनसंहार हुक्मरान वर्ग की “बांटो और राज करो” की नीति का अभिन्न अंग है। यह रणनीति हुक्मरान वर्ग की राजनीतिक पार्टियों और उनकी सरकारों के हाथों में कारगर हथियार रहा है, जिसके ज़रिये वे अपनी हुकूमत को स्थिर बनाने की कोशिश करते हैं और ऐसी नीतियां बनाकर लागू करते हैं जो लोगों के हितों के खि़लाफ़ हंै और बड़े पूंजीपति घरानों के फायदे में है। हुक्मरान, उनके राज्य और मीडिया द्वारा लोगों को सांप्रदायिक करार देने वाले प्रचार को चुनौती देते हुए सभी वक्ताओं ने कहा कि असलियत में हिन्दोस्तानी राज्य सांप्रदायिक है और यह राज्य सांप्रदायिक हिंसा और कत्लेआम आयोजित करता है। नवंबर 1984 की घटना ने यह साफ़ दिखाया कि किस तरह से राज्य के अधिकारी और सुरक्षा बल उनकी आँखों के सामने हो रहे कत्लेआम के समय चुप-चाप खड़े रहे और यहां तक कि उन्होंने हत्यारे गुंडों की सहायता की। इसके ठीक विपरीत लोग बहादुरी के साथ पीड़ितों की हिफ़ाज़त में साथ खड़े रहे और उनकी हर संभव मदद की।

वक्ताओं ने बताया कि सत्ताधारियों के तमाम दबावों के बावजूद हमने लोगों को इस भयंकर गुनाह को भुलाने नहीं दिया है, जो कि आज से 35 वर्ष पहले दिल्ली की सड़कों और देश के कई अन्य स्थानों में बेकसूर लोगों पर आयोजित किया गया था। आज जब देश में मानव अधिकारों की हिफ़ाज़त करने वालों के ख़िलाफ़ नफ़रत भरे गुनाह और राज्य के दमन का माहौल बढ़ता ही जा रहा है, यह बेहद ज़रूरी है कि हम बहादुरी के साथ सामने आयें और जो गलत हुआ है और हो रहा है, उसकी निंदा करें। “गुनहगारों को सज़ा दो!” यह नारा सबसे पहले ऐसे लोगों को सज़ा देने की मांग करता है जिनके हाथों में हिन्दोस्तानी राज्य की सत्ता की कमान है, जिनमें शामिल हैं हुक्मरानों की राजनीतिक पार्टियां, मंत्री और ऊंचे पदों पर बैठे अधिकारीगण जो इस जनसंहार को आयोजित करने के लिए ज़िम्मेदार हंै और जिन्होंने पीड़ितों की हिफ़ाज़त करने के लिए कुछ नहीं किया। यह बेहद ज़रूरी है कि हम 1984 के बाद पैदा हुई पीढ़ी को इस सच्चाई के बारे में बताएं, ताकि भविष्य में ऐसे भयानक कत्लेआम को आयोजित होने से रोका जा सके।

वक्ताओं ने बताया कि केवल 1984 के जनसंहार के ही ऐसे गुनहगार नहीं है जिनको सज़ा नहीं मिली है, बल्कि, वे गुनहगार जिन्होंने 1992 में बाबरी मस्जिद का विनाश आयोजित किया, 2002 में गुजरात में मुसलमानों का क़त्लेआम आयोजित किया और तमाम ऐसे सांप्रदायिक क़त्लेआम को आयोजित किये, वे सब गुनहगार बेख़ौफ़ आज़ाद घूम रहे हैं। 1984 के बाद अल्पसंख्यक समुदायों पर हिंसा बढ़ती ही गयी है। उनको भीड़ द्वारा हिंसा (मोब लिंचिंग), मुठभेड़ों में मार डालना, यू..पी.. जैसे तमाम काले कानून के तहत सताया जाना और जेल में बंद रखना जैसे तमाम तरीकों से निशाना बनाया गया है। उनको “आतंकवादी” और “देशद्रोही” करार देते हुए निशाना बनाया जा रहा है।

सभी वक्ताओं ने इस हकीक़त को उजागर किया कि कांग्रेस पार्टी और भाजपा दोनों ही इन गुनहगार कार्यवाहियों में शामिल रही हैं। इन दोनों ही पार्टियों ने लोगों के ख़िलाफ़ सांप्रदायिक हिंसा और आतंक आयोजित किये हैं। हर एक चुनाव के दौरान ये पार्टियां लोगों की एकता को तोड़ने के लिए जाति और सांप्रदायिकता के “पत्तों” का इस्तेमाल करती हैं। वक्ताओं ने लोगों को आगाह करते हुए बताया कि हम गुनहगारों को सज़ा दिलाने या भविष्य में इस तरह की घटनाओं से बचने के लिए हुक्मरानों की इन पार्टियों पर निर्भर नहीं रह सकते। हमें राज्य द्वारा किये गए गुनाहों का बहादुरी के साथ पर्दाफाश करना होगा और राज्य द्वारा आयोजित सांप्रदायिक हिंसा और राजकीय आतंक के पीड़ि़तों के साथ खड़े रहना होगा। सभी वक्ताओं ने दोहराया कि हम लोगों को धर्म, जाति या राजनीतिक वफ़ादारी से ऊपर उठकर अपनी एकता मजबूत करनी होगी और हुक्मरानों की “बांटो और राज करो” की नीच राजनीति के ख़िलाफ़ एक मज़बूत आंदोलन खड़ा करना होगा।

जनसभा में हिस्सा ले रहे सभी लोगों और संगठनों ने 1984 के गुनहगारों को सज़ा दिलाने के संघर्ष को तेज़ करने, लोगों की एकता को मज़बूत करने और लोगों को धर्म, जाति, भाषा और अन्य आधार पर बांटने वाली राजनीतिक ताक़तों की चालों का पर्दाफाश करने का संकल्प किया।

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Nov 16-30 2019    Struggle for Rights    Rights     2019   

पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

 

5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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