“अयोध्या विवाद” पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला

"पूर्ण न्याय” के नाम से घोर अन्याय

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति का बयान, 25 नवम्बर, 2019

9 नवम्बर, 2019  को सुप्रीम कोर्ट की 5 न्यायाधीशों वाली पीठ ने 1992 में बाबरी मस्जिद के तोड़े जाने से पहले वह मस्जिद जिस भूमि पर खड़ी थी, उस भूमि से संबंधित एक संपत्ति विवाद पर अपना फैसला दिया। अदालत ने ऐलान किया कि वह भूमि राम लल्ला विराजमान की संपत्ति है। अदालत ने केंद्र सरकार को आदेश दिया कि उसी स्थान पर मंदिर बनाने के लिए एक ट्रस्ट की स्थापना की जाये।

जबकि उस विवादित स्थान की मालिकी के कोई रिकॉर्ड मौजूद नहीं हैं, तो सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को जायज़ ठहराते हुए, यह ऐलान किया है कि विवाद में, हिन्दू पक्ष के दावे में मुसलमान पक्ष के दावे से ज्यादा दम है। अपने इस तर्क के समर्थन में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इस बात को साबित करने के लिए कोई दस्तावेज़ नहीं मिले हैं कि 1527 में जब मस्जिद बनाई गयी थी, उस समय से लेकर 1856-57 तक, वहां मुसलमान लोग इबादत करते थे। परन्तु इबादत के लिए बनाई गयी मस्जिद में मुसलमान लोग इबादत करते थे या नहीं, यह सवाल करना बहुत ही बेतुका है। और इसके सबूत बतौर दस्तावेज़ मांगना और भी बेतुका है, क्योंकि बरतानवी हुक्मरानों ने 1857 के ग़दर के बाद उस प्रकार के सभी दस्तावेज़ों को नष्ट कर दिया था।

“पूर्ण न्याय” दिलाने का दावा करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को आदेश दिया है कि उत्तर प्रदेश सरकार से सलाह करके, सुन्नी वक्फ बोर्ड को मस्जिद बनाने के लिए अयोध्या में कहीं और 5 एकड़ ज़मीन दे दी जाये। 6 दिसंबर, 1992 को बाबरी मस्जिद को अवैध तरीके से गिराए जाने के बदले में, यह तथाकथित “मुआवज़ा” है, ऐसा कहा जा रहा है। यह भी कहा जा रहा है कि इससे हिन्दोस्तानी राज्य का “धर्म-निरपेक्ष चरित्र” दिखता है।

भाजपा और कांग्रेस पार्टी तथा हुक्मरान वर्ग की दूसरी पार्टियों ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को सराहा है। जिस फैसले में मुसलमान लोगों की इबादत की जगह को तोड़कर, मुसलमानों को बेइज्ज़त करने के भयानक अपराध पर पर्दा डालकर, उसी जगह पर मंदिर बनाने का आदेश दिया गया है, उस फैसले का स्वागत किया जा रहा है।

हिन्दोस्तानी लोगों को कहा जा रहा है कि इस फैसले को चुपचाप मान लें, क्योंकि यही राष्ट्र हित में है। इस नाजायज़ फैसले का विरोध करने वालों को “सांप्रदायिक सद्भावना के दुश्मन” करार दिया जा रहा है।

हिन्दोस्तानी लोगों को यह हरगिज मंजूर नहीं कि किसी की भी इबादत के स्थान को ध्वंस किया जाये। जिस फैसले में किसी की इबादत के स्थान के अपराधी विध्वंस पर पर्दा डाला जा रहा है, उस फैसले को हम मंजूर नहीं कर सकते। यह न सिर्फ देश के 20 करोड़ मुसलमानों पर हमला है, बल्कि सभी हिन्दोस्तानी लोगों पर हमला है।

बाबरी मस्जिद का ध्वंस करके उसकी जगह पर राम मंदिर बनाने के अभियान को हिन्दोस्तानी हुक्मरान वर्ग और उसकी मुख्य पार्टियों - कांग्रेस पार्टी और भाजपा - ने 1980 के दशक में शुरू किया था। बीते 35 वर्षों में, हिन्दोस्तानी राज्य के सभी उपकरणों - कार्यकारिणी, विधायिकी और न्यायपालिका - ने इस विषय पर सांप्रदायिक भावनाओं को भड़काने के इरादे से, मिलजुलकर काम किया है (देखिये: 1947 के बाद “अयोध्या विवाद” के बारे में कुछ ऐतिहासिक तथ्य)। बाबरी मस्जिद का ध्वंस उन सबकी मिलीजुली साज़िश थी। उन्होंने देश के अलग-अलग भागों में बार-बार सांप्रदायिक हत्याकांड आयोजित किये हैं।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला बरतानवी उपनिवेशवादी हुक्मरानों द्वारा बनाये गए रेकॉर्डों पर आधारित है। इस फैसले में यह भी नहीं माना गया है कि उपनिवेशवादियों ने हिन्दुओं और मुसलमानों को आपस में लड़वाने के लिए और उपनिवेशवादी हुकूमत के खि़लाफ़ हमारे लोगों की एकता को तोड़ने के लिए, सोच-समझकर हमारे इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश किया था।

1527 में बाबरी मस्जिद के बनाये जाने के बाद, अगले 300 सालों तक वहां बाबरी मस्जिद को लेकर कोई सांप्रदायिक फसाद नहीं हुए। 1856 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने अवध के प्रशासन को वहां के नवाब, वाजिद अली शाह से अपने हाथों में ले लिया था। ईस्ट इंडिया कंपनी ने नवाब को गिरफ़्तार करके अपने राज्य से बाहर निकाल दिया। उन्होंने बाबरी मस्जिद से सम्बंधित सभी दस्तावेज़ों को नष्ट कर दिया, जिनमें नवाब की सहमति के साथ तैयार किया गया, हिन्दुओं और मुसलामानों द्वारा पूजा-इबादत के नियमों पर लिखित समझौता भी शामिल था। 1856-57 में बरतानवी हुक्मरानों ने बाबरी मस्जिद के मामले पर पहला सांप्रदायिक फसाद आयोजित किया था।

अवध 1857 के ग़दर के सबसे अगुवा केन्द्रों में से एक था। वहां हिन्दू और मुसलमान बरतानवी हुकूमत को गिराने के लिए एकजुट हो गए थे। उस व्यापक जन-विद्रोह को बेरहमी से कुचलने के बाद, उपनिवेशवादी हुक्मरानों ने इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश करना शुरू किया। बरतानवी हुक्मरानों ने फैजाबाद के सरकारी समाचार पत्र में यह छाप दिया कि बाबरी मस्जिद उसी स्थान पर खड़ी है जहां भगवान राम का जन्म हुआ था और उसे राम मंदिर को तोड़कर बनाया गया था।

बरतानवी हुक्मरानों ने बाबरी मस्जिद के मामले को लेकर हिन्दू-मुसलमान दुश्मनी के बीज बोये। उन्होंने इस मामले पर बार-बार सांप्रदायिक भावनाओं को भड़काया।

1947 के बाद, हिन्दोस्तानी राज्य ने उसी रास्ते को अपनाया है और बरतानवी हुक्मरानों के उसी झूठे प्रचार को फैलाया है, ताकि सांप्रदायिक आधार पर लोगों को उकसाया जाये और आपस में बांट कर रखा जाये। बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि विवाद की आग को सुलगते रहने दिया गया, ताकि जब-जब हुक्मरानों को ज़रूरत हो, उसे फिर से हवा देकर तेज़ किया जा सके। 1984 में हुक्मरान वर्ग ने बहुत ही अपराधी राजनीतिक इरादों के साथ, सोच-समझ कर, उसे एक सर्व-हिन्द अभियान बना दिया। उनका राजनीतिक इरादा था लोगों को बहकाना और सांप्रदायिक आधार पर बांटना, ताकि मुट्ठीभर शोषकों की हुकूमत को स्थिरता दी जा सके।

बाबरी मस्जिद को गिराने और बीते 35 सालों में बार-बार सांप्रदायिक हिंसा आयोजित करने में हुक्मरान वर्ग के राजनीतिक इरादों और उसकी मुख्य राजनीतिक पार्टियों की भूमिका के बारे में सुप्रीम कोर्ट के पास कुछ भी कहने को नहीं है।

कमान की ज़िम्मेदारी के असूल के अनुसार, बाबरी मस्जिद के ध्वंस के समय की तत्कालीन कांग्रेस पार्टी नीत केंद्र सरकार और भाजपा नीत उत्तर प्रदेश सरकार, दोनों ही हमारे लोगों के ख़िलाफ़ किये गए इन भयानक अपराधों के गुनहगार हैं।

बाबरी मस्जिद के विध्वंस की जांच करने के लिए, नरसिम्ह राव सरकार ने 16 दिसंबर, 1992 को लिब्रहान आयोग को बिठाया था। उस आयोग ने 17 साल बाद, जून 2009 को अपनी रिपोर्ट मनमोहन सिंह सरकार को पेश की थी। परन्तु उस रिपोर्ट पर आज तक कोई कार्यवाही नहीं की गयी है। 1992-93 में मुंबई में आयोजित किये गए सांप्रदायिक कत्लेआम में श्रीकृष्ण आयोग ने जिन सभी को दोषी ठहराया था - कांग्रेस पार्टी, भाजपा, शिव सेना - उनके खि़लाफ़ कोई कार्यवाही नहीं की गयी है।

उक्त घटनाओं के 27 साल बाद, उन्हें आयोजित करने वालों के खि़लाफ़ आपराधिक मामलों की फाईलें सी.बी.आई. की अदालतों में सड़ रही हैं। उस 16वीं सदी वाली मस्जिद को गिराने की अपनी कृति के बारे में जिन्होंने सीना तान कर ढिंढोरा पीटा था, वे आज राज्य के ऊंचे से ऊंचे पदों पर बैठे हैं। गुनहगारों को आज तक सज़ा नहीं दी गयी है। परन्तु सुप्रीम कोर्ट ने उस भूमि की मालिकी के मामले को हल करने में बड़ी जल्दबाजी दिखाई, ताकि बाबरी मस्जिद की जगह पर राम मंदिर की स्थापना करने का रास्ता खोल दिया जा सके।

हिन्दोस्तानी राज्य धर्म-निरपेक्षता की कसम खाता है परन्तु उसने बार-बार ज़मीर के अधिकार पर हमला किया है। हम यह नहीं भूल सकते हैं कि जून 1984 में केंद्र सरकार ने सेना को सिखों के पवित्र धर्म स्थल, स्वर्ण मंदिर पर हमला करने का आदेश दिया था। देश की अलग-अलग जगहों पर, ईसाइयों और उनके गिरजाघरों को निशाना बनाया गया है। इस या उस धर्म के लोगों को बार-बार “विदेशी”, “आतंकवादी” और “राष्ट्र-विरोधी” करार दिया जाता है, ताकि राजकीय आतंकवाद को सही ठहराया जा सके और हमारे लोगों के जायज़ संघर्षों को कुचला जा सके।

ज़मीर के अधिकार की, हर इंसान के अलंघनीय अधिकार बतौर, हिफ़ाज़त करने का हमारा लंबा इतिहास और पुरानी परंपरा रही है। हर इंसान का अपनी आस्थाओं को मानने और अपनी पूजा-इबादत के तौर-तरीकों का पालन करने का अधिकार है। इस अधिकार की रक्षा करना राज्य का फर्ज़ है।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला यह दिखाता है कि हमारे देश की न्याय व्यवस्था इन हिन्दोस्तानी मूल्यों पर आधारित नहीं है। हमारी न्याय व्यवस्था बरतानवी उपनिवेशवादियों द्वारा फैलाये गए सांप्रदायिक दृष्टिकोण पर आधारित है। इसके अनुसार यह माना जाता है कि हिन्दोस्तानी समाज में हिन्दू बहुसंख्यक हैं, मुसलमान और अन्य धर्म के लोग अल्पसंख्यक हैं, कि वे हमेशा आपस में लड़ते रहते हैं और उनके बीच में सांप्रदायिक सद्भावना बनाये रखने के लिए राज्य की ज़रूरत है।

बरतानवी हुक्मरानों ने यह झूठ फैलाया कि हिन्दोस्तानी उपमहाद्वीप के लोगों का अपना कोई दर्शनशास्त्र, अर्थशास्त्र या राजनीतिक सिद्धांत नहीं है, इसलिए वे खुद अपना शासन करने के क़ाबिल नहीं हैं। उन्होंने यह प्रचार किया कि हिन्दोस्तानी लोग निरंतर आपस में लड़ने वाले धार्मिक गुटों में बंटे हुए हैं, कि अगर “उन्नत सोच वाले” गोरे शासक उन पर राज नहीं करेंगे और उन आदिवासियों को “सभ्यता” नहीं सिखायेंगे, तो वे एक-दूसरे को ख़त्म कर देंगे।

धार्मिक बहुसंख्या  की अवधारणा एक उपनिवेशवादी विरासत है। बरतानवी उपनिवेशवादियों ने हिन्दू बहुसंख्यक और मुसलमान व अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों के बीच में भेदभाव इसलिए पैदा किया ताकि हिन्दोस्तानी लोगों को बांटकर उन पर राज किया जा सके। 1871 में बरतानवी राज ने हिन्दोस्तान में जो पहली जनगणना की थी, उसमें ‘हिन्दू’ शब्द को एक सर्व व्यापक परिभाषा दी गयी थी, जिसके अन्दर कई अलग-अलग धर्मों को शामिल कर दिया गया था, और यह ऐलान कर दिया गया था कि हिन्दू धर्म ही अधिकतम हिन्दोस्तानी लोगों का धर्म है।

1950 में अपनाया गया, आज़ाद हिन्दोस्तान का संविधान उसी उपनिवेशवादी अवधारणा पर आधारित है कि हिन्दोस्तानी समाज बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक धार्मिक समुदायों के बीच में बंटा हुआ है। यह संविधान बरतानवी हुक्मरानों द्वारा पैदा किये गए सांप्रदायिक बंटवारे को बरकरार रखने का आधार है।

बरतानवी उपनिवेशवादी न्यायशास्त्र के अनुसार चलते हुए, हिन्दोस्तान के संविधान में, सिख धर्म व जैन धर्म को मानने वालों तथा अपनी-अपनी अलग-अलग आस्थाओं व पूजा-पाठ के तौर-तरीकों को मानने वाले विभिन्न आदिवासी समुदायों, सभी को हिन्दू बहुसंख्या के अन्दर शामिल कर दिया गया है। न्याय व्यवस्था में भूमि को निजी संपत्ति माना जाता है, और भूमि की सामूहिक मालिकी की हिन्दोस्तानी परंपरा की पूरी तरह उपेक्षा की जाती है।

हिन्दोस्तानी राज्य की धर्म-निरपेक्षता भी बरतानवी राज की विरासत है। इस धर्म-निरपेक्षता का मतलब है कि बहुसंख्यक समुदाय को धार्मिक अल्पसंख्यकों के प्रति सहनशील होना चाहिए। इसे एक प्रगतिशील और लोकतान्त्रिक अवधारणा बताया जाता है। पर वास्तव में, यह एक सांप्रदायिक अवधारणा है, जो लोगों को बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक धार्मिक समुदायों में बांटता है और अल्पसंख्यक समुदायों के भाग्य को बहुसंख्यक धार्मिक समुदाय के हाथों में छोड़ देता है।

साम्प्रदायिकता और सांप्रदायिक हिंसा पूंजीपति वर्ग का हथकंडा है, जिसके ज़रिये वह लोगों को बांटता है, हमारे संघर्षों को कुचलता है और अपनी जन-विरोधी हुकूमत को बरकरार रखता है। बीते चार दशकों में, लोगों की एकता को तोड़ने के लिए और उदारीकरण, निजीकरण व भूमंडलीकरण के समाज-विरोधी और राष्ट्र-विरोधी कार्यक्रम को लागू करने के लिए, साम्प्रदायिकता हुक्मरानों का पसंदीदा हथकंडा रहा है।

इस समय, मुसलमानों के खि़लाफ़ सांप्रदायिक प्रचार और मुसलमानों का उत्पीड़न हिन्दोस्तान और सारी दुनिया में बहुत बढ़ाया जा रहा है। 2019 के लोक सभा चुनावों में, सबसे बड़े हिन्दोस्तानी और अमरीकी इजारेदार पूंजीपतियों के समर्थन के साथ, भाजपा ने फिर से चुनाव जीतकर अपनी सरकार बनाई। अमरीकी साम्राज्यवादी यह मानते हैं कि हिन्दोस्तान को अपना विश्वसनीय मित्र बनाने का काम मोदी की अगुवाई में भाजपा सरकार सबसे बेहतर तरीके से कर सकती है। अमरीकी साम्राज्यवादी दुनियाभर में अपने मुसलमान-विरोधी, समाज-विरोधी और जंग फरोश हमले में हिन्दोस्तान का समर्थन चाहते हैं।

देश के मज़दूरों और किसानों के बढ़ते विरोध के बावजूद, हिन्दोस्तान का हुक्मरान वर्ग उदारीकरण और निजीकरण के कार्यक्रम को तेज़ी से लागू कर रहा है। सांप्रदायिक प्रचार और मुसलमानों का उत्पीड़न बढ़ाया जा रहा है ताकि मेहनतकश लोग अपने सांझे शोषकों और उनके जन-विरोधी कार्यक्रम के खि़लाफ़ एकजुट संघर्ष न कर सकें।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला “सांप्रदायिक सद्भावना” बनाये रखने के हित में नहीं है, जैसा कि हुक्मरान वर्ग और उसकी पार्टियां दावा कर रही हैं। लोगों को इस प्रचार पर यकीन नहीं करना चाहिए।

हमें इंसाफ के लिए अपने संघर्ष को जारी रखना होगा। हमें यह मांग करते रहनी होगी कि बाबरी मस्जिद का विध्वंस करने वालों और सांप्रदायिक हिंसा आयोजित करने वालों के समेत, सांप्रदायिक अपराधों के सभी गुनहगारों को सज़ा दी जानी चाहिए।

इंसाफ के लिए हमारे संघर्ष का यह उद्देश्य होना चाहिए कि बरतानवी उपनिवेशवाद की इस विरासत, इस सांप्रदायिक राज्य की जगह पर एक नया राज्य स्थापित किया जाये, जिसमें ज़मीर के अधिकार को समाज के हर सदस्य का सर्व व्यापक और अलंघनीय अधिकार माना जायेगा व उसकी हिफ़ाज़त की जायेगी।

1947 के बाद “अयोध्या विवाद” के बारे में कुछ ऐतिहासिक तथ्य

  • 22 दिसम्बर, 1949 को एक सरकारी अफ़सर की निगरानी में, बाबरी मस्जिद के अन्दर राम लल्ला की एक मूर्ती रखी गयी। यह कहानी फैला दी गयी कि किसी प्रकार के चमत्कार से, वह मूर्ती खुद ही वहां पहुंच गयी थी। नेहरू की सरकार ने मूर्ती को नहीं हटाया, यह बहाना देकर कि वैसा करने से सांप्रदायिक फसाद हो सकते हैं। 29 दिसम्बर, 1949 को सरकार ने बाबरी मस्जिद को विवादित संपत्ति घोषित कर दिया। उसके मुख्य दरवाज़े पर ताले लगाये गए। मुसलमानों को मस्जिद में प्रवेश करने से रोका गया। हिन्दुओं को एक अन्य दरवाजे़ से मूर्ती का दर्शन करने की इजाज़त दी गयी।
  • 1984 में विश्व हिन्दू परिषद ने रामजन्मभूमि को “मुक्त” कराने और बाबरी मस्जिद की जगह पर मंदिर बनाने का अभियान शुरू किया।
  • 1 फरवरी, 1986 को तत्कालीन प्रधान मंत्री राजीव गांधी के आदेशों के अनुसार, फैजाबाद के जिला अदालत ने आदेश जारी किया कि हिन्दुओं की पूजा के लिए, विवादित स्थल के तालों को खोल दिया जाये।
  • 9 नवम्बर, 1989 को राजीव गांधी की सरकार ने विश्व हिन्दू परिषद को विवादित स्थल पर राम मंदिर बनाने के लिए, शिलान्यास करने की इजाज़त दे दी। जो न्यायिक मामले बीते 40 सालों से अदालतों में सड़ रहे थे, उन्हें आगे लाया गया। “राम लल्ला” की मूर्ती और “राम जन्मस्थान” नामक जगह को विवाद के अलग-अलग पक्ष स्वीकार किये गए। राजीव गांधी ने 1989 के लोक सभा चुनावों के लिए अपना अभियान अयोध्या से शुरू किया।
  • सितम्बर 1990 को भाजपा के अध्यक्ष लाल कृष्ण आडवानी ने राम मंदिर अभियान के लिए समर्थकों को लामबंध करने के इरादे से, सोमनाथ से अयोध्या तक रथ यात्रा आयोजित की। जिन-जिन राज्यों से वह रथ यात्रा गुजरी, वहां-वहां मौत और तबाही फैल गयी।
  • सितम्बर 1991 को नरसिंह राव सरकार ने संसद में इबादत के स्थान (विशेष प्रावधान) अधिनियम को पास करवाया। उस अधिनियम में यह ऐलान किया गया कि किसी भी इबादत की जगह का 15 अगस्त, 1947 के समय जो दर्जा था, उसे नहीं बदला जा सकता है। परन्तु उसमें यह भी कहा गया कि “यह अधिनियम रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मामले पर लागू नहीं होगा”। यह हिन्दोस्तानी राज्य की तरफ से, बाबरी मस्जिद को तोड़ने और उस जगह पर राम मंदिर बनाने के लिए हरी झंडी थी।
  • सुप्रीम कोर्ट ने 6 दिसंबर, 1992 को अयोध्या में “कार सेवा” की इजाज़त दी, यह कहकर कि उत्तर प्रदेश सरकार और भाजपा के उच्च नेताओं ने आश्वासन दिया है कि मौजूदा स्थिति बरकरार रहेगी। पर उसी दिन बाबरी मस्जिद को गिराया गया, और अदालत ने आज तक उन नेताओं पर कोई कार्यवाही नहीं की है।
  • 6 दिसंबर, 1992 को कांग्रेस पार्टी की केंद्र सरकार और भाजपा की उत्तर प्रदेश सरकार की देखरेख में, बाबरी मस्जिद का ध्वंस किया गया। केंद्र और राज्य सरकारों के सुरक्षा बलों को सोच-समझकर आदेश दिया गया कि वे तोड़-फोड़ को न रोकें। उसके बाद, देश के अनेक स्थानों पर, व्यापक पैमाने पर सांप्रदायिक हत्याकांड आयोजित किये गए।
  • जनवरी 1993 को संसद में अयोध्या में कुछ इलाके का अधिग्रहण अधिनियम  को पास किया गया। उस अधिनियम के ज़रिये, विवादित स्थल की मालिकी पर अदालत के फैसले के आने तक, केंद्र सरकार ने उस ज़मीन को, जिस पर बाबरी मस्जिद खड़ी थी, और आस-पास के कुछ इलाकों, यानी कुल 68 एकड़ ज़मीन को अपने हाथों में ले लिया।
  • 2002 में इलाहाबाद के उच्च न्यायालय ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ए.एस.आई.) को यह जांच करने का आदेश दिया कि बाबरी मस्जिद के स्थान पर हिन्दू मंदिर था या नहीं। ए.एस.आई. की उस जांच के अभी भी कोई नतीजे नहीं पेश किये गए हैं।
  • 2010 को इलाहाबाद के उच्च न्यायालय ने यह फैसला सुनाया कि विवादित स्थल को राम लल्ला, निरमोही अखाड़ा और सुन्नी वक्फ बोर्ड के बीच में बांटा जायेगा।
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Dec 1-15 2019    Statements    Communalism     History    2019   

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मयंक चर्तुवेदी, मुम्बई  से  :

मेरा पत्र हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी के बयान, “पूर्ण न्याय” के नाम से घोर अन्याय’ की प्रतिक्रिया में है जो 1.15 दिसम्बर के मज़दूर एकता लहर के अंक में छपा था। ऐसे सच्चे और वैज्ञानिक सोच के बयान, जो अपने देश की न्याय व्यवस्था का पर्दाफाश करता है, उसको छापने के लिये मैं पार्टी को बधाई देना चाहता हूं। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात है कि हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी को सच बयान करने का साहस है, जो अपने देश के सभी प्रगतिशील लोगों को बल देता है। इसमें दिये गये कुछ अहम मुद्दों को मैं दोहराना चाहता हूं।

अपने देश में ज़मीर के अधिकार को नज़रंदाज़ किया जाता है। सभी नागरिकों को अधिकार है कि अपनी मर्जी से वे किसी भी भगवान की पूजा करें, किसी भी धर्म का पालन करें या किसी भी धर्म को न मानें।

बाबरी मस्जिद के विध्वंस के पश्चात, देशभर में, हजारों लोगों के कत्ल के बारे में इस अदालत का फैसला चुप है। मारे गये लोगों में अधिकांश मुसलमान लोग थे। जिन्होंने ये हत्याऐं की थीं और जिन्होंने ऐतिहासिक मस्जिद को ढहाया था, उन्हें न केवल आज़ाद घूमने की इजाज़़त है बल्कि उन्हें केन्द्र सरकार में ऊंचे-ऊंचे पदों से नवाजा गया है। इससे गुनहगारों और शासक वर्ग को साम्प्रदायिक हिंसा को, फूट डाल कर राज करने के एक पसंदीदा साधन बतौर, इस्तेमाल करने में बढ़ावा मिलता है।

साम्प्रदायिक हिंसा का इस्तेमाल बार-बार लोगों की एकता तोड़ने के लिये किया गया है।

न्यायपालिका बेशर्मी से सबूत मांग सकती है कि मुसलमान लोग इस मस्जिद में नमाज़ पढ़ते थे।

मामले को तीन पक्षों के बीच एक भूमि विवाद के स्तर तक गिरा दिया गया है।

बिना किसी सबूत के आधार पर यह कहा गया है कि हिन्दुओं का दावा मुसलमानों के दावे से ज्यादा मजबूत है।

इसे ”पूर्ण न्याय” कैसे कह सकते हैं? केन्द्रीय कमेटी का बयान हमें अवध के इतिहास में, विवाद की जड़ तक ले जाता है। इसमें ध्यान दिलाया गया है कि लोगों की एकता को तोड़ने के लिये, अंग्रेज उपनिवेशवादी कैसे लोगों के बीच धार्मिक आधार पर फूट डालते थे। आज़ादी के बाद, एक के बाद एक आई सरकारों ने फूट डालो और राज करो की नीति में माहारत प्राप्त की और इसे बार-बार इस्तेमाल किया। आज इस मुद्दे को लोगों को भ्रम में डालने के लिये इस्तेमाल किया जा रहा है ताकि उनका ध्यान बेरोज़गारी, स्वास्थ्य सेवा के अभाव, बहुत कम आय जैसे अपने अहम मुद्दों से भटकाया जा सके।

यह बयान मुसलमान सम्प्रदाय को हमेशा निशाना बनाने की अमरीकी शासक वर्ग की भूमिका का बहादुरी से पर्दाफाश करता है। अमरीका प्राकृतिक संसाधनों की लूट को क़ायम रखने के लिये सभ्यताओं की टक्कर और मुसलमानों का डर जैसी संकल्पनाओं को फैलाता है, ताकि लोगों का ध्यान उसके द्वारा की जा रही लूट से हटाया जा सके। इसने इस्लाम पर कीचड़ उछाला है। अमरीकी शासक वर्ग ने आतंकवाद के खि़लाफ़ जंग के नाम पर, पश्चिम एशिया के अनेक देशों को बर्बाद किया है। अब हिन्दोस्तानी शासक वर्ग के साथ मिलकर अमरीकी शासक वर्ग, दक्षिण एशिया में मोदी सरकार की मदद से लूट-खसोट को बढ़ाना चाहता है।

एक बार फिर, मैं हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी को इस लेख को प्रकाशित करने के लिये धन्यवाद देना चाहता हूं क्योंकि इससे अपने देश के मज़दूर वर्ग के बीच भ्रम टूटेगा।

अंग्रेजी

पार्टी के दस्तावेज

8 जनवरी, 2020 की सर्व हिन्द आम हड़ताल को सफल करें!

मज़दूर एकता कमेटी का आह्वान

देश की दिशा पूंजीपतियों की अमीरी को बढ़ा रही है और मज़दूर, किसान व सभी मेहनतकशों को ग़रीबी में धकेल रही है। इस रास्ते का विरोध करने के लिए और देश की दौलत पर अपने अधिकार का दावा करने के लिए यह हड़ताल आयोजित की जा रही है।

मेहनतकशों का है यह नारा, हम हैं इसके मालिक! हिन्दोस्तान हमारा!

thumbपूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है। इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को। यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब, मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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