नई पेंशन योजना

मज़दूरों के भविष्य की सुरक्षा सट्टेबाज़ बीमा कंपनियों पर निर्भर

देशभर के सरकारी कर्मचारी नई पेंशन योजना के ख़िलाफ़ सड़कों पर उतर रहे हैं। इसे राष्ट्रीय पेंशन योजना (एन.पी.एस.) के नाम से भी जाना जाता है, और 1 जनवरी, 2004 के बाद सरकारी नौकरी में नियुक्त किये गए सभी कर्मचारियों पर इसे अनिवार्य रूप से लागू किया गया है (सशस्त्र बलों में काम करने वाले कर्मचारियों को इसके बाहर रखा गया है)। 30 सितम्बर, 2019 को पुरानी पेंशन योजना के लिए राष्ट्रीय आंदोलन (नेशनल मूवमेंट फॉर ओल्ड पेंशन स्कीम - एन.एम.ओ.पी.एस.) के झंडे तले हजारों सरकारी कर्मचारियों ने नई पेंशन योजना का विरोध करने और पुरानी पेंशन योजना को बहाल करने की मांग करते हुए संसद पर धरना प्रदर्शन आयोजित किया। देश की सभी केंद्रीय ट्रेड यूनियनों समेत विश्वविद्यालयों के शिक्षक, सरकारी स्कूलों के शिक्षक, बैंक, बीमा कंपनी, टेलिकॉम सेवा के संस्थाओं, इत्यादि के कर्मचारियों ने एक साथ मिलकर नई पेंशन योजना का ज़ोरदार विरोध किया।

नई पेंशन योजना के प्रति मज़दूरों के विरोध को समझने के लिए हम उसकी तुलना पुरानी पेंशन योजना के साथ करते हैं। इससे यह साफ़ देखा जा सकता है कि मज़दूर क्यों नई पेंशन योजना को अपने भविष्य के लिए ख़तरा मानते हैं।

पुरानी पेंशन योजना

जिन सरकारी कर्मचारियों की नियुक्ति 2004 से पहले हुई है उनको सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाली सुविधाएं पुरानी पेंशन योजना के अनुसार दी जाती हैं और इसे “परिभाषित सुविधाओं का प्रकार” की श्रेणी में रखा गया है। “परिभाषित सुविधाओं” का अर्थ है सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाली आय कर्मचारी को सेवानिवृत्ति के समय मिलने वाले अंतिम वेतन के आधार पर तय की जाती है।

सेवानिवृत्त कर्मचारी को या यदि उसकी मृत्यु हो जाये तो उस पर निर्भर परिवार के व्यक्ति को सरकार उसके अंतिम वेतन का 50 प्रतिशत अदा करती है। इसके अतिरिक्त उन्हें उपभोक्ता के लिए अखिल भारतीय मूल्य सूचकांक के आधार पर महंगाई भत्ते और स्थाई स्वास्थ्य भत्ते का भुगतान किया जाता है। 80 वर्ष की उम्र के बाद सेवानिवृत्त कर्मचारी को मूल पेंशन का 20 प्रतिशत अतिरिक्त राशि भी दी जाती है।

पुरानी पेंशन योजना के तहत पूरी पेंशन की राशि की ज़िम्मेदारी सरकार वहन करती थी।

नई पेंशन योजना

नई पेंशन योजना (एन.पी.एस.) 1 जनवरी, 2004 से या उसके बाद सरकारी नौकरी में नियुक्त किये गए कर्मचारियों पर लागू है। इस योजना के अनुसार सेवानिवृत्ति के बाद कर्मचारी को मिलने वाली आय पूरी तरह से शेयर बाज़ार में किये गए निवेश पर मिलने वाले मुनाफ़े पर आधारित होगी।

नई पेंशन योजना “परिभाषित योगदान” के आधार पर काम करती है। “परिभाषित योगदान” का अर्थ है कि कर्मचारी अपनी आय का एक निर्धारित हिस्सा इस योजना में योगदान के रूप में जमा करता है, जिसे शेयर बाज़ार में निवेश किया जाता है। यह निवेश इक्विटी, कॉर्पोरेट बॉन्ड और सरकारी प्रतिभूतियों को मिलाकर किया जाता है। इस निवेश पर मिलने वाला मुनाफ़ा कर्मचारी को सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन के रूप में दिया जायेगा। कर्मचारियों द्वारा योगदान के रूप में दी गयी इस राशि के निवेश का संयोजन करने के लिए सरकार ने कुछ विशिष्ट पेंशन फण्ड मैनेजर नियुक्त किये हैं।

नई पेंशन योजना दो श्रेणियों में काम करती है - श्रेणी-1, और श्रेणी-2। जिन कर्मचारियों की नियुक्ति 1 जनवरी, 2004 या उसके बाद हुई है, उनको श्रेणी-1 में निवेश करना अनिवार्य है (सशस्त्र बलों पर यह लागू नहीं है)। जबकि, श्रेणी-2 में योगदान करना कर्मचारी की इच्छा पर निर्भर करता है।

श्रेणी-1 के तहत सरकारी कर्मचारी को अपने मूल वेतन सहित महंगाई भत्ता का 10 प्रतिशत योगदान के रूप में जमा करना अनिवार्य है, जो कि उसके मासिक वेतन से काट लिया जायेगा। सरकार अपनी ओर से समान राशि का योगदान देगी।

श्रेणी-1 में दिया गया योगदान (और उसके निवेश पर मिलने वाला मुनाफ़ा) पेंशन श्रेणी-1 खाते में जमा किया जायेगा, जिसमें से कुछ सीमित राशि को कुछ सीमा तक निकाला जा सकता है। श्रेणी-1 खाते से राशि निकालने के लिए समय निर्धारित किया गया है जिसे लॉक-इन पीरियड कहते हैं। शुरुआत में यह घोषणा की गयी थी कि कर्मचारी यह राशि केवल सेवानिवृत्ति में बाद, यानी 60 वर्ष की उम्र के बाद ही निकाल पायेंगे। लेकिन 2017 के केन्द्रिय बजट में इसमें बदलाव किया गया और घोषणा की गयी कि अब कर्मचारी अपने योगदान की 25 प्रतिशत तक की राशि आपातकालीन स्थिति में निकाल सकता है। यह संषोधन 2018-19 के आंकलन वर्ष से लागू किया गया है।

श्रेणी-2 स्वेच्छा से बनाया जाने वाला खाता है, जिसमें कर्मचारी अपनी मर्जी से कितनी भी राशि जमा कर सकता है। कर्मचारी इस खाते से किसी भी समय राशी निकाल सकता है, और उसपर कोई सीमा नहीं है। सरकार इस श्रेणी-2 के खाते में कोई योगदान नहीं करती है। श्रेणी-2 का खाता तभी खोला जा सकता है जब कर्मचारी के पास श्रेणी-1 का चालू खाता मौजूद हो। नई पेंशन योजना के तहत किये गए योगदान पर आयकर पर छूट की सुविधा लागू होती है।

नई पेंशन योजना के तहत केंद्र सरकार के कर्मचारियों को मिलने वाली मृत्यु एवं सेवानिवृत्ति ग्रेच्युटी की शर्तें पुरानी पेंशन योजना के सामान हैं।

पुरानी पेंशन योजना के विपरीत, नई पेंशन योजना के तहत निर्धारित मुनाफ़े मिलने की कोई कोई गारंटी नहीं है, क्योंकि वह शेयर बाज़ार से जुड़ी है और उससे मिलने वाले मुनाफ़े पर निर्भर होगी।

60 वर्ष की उम्र या उसके बाद एक सरकारी कर्मचारी योजना की श्रेणी-1 से बाहर जा सकता है। सेवानिवृत्ति के समय वह कुल जमा राशी की केवल 60 प्रतिशत रकम निकाल सकता है, जिसपर कर लगेेगा। बाकि 40 प्रतिशत रकम को आजीवन वार्षिकी योजना (लाइफलॉन्ग एन्युटी स्कीम) में निवेश करना अनिवार्य है। यह निवेश बीमा नियामक और विकास प्राधिकरण के तहत पंजीकृत किसी भी बीमा कंपनी के ज़रिये किया जा सकता है। यदि कोई कर्मचारी 60 वर्ष की उम्र से पहले सेवानिवृत्त हो जाता है या योजना से निकल जाता है तो उसे अपनी पेंशन जमा राशि की 80 प्रतिशत रकम को वार्षिकी योजना में निवेश करना अनिवार्य है।

22 दिसंबर, 2003 को सरकार ने नई राष्ट्रीय पेंशन योजना की घोषणा की थी और 1 जनवरी, 2004 से यह योजना प्रभावी हुई थी। कई राज्य सरकारों ने 1 जनवरी, 2004 के बाद इस योजना को अलग-अलग समय से अपनाया है। 1 मई, 2009 के बाद इस योजना को देश के सभी नागरिकों के लिए खोल दिया गया, जिसमें स्व-रोज़गार मज़दूर और असंगठित क्षेत्र के मज़दूर शामिल हैं और स्वेच्छा से इस योजना से जुड़ सकते हैं। लेकिन गैर-सरकारी मज़दूरों के लिए सरकार कोई योगदान नहीं करेगी।

पुरानी पेंशन योजना को ख़त्म करने और नई पेंशन योजना को लागू करने को जायज़ ठहराते हुए सरकार और उसके प्रवक्ता यह तर्क़ पेश करते हैं कि पुरानी पेंशन योजना से सरकार पर “वित्तीय बोझ बढ़ रहा है”, और इसे “दीर्घकाल तक जारी रखना संभव नहीं है”।

अपने सेवानिवृत्त कर्मचारियों को एक परिभाषित, निर्धारित और सामाजिक सुरक्षा की गारंटी देने की बजाय सरकार उन्हें अपने पूरे जीवन की जमा-पूंजी को शेयर बाज़ार में निवेश करने के लिए मजबूर कर रही है, ताकि बड़ी वित्त कपनियां मुनाफ़े बनाने के लिए इसका इस्तेमाल कर सकें। सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाली आय शेयर बाज़ार से मिलने वाले मुनाफ़ों पर निर्भर होगी।

नयी पेंशन योजना का व्यापक विरोध

सरकारी कर्मचारी इस नई पेंशन योजना का जबरदस्त विरोध कर रहे हैं। वे मांग कर रहे हैं कि अंतिम वेतन के आधार पर निर्धारित पेंशन की योजना को पुनः बहाल किया जाये।

पुरानी पेंशन योजना के तहत कर्मचारी को कोई भी योगदान करने की ज़रूरत नहीं थी। जबकि, नई पेंशन योजना के तहत उन्हें पेंशन कोष के लिए एक हिस्सा योगदान देना होगा।

सेवानिवृत्त होने पर वे इस कोष से केवल 60 प्रतिशत रकम ही निकाल सकते हैं, जबकि बाकि की 40 प्रतिशत रकम को शेयर बाज़ार से जुड़े कोष में निवेश करना अनिवार्य होगा। सेवानिवृत्त कर्मचारियों को शेयर बाज़ार में अपना पैसा डूब जाने का डर हमेशा लगा रहता है। (बॉक्स देखियेः नयी पेंशन योजना के चलते सेवानिवृत्ति के बाद मज़दूरों की असुरक्षा बढ़ जाएगी)  

राज्य द्वारा सर्वव्यापी पेंशन की गारंटी देना एक जायज़़ मांग है

एक उम्र के बाद सेवानिवृत्त होने पर पेंशन मिलना मज़दूरों के लिए एक सामाजिक सुरक्षा का ज़रिया है। इसलिए पेंशन को सर्वव्यापी माना गया है, ताकि सेवानिवृत्ति के बाद जब मज़दूर काम नहीं कर सकता उस समय उसे कम से कम इतनी पेंशन मिलनी चाहिए जिससे कि वह एक इज्ज़त की ज़िन्दगी जी सके और इसे बढ़ती महंगाई के साथ बढ़ाया जाना चाहिए। अपने सेवानिवृत्ति नागरिकों को पेंशन और सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना एक आधुनिक राज्य का ज़रूरी फ़र्ज़ और ज़िम्मेदारी है। 

हमारे देश में मज़दूरों का बहुत बड़ा तबका, जो केंद्र या राज्य सरकार के तहत काम नहीं करता है, वह सेवानिवृत्ति के बाद किसी भी तरह की पेंशन या किसी सामाजिक सुरक्षा का पात्र नहीं है। सरकार दावा कर रही है कि इस नई पेंशन योजना के ज़रिये वह एक “ऐसे समाज की रचना कर रही है, जहां सभी को पेंशन मिलेगी”, क्योंकि अब असंगठित मज़दूर भी इस नई पेंशन योजना का हिस्सा बन सकता है। मज़दूरों को बेवकूफ बनाने के लिए यह एक फ़र्ज़ी प्रचार चलाया जा रहा है। निजी मालिक को मज़दूर की पेंशन कोष में योगदान देना ज़रूरी नहीं है। सरकार भी इसमें कोई योगदान नहीं देगी। इस तरह इस कोष में केवल मज़दूर के वेतन से आने वाली रकम होगी और इसको शेयर बाज़ार में निवेश अनिवार्य है, जिससे वित्तीय सट्टेबाजों के लिए मुनाफ़े सुनिश्चित किये जा सके।

हमारे देश में ट्रेड यूनियन आंदोलन सर्वव्यापी न्यूनतम पेंशन 10,000 रुपये प्रतिमाह और राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन 21,000 रुपये प्रति माह करने के लिए संघर्ष कर रहा है।

एक तरफ बड़े इजारेदार पूंजीवादी घरानों को उनके मुनाफ़े बढ़ाने के लिए लोगों के लाखों करोड़ों रुपयों की रकम सौंपने में सरकार को कोई हिचकिचाहट नहीं है। इन बड़े इजारेदार पूंजीवादी घरानों द्वारा “न चुकाये गये कर्ज़” के रूप में लूटे गए लाखों करोड़ों रुपयों की कर्ज़ माफ़ी करने के लिए सरकार तैयार है। इन इजारेदार पूंजीपतियों के लिए करों में राहत देने में भी सरकार देरी नहीं करती है, जैसा कि हाल ही में सरकार ने इन बड़े इजारेदार पूंजीपतियों के लिए 1.45 लाख करोड़ रुपये के करों को घटाने की घोषणा की है। दूसरी तरफ सरकार यह घोषणा करती है कि अपने कर्मचारियों को सेवानिवृत्ति के बाद सुनिष्चित पेंशन देना उसके लिए “वित्तीय बोझ” है, जिस बोझ को वह उठाने के क़ाबिल नहीं है। नई पेंशन योजना के ज़रिये सरकार मज़दूरों के लिए सेवानिवृत्ति के बाद एक निर्धारित आय प्रदान करने से इंकार कर रही है, और पूंजीपति सट्टाबाजों और बीमा कंपनियों के मुनाफ़े बढ़ाने के लिए वह मज़दूरों को अपनी ज़िन्दगी भर की जमा-पूंजी शेयर बाज़ार में निवेश करने के लिए मजबूर कर रही है।

मज़दूर जब तक काम करता है तब तक अपनी मेहनत से समाज में अपना योगदान देता रहता है। जब वह बूढ़ा हो जाता है, या किसी दुर्घटना का शिकार हो जाता है और आगे काम नहीं कर पाता है ऐसे समय में उसकी देखभाल सुनिश्चित करना समाज का फ़र्ज़ है। यह सुनिश्चित करना राज्य की ज़िम्मेदारी है कि पूंजीपति जो बेशी मूल्य मज़दूरों की मेहनत से निकालते हैं उसका एक हिस्सा पूंजीपतियों से लेकर मज़दूरों के लिए पेंशन कोष में जमा करे। यह रकम योगदान के रूप में मज़दूरों के वेतन से निकाली गयी रकम से अतिरिक्त होगी। जिन मज़दूरों के स्थायी मालिक नहीं होते है, जैसे निर्माण मज़दूर, उनके लिए राज्य को एक पेंशन कोष का निर्माण करने की ज़िम्मेदारी उठानी होगी, जहां से इन मज़दूरों के लिए सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन का भुगतान किया जा सके। किसी भी हाल में मज़दूरों के पेंशन कोष को सट्टाबाज़ारी गतिविधियों में निवेश नहीं किया जाना चाहिए। सभी सेवानिवृत्त मज़दूरों के लिए सर्वव्यापी पेंषन की मांग मज़दूर वर्ग की जायज़ मांग है।

नयी पेंशन योजना के चलते सेवानिवृत्ति के बाद मज़दूरों की असुरक्षा बढ़ जाएगी

सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियंस (सीटू) के महासचिव तपन सेन ने साफ़ तौर से समझाया कि “पुरानी पेंशन योजना के तहत न्यूनतम पेंशन की रक़म 9000 रुपये प्रति माह बनती है और यह आंकड़ा नौकरी की शुरुआत में सबसे न्यूनतम वेतन पर काम कर रहे एक मज़दूर के वेतन के आधार पर निकाला गया है। असली पेंशन इससे कहीं अधिक है, क्योंकि कोई भी व्यक्ति नौकरी की शुरुआत में दिए गए वेतन पर सेवानिवृत्त नहीं होता है। नई पेंशन योजना के तहत एक पूरे दशक तक काम करने वाले मज़दूर को केवल 1000-2000 रुपये ही मिलेंगे। यह एक विनाशकारी नीति है।” उन्होंने आगे बताया कि इस नई पेंशन योजना के ज़रिये सरकार लोगों के पैसे को शेयर बाज़ार में निवेश करके सट्टा बाज़ारियों के मुनाफ़ों को बढ़ाने का इंतजाम कर रही है, और इसकी क़ीमत सरकारी कर्मचारियों से वसूल की जाएगी।

सरकार और उसके प्रवक्ता यह भ्रम फैला रहे हैं कि एक मानक व्यवस्थित निवेश योजना (एस.आई.पी.) की तरह नई पेंशन योजना के तहत दीर्घकालिक पूंजीगत लाभ पहले से बेहतर होगा। लेकिन इसका विरोध कर रहे कर्मचारियों ने मज़बूत तर्क के आधार पर यह साबित किया कि जो कर्मचारी नई पेंशन योजना के तहत 10-12 वर्ष के भीतर सेवानिवृत्त होता है उसके पेंशन खाते में जो रकम जमा होगी, वह पेंशन के रूप में पर्याप्त आय देने के लिए काफी नहीं होगी। 

उदाहरण के लिए हरियाणा बिजली बोर्ड के एक भूतपूर्व कर्मचारी के बताया कि “जब मैं रिटायर हुआ उस समय नई पेंशन योजना के तहत मेरे पेंशन खाते में 3.25 लाख रुपये थे, जबकि मुझे 13 प्रतिशत ब्याज मिल रहा था। सेवानिवृत्ति के बाद मुझे इसकी 60 प्रतिशत राषि मिल गयी। बकाया राशि आजीवन वार्षिकी योजना में निवेश कर दी गयी। आज मुझे इस वार्षिकी योजना से हर महीने केवल 700 रुपये से मिल रहे हैं।” हरियाणा बिजली बोर्ड के इस भूतपूर्व कर्मचारी को 2006 में स्थायी पद पर नियुक्त किया गया था और 2013 में वह रिटायर हो गए। हरियाणा में नई पेंशन योजना 2006 से लागू की गयी। उन्होंने आगे बताया कि उनके कुछ सहकर्मी जो उनसे कुछ ही समय पहले स्थायी किये गए थे, उन्हें पुरानी पेंशन योजना के तहत 15,000 रुपये प्रतिमाह से अधिक पेंशन मिल रही है।

 

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पार्टी के दस्तावेज

8 जनवरी, 2020 की सर्व हिन्द आम हड़ताल को सफल करें!

मज़दूर एकता कमेटी का आह्वान

देश की दिशा पूंजीपतियों की अमीरी को बढ़ा रही है और मज़दूर, किसान व सभी मेहनतकशों को ग़रीबी में धकेल रही है। इस रास्ते का विरोध करने के लिए और देश की दौलत पर अपने अधिकार का दावा करने के लिए यह हड़ताल आयोजित की जा रही है।

मेहनतकशों का है यह नारा, हम हैं इसके मालिक! हिन्दोस्तान हमारा!

thumbपूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है। इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को। यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब, मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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