तेल और पेट्रोलियम मज़दूरों का राष्ट्रीय अधिवेशन

निजीकरण के विरोध में हड़ताल करने का निर्णय लिया

20 नवम्बर को नई दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में बी.पी.सी.एल., एच.पी.सी.एल., ओ.एन.जी.सी. और ऑइल इंडिया लिमिटेड में हिन्दोस्तान भर में काम करने वाले तेल और पेट्रोलियम मज़दूरों का प्रतिनिधित्व करने वाली तीन फेडरेशनों ने संयुक्त आम अधिवेशन का आयोजन किया। ये तीनों फेडरेशनें थीं, ऑल इंडिया पेट्रोलियम वर्कर्स फेडरेशन (ए.आई.पी.डब्ल्यू.एफ.), नेशनल फेडरेशन ऑफ पेट्रोलियम वर्कर्स (एन.एफ.पी.डब्ल्यू.) तथा पेट्रोलियम एंड गैस वर्कर्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (पी.जी.डब्ल्यू.एफ.आई.)।  

Oil Workers Convention, Indiaपूरे देश से 300 से अधिक प्रतिनिधियों ने इस अधिवेशन में भाग लिया। तीनों फेडरेशनों के नेताओं के अलावा इंटक के राष्ट्रीय अध्यक्ष संजीव रेड्डी, एटक की अखिल भारतीय सचिव अमरजीत कौर, केरल सेे लोकसभा सदस्य आई.एन.सी. के हिबी एडेन, सी.पी.एम. के एलामारम करीम, सी.पी.एम. के ही ए.एम. आरिफ, सी.पी.आई. के बिनॉय विश्वम और महाराष्ट्र से शिव सेना के लोक सभा सदस्य गजानन कीर्तिकर एवं अनिल देसाई तथा मुंबई से कामगार एकता कमेटी के सचिव ए. मैथ्यू ने भी अधिवेशन को संबोधित किया। पी.जी.डब्ल्यू.एफ.आई. के भूतपूर्व महासचिव कॉमरेड स्वदेश देव रॉय ने सभा का संचालन किया।

पूंजीपति वर्ग के इस झूठे प्रचार का वक्ताओं ने खंडन किया कि सार्वजानिक क्षेत्र की इकाइयां देश को ग़रीब बनाती हैं। सच तो यह कि निजीकरण पूंजीपतियों को अमीर और देश को ग़रीब बनाता है। वक्ताओं ने पूंजीवादी झूठ का पर्दाफाश किया कि पूंजीपति वर्ग धन-संपत्ति उत्पन्न करता है। उन्होंने बताया कि मानवीय श्रम ही है जो प्रकृति पर कार्य करके समाज की सारी भौतिक संपत्ति उत्पन्न करता है।

वक्ताओं ने सरकार के 41 आयुद्ध निर्माण इकाइयों के निगमीकरण, कोयला क्षेत्र में 100 प्रतिशत एफ.डी.आई. की छूट और रेलवे की सात उत्पादन इकाइयों के निगमीकरण की योजनाओं का हाल ही में हुए एकजुट विरोध की तरफ ध्यान दिलाया। इन सभी क्षेत्रों के मज़दूरों की हड़तालों ने सरकार को क़दम पीछे लेने के लिए और फिलहाल के लिए निजीकरण की योजनाओं को स्थगित करने पर मजबूर कर दिया।

रक्षा क्षेत्र के मज़दूरों ने 26, 27 एवं 28 जनवरी 2019 को तीन दिवसीय हड़ताल की और 20 अगस्त को पूरे देशभर में एक माह की 100 प्रतिशत सफल हड़ताल की। कोयला मज़दूरों ने 24 सितम्बर को हड़ताल की जो कि 100 प्रतिशत सफल हुई। विभिन्न यूनियनों ने मतभेदों को एक तरफ करके रेलवे मज़दूरों ने बड़ी संख्या में विरोध किया और अपने परिवार के साथ सड़क पर भी उतर आए।

वक्ताओं ने तेल और पेट्रोलियम क्षेत्र के मज़दूरों की 28 नवम्बर, 2019 को हड़ताल पर जाने के निर्णय की सराहना की।

वक्ताओं ने ध्यान दिलाया कि निजीकरण की शुरुआत मोदी सरकार से नहीं हुई है, इसे तो कांग्रेस सरकार ने 1992 में शुरू किया था। उन्होंने मौजूदा सरकार की सार्वजानिक क्षेत्र की इकाइयों का और तेज़ी से निजीकरण करने के प्रयासों और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफ.डी.आई.) चालित अर्थव्यवस्था की तरफ झुकाव की भर्त्सना की। उन्होंने कहा कि मोदी के ‘मेक इन इंडिया’ के नारे को ‘सेल आफ इंडिया’ में बदल देना चाहिए!

सभा को संबोधित करते हुए कामगार एकता कमेटी के प्रतिनिधि ने एटक, सीटू, एच.एम.एस. और के.ई.सी., इत्यादि सहित 30 यूनियनों की महाराष्ट्र की ट्रेड यूनियन संयुक्त एक्शन कमेटी (टी.यू.जे.ए.सी.) का सन्देश दिया कि वह बी.पी.सी.एल. और तेल क्षेत्र के सभी मज़दूरों के संघर्ष का पूरा समर्थन करेगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि मोदी सरकार उन 150 बड़े पूंजीवादी इजारेदारों के हितों के लिए महज एक मैनेजर है, जिन्होंने उसके चुनाव के लिए धन दिए और अब वे बदले में निजीकरण को तेज़ करने की मांग कर रहे हैं। उन्होंने यह भी बताया कि निजीकरण और उदारीकरण द्वारा भूमंडलीकरण के कार्यक्रम ने हिन्दोस्तान में धन-संपत्ति का केन्द्रीकरण बहुत बढ़ा दिया है। वर्ष 2000 में हिन्दोस्तान के उच्चतम 1 प्रतिशत लोग देश की 35 प्रतिशत संपत्ति के मालिक थे और अब 19 वर्ष बाद उच्चतम 1 प्रतिशत लोग हिन्दोस्तान की 70 प्रतिशत संपत्ति के मालिक हैं और यह प्रवृत्ति भविष्य में जारी रहेगी। आज उच्चतम 3 इजारेदार पूंजीवादी घरानों - टाटा, बिड़ला, अम्बानी - की संपत्ति हिन्दोस्तान के सकल घरेलू उत्पाद के 10 प्रतिशत के बराबर है। इजारेदार पूंजीपति अपना धन नहीं लगाते हैं बल्कि लोगों द्वारा बैंकों के बचत खातों में जमा किये गये पैसों से कर्ज़ लेकर इस्तेमाल करते हैं। वे इस पैसे से खेलते हैं और यदि उनका व्यवसाय सफल नहीं होता है तो उनके कर्ज़ों को माफ़ करने के लिए लोगों के पैसे का ही इस्तेमाल किया जाता है।

Oil workers conventionउन्होंने बताया कि हिन्दोस्तान के स्वतंत्र होने से पहले ही, देश के आर्थिक विकास की योजना बनाने के लिए उस समय के बड़े पूंजीपतियों - टाटा, बिड़ला, इत्यादि ने मुंबई में 1944 में एक मीटिंग आयोजित की थी। उनको यह स्पष्ट था कि शीघ्र ही अंग्रेज हिन्दोस्तान छोड़ने के लिए मजबूर हो जायेंगे और सत्ता उनके हाथों में हस्तांतरित कर देंगे। इसलिए यह प्लान बनाया गया जिसे ‘बॉम्बे प्लान’ या ‘टाटा-बिड़ला प्लान’ के नाम से भी जाना जाता है। इस योजना के अनुसार सरकार को खनिज उत्पादन, स्टील, ऊर्जा, जल परिवहन, रेलवे, दूर संचार, उर्वरक, इत्यादि जैसे भारी औद्योगिक क्षेत्रों में निवेश करना चाहिए। इन क्षेत्रों में ज्यादा पूंजी लगती है और उनको स्थापित करने और उनसे पैसा कमाने में ज्यादा समय लगता है। तब के 20 सबसे बड़े पूंजीपतियों की कुल पूंजी केवल 100 करोड़ रुपये थी। इसलिए वे कपड़े, जूते, सीमेंट, इत्यादि, तेज़ी से खपत होने वाली उपभोक्ता वस्तुओं में निवेश किया जिनसे जल्दी मुनाफ़ा कमाया जा सकता था। इसी आर्थिक मॉडल को 1947 के बाद नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी ने लागू किया और “समाजवादी ढांचा” कह कर उसका प्रचार किया। लेकिन यदि आप बबूल के बीज बोयेंगे तो कांटे ही मिलेंगे। इसी तरह यदि आप पूंजीपति वर्ग के फ़ायदे के लिए व्यवस्था बनायेंगे तो उनको ही फ़ायदा होगा। आज हमको यही देखने को मिल रहा है बड़े इजारेदार पूंजीवादी घरानों की दौलत बहुत तेज़ी से बढ़ रही है जबकि लोगों को यथास्थिति में रहने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। हम मज़दूरों को हिन्दोस्तान की इस मौजूदा परिकल्पना को चुनौती देनी है।

सभा को संबोधित करते हुए पी.जी.डब्ल्यू. एफ. आई. और एन. एफ. पी. डब्ल्यू. के महासचिवों ने बताया कि पांच तेल कपनियां - बी.पी.सी.एल., एच.पी.सी.एल., आई.ओ.सी.एल., ओ.एन.जी.सी. और ऑइल इंडिया लिमिटेड - हर वर्ष ईंधन पर टैक्स, इत्यादि के रूप 6 लाख करोड़ रुपये का राजस्व केंद्र सरकार को देती हैं। उन्होंने राष्ट्रीय अधिवेशन, अनेक रैलियों व हड़तालों की सराहना की और कहा कि यह अधिवेशन तेल क्षेत्र के मज़दूरों के संघर्ष के लिए एकता को और मजबूत करने की दिशा में एक क़दम है। बी.पी.सी.एल. की कोच्ची रिफायनरी की मज़दूर यूनियन के प्रतिनिधियों ने रिफायनरी के नज़दीक रहने वाले लोगों को साथ जोड़ने के मज़दूरों के प्रयासों की सराहना की। 

सभी वक्ताओं ने देशभर के तेल क्षेत्र के मज़दूरों से आह्वान किया कि वे 8 जनवरी, 2020 की हड़ताल के लिए अधिकतम लोगों को संगठित करके उसमें पूरा सहयोग दें जिससे देश के शासकों को ज़ोरदार सन्देश दिया जा सके कि निजीकरण और उदारीकरण बिलकुल मंजूर नहीं है और अपनी जीविका और यूनियन बनाने के अधिकार के लिए हम लड़ेंगे।

देशभर से आए अनेक प्रतिनिधियों ने भी सभा को संबोधित किया।

अंत में अध्यक्षमंडल ने अधिवेशन के लिए देशभर से आए प्रतिनिधियों को बधाई देकर सभा का समापन किया। उन्होंने बी.पी.सी.एल. और एच.पी.सी.एल. की 28 नवम्बर, 2019 को प्रस्तावित हड़ताल को सफल बनाने के लिये सबसे आह्वान किया और पांचों तेल कंपनियों के मज़दूरों को 8 जनवरी को अखिल भारतीय आम हड़ताल में भाग लेने का आह्वान भी किया।

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Dec 1-15 2019    Struggle for Rights    2019   

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