हाल ही में हुए महाराष्ट्र चुनाव के नतीजे क्या दिखाते हैं?

चुनावों के नतीजों की घोषणा होने के लगभग 35 दिन बाद, महाराष्ट्र में 28 नवंबर को एक नयी सरकार सत्ता में आयी जब महाविकास अघाड़ी के नेता, उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलायी गयी। इस दौरान, पुरानी पार्टियों का गठबंधन टूटा और एक नया गठबंधन बना। जो पार्टियां चुनावों के पहले और बाद, एक दूसरे को अपना दुश्मन कह रही थीं उन्होंने एक दूसरे के साथ समझौता किया और गठबंधन बनाया। चारों पार्टियों भाजपा, षिवसेना, राष्ट्रवादी कांग्रेस और कांग्रेस पार्टी के सत्ता पर आने के भरसक प्रयास और सत्ता की हवस की होड़, जिससे वे सत्ता की लूट का हिस्सा बन सकें, यह भली भांति जनता के सामने आया और इससे सभी पार्टियों के असली चेहरे का पर्दाफ़ाश हुआ।

इन पार्टियों के नेताओं ने सत्ता में आने के लिए केवल खुले और गुप्त समझौते ही नहीं किये बल्कि उन्होंने पार्टी के विधायकों के ख़रीदने की साज़िश और दूसरी पार्टियों को तोड़ने का भी भरसक प्रयास किया। कई पार्टियों ने अपने विधायकों को एक महीने तक कैद करके रखा जिससे वे कहीं किसी और पार्टी को बिक न जाएं।

भाजपा और शिव सेना ने अपना गठबंधन “हिंदुत्व” के समर्थन में बनाया था जबकि कांग्रेस पार्टी और राष्ट्रवादी कांग्रेस ने “धर्म निरपेक्षता की रक्षा करने के लिए” अपने गठबंधन का निर्माण किया था लेकिन कौन मुख्यमंत्री बनेगा, इस मुद्दे को लेकर भाजपा और शिवसेना का गठबंधन टूट गया। शिवसेना, कांग्रेस पार्टी और राष्ट्रवादी कांग्रेस ने अपने नए गठबंधन को ‘महाविकास आघाड़ी” का नाम दिया।

लोगों ने यह भी देखा कि संविधान के द्वारा दी गई मनमानी करने की खुली छूट, का इस्तेमाल करके किस तरह से देश के प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और राज्यपाल मिलकर, कितनी आसानी से, एक राज्य में, केंद्र में सत्ता में बैठी पार्टी (इस समय भाजपा) की सरकार बना सकते हैं। प्रधानमंत्री ने कैबिनेट को पूरी तरह से दरकिनार करने के संवैधानिक अधिकार का इस्तेमाल किया और देर रात राष्ट्रपति को महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन को ख़त्म करने की सिफारिश की। यह भी गौर करने की ज़रूरत है कि संविधान के अनुसार, प्रधानमंत्री को कैबिनेट को दरकिनार करने का अधिकार, केवल बहुत ही भयानक आपातस्थिति में इस्तेमाल करना चाहिए न कि सरकार बनाने के लिए।

सुबह होने के पहले ही राष्ट्रपति ने महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन को ख़त्म करने के आदेश को मंजूरी दे दी और महाराष्ट्र के राज्यपाल ने देवेन्द्र फड़नविस को राज्य के मुख्यमंत्री की शपथ भी दिला डाली जब महाराष्ट्र की जनता सो रही थी।

यह सब नाटक जो हमने महाराष्ट्र में सरकार बनते समय देखा (बाॅक्स देखिए), वह हमारे देश में चल रहे “बहु पार्टियों का प्रतिनिधित्व करने वाला लोकतंत्र” का जन-विरोधी और लोकतंत्र-विरोधी चरित्र का पर्दाफाश करता है जिसमें आम मेहनतकश लोग बेबस हैं उनके हाथ में इस लोकतंत्र में केवल वोट देने के अलावा और कुछ भी करने की क्षमता नहीं है।

शासक पूंजीपति वर्ग चुनावों का एजेंडा तय करता है। यह वर्ग अपनी पसंद की पार्टियों को पैसा देता है और देश में सत्ता में आने वाली सरकार और विभिन्न पदों पर बैठे मंत्रियों के चयन में उसकी बहुत ही सक्रिय भूमिका रहती है। चुनावी प्रक्रिया द्वारा यह निश्चित होता है कि कौन सी पार्टी या गठबंधन, एक तरफ इस वर्ग के तय किये गए कार्यक्रम को लागू करने में सक्षम है और दूसरी तरफ, इस समय आम लोगो को बेवकूफ बनाने में कितना समर्थ है।

विधान सभा के चुनावों में, एक तरफ भाजपा धारा 370 को रद्द करने और “देश प्रथम” के नारों के साथ चुनावी प्रचार में लोगों के सामने जो उनके मुद्दे थे जैसे कि देश में बढ़ती विषमता (अमीर और गरीब के बीच बढ़ती खाई), बढ़ती बेरोज़गारी और नौकरी का प्रश्न, बढ़ती मंहगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और सभी सार्वजनिक सेवाओं का निजीकरण आदि, मुद्दों से उनका ध्यान हटाकर, उनको दिशा भूल करने का काम कर रही थी। वहीं दूसरी तरफ राष्ट्रवादी कांग्रेस और कांग्रेस पार्टी के गठबंधन का प्रचार इस बात पर केन्द्रित था कि लोगों की समस्याओं की जड़ भाजपा की सरकार है। जबकि हम सब भली-भांति जानते हैं कि उनका गठबंधन भी पूंजीपति वर्ग की उसी आर्थिक दिशा के प्रति वचनवद्ध है जिसे भाजपा लागू कर रही थी और पूंजीपतियों के उसी कार्यक्रम ने आम मज़दूरों और किसानों की जिं़दगी तबाह कर रखी है।

चुनावी नतीजे लोगों की इच्छा और प्राथमिकताओं का प्रतीक नहीं हैं

हर सरकार जो सत्ता में आती है वह दावा करती है कि उसको लोगों का “जनादेश” हासिल हुआ है। असलियत में जो सरकार बनती है उसको पूंजीपति वर्ग का आदेश और समर्थन प्राप्त होता है। इसलिए हर सरकार ऐलान तो करती है कि वह लोगों की खुशहाली और हितों के लिए काम करेगी। परतु इसके बिलकुल विपरीत वह पूंजीपति वर्ग के कार्यक्रम को जन-विरोधी नीतियों के द्वारा लागू करती है, जिन नीतियों का मक़सद होता है हिन्दोस्तानी और विदेशी इजारेदार पूजीपतियों को मज़दूरों और मेहनतकशों का शोषण करके और अमीर बनाना, किसानों को लूटना और देश के प्राकृतिक संसाधनों और सामाजिक सम्पति को अपने मुनाफ़ों के लिए लूटना।

पूंजीपति वर्ग अपने वर्ग चरित्र के अनुसार, अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए स्पर्धा में विभिन्न गुटों में बंटा हुआ है। विभिन्न पार्टियां जैसे कि भाजपा, कांग्रेस पार्टी, राष्ट्रवादी कांग्रेस, शिवसेना, देश के बड़े पूंजीपतियों और महाराष्ट्र के विभिन्न क्षेत्रीय पूजीपतियों के हितों का प्रतिनिधित्व करती हैं। जैसा कि साफ दिखता है कि उनकी आपसी लड़ाई केवल इस बात पर है कि देश की लूट का कितना हिस्सा किसको मिलेगा वर्ना उनके बीच में इस बात पर पूरी एकता बनी हुई है और वे सभी एक मत से, पूंजीपति वर्ग के मज़दूर-विरोधी, किसान-विरोधी तथा निजीकरण और उदारीकरण के ज़रिये भूमंडलीकरण के कार्यक्रम को लागू करने का समर्थन करते हैं।

ये सभी पार्टियां, एक ही पूंजीपति वर्ग की प्रतिनिधि हैं - यही कारण है कि इन पार्टियों के सदस्य बिना किसी संकोच के समय के अनुसार, अपने निजी स्वार्थ के लिए, इस पार्टी से उस पार्टी में शामिल हो जाते हैं। जैसा कि सब जानते हैं महाराष्ट्र में चुनावों से पहले कांग्रेस पार्टी और राष्ट्रवादी कांग्रेस के 23 नेता भाजपा और शिवसेना में शामिल हो गए थे।

वास्तव में, पूंजीपति वर्ग की इन चारों पार्टियों में मौलिक रूप से कोई अंतर नहीं है

लोगों को बेवकूफ बनाने के लिए ये दावा करती हैं कि उनकी विचारधारा अलग है। परन्तु इसके विपरीत, जैसा कि उनके इतिहास और आचरण से साफ दिखता है, ये सभी पार्टियां पूजीवादी व्यवस्था और पूंजीपतियों के हित में बनाये गए लोकतंत्र की हिफ़ाज़त करने के लिए समर्पित हैं। इसलिए पूंजीपति वर्ग को कोई संकोच नहीं होता कि कौन-सी पार्टी सत्ता में है। वे इन सबको पैसा देते हैं और उनको समय-समय पर, अपने आदेशानुसार सरकार चलाने के लिए इस या उस पार्टी को सत्ता में लाते हैं। इसलिए ये सभी पार्टियां किसी भी तरीक़े से सत्ता में आने के लिए होड़ लगाती हैं और सत्ता में आने के बाद, वे खुद को और पूंजीपतियों को, जो उनको पैसा देते हैं, देश की सामाजिक सम्पति को लूटकर और भी अमीर बनाने के उनके कार्यक्रम को लागू करती हैं। कोई फरक नहीं पड़ता कि कौन-सी पार्टी और गठबंधन सत्ता में आता है। कौन किस पार्टी को तोड़ता है और किसमें जाता है। तथाकथित “हिंदुत्ववादी” पार्टी भाजपा ने “धर्मनिरपेक्ष” राष्ट्रवादी कांग्रेस के साथ गठबंधन में कोई संकोच नहीं किया और इसी प्रकार “धर्मनिरपेक्ष” राष्ट्रवादी कांग्रेस गठबंधन ने “हिन्दुत्ववादी” शिवसेना के नेतृत्व में सरकार बनाने में कोई बाधा नहीं महसूस की।

इन चुनावों से पहले 2014 के विधानसभा चुनावों में, राष्ट्रवादी कांग्रेस ने भाजपा को समर्थन देने का प्रस्ताव किया था। पिछले महीने प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रवादी कांग्रेस के नेता शरद पवार से मुलाक़ात की और महाराष्ट्र में राष्ट्रवादी कांग्रेस को भाजपा सरकार को समर्थन देने की गुजारिश की थी। 

इन सब पार्टियों का बिना किसी संकोच और परेशानी के एक दूसरे के साथ गठबंधन बनाने के प्रयासों से यह भी साफ हो जाता है कि ये चारों पार्टियां सम्प्रयादिक हैं। अपने को “हिंदुत्ववादी’ या “धर्मनिरपेक्ष” कहलाने वाली ये पार्टियां लोगों को बेवकूफ बनाती हैं - ये विभिन्न चेहरे इस मूलभूत सच को छिपाने के लिए हैं कि ये सब पूंजीपतियों की पार्टियां हैं और उनका एक ही मक़सद है कि किस तरह से लोगों का शोषण और दमन करने वाले पंूजीपति वर्ग के खि़लाफ़, लोगों के एकजुट संघर्ष को दिशाभूल करें।

इस वर्तमान लोकतंत्र में लोग संप्रभु नहीं हैं

हम सबका अपने जीवन का अनुभव यह साफ दिखाता है कि इतने चुनावों के बाद भी मज़दूरों, किसानों और मेहनतकश लोगों के जीवन में कोई गुणात्मक परिवर्तन नहीं आया है। एक पार्टी या गठबंधन के बदलने से हमारी आर्थिक व्यवस्था का पूजीपतियों के हित में चलने वाली दिशा में किसी किसी परिवर्तन का सवाल ही नहीं उठता क्योंकि वे सब उसी वर्ग की सेवा और समृद्धि के लिए चलायी जाती हैं। हर तरह का शोषण दमन बढ़ गया है। हम सबकी ज़िंदगी बद से बदतर होती जा रही है। अमीर और अमीर हो रहे हैं और गरीबों की ज़िन्दगी दिन पर दिन और भी मुश्किल होती जा रही है। लोगो की जायज़ मांगें कभी भी पूरी नहीं की जाती।

इन सब सबूतों से केवल एक ही निष्कर्ष निकलता है - इस वर्तमान लोकतंत्र और राजनीतिक प्रक्रिया में एक बुनियादी नुक्स है। यही इन सब समस्याओं की जड़ है।

हिन्दोस्तानी संविधान की प्रस्तावना पढ़ने से ऐसा लगता है कि हिन्दोस्तानी गणतंत्र में लोग सत्ता में हैं। वे संप्रभु हैं। लेकिन सच तो यह है की संविधान, कैबिनेट (मंत्रिमंडल) को, लोगों के नाम पर, सभी मुद्दों पर निर्णय लेने का अधिकार दे देता है। और मंत्रिमंडल में भी, उसके एक सदस्य, प्रधानमंत्री के पास, मंत्रिमंडल को भी दरकिनार करके, कुछ भी निर्णय लेने का विशेषाधिकार है।

उदाहरण सामने है। जम्मू और कश्मीर को टुकड़े-टुकड़े करने का निर्णय, केंद्रीय मंत्रिमंडल ने लिया और (कि यह लोगो के हित में है) ऐसा ऐलान कर दिया गया। इस निर्णय में लोगों की भूमिका, केवल एक मूक दर्शक के अलावा और कुछ नहीं थी।

प्रधानमंत्री को यह अधिकार भी है कि वे 2016 में की गई नोटबंदी जैसा निर्णय खुद ले लें और उसका ऐलान करने से पहले, उनको कोई ज़रूरत नहीं थी कि वे संसद से सलाह मशवरा करें। और यह ऐसा निर्णय था जिसने करोड़ो लोगों की जिं़दगी तबाह कर दी और उनकी रोज़ी-रोटी उनसे छीन ली।

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भी इसी प्रकार 1975 में आपातकाल (इमरजेंसी) की घोषणा करने से पहले संसद में विचार विमर्ष करने की ज़रूरत नहीं समझी। एक ऐसा निर्णय जिसने हिन्दोस्तान के लोगों के सभी मूल अधिकार उनसे छीन लिए और यह सब करने के लिए उनको संविधान से अधिकार प्राप्त था। गौर करने के ज़रूरत है कि इन चुनावों में बड़े-बड़े पूंजीपति हजारों करोड़ों रुपये खर्च करते हैं जिसके द्वारा वे सुनिशिचित करते हैं कि उनकी चुनी गयी पार्टी और उनके विश्वासपात्र नुमाइंदे सरकार बनाते हैं। आम लोग और मज़दूरों को केवल वोट देने का अधिकार है - केवल यही भूमिका, कि पूंजीपतियों की किसी एक पार्टी को चुनें, जो फिर “जनादेश” के नाम पर, मज़दूरों, किसानों और मेहनतकश लोगों का शोषण और दमन करे और इस जन-विरोधी, मज़दूर-किसान-विरोधी व्यवस्था को और भी मजबूत करे। इस वर्तमान व्यवस्था में लोगों की, चुनावों में खड़े होने वाले उम्मीदवारों के चयन में कोई भूमिका नहीं है। विभिन्न पंूजीपति वर्ग की पार्टियों के “हाई कमांड” और उनके नेतागण चुनावों में प्रत्याशियों का चयन करते हैं।

जो भी उम्मीदवार चुनकर संसद में जाते हैं वे अपने चुनाव क्षेत्र के लोगों, जिन्होंने उनको “चुना” है, उनके प्रति उनकी अगले पांच वर्षों तक कोई जबाबदेही नहीं होती। लोगों को यह भी अधिकार नहीं है कि वे अपने “प्रतिनिधि” को वापस बुला सकें चाहे वे उनके हितों के ख़िलाफ़, कितने भी जन-विरोधी जुर्म करें।

इस वर्तमान “लोकतंत्र” में जो सबसे बड़ा झूठ और लोगों के ख़िलाफ़ सबसे हानिकारक प्रचार किया जाता है वह यह है कि, हिन्दोस्तानी लोग अपनी पसंद की सरकार को चुनते हैं। चूंकि करोड़ों लोग चुनाव के दिन वोट देते हैं इसका मतलब यह तो नहीं हो सकता कि चुनी हुई सरकार उनको पसंद है। हमारा अपने जीवन का अनुभव दिखाता है कि इस राजनीतिक व्यवस्था में चुनावी परिणाम लोगों की पसंद का प्रतीक नहीं हैं। चुनावों के ज़रिये जो हासिल किया जाता है और जिसको “जनादेश” कहा जाता है वह लोगों द्वारा निर्धारित नहीं होता।

इस राजनीतिक व्यवस्था और प्रक्रिया को इस तरह से बनाया गया है कि चुनावों के द्वारा यही सुनिश्चित किया जाता है कि केवल वे पार्टियां ही चुनाव जीत सकती हैं और सत्ता में आ सकती हैं जिनको पूंजीपति वर्ग का समर्थन प्राप्त है।

राजनीतिक सत्ता पूंजीपति वर्ग के हाथ में है

इतने चुनावी दौर के बाद भी हम मज़दूरों, किसानों और मेहनतकश लोगों के हालातों में कोई सुधार नहीं हुआ है। इसका कारण यह है कि इस लोकतंत्र में, सर्वोच्च निर्णय लेने का अधिकार केवल पूंजीपति वर्ग के पास है। जो भी पार्टी उस समय और परिस्थितियों के अनुसार, लोगों को बेवकूफ बनाने में सक्षम है, उसे पूजीपति वर्ग का समर्थन मिलता है, पैसा मिलता है और फिर वही पार्टी चुनाव में जीत कर आती हंै और पूंजीपति वर्ग के बनाये गए एजेंडा को लोगों के हित में है कह कर वह पूंजीपति वर्ग के कार्यक्रम का ऐलान करती है।

केंद्र और राज्य सरकारें केवल पूंजीपति वर्ग के हितों की रक्षा के लिए ही काम करतीं हैं। यह लोकतंत्र पूंजीपति वर्ग के शासन को वैधता प्रदान करने के लिए बनाया गया है। राज्य यंत्रणा के विभिन्न अंग - कार्यकारिणी, विधायिका और न्यायपालिका और चुनाव आयोग जैसी संस्थाएं - सभी पूंजीपति वर्ग के राज के हथियार बतौर बनाई गयी हैं।

यह भी सच है कि लोगों के अनगिनत उम्मीदवार भी, इन चुनावों में खड़े हुए हैं। इसका मतलब है कि लोगों का इस व्यवस्था के प्रति इतना गुस्सा है और यह दिखाता है कि लोग अपना विरोध करने के लिए कितने आतुर हैं। उन्होंने पूंजीपति की पार्टियों के उम्मीदवारों के चयन के प्रभुत्व को टक्कर दी है।

आगे का रास्ता

लोगों को सत्ता अपने हाथ में लेने की सख़्त ज़रूरत है। उसके बिना न तो उन्हें बुनियादी अधिकार हासिल हो सकते हैं, न ही उनकी मूलभूत ज़रूरतें पूरी हो सकती हैं और न ही उनके शोषण और दमन का अंत हो सकता है।

वक्त की मांग है कि हम एक आधुनिक लोकतंत्र की स्थापना करें जिसमें लोगों के हाथ में सत्ता हो। समाज में सर्वोच्च निर्णय लेने का अधिकार केवल लोगों के हाथों में हो न कि कुछ मुट्ठी भर के हाथ में, जो मंत्रिमंडल में बैठकर, पूंजीपतियों के अजेंडे और आदेशों को लागू करता है। हमें ऐसी व्यवस्था स्थापित करने की ज़रूरत है जो लोगों के प्रतिनिधियों को लोगों के प्रति जवाबदेह बना सके। लोगों के प्रतिनिधियों को सत्तारूढ़ और विपक्ष (जबकि दोनों ही पूजीपति वर्ग के लिए काम करते हैं) में बाटने की बजाय, ऐसी व्यवस्था की ज़रूरत है जो पूरे वैधानिक तंत्र को लोगों के प्रति जबाबदेह बनाये।

हमें एक ऐसी राजनीतिक प्रक्रिया की ज़रूरत है जिसमें चुनावी प्रचार राज्य के द्वारा दिए गए पैसे से चले। इसके अलावा और अन्य कोई पैसा चुनावी प्रक्रिया में न इस्तेमाल किया जा सके। लोगों को यह अधिकार हो कि वे अपने मतदान क्षेत्र में चुनाव में खड़े होने वाले उम्मीदवारों की सूची को खुद तय कर सकें। लोगों को यह अधिकार हो कि वे नए कानूनों को प्रस्तावित कर सकें, समाज में सभी बड़े निर्णय, जिनका असर सभी लोगों के ऊपर पड़ता हो, वे जनमत के ज़रिये लिए जाएं और लोगों को यह अधिकार हो कि वे अपने चुने हुए प्रतिनिधियों को कभी भी वापस बुला सकें।

इस तरह की राजनीतिक प्रक्रिया ही यह सुनिश्चित कर सकती है कि सत्ता लोगों के हाथ में रहेगी। यदि सत्ता लोगों के हाथ में होगी और समाज में लोगों को अपनी निर्णायक भूमिका को अदा करने का अधिकार होगा तभी यह मुमकिन है कि समाज की अर्थव्यवस्था को आम लोगों की ज़रूरतों को पूरा करने की दिशा में चलाया जा सके, न कि चंद मुट्ठीभर पूंजीपतियों को देश की सम्पति लूटने के लिए, जैसा अभी होता है।

ऐसी आधुनिक अर्थव्यवस्था और राजनीतिक प्रक्रिया ही समाज के हर सदस्य के लिए सुख और सुरक्षा सुनिश्चित कर सकती है।

महाराष्ट्र में राजनीतिक घटनाक्रम की समयसूची

21 अक्तूबर, 2019: महाराष्ट्र में 14वीं विधानसभा की 288 सीटों के लिए चुनाव संपन्न हुए।

24 अक्तूबर: चुनाव परिणाम घोषित - किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला। भाजपा 105 सीटें, शिव सेना 56 सीटें, राष्ट्रवादी कांग्रेस 54 सीटें, कांग्रेस 44 सीटें।

9 नवम्बर: राज्यपाल ने पहले भाजपा को आमंत्रित किया और 48 घंटे में अपना बहुमत सिद्ध करने के आदेश दिए। भाजपा ने सरकार बनाने में असमर्थता जाहिर की।

10 नवम्बर: शिवसेना को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया गया लेकिन केवल 24 घंटों में अपना बहुमत सिद्ध करने के आदेश दिए गए।

11 नवम्बर: शिवसेना ने सरकार बनाने का दावा किया लेकिन और पार्टियों ने समर्थन पत्र पेश करने के लिए तीन दिन का समय मांगा लेकिन राज्यपाल ने उसको नामंजूर कर दिया।

12 नवम्बर: महराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन का ऐलान किया गया।

22 नवम्बर: शिवसेना, राष्ट्रवादी कांग्रेस और कांग्रेस पार्टी ने “महाविकास आघाड़ी” के गठन का ऐलान किया और सर्व सम्मति से उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री चुना।

23 नवम्बर: सुबह 5ः47 मिनट पर राष्ट्रपति शासन को रद्द किया गया और राज्यपाल के निवास स्थान पर 7ः30 बजे, भाजपा के देवेंद्र फडनवीस को मुख्यमंत्री और राष्ट्रवादी कांग्रेस के अजित पवार को उपमुख्यमंत्री के शपथ दिलाई गयी। उनको अपना बहुमत सिद्ध करने के लिए, दो हफ्ते का समय दिया गया।

23 नवम्बर: “महाविकास आघाड़ी” ने राज्यपाल के निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी और बहुत जल्दी सुनवाई की मांग की। सर्वोच्च न्यायालय ने रविवार को सुनवाई करने के आदेश दिए।

26 नवम्बर: सर्वोच्च न्यायालय ने राज्यपाल को आदेश दिए कि बहुमत सिद्ध करने की प्रकिया 27 नवम्बर को 5 बजे से पहले पूरी हो जानी चाहिए और विधानसभा में बहुमत सिद्ध करने की पूरी प्रक्रिया का लाईव प्रसारण करने के आदेश दिए।

27 नवम्बर: देवेन्द्र फडनवीस और अजित पवार ने सुबह होते ही अपना इस्तीफा राज्यपाल को सौंप दिया। अजित पवार राष्ट्रवादी कांग्रेस में वापस शामिल हुए और “महाविकास आघाड़ी” ने सरकार बनाने का दावा किया।

28 नवम्बर: उद्धव ठाकरे ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।

 

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Dec 16-31 2019    Voice of the Party    Political Process     2019   

पार्टी के दस्तावेज

8 जनवरी, 2020 की सर्व हिन्द आम हड़ताल को सफल करें!

मज़दूर एकता कमेटी का आह्वान

देश की दिशा पूंजीपतियों की अमीरी को बढ़ा रही है और मज़दूर, किसान व सभी मेहनतकशों को ग़रीबी में धकेल रही है। इस रास्ते का विरोध करने के लिए और देश की दौलत पर अपने अधिकार का दावा करने के लिए यह हड़ताल आयोजित की जा रही है।

मेहनतकशों का है यह नारा, हम हैं इसके मालिक! हिन्दोस्तान हमारा!

thumbपूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है। इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को। यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब, मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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