नानावटी आयोग की रिपोर्ट - सच्चाई पर पर्दा डालने का पूरा प्रयास:

गुनहगारों को सज़ा दिलाने के लिए संघर्ष जारी है!

जरात सरकार ने रिटायर्ड न्यायाधीश जी.टी. नानावटी और ए.एच. मेहता आयोग की दूसरी और सम्पूर्ण रिपोर्ट 11 दिसंबर, 2019 को विधानसभा में पेश की। यह रिपोर्ट पांच वर्ष पहले सरकार के पास जमा कर दी गयी थी। यह आयोग फरवरी 2002 में गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस को आग लगाए जाने और उसके बाद पूरे गुजरात में हुए मुसलमानों के क़त्लेआम की छानबीन करने के लिए मई 2002 में गठित किया गया था।

इस आयोग ने निर्धारित किये गये पहले 6 महीने के भीतर रिपोर्ट पेश नहीं की और बार-बार इसकी अवधि बढ़ाई जाती रही। मार्च 2012 में इसे 18वीं बार दिसंबर 2012 तक बढ़ाया गया। अंत में आयोग को 2014 में अपनी रिपोर्ट को गुजरात के मुख्यमंत्री को सौंपना पड़ा, जब गुजरात पुलिस के एक रिटायर्ड डायरेक्टर जनरल ने गुजरात उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की। इसके बावजूद 11 दिसंबर, 2019 तक इस रिपोर्ट में दी गयी जानकारी को सार्वजनिक नहीं किया गया।

नानावटी आयोग द्वारा अपने गठन के 17 वर्ष बाद पेश की गयी यह रिपोर्ट उस समय के गुजरात के तात्कालिक मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार को गोधरा में ट्रेन के जलाये जाने और उसके बाद आयोजित की गयी मुसलमान धर्म के लोगों के क़त्लेआम में किसी भी तरह की भूमिका के आरोप से बरी करती है। यह रिपोर्ट उन तमाम सबूतों के खि़लाफ़ जाती है जो कि हिंसा के शिकार हजारों लोगों ने, जागरुक नागरिकों ने, सांसदों और मंत्रियों के परिवार वालों ने और कई पुलिस अधिकारियों और राज्य के अन्य अधिकारियों ने आयोग के सामने पेश किये थे। पिछले 17 वर्षों से कई राजनीतिक पार्टियां, संगठनों के कार्यकर्ता हिंसा के शिकार लोगों को इंसाफ दिलाने और इस क़त्लेआम को आयोजित करने में राज्य सरकार और पूरी राजकीय मशीनरी की भूमिका का पर्दाफाश करने के लिए लगातार संघर्ष करते आ रहे हैं।

गोधरा की घटना और उसके बाद हुए क़त्लेआम की तहकीक़ात करने के लिए केवल यही एक जांच आयोग नहीं बैठाया गया था। 6 मार्च, 2002 को गुजरात सरकार ने एक आयोग का गठन किया था, जिसे तीन महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए गए थे। इस आयोग की अवधि पूरी होने से पहले ही नानावटी आयोग का गठन किया गया। इसके अलावा केंद्र सरकार ने भी बनर्जी आयोग का गठन किया जिसके द्वारा पेश की गयी रिपोर्ट को गुजरात सरकार ने चुनौती दी। इसके बाद 2009 में सर्वोच्च न्यायालय ने मामलों की तेज़ी से जांच करने के लिए एक स्पेशल इन्वेस्टीगेशन टीम (एस.आई.टी.) को नियुक्त किया। नवंबर 2010 में सर्वोच्च न्यायालय ने कई लोगों द्वारा मोदी और उनकी सरकार के खि़लाफ़ लगाये गए आरोपों की जांच करने के लिए एक अमिकस क्यूरी की नियुक्ति की (अमिकस क्यूरी एक ऐसा व्यक्ति होता है, जो कोर्ट को फैसला लेने में स्वेच्छा से सहायता करता है)। इस वकील ने ऐलान किया कि इस पूरे मामले में मोदी की भूमिका की जांच की जाये और उनके खि़लाफ़ कार्यवाही करने के लिए आधार है। लेकिन उनका यह दावा एस.आई.टी. द्वारा की गई जांच से निकली जानकारी से अलग था और अंत में इसका कोई नतीजा नहीं निकला।

नानावटी आयोग और सरकार द्वारा गठित किये गए तमाम अन्य आयोगों द्वारा की गयी छानबीन से यह साफ नज़र आता है कि इनका मक़सद सच्चाई को उजागर करना कतई नहीं था, बल्कि इस भयानक क़त्लेआम में नरेंद्र मोदी की अगुवाई में गुजरात सरकार और हिन्दोस्तानी राज्य की भूमिका पर पर्दा डालना था।

2002 के क़त्लेआम के बाद इसके शिकार लोगों, मानव आधिकार संगठनों और तमाम छानबीन से यह साफ नज़र आता है कि यह क़त्लेआम राज्य द्वारा आयोजित किया गया था। इस क़त्लेआम की योजना बनाने और उसे आयोजित करने में मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार के शामिल होने के पुख्ता सबूत मौजूद हैं, जिनसे इंकार नहीं किया जा सकता है।

अप्रैल 2002 को रिटायर्ड न्यायाधीश कृष्णा अय्यर की अगुवाई में चलाये गए कंसर्नड सिटिजन्स ट्रिब्यूनल ने मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी, उनके मंत्रियों और उनके राज्य के अधिकारियों को इस क़त्लेआम में भूमिका के लिए दोषी ठहराया था। इस ट्रिब्यूनल में सर्वोच्च न्यायालय के रिटायर्ड न्यायाधीश न्यायमूर्ति सावंत, मुंबई उच्च न्यायालय के रिटायर्ड न्यायाधीश न्यायमूर्ति सुरेश, शामिल थे। क़त्लेआम के शिकार लोग, उनके परिवार और गवाहों समेत हजारों लोग इस ट्रिब्यूनल के सामने पेश हुए और उनके द्वारा दी गयी गवाही से यह पूरी तरह से साबित होता है कि इस क़त्लेआम में सरकार की पूरी राज्य मशीनरी शामिल थी।

2002 से बाद से गुजरात सरकार और हिन्दोस्तानी राज्य की तमाम संस्थाओं ने सच्चाई को छुपाने के लिए पूरी सांठ-गांठ की है। इन तमाम एजेंसियों ने उन सभी लोगों को ख़त्म करने का ख़तरनाक अभियान चलाया, जो सच्चाई को उजागर करने की हिम्मत कर रहे थे। हिंसा से बचे लोगों, उनके वकीलों और सच्चाई बताने की हिम्मत दिखाने वाले पुलिस अधिकारियों पर वहशी हमले आयोजित किये गए। फर्ज़ी मुठभेड़ों में लोगों को मार डालना, वकीलों और न्यायाधीशों को खरीदना और धमकी देना, हिंसा से बचे लोगों को और उनकी तरफदारी कर रहे लोगों के खि़लाफ़ झूठे मुक़दमे चलाना, यह सब कुछ बेशर्मी के साथ कानून से किसी भी तरह के डर के बगैर किया गया।

राज्य द्वारा आयोजित सांप्रदायिक हिंसा और क़त्लेआम के खि़लाफ़ लोगों के संघर्ष का अनुभव यह साफ दिखाता है कि हम पीड़ितों के लिए इंसाफ और गुनहगारों के लिए सज़ा की उम्मीद उन लोगों और संस्थाओं से नहीं कर सकते, जिन्होंने खुद ये गुनाह आयोजित किये हैं। लोगों के खि़लाफ़ गुनाह आयोजित करने वालों को सज़ा नहीं दी गयी है, बल्कि इसके ठीक विपरीत उनको राज्य में सर्वोच्च पदों पर बैठाया गया है।

लेकिन हमारे लोग 2002 में हुए मुसलामानों के क़त्लेआम को कभी नहीं भुला सकते, जैसे कि उन्होंने 1984 में हुए सिखों के जनसंहार को और ऐसे तमाम गुनहगारी हमलों को नहीं भुलाया है, जिसे राज्य और उसकी एजेंसियों ने आयोजित किये हैं। इन कत्लेआमों के शिकार लोगों के लिए इंसाफ और गुनहगारों के लिए सज़ा दिलाने का हमारा संघर्ष लगातार चलता रहेगा।

बुनियादी तौर पर एक बिल्कुल नयी व्यवस्था की स्थापना करके ही हम पीड़ितों के लिये इंसाफ और गुनहगारों के लिए सज़ा सुनिश्चित कर सकते हैं। यह एक ऐसी व्यवस्था होगी जो लोगों के हाथों में सत्ता देगी! यह नयी व्यवस्था ऐसे तंत्र बनाएगी जो यह सुनिश्चित करेंगे कि लोगों के खि़लाफ़ इस तरह के घोर अपराध करने वालों को सज़ा दी जाये। यही एक रास्ता है जिससे हम यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि इस तरह के गुनाह हमारे लोगों के खि़लाफ़ बार-बार आयोजित न किये जा सकें।

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Jan 1-15 2020    Voice of the Party    Communalism     Rights     2020   

पार्टी के दस्तावेज

8 जनवरी, 2020 की सर्व हिन्द आम हड़ताल को सफल करें!

मज़दूर एकता कमेटी का आह्वान

देश की दिशा पूंजीपतियों की अमीरी को बढ़ा रही है और मज़दूर, किसान व सभी मेहनतकशों को ग़रीबी में धकेल रही है। इस रास्ते का विरोध करने के लिए और देश की दौलत पर अपने अधिकार का दावा करने के लिए यह हड़ताल आयोजित की जा रही है।

मेहनतकशों का है यह नारा, हम हैं इसके मालिक! हिन्दोस्तान हमारा!

thumbपूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है। इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को। यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब, मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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