नागरिकता संशोधन अधिनियम और एन.आर.सी. के विरोध में देशभर और दुनियाभर में हजारों की तादाद में लोग सड़कों पर उतरे

12 दिसम्बर, 2019 को सी.ए.ए. कानून पारित होने के बाद से पूरे देश में लाखों की संख्या में इसका विरोध करने के लिये लोग सड़कों पर उतर आये।

CAA-protest_JM_New_Delhi_19-Dec
Protest outside Delhi police headquarters
Protest outside Jamia gate

19 दिसम्बर को दिल्ली के जंतर-मंतर पर सैकड़ों नौजवान, औरतें, मज़दूर और बुजुर्ग अपने हक़ के लिए और सी.ए.ए. व एन.आर.सी. को सरकार द्वारा वापस लेने की मांग के साथ सड़कों पर उतरे। 19 दिसंबर को प्रदर्शन करने के लिए अनुमति ली गई थी, लेकिन उसी सुबह धारा 144 लागू कर दी गई। इस धारा के लागू होने का मतलब है पुलिस को कानूनी तौर पर विरोध प्रदर्शन के खि़लाफ़ कार्रवाई करने की खुली छूट! सुबह से ही मंडी हाउस पर प्रदर्शनकारियों को गिरफ़्तार किया जा रहा था और ख़बर फैल रही थी कि लाल किले पर प्रदर्शनकारियों को भी गिरफ़्तार करके पुलिस द्वारा बसों में धकेला जा रहा है। जो लोग चालू मेट्रो लाइनों पर यात्रा कर रहे थे, अचानक स्टेशनों के बंद होने की सूचना सुनकर सोच में पड़ गए कि विरोध स्थल पर कैसे पहुंचा जाये। बाकी जिन्हें काम पर जाना था, उन्हें अपने कार्यालयों तक पहुंचने के लिए अत्यधिक खर्चा करने पर मजबूर होना पड़ा। पूरे राज्य में इंटरनेट बंद कर दिया गया था। इस सबके बावजूद लोग एक-दूसरे की मदद कर रहे थे, जगह-जगह घूमते हुए, बातें करते हुए और अन्य नवीन तरीकों से, हर किसी को जंतर-मंतर पर पहुंचने के लिए सूचित कर रहे थे। स्थिति तनावपूर्ण थी लेकिन लोगों की आंखों में कोई डर नहीं था। हर एक व्यक्ति प्रदर्शन तक पहुंचने में एक दूसरे की मदद कर रहा था।

जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों ने बड़ी संख्या में आना शुरू कर दिया, कुछ मंडी हाउस से आ रहे थे, कुछ बाराखंभा से और बाकी दिल्ली के अन्य हिस्सों से। जंतर-मंतर पर, आसमान “हम क्या चाहें, आज़ादी!, तुम कुछ भी करलो, आज़ादी!” और “इंक़लाब ज़िंदाबाद!” के नारों से गूंज रहा था। भले ही विभिन्न संगठनों के नेताओं को मंडी हाउस में गिरफ़्तार कर लिया गया था, लेकिन युवाओं ने संगठन और अनुशासन दिखलाया उन्होंने पुलिस से बचाव के लिए सुरक्षित घेरे बनाकर ज़ोरदार नारे लगाए।

कुछ लोग प्रदर्शनकारियों को भोजन वितरित कर रहे थे और साथ-साथ कचरे को साफ कर रहे थे। अन्य एक-दूसरे के बैनर और पोस्टर ले जाने और पकड़ के खड़े होने में मदद कर रहे थे, भले ही वे स्पष्ट रूप से विभिन्न समूहों और संगठनों से संबंधित थे। सी.ए.ए. और एन.आर.सी. को तत्काल निरस्त करने की मांग करने वाले छात्रों के समुद्र के चारों ओर विशाल लाल बैनर लहरा रहे थे। महिलाओं और लड़कियों ने ज़ोर-शोर से नारेबाज़ी की और देश के लोगों के लिए न्याय की मांग की। सार्वजनिक और निजी स्कूलों और कॉलेजों के छात्र और शिक्षक इसमें शामिल हुए। एक प्रसिद्ध निजी विश्वविद्यालय के एक छात्र ने सी.ए.ए. और एन.आर.सी. के अधिनियमन की निंदा की और अपने कॉलेज के छात्र संगठन के बयान के समर्थन में खड़े होकर प्रदर्शनकारियों के खि़लाफ़ राज्य की प्रतिक्रिया को “राज्य द्वारा आयोजित आतंकवाद” बताया। विभिन्न कॉलेजों में पढ़ रहे छात्रों की माताओं ने विरोध प्रदर्शन में भाग लिया और युवाओं के खि़लाफ़ राज्य के क़दमों की निंदा की। सभी धर्मों के लोग विरोध प्रदर्शन में शामिल हुए। छात्रों ने अपने पोस्टर और बैनर ऊंचे उठाकर रखे! 19 दिसंबर की आधी रात के बाद 20 दिसंबर की सुबह तक विरोध प्रदर्शन चलता रहा।

19 दिसंबर की घटनाओं के बाद से, दिल्ली के लोगों ने देश के बाकी हिस्सों के लोगों के संग शांतिपूर्वक अपना विरोध जारी रखा है। उच्च श्रेणी की मानी जाने वाली कालोनियों के निवासी भी विरोध प्रदर्शनों में सामने आए हैं। भले ही प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज हो रहे हैं, पानी की तोपों और गिरफ़्तारियों के साथ उन्हें रोकने की कोशिश की जा रही है, लेकिन शहर के लोग अपने अधिकारों के लिए लड़ाई में और सी.ए.ए. व एन.आर.सी. के विभाजनकारी अधिनियम की ख़िलाफ़त में पीछे हटने का नाम नहीं ले रहे हैं। देश के अन्य हिस्सों से राज्य द्वारा लोगों को परेशान करने, पीटने और मार दिए जाने की ख़बरें, लोगों को बाहर आकर विरोध करने और ज्यादा डटकर लड़ने के लिए उत्तेजित कर रही हैं।

हमारे देश के नौजवान और लोग बिना रुके, बिना डरे हर दिन बस आगे ही बढ़ते जा रहे हैं!

जामिया मिलिया इस्लामिया में जन प्रदर्शन जारी 

दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के सामने हजारों लोग रोज़-ब-रोज़ नागरिकता संशोधन अधिनियम (सी.ए.ए.) के ख़िलाफ़ हो रहे प्रदर्शन में हिस्सा ले रहे हैं। यह विश्वविद्यालय सी.ए.ए. और देशभर में छात्रों और लोगों के ख़िलाफ़ राज्य द्वारा कराई जा रही पुलिस की बर्बर हिंसा के ख़िलाफ़ उठी आवाज़ का केंद्र बन गया है।

दिन चढ़ते ही शहर के कोने-कोने से लोग यहां जमा होते हैं। न केवल कॉलेज और आस-पास के इलाकों से, मगर दूर-दराज़ से भी लोग आते हैं। इनमें वे लोग भी शामिल हैं, जिन्होंने यहां चल रहे प्रदर्शन से प्रेरित होकर अपने-अपने इलाकों में सी.ए.ए. के ख़िलाफ़ रैली और मार्च आयोजित किये हैं।

विश्वविद्यालय के गेट न. 7 के सामने एक मंच बनाया गया है। इस मंच की बागडोर छात्र-छात्राओं के हाथ में है। इस मंच से छात्र संगठनों सहित कई राजनीतिक  गैर-राजनीतिक और सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि, राज्य की बर्बर हिंसा के शिकार छात्र, इकट्ठा हुये लोगों को संबोधित करते हैं। यहां इकट्ठा होने वालों में महिलाएं, बच्चे और नौजवान बड़ी तादात में शामिल हो रहे हैं। सड़क की आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए स्वयंसेवक हर वक्त ध्यान रखते हैं। प्रदर्शन के दौरान, राज्य द्वारा किसी भी गड़बड़ी को फैलाए जाने की संभावना पर निगाह रखी जाती है।

स्थानीय लोग प्रदर्शनकारियों के लिए, जो भी बन पड़ता है - मसलन, बिस्कुट, अंडे, बिरयानी, कुछ नहीं तो स्नेक्स का इंतजाम करते हैं। वे यहां पानी का इंतजाम करते हैं। यहां चाय का इंतजाम है। सभी प्रदर्शनकारियों के हाथ में, ‘रिजेक्ट एन.आर.सी. एंड सी.ए.ए.’ नारों वाली तख्तियां होती हैं। नौजवान और बच्चे अपने गालों पर ‘नो एन.आर.सी.-सी.ए.ए.’ पेंट करके अपने जज़बात को प्रकट करते हैं। खासकर शुक्रवार और रविवार को प्रदर्शनकारियों की संख्या लाखों तक पहुंच जाती है। न कोई झगड़ा, न कोई मारपीट, न छीना-झपटी, न बच्चों के खो जाने का डर। जिसको जहां जगह मिलती है, एन.आर.सी. एंड सी.ए.ए. के खि़लाफ़ नारे लगाने में जुट जाता है। अपने गुस्से का इजहार करता नज़र आता है। हर दिन यह प्रदर्शन शाम 6 बजे तक चलता है। सड़क पूरी खाली कर दी जाती है। वहां पड़े कूड़े-कचरे को छात्र-छात्राएं और नागरिक मिलकर उठाते हैं। सड़क पर झाड़ू मारकर साफ करते हैं। फिर से कल की तैयारी के लिए जुट जाते हैं।

जामिया मिलिया इस्लामिया सहित पूरा इलाका हजारों की संख्या में नारों वाले छोटे-बड़े बैनरों से पटा पड़ा है जिन पर सी.ए.ए. और एन.आर.सी. के ख़िलाफ़ संदेश लिखे हुए हैं।

इलाके में जगह-जगह पर 15 दिसम्बर को पुलिस द्वारा की गयी बर्बरता के निशान अभी भी नज़र आ रहे हैं। शासक वर्ग के इशारे पर पुलिस की बर्बर हिंसा के शिकार छात्रों और लोगों की कानूनी सहायता करने के लिए वकीलों ने कानूनी सहायता केंद्र भी लगाये हैं। दिल्ली पुलिस ने सी.ए.ए. के ख़िलाफ़ प्रदर्शन में हिस्सा लेने वाले सैकड़ों छात्रों और नेताओं पर गैर-कानूनी रूप से कार्यवाही की है।

प्रदर्शन में शामिल सभी लोगों ने एक आवाज़ में इस अधिनियम को तुरंत वापस लेने की मांग की है और सरकार पर बर्तानवी उपनिवेशवादियों के नक्शे-क़दम पर चलते हुए लोगों को धर्म और सांप्रदायिक आधार पर बांटने का आरोप लगाया है। लोग छोटे-बड़े गुटों में जगह-जगह पर इकट्ठा होकर नारों और गीतों के माध्यम से अपना आक्रोश व्यक्त कर रहे हैं और पूरा इलाका - “सी.ए.ए. मुर्दाबाद!”, “एन.आर.सी. मुर्दाबाद!”, “सी.ए.ए. को वापस लो!”, “एक पर हमला, सब पर हमला!”, “राजकीय आतंकवाद मुर्दाबाद!”, “लोक एकता जिंदाबाद!”, “आज़ादी...!, “सी.ए.ए. को दफना दो!”, आदि नारों से गूंज उठा है!

सैकड़ों महिलाओं समेत बहुत बड़ी तादाद में कॉलेजों और स्कूलों के नौजवान लड़के और लड़कियां अपने हाथों में बैनर और अपने हाथों से बनाये हुए पोस्टरों-प्लेकार्डों के साथ प्रदर्शन में हिस्सा ले रहे हैं। इन पोस्टरों और प्लेकार्डों में वे बड़े ही रचनात्मक तरीके से नारों, कार्टूनों, कविताओं और दोहों के माध्यम से सी.ए.ए. के खि़लाफ़ अपनी भावनाओं को व्यक्त कर रहे थे और जल्दी ही ये नारे और कविताएं सभी के लबों से निकल रहे थे।

अपने माता-पिता और शिक्षकों की अगुवाई में स्कूलों के बच्चे पूरे प्रदर्शन में घूम रहे थे। वे सी.ए.ए. और एन.आर.सी. के खि़लाफ़, लोगों की एकता को तोड़ने की हुक्मरानों की कोशिश के खि़लाफ़ नारे लगा रहे थे। माताएं अपने बच्चों को बैनर और प्लेकार्ड उठाने और सभी के साथ मिलकर नारे लगाने के लिए जोश के साथ प्रोत्साहित कर रही थीं। नौजवान लड़कियां बेखौफ और आज़ाद प्रदर्शन में हिस्सा ले रही हैं। हर किसी के दिल में एक दूसरे के प्रति आदर और सम्मान साफ नज़र आता है।

कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के सदस्यों ने सभी लोगों के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर प्रदर्शन में हिस्सा लिया। ग़दर पार्टी के बैनर पर लिखा था - “एक पर हमला, सब पर हमला!”, “नागरिकता संशोधन अधिनियम - लोगों को सांप्रदायिक आधार पर बांटने की साजिश!“, “राजकीय आतंकवाद मुर्दाबाद!”, “सी.ए.ए. - लोगों की एकता पर वहशी हमला!”, “धर्म को नागरिकता का आधार बनाना हमें मंजूर नहीं!”, प्रदर्शन में शामिल लोगों ने पार्टी के बैनर को बड़े फक्र के साथ उठाया और पार्टी के साथियों के साथ नारे लगाने में पूरे जोश के साथ हिस्सा लिया। कुछ ही पल में प्रदर्शन के फोटो और विडियो सोशल मीडिया के माध्यम से पूरी दुनिया में फैल गए। देश और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बसे हिन्दोस्तानियों द्वारा आयोजित प्रदर्शनों की ख़बरें भी सोशल मीडिया पर सांझा की गयीं।

कई छात्र और नौजवान पूरे प्रदर्शन की पल-पल की घटनाओं की सीधी कवरेज सोशल मीडिया के द्वारा कर रहे थे। इस अभियान का समर्थन करने वाले संगठनों का इंटरव्यू ले रहे थे। कई टी.वी. पत्रकारों का एक जत्था, जो अपनी पुराने चैनल से इस्तीफा देकर आये थे। वे भी प्रदर्शन में शामिल हुए। अपने चैनलों द्वारा छात्रों और लोगों के विरोध प्रदर्शन के बारे में गलत प्रचार करने और अफवाएं फैलाने के ख़िलाफ़ उन्होंने इस्तीफा दे दिया था। अब वे खुद अपना चैनल शुरू करने के लिए एकजुट हुए हैं, जो लोगों के संघर्ष का प्रचार करेगा।

शाम 6 बजे की अज़ान के साथ प्रदर्शन का समापन किया गया और सभी लोग शांतिपूर्वक और बड़े अनुशासन के साथ अपने-अपने घरों की ओर निकल पड़े।

एक संदेशा जो हर कोई साथ ले गया, उसे एक महिला ने बड़े ही सटीक ढंग से इन शब्दों में पेश किया “कोई हमारी एकता को तोड़ने की जुर्रत न करे! वर्ना उसकी खैर नहीं!” यह महिला अपनी नौजवान लड़कियों के साथ प्रदर्शन में हिस्सा लेने आई थी।

जामिया के नौजवानों ने संगठित होकर ट्रैफिक का नियंत्रण करने और कार्यक्रम के बाद पूरे इलाके की साफ-सफाई करने की स्वेच्छा से ज़िम्मेदारी उठाई।

दिल्ली में जामिया के नजदीक शाहीन बाग में महिलाएं पिछले 15 दिनों से पूरे इलाके में लगातार सी.ए.ए. के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन कर रही हैं, और उनका वहां से हटने का कोई इरादा नहीं है। जिस दिन जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्रों पर सी.ए.ए. का विरोध करने के लिए आंसू गैस और लाठियों से हमला किया गया था उसके अगले दिन से ही शाहीन बाग की महिलाओं ने अपने ही अनोखे तरीके का विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया। हर दिन इस बस्ती की महिलाएं, माताएं, बेटियां और बहनें, कड़ाके की ठंड का सामना करते हुए सैकड़ों की तादाद में सड़कों पर उतर आती हैं। ये महिलाएं अपने हाथों में पोस्टर, प्लेकार्ड लेकर शांति से मगर बेहद प्रभावी तरीके से अपना विरोध प्रदर्शन करते हुए रात भर बैठी रहती हैं। उनके जज्बे को बयान करते हुए जामिया के एक छात्र ने एक शेर सुनाया -

लहर भी एक बार, वो मूसा की चली है,

अब तो लगता है तबस्सुम, मौत भी इनाम से कम नहीं,

तेरी सांसों की खुशबु, जो इस वतन से मिली है!

मुंबई

19 दिसंबर, 2019 एकजुटता का दिन था। समाज के हर तबके के लोग और बड़ी तादाद में महिलाएं विरोध प्रदर्शन में शामिल हुए। महिला आंदोलन में पुराने दोस्त एक दूसरे को मिलकर गले लग रहे थे। ट्रेन में नरसी मोंजी इंस्टिट्यूट ऑफ मैनेजमेंट से आई कई सारी लड़कियों ने गर्व से बताया कि न केवल उनके अध्यापक बल्कि उनके डीन भी प्रदर्शन में जुड़ रहे हैं। यह कोई अपवाद नहीं था। सेण्ट जेवियर्स, विल्सन, रुइया, एस.आई.ई.एस. और अनेक महाविद्यालयों से विद्यार्थी और अध्यापक आये हुए थे और आई.आई.टी. मुंबई और टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (टी.आई.एस.एस.) से भी। शासकीय आदेश को ठुकराते हुए, टी.आई.एस.एस. से सैकड़ों विद्यार्थी और कई संकाय सदस्य रैली में आये थे। ग्रांट रोड रेलवे स्टेशन पर ऐसा लग रहा था जैसे सारे लोग अगस्त क्रांति मैदान के तरफ ही जा रहे हैं। किसी को भी मैदान का रास्ता पूछने की ज़रूरत ही नहीं थी। उसे लोगों का यह महासागर उसी तरफ ले जा रहा था! रास्ते में, सहायक स्वयंसेवक लोगों में पानी के बोतलें बांट रहे थे। सारे मैदान में हर तबके के लोग, हर धर्म के लोग और नास्तिक भी थे। कई आन्दोलनों, पार्टियों, जन संगठनों और एन.जी.ओ. से लोग आये थे।

इस महासागर में वृद्ध पुरुष और महिलाएं, लोगों के कन्धों पर छोटे बच्चे और नौजवान भी थे। नौजवान लड़कियां इतनी बड़ी संख्या में आयी थीं कि यकीन ही नहीं हो रहा था। पुलिस ने अनुमान किया था कि 5,000 लोग आएंगे लेकिन लगभग दो लाख लोग आ गए थे!

कल्पनात्मक और रचनात्मक बैनर और पोस्टर हर जगह नज़र आ रहे थे। हिन्दोस्तानी झंडे के साथ लाल झंडे भी लहरा रहे थे। सांस्कृतिक समूह लड़ाकू और क्रांतिकारी गीत गा रहे थे। सी.ए.ए. के ख़िलाफ़ विरोध का माहौल स्पष्ट तरीके से महसूस हो रहा था। लोगों को लग रहा था कि सरकार उनके क़ीमती लोकतान्त्रिक और धर्म-निरपेक्ष मूल्यों के खि़लाफ़ जा रही है। हाल के शासन के ख़िलाफ़ लोगों में बहुत गुस्सा था। एक के बाद एक वक्ताओं ने कहा कि लोग जंग जीतने तक लड़ते रहेंगे। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि मुसलमान हमारे देश के उतने ही अहम हिस्से हैं जैसे अन्य धर्मों के लोग और एक पर हमला सब पर हमला है।

बृहन्मुंबई क्षेत्र में मलवानी, धारावी, चेंबूर, ठाणे और कई इलाकों में हर रोज़ विरोध प्रदर्शन आयोजित किये जा रहे हैं। पुणे, अकोला और महाराष्ट्र के अन्य शहरों में भी विरोध प्रदर्शन आयोजित किये गए हैं।

हाल ही में 27 दिसंबर को आज़ाद मैदान में एक विशाल विरोध प्रदर्शन आयोजित किया गया जहां हजारों की तादाद में लोगों ने हिस्स लिया। देश के अन्य शहरों की तरह ही इन विरोध प्रदर्शनों में सभी वर्गों, धर्मों और उम्र के लोगों ने हिस्सा लिया। यह विरोध प्रदर्शन कई संगठनों सहित छात्र यूनियनों की संयुक्त समिति ने मिलकर आयोजित किया था। छात्रों के संगठक अपने मक़सद के बारे में बिलकुल साफ हैं - “हम पूरी तरह से सी.ए.ए. के ख़िलाफ़ हैं, और हम अपनी एकता और प्रतिबद्धता के बल पर भाजपा को यह दिखा देंगे!”

बेंगलुरु

19, 23 और 26 दिसंबर को बेंगलुरु में सी.ए.ए. और एन.आर.सी. के ख़िलाफ़ ज़ोरदार प्रदर्शन आयोजित किये गए। 19 दिसंबर को शांतिपूर्वक प्रदर्शन कर रहे लोगों पर राज्य द्वारा हमलों के बावजूद 23 दिसंबर को एक लाख से अधिक लोगों ने प्रदर्शन में हिस्सा लिया। बेंगलुरु कैन्टोंमेंट रेलवे स्टेशन के पास खुद्दुस साहेब ईदगाह पर हजारों लोग एक शांतिपूर्ण प्रदर्शन में बड़ी तादाद में शामिल हुए। कई संगठनों द्वारा एकजुट होकर आयोजित इस दो घंटे के कार्यक्रम में एक लाख से अधिक लोगों ने हिस्सा लिया।

बेंगलुरु का टाउन-हॉल शहर में विरोध प्रदर्शनों का केंद्र बन गया है। 26 दिसंबर को एन.आर.सी. और सी.ए.ए. काले-कानूनों के ख़िलाफ़ सैकड़ों महिलाएं बेंगलुरु टाउन-हॉल में इकट्ठा हुयीं। ये प्रदर्शन तमाम महिला संगठनों द्वारा मिलकर आयोजित किया गये थे। सैकड़ों की तादाद में महिलाएं ट्रकों में बैठकर आईं। प्रदर्शनकारी हाथों में प्लेकार्ड और बैनर लिए हुए थे जिनपर लिखा था - “सी.ए.ए. को हमेशा के लिए वापस लो!”, “सी.ए.ए., एन.आर.सी, एन.पी.आर. नहीं चलेगा!”, “एन.आर.सी. और सी.ए.ए. हमारी नागरिकता की नोटबंदी है!” महिलाओं ने ऐलान किया कि लोगों से उनकी नागरिकता के दस्तावेज़ मांगना बेहद शर्मनाक हरकत है। “यह सरकार कोई काम नहीं कर रही है। हमें नौकरी दो, हमें सुरक्षा दो, हमें बढ़ती अर्थव्यवस्था दो, हमें आज़ादी दो। इसके बजाय सरकार हमको बांटने की कोशिश कर रही है! लेकिन हमें कोई भी बांट नहीं सकता!”

चंडीगढ़

हिंदोस्तान ज़िंदाबाद!, हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, आपस में सब भाई-भाई! जैसे नारों से वीरवार को सेक्टर-20 स्थित जामा मस्जिद का मैदान गूंज रहा था। बड़ी संख्या में लोग यहां नागरिकता संशोधन एक्ट (सीएए) के विरोध में एकत्र हुए थे। लोगों ने इस मैदान में विशाल रैली कर इस कानून का विरोध किया और सरकार से इस कानून को वापस लेने की मांग की। रैली को अन्य नेताओं के अलावा वामपंथी पार्टियों के नेताओं ने भी संबोधित किया। रैली के बाद एक 21 सदस्यीय कमेटी ने पंजाब के राज्यपाल और चंडीगढ़ के प्रशासक वी.पी. सिंह बदनौर को राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन सौंपा। जामा मस्जिद सेक्टर-20 के इमाम और खतीब मौलाना अजमल खान ने लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि आज 19 दिसंबर है। आज ही के दिन पंडित राम प्रसाद बिस्मिल और अशफाकुल्लाह खां का शहीदी दिवस है। राम प्रसाद बिस्मिल ब्राह्मण थे और अशफाकुल्लाह खां मुसलमान लेकिन आज़ादी की लड़ाई में दोनों साथ-साथ थे। अशफाकुल्लाह खां ने राम प्रसाद बिस्मिल को अपना उस्ताद माना था। आज़ादी की लड़ाई हिंदू-मुसलमान ने साथ-साथ लड़ी थी और आज भी यह भाईचारा बनाए रखने की ज़रूरत है। उन्होंने कहा कि सी.ए.ए. देश के लिए ठीक नहीं है। सरकार को इस कानून को बदलना चाहिए। धर्म के आधार पर इस देश में कोई कानून नहीं बनना चाहिए।

चेन्नई

15-18 दिसंबर को लगातार तीन दिन तक मद्रास विश्वविद्यालय के छात्रों ने सी.ए.ए. के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन आयोजित किया। बड़ी तादाद में पुलिस ने विश्वविद्यालय के गेट पर पहरा दिया। छात्रों ने ज़ोरदार प्रदर्शन किया और सी.ए.ए. के ख़िलाफ़ नारे लगाये। कैंपस पर छात्रों के विरोध को ख़त्म करने के लिए विश्वविद्यालय प्रशासन ने छुट्टियां घोषित कर दीं।

26 दिसंबर को कलाकारों, लेखकों और कई राजनीतिक पार्टियों के नेताओं ने पीपल्स मूवमेंट अगेंस्ट सी.ए.ए. के तहत एक विशाल विरोध प्रदर्शन आयोजित किया। इसमें बड़ी तादाद में लोगों ने हिस्सा लिया।

सेलम, तिरुपुर और राज्य के कई अन्य शहरों में हजारों लोगों ने सी.ए.ए. के खि़लाफ़ विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा लिया।

देशभर में हिंसा का शिकार बनाये जा रहे छात्रों और लोगों के समर्थन में और सी.ए.ए. के विरोध में पोंडिचेरी विश्वविद्यालय के छात्र संघ ने 23 दिसंबर को विश्वविद्यालय के कन्वोकेशन (दीक्षांत) समारोह का बहिष्कार किया। यह दीक्षांत समारोह देश के राष्ट्रपति की अध्यक्षता में आयोजित किया गया था।

उत्तर प्रदेश

पूरे उत्तर प्रदेश में सी.ए.ए. के ख़िलाफ़ व्यापक विरोध हुआ है। लखनऊ, कानपुर, इलाहाबाद, आगरा, अलीगढ़, गाज़ियाबाद, वाराणसी, मथुरा, मेरठ, मुरादाबाद, मुज़फ्फर नगर, बरेली, फिरोज़ाबाद, पीलीभीत, रामपुर, सहारनपुर, शामली, संभल, मऊ, आजमगढ़ और सुल्तानपुर समेत कई शहरों में लोग सी.ए.ए. के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन में सड़कों पर उतर आयें।

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के छात्र 15 दिसम्बर को जामिया के छात्रों पर हुए बर्बर हमले के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने में सबसे आगे थे। ये छात्र लाइब्रेरी कैंटीन में इकट्ठा हुए और विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार बाब-ए-सैय्यद की ओर विरोध मार्च निकला, जहां अक्सर प्रदर्शन आयोजित किये जाते हैं।

रिपोर्ट लिखे जाने तक देशभर के अनेक स्थानों पर विरोध प्रदर्शन जारी हैं।

सी.ए.ए. के ख़िलाफ़ दुनियाभर में विरोध प्रदर्शन

17 से 19 दिसंबर के बीच ऑक्सफोर्ड, साइंसेज पो. (पेरिस), हार्वर्ड, कैंब्रिज, कोलंबिया, युनिवर्सिटी ऑफ मेस्साच्युसेट्स समेत दुनिया भर के कई विश्वविद्यालयों में हिन्दोस्तानी छात्रों ने लंदन, न्यू यॉर्क, वाशिंगटन डी.सी., टोरंटो, बर्लिन, जिनेवा, हेग, बार्सिलोना, सैन फ्रांसिस्को, टोक्यो, एम्स्टर्डम और मेलबोर्न जैसे प्रमुख शहरों में शान्तिपूर्ण तरीके से विरोध प्रदर्शन आयोजित किये।

इन विरोध प्रदर्शनों पर जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि “इन सभी प्रदर्शनों में लोगों ने सी.ए.ए. और एन.आर.सी. को निरस्त करने और तमाम प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ हिंसा को रोकने, जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्रों के खि़लाफ़ एफ.आई.आर. को वापस लेने और पूरे इलाके में इन्टरनेट सुविधा को बहाल करने की मांग की गयी है”।

लंदन

स्कूल ऑफ ओरिएंटल एंड अफ्रीकन स्टडीज (एस.ओ.ए.एस.) और साउथ एशिया सॉलिडेरिटी ग्रुप द्वारा जारी एक बयान में सी.ए.ए. को निरस्त करने, एन.आर.सी. को ख़त्म करने और हिन्दोस्तान के विश्वविद्यालयों में छात्रों के ख़िलाफ़ पुलिस की कार्यवाही की जांच करने की मांग की है। इंग्लैंड में लंदन और अन्य शहरों में सैकड़ों हिन्दोस्तानी छात्रों ने हिन्दोस्तानी दूतावास के सामने ज़ोरदार विरोध प्रदर्शन आयोजित किये और इस नए सी.ए.ए. के प्रति अपनी चिंताएं व्यक्त कीं। हाथ में हिन्दोस्तानी झंडे और सी.ए.ए. के ख़िलाफ़ नारों वाले प्लेकार्ड लेकर इसी तरह के प्रदर्शन युनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफोर्ड में और इंडियन ओवरसीज कांग्रेस (यू.के.) द्वारा आयोजित किये गए। प्रदर्शनकारियों ने हिन्दोस्तानी सरकार के ख़िलाफ़ नारे बुलंद किये।

लंदन में हिन्दोस्तानी उच्चायुक्त के ऑफिस के बाहर असमिया लोगों द्वारा आयोजित सी.ए.ए. के ख़िलाफ़ जन-प्रदर्शन में अन्य हिन्दोस्तानी लोग भी शामिल हुए। लंदन निवासी हिन्दोस्तानी मूल की एक जानी-मानी हस्ती करुणा साग दास ने पी.टी.आई. को बताया कि “इस कानून को निरस्त करने की मांग करते हुए हमने इसके ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन आयोजित किया है, क्योंकि यह असम की भाषाई और सांस्कृतिक पहचान के लिए एक ख़तरा है।” उन्होंने आगे कहा कि “हम दुनिया भर में इस कानून के बारे में जागरुकता फैलाने की कोशिश कर रहे हैं, और साथ ही हमारे देश में इस कानून के ख़िलाफ़ संघर्ष कर रहे हमारे मित्रों और परिवार वालों के साथ हम एकजुट हैं”। शनिवार को एक फेसबुक ग्रुप “आसामी इन यू.के.” ने इस कानून के ख़िलाफ़ एक विरोध आयोजित किया, जिसमें कई पेशे से जुड़े लोगों और विश्वविद्यालयों के छात्रों ने हिस्सा लिया। प्रदर्शनकारियों ने सफेद और लाल रंग के अपने पारंपरिक “गामोसा” पर “नो सी.ए.बी.” “वी आपेज़ सी.ए.बी.” और “स्टॉप सी.ए.ए.” जैसे नारे लिखे हुए थे।

उत्तरी अमरीका के विश्वविद्यालयों में विरोध प्रदर्शन

जामिया के छात्रों पर पुलिस के बर्बर हमलों के ख़िलाफ़ और छात्रों के साथ एकजुटता के प्रदर्शनों के समर्थन में ऑक्सफोर्ड, हार्वर्ड, येल, एम.आई.टी. में भी प्रदर्शन आयोजित किये गए।

17 दिसंबर को अमरीका में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में सी.ए.ए. के ख़िलाफ़ 300 से अधिक अन्य छात्रों के साथ जामिया के भूतपूर्व छात्रों ने इकट्ठा होकर प्रदर्शन निकाला और अपने वतन में जामिया विश्वविद्यालय के छात्रों के साथ एकजुटता जाहिर की। इससे कुछ ही दिन पहले हार्वर्ड के छात्रों ने हिन्दोस्तान की सरकार को एक खुला पत्र भेजा था।

वाशिंगटन

22 दिसंबर को वाशिंगटन में हिन्दोस्तानी दूतावास के सामने स्थापित की गयी महात्मा गांधी की प्रतिमा के पास बड़ी तादाद में हिन्दोस्तानी-अमरीकी नागरिक इकट्ठा हुए और उन्होंने सी.ए.ए. और प्रस्तावित एन.आर.सी. के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन आयोजित किये। रविवार को अमेरिकन-इंडियन मुस्लिम और ऐसे दर्जनों अन्य संगठनों ने मिलकर एक प्रदर्शन आयोजित किया जिसमें ग्रेटर वाशिंगटन एरिया और आस-पास के लोगों ने बड़ी तादाद में हिस्सा लिया और हिन्दोस्तान की एकता के समर्थन में नारे लगाये। हाथों में पोस्टर और बैनर पर लिखे नारों के द्वारा उन्होंने ऐलान किया कि हिन्दोस्तान को जिस दिशा में धकेला जा रहा है वह हमारे लोगों की एकता के ख़िलाफ़ है।

प्रदर्शन के लिए इकट्ठा हुए लोगों ने एक प्रस्ताव पारित किया जिसमें हिन्दोस्तानी सरकार से सी.ए.ए. और एन.आर.सी. को वापस लेने की मांग की गयी। प्रस्ताव में कहा गया “हम यह चाहते हैं कि हिन्दोस्तानी सरकार इस कानून को निरस्त करे, जो हाल ही में पारित किया गया है, ताकि हम सब एक हिन्दोस्तान, एक लोग और एक राष्ट्र बनें, जो एक साथ काम करें, एक साथ ज़िन्दगी बसर करें, और इस बात में न उलझे रहें कि कौन कहां से आया है। हम सब एक हैं!”

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Jan 1-15 2020    Struggle for Rights    Popular Movements     Rights     2020   

पार्टी के दस्तावेज

8 जनवरी, 2020 की सर्व हिन्द आम हड़ताल को सफल करें!

मज़दूर एकता कमेटी का आह्वान

देश की दिशा पूंजीपतियों की अमीरी को बढ़ा रही है और मज़दूर, किसान व सभी मेहनतकशों को ग़रीबी में धकेल रही है। इस रास्ते का विरोध करने के लिए और देश की दौलत पर अपने अधिकार का दावा करने के लिए यह हड़ताल आयोजित की जा रही है।

मेहनतकशों का है यह नारा, हम हैं इसके मालिक! हिन्दोस्तान हमारा!

thumbपूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है। इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को। यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब, मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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