हिन्दोस्तानी गणतंत्र के 70 साल पूरे हुए :

लोगों के हाथ में राज्य सत्ता - यही आज वक्त की मांग है

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति का बयान, 23 जनवरी, 2020

26 जनवरी के दिन, नयी दिल्ली के राजपथ पर टैकों और मिसाइल लांचरों की परेड होगी। राजधानी में, लड़ाकू विमान आसमान में दिखेंगे। हिन्दोस्तानी गणतंत्र की सैनिक शक्ति सारी दुनिया के सामने प्रदर्शित की जायेगी। हमारे शासक बड़े घमंड के साथ दावा करेंगे कि इस गणतंत्र में सब कुछ बहुत बढ़िया चल रहा है।

परन्तु कश्मीर से केरल तक, और महाराष्ट्र से मणिपुर तक, हरेक हिन्दोस्तानी यह जानता है कि इस गणतंत्र में सब कुछ बहुत बढ़िया नहीं चल रहा है।

बीते एक महीने से देशभर के शहरों और गांवों में, करोड़ों-करोड़ों महिलाएं और पुरुष, सड़कों पर निकलकर, यह मांग कर रहे हैं कि नागरिकता संशोधन कानून (सी.ए.ए.) को रद्द किया जाये, जो धर्म को नागरिकता का आधार बनाता है। इनमें अलग-अलग धर्मों के लोग एक साथ संघर्ष कर रहे हैं। लोग मांग कर रहे हैं कि केंद्र सरकार देश भर में नागरिकता की राष्ट्रीय पंजी (एन.आर.सी.) तैयार करने के अपने फैसले को वापस ले, जिसके आधार पर यह तय किया जायेगा कि “कौन नागरिक है” और “घुसपैठियों” को बाहर निकाल दिया जायेगा। सत्ता चलाने वालों की सांप्रदायिक और बंटवारे की राजनीति के खिलाफ़ इस संघर्ष में महिलाएं और नौजवान, कालेजों और विश्वविद्यालयों के छात्र सबसे आगे हैं।

देश के कोने-कोने में, लोग सरकार को चुनौती देते हुए यह ऐलान कर रहे हैं कि “हिन्दोस्तान हमारा है, हम सब हिन्दोस्तानी हैं! तुम कौन होते हो हमसे सबूत मांगने वाले, कि हम कौन हैं? हम कागज नहीं दिखायेंगे!”

लोगों के इस प्रबल संघर्ष के चलते, लगभग सभी संसदीय पार्टियां अब सी.ए.ए. और एन.आर.सी. के खिलाफ़ बोल रही हैं। इनमें कुछ ऐसी पार्टियां भी हैं जिन्होंने पहले इनके समर्थन में वोट दिया था। केरल और पंजाब की राज्य विधान सभाओं ने सी.ए.ए. और एन.आर.सी. के खिलाफ़ प्रस्ताव पारित किये हैं। केरल सरकार और अनेक राजनीतिक पार्टियों ने सी.ए.ए. के संवैधानिक औचित्य को चुनौती देते हुए, सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दर्ज की हैं।

केन्द्रीय गृह मंत्री ने ऐलान किया है कि लोग चाहे कितना भी विरोध करें, “हम एक इंच पीछे नहीं हटेंगे”। जनता के इस विरोध को कुचलने के लिए भयानक आतंक की मुहिम चलायी जा रही है। सुरक्षा बलों द्वारा फैलाई जा रही हिंसा के लिए लोगों को दोषी बताते हुए झूठा प्रचार किया जा रहा है। इस सांप्रदायिक हमले का विरोध करने वाले लोगों को “राष्ट्र विरोधी”, “आतंकवादी”, “पाकिस्तानी एजेंट”, आदि करार दिया जा रहा है, ताकि उन पर बल प्रयोग को जायज़ ठहराया जा सके।

परन्तु लोग लाठियों, गोलियों और जेलों की परवाह किये बिना, बहादुरी से अधिकारियों को चुनौती देते हुए, अपने विरोध को जारी रख रहे हैं।

इस जन-विरोध के प्रति राज्य सत्ता का बर्ताव उसके बेहद लोकतंत्र-विरोधी चरित्र को दर्शाता है। यह गणतंत्र “लोक मत को प्रकट करने” का दावा करता है परन्तु इसके संसद में ऐसे कानून बनाये जाते हैं जो पूरी तरह जन-विरोधी हैं। सरकार जनता की आवाज को दबाने के लिए पुलिस भेजती है। देश भर में बोलने और सभा करने के अधिकार का हनन किया जाता है। पर संविधान में दावा किया जाता है कि हिन्दोस्तान लोकतांत्रिक गणतंत्र है।

संविधान के खंड 3 में मौलिक अधिकारों की रक्षा करने की बात कही गयी है। परन्तु खंड 3 के हर अनुच्छेद के साथ एक अपवाद का वाक्य भी जुड़ा हुआ है, जो राज्य को लोगों के अधिकारों का हनन करने की इज़ाज़त देता है।

अनुच्छेद 19 के प्रथम वाक्य में कहा गया है कि “सभी नागरिकों को वचन और अभिव्यक्ति की आजादी है”। परन्तु उसी अनुच्छेद के दूसरे वाक्य में कहा गया है कि हिन्दोस्तान की संप्रभुता और एकता के हित के लिए, राज्य की सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था बनाये रखने के लिए, राज्य को इस अधिकार पर “उचित पाबंदियां” लगाने से कोई नहीं रोक सकता है। यह वाक्य राज्य को किसी भी समय पर निषेधात्मक आदेश, जैसे कि दफा 144, लागू करने की इज़ाज़त देता है। वर्तमान राजनीतिक सत्ता के खिलाफ़ जो भी आवाज़ उठाने की जुर्रत करता है, उसे मनमानी से गिरफ्तार करने और बंद करने के लिए राज्य को पूरी इज़ाज़त दी जाती है।

“विशेष परिस्थितियों” के बहाने लोगों के अधिकारों का हनन करना अब आम बात हो गयी है। अवैध गतिविधि निरोधक कानून (यू.ए.पी.ए.), राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका), ‘अशांत इलाका’ अधिनियम, सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (आफ्सपा) और इस प्रकार के तमाम अन्य कानून, जिनके तहत दसों-हजारों बेकसूर नौजवानों को जेलों में बंद किया जाता है, प्रताड़ित किया जाता और मार डाला जाता है, उन सबको मौलिक अधिकारों के अध्याय के “उचित पाबंदियों” के वाक्य के जरिये वैधता दी जाती है।

हमारे हुक्मरान हर रोज ‘देश की एकता और अखंडता को खतरे’ की बात करते हैं। राष्ट्रीय एकता की हिफाज़त के नाम पर, असमीय, मणिपुरी, नगा, कश्मीरी, पंजाबी और अन्य लोगों के राष्ट्रीय अधिकारों के संघर्षों को बेरहमी के साथ कुचल दिया गया है।

बीते साढ़े पांच महीनों से कश्मीर को एक कैदखाना जैसा बना दिया गया है। 5 अगस्त को जब संसद में यह फैसला घोषित किया गया कि एकमत से जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे़ को खत्म किया जायेगा और उसे दो केंद्र-प्रशासित प्रदेशों में बांट दिया जायेगा, तो उस समय और उसके बाद हजारों केन्द्रीय सशस्त्र सैनिकों को वहां तैनात किया गया। कश्मीर के लोगों के सारे जनवादी अधिकार, यहां तक कि इन्टरनेट इस्तेमाल करने का भी अधिकार, छीन लिए गए। कई सांसदों और भूतपूर्व मुख्य मंत्रियों समेत, हजारों राजनीतिक कार्यकर्ता अभी भी जेल में बंद हैं। इस आतंक की मुहिम को ‘हिन्दोस्तान की एकता और अखंडता की रक्षा’ करने के नाम पर जायज ठहराया जा रहा है।

हिन्दोस्तान की एकता और अखंडता को खतरा इस या उस राष्ट्र के लोगों के संघर्षों से नहीं पैदा होता है। यह खतरा इसलिए पैदा होता है क्योंकि हिन्दोस्तानी गणतंत्र इस देश के बहु-राष्ट्रीय चरित्र को मान्यता देने से इन्कार करता है। हिन्दोस्तान में राष्ट्रीय अधिकारों के किसी भी संघर्ष को “कानून और व्यवस्था की समस्या” बताना और उसे राष्ट्र-विरोधी बताना - यह लोगों की एकता को तोड़ने में एक मुख्य कारक है। इससे ऐसी हालतें पैदा की जाती हैं जिनका फायदा उठाकर बाहरी साम्राज्यवादी ताकतें यहां अस्थायी हालतें पैदा कर सकती हैं और हिन्दोस्तानी संघ को तोड़ भी सकती हैं।

संविधान के पूर्वकथन में न्याय, स्वतंत्रता, एकता और भाईचारे के वायदे किये गए हैं। परन्तु ये ऊंचे-ऊंचे वायदे खोखले शब्द बन कर रह गए हैं।

संविधान के चैथे भाग में, नीतिनिदेशक तत्वों में यह ऐलान किया गया है कि राज्य ऐसी नीति बनायेगी जिससे सभी पुरुषों और महिलाओं को “रोजगार के पर्याप्त साधनों का अधिकार” मिलेगा। परन्तु सच्चाई तो यह है कि करोड़ों लोगों के पास नौकरी नहीं है और किसान खुदकुशी करने को मजबूर हैं।

नीतिनिदेशक तत्व अधिकार नहीं माने जा सकते हैं क्योंकि इन्हें लागू करने के लिए राज्य को कानूनी तौर पर बाध्य नहीं किया जा सकता है। ये नीतिगत उद्देश्य मात्र हैं, जो हमेशा ही लोगों की पहुंच के बाहर होते हैं। इसमें कहा गया है कि राज्य को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि “आर्थिक व्यवस्था के संचालन से धन और उत्पादन के साधनों का ज्यादा संकेन्द्रण न हो”। परन्तु कड़वी सच्चाई यह है कि सबसे अमीर 1 प्रतिशत आबादी के हाथों में देश का 70 प्रतिशत धन संकेंद्रित है।

8 जनवरी को 25 करोड़ लोगों ने मजदूर ट्रेड यूनियनों के आह्वान पर, एक-दिवसीय आम हड़ताल में भाग लिया था। उन्होंने सम्मानजनक मानव जीवन जीने लायक न्यूनतम वेतन की मांग की। उन्होंने ठेका मजदूरी, निजीकरण और श्रम कानूनों के पूंजी-परस्त संशोधनों को खत्म करने की मांग की। उन्होंने किसानों के कर्ज़ों को माफ करने की मांग की। उन्होंने एक ऐसी सर्वव्यापक सार्वजनिक वितरण व्यवस्था की मांग की, जिसमें सभी ज़रूरत की चीजें सस्ते दामों पर उपलब्ध होंगी। उन्होंने किसानों के उत्पादों के लिए सरकारी खरीदी की व्यवस्था की मांग की, जो किसानों के लिए स्थाई और लाभदायक दामों को सुनिश्चित करेगी।

अगर हिन्दोस्तानी गणतंत्र वास्तव में जनमत का प्रतिनिधित्व कर रहा होता, तो वह इन मांगों को पूरा करने के लिए फौरन कदम लेता। इन मांगों को पूरा करना अधिकतम आबादी के हित में होगा और इससे अर्थव्यवस्था को संकट से बाहर निकालने में भी योगदान होगा। परन्तु इन मांगों को पूरा करना इजारेदार पूंजीपतियों के हित में नहीं है क्योंकि वे हमेशा अधिकतम मुनाफ़े बनाना चाहते हैं।

मज़दूरों और किसानों की मांगों को पूरा करना तो दूर, केंद्र सरकार टाटा, अम्बानी, बिरला और दूसरे इजारेदार पूंजीवादी घरानों के ज्यादा से ज्यादा पूंजीवादी मुनाफों को सुनिश्चित करने के लिए, उनके साथ सलाह करने में व्यस्त है।

संविधान के पूर्वकथन में “हम, इस देश के लोग” का जिक्र किया जाता है, जिससे लगता है कि हम लोग ही इस देश के लिए फैसले लेते हैं। परन्तु संविधान के अनुसार, फैसले लेने की ताक़त सिर्फ कुछ थोड़े लोगों के हाथों में संकेंद्रित है। सिर्फ संसद को ही नए कानून बनाने, पुराने कानूनों को रद्द करने और संविधान में संशोधन करने का अधिकार है। फैसले लेने में लोगों की कोई भूमिका नहीं है।

जिस लोकतंत्र की व्यवस्था को इस संविधान के द्वारा कानूनी रूप दिया गया है, उसका समय अब पूरा हो चुका है। यह लोकतंत्र एक ऐसा तंत्र नहीं है जिसके ज़रिये लोग अपना मत प्रकट कर सकते हैं। बल्कि, यह साफ-साफ देखने में आ रहा है कि यह लोकतंत्र इस देश की जनता पर मुट्ठीभर इजारेदार पूंजीवादी घरानों की हुकूमत का तंत्र है।

इजारेदार पूंजीवादी घराने अपनी पसंद की पार्टियों के चुनाव अभियानों के लिए खुलेआम धन देते हैं और उनमें से किसी एक को सत्ता में लाते हैं। सत्ता में आकर ऐसी पार्टियां पूंजीपति वर्ग के कार्यक्रम को वफादारी से लागू करती हैं।

फैसले लेने की ताकत प्रधान मंत्री की अगुवाई में मंत्रिमंडल के हाथों में संकेंद्रित है। मंत्रिमंडल हुक्म जारी करके शासन करता है। मंत्रिमंडल विधायिकी के प्रति जवाबदेह नहीं है और विधायिकी मतदाताओं के प्रति जवाबदेह नहीं है।

यह व्यवस्था पूंजीपति वर्ग के लिए अच्छी है क्योंकि इसके जरिये पूंजीपति सुनिश्चित कर सकते हैं कि सरकार उनका काम करेगी। यह मज़दूरों, किसानों और अधिकतम लोगों के लिए ठीक नहीं है, क्योंकि फैसले लेने में उनकी कोई भूमिका नहीं होती है।

करोड़ों लोगों की आज यह जजबात है कि गणतंत्र में उन मूल्यों को मान्यता दी जाये जो संविधान के पूर्वकथन में बताये गए हैं। लोग यह मांग कर रहे हैं कि हिन्दोस्तानी गणतंत्र धर्म, जाति, लिंग, आदि के आधार पर भेदभाव किये बिना, समाज के सभी सदस्यों को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित करे।

इसके लिए हमें लोकतंत्र की व्यवस्था का आधुनिकीकरण करने के नज़रिये और उद्देश्य के साथ अपने संघर्ष को आगे बढ़ाना होगा। आधुनिक लोकतंत्र में फैसले लेने की ताकत लोगों के हाथों में होनी चाहिए। संविधान को यह सुनिश्चित करना होगा कि संप्रभुता, यानि फैसले लेने की ताकत लोगों के हाथों में हो। कार्यकारिणी को निर्वाचित विधायिकी के प्रति जवाबदेह होना होगा और विधायिकी को लोगों के प्रति जवाबदेह होना होगा। लोगों के पास कानून प्रस्तावित करने और ठुकराने का अधिकार होना चाहिए। लोगों के पास संविधान में संशोधन करने या संविधान को फिर से लिखने का अधिकार नहीं है।

आधुनिक लोकतंत्र को यह मान्यता देनी होगी कि हिन्दोस्तान में अनेक राष्ट्र, राष्ट्रीयताएं और लोग बसे हुए हैं, जिन सब के अपने-अपने अधिकार हैं। संविधान को यह सुनश्चित करना होगा कि हिन्दोस्तानी संघ के हर घटक को आत्म-निर्धारण का अधिकार प्राप्त हो। आधुनिक लोकतंत्र में नागरिकता की आधुनिक परिभाषा होनी चाहिए। आधुनिक लोकतंत्र में जमीर के अधिकार समेत, सभी मानव अधिकारों को सुनिश्चित किया जाना चाहिए और किसी भी बहाने उनका हनन नहीं होना चाहिए।

हम मजदूर, किसान, महिला, नौजवान, अलग-अलग राष्ट्रों व राष्ट्रीयताओं के लोग और आदिवासी लोग यह दावा कर रहे हैं कि हम हैं हिन्दोस्तान, यह हिन्दोस्तान हमारा है। हमारा अधिकार और कर्तव्य है इस व्यवस्था में उन सभी परिवर्तनों को लाना, ताकि संप्रभुता लोगों के हाथों में सुनिश्चित हो। अपने हाथों में राज्य सत्ता लेकर हम उत्पादन के प्रमुख साधनों को अपने नियंत्रण में कर लेंगे और अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाएंगे, ताकि सबको सुख और सुरक्षा सुनिश्चित हो। तब गणतंत्र वास्तव में जन मत का प्रतिनिधित्व करेगा और लोगों के जजबातों को पूरा करेगा।

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Feb 1-15 2020    Statements    Rights     2020   

टिप्पणी

प्रिय संपादक, हिन्दोस्तानी गणतंत्र के 70 साल के अवसर पर पार्टी का बयान, राज्य के गैर-गणतंत्रीय स्वभाव का पर्दाफाश करता है। हमारे देश के लोगों के पास स्थापित पार्टियों के निर्वाचित प्रतिनिधियों पर नियंत्रण रखने का कोई साधन नहीं है। भाजपा और कांग्रेस पार्टियां लोगों की इच्छा के विपरीत बड़े सरमायदारों के आदेशों का पालन करती हैं।

हाल में, सी.ए.ए. का भीषण जनविरोधी चरित्र साफ़ नज़र आया है। यह कानून सभी लोकतांत्रिक सिद्धांतों का उल्लंघन करता है। यह गैर-गणतांत्रिक है और साम्प्रदायिक है क्योंकि नागरिकता और लोकतांत्रिक अधिकारों की कोई भी आधुनिक परिभाषा धर्म पर आधारित नहीं हो सकती है। जबकि सबसे पहले मुसलमान इसके निशाना बनाये जा रहे हैं, सी.ए.ए. से उन सभी को ख़तरा है जो राज्य से सहमत नहीं है। दिसम्बर 2019 से बहुत शक्तिशाली ढंग से और बहुत बड़ी संख्या में, हिन्दोस्तान के लोगों ने इसका लगातार विरोध किया है।

सी.ए.ए. का मकसद इसके विरोध और इसके समर्थन के पड़ावों के बीच लोगों को बांटना और आपस बीच लड़ाई करवाना है। लेकिन लोगों ने समय की जरूरत को समझा है और उन्होंने अपने विरोध प्रदार्शन, असली ख़तरे के खिलाफ मोड़े हैं, याने कि हिन्दोस्तानी राज्य के खिलाफ और वे मांग कर रहे हैं कि इस कानून को वापस लिया जाये।

8 जनवरी के दिन, सर्व हिन्द हड़ताल में हिन्दोस्तान के मेहनतकश लोगों ने न्यूनतम वेतन, कृषि ऋणों की माफी और सर्वव्यापी वितरण व्यवस्था की मांगें उठाईं। राज्य का गैर-गणतांत्रिक स्वभाव तब साफ नज़र आया जब सरकार ने इन मांगों को पूरी तरह नज़रअंदाज किया और इससे उल्टे सी.ए.ए. के विरोध प्रदर्शनों पर हमला और दमन करना जारी रखा।

राज्य के प्रचार में हिन्दोस्तान के संविधान को गणतंत्र का प्रतीक बताया जाता है। दर-असल यह छलावा है। इसके तहत मूलभूत मानव अधिकारों की गारंटी नहीं है। संविधान का मकसद मौजूदा दमनकारी राज्य की संकल्पना को कानूनी जामा देना है। इसका पर्दाफाश करना आवश्यक है। मैं पार्टी को शुक्रिया अदा करना चाहती हूं कि इस बयान को छाप कर, पार्टी ने यह स्पष्ट किया कि एक गणतंत्र में लोगों के पास जो असली सत्ता और अधिकार होने चाहिये, उसके लिये मेहनतकश लोगों को सत्ता अपने हाथों में लेनी होगी और एक ऐसे संविधान को विकसित करना होगा जिसमें लागू करने योग्य और जवाबदेही के तंत्र हों, और जिसके तहत निर्वाचित प्रतिनिधि लोगों की इच्छा को लागू करते हों।

आपकी, अनीता

अंग्रेजी

टिप्पणी

संपादक महोदय, कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी का बयान इस गणतंत्र के अंदरूनी विरोधाभासों का पर्दाफाश करता है। एक तरफ लोग हैं - छात्र, नौजवान, महिला, मानव अधिकार और सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता, रंग-मंच और फिल्म कलाकार, साहित्यकार, नागरिकता संशोधन अधिनियम का विरोध कर रहे हैं। वे एक बेहद विभाजनकारी, सांप्रदायिक और प्रतिगामी कानून के खिलाफ़, देश की आत्मा, अपनी एकता, अपने भविष्य को बचाने के लिए सड़कों पर उतर रहे हैं। दूसरी ओर सरकार बड़े घमंड के साथ ऐलान कर रही है कि उसको कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि यह कानून “लोकतांत्रिक” तरीके से संसद में पारित किया है, और जो कोई इसका विरोध करेगा उसे देशद्रोही करार दिया जायेगा। लोगों को केवल अपनी आवाज उठाने और सड़कों पर उतरकर विरोध करने के लिए गोलियों से मार डाला गया है। राज्यों के मुख्यमंत्री लोगों के बारे में इस तरह के बयान देते है जैसे कि विरोध करने वाले देश के दुश्मन हों। छोटे बच्चों, उनके माता पिता और शिक्षकों को मात्र एक नाटक का मंचन करने के लिए उन पर राजद्रोह का आरोप लगाया जाता है।

सत्ताधारी पार्टी मुख्यमंत्री, गृहमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक खुलेआम सांप्रदायिक प्रचार चलाते है। बड़े घमंड के साथ मेहनतकश लोगों के लिए घिनौने अपशब्दों का इस्तेमाल करते हैं और पूरे मीडिया द्वारा सरासर झूठ फैलाते हैं। लेकिन जब देश भर 25 करोड़ से अधिक मेहनतकश लोग अपनी जिन्दगी और अर्थव्यवस्था में फैली बर्बादी के खिलाफ एकजुट होकर आम हड़ताल करते हैं तो उसे पूरी तरह से नजरंदाज किया जता है। एक तरफ मजदूरों को केवल अपने हकों की आवाज बुलंद करने के लिए तुरंत जेलों में बंद कर दिया जाता है, उन पर झूठे आरोपों के तहत मौत की सजा सुनाई जाती है। दूसरी तरफ, सरकार द्वारा देश के संसाधनों को बर्बाद करने, उसे निजी हितों के हवाले करने को देश-परस्त करार दिया जाता है।

यह सब इसलिए संभव है क्योंकि सरकार को यह विश्वास है कि देश के असली हुक्मरान इजारेदार पूंजीपति उनके पीछे हैं। जब तक सरकार उनकी सेवा करती रहेगी, उनको कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता है। यह सब इसलिए संभव है क्योंकि इस देश का संविधान, अपने पूर्वकथन के किये गए तमाम दावों के बावजूद, सरकार की इन तमाम कार्यवाहियों को वैधता देता है, और अपने तमाम संस्थान व मीडिया देश में मुट्ठीभर इजारेदार पूंजीपति घरानों की हुकूमत की रक्षा करता है। इस देश का मौजूदा गणतंत्र इन इजारेदार घरानों की हुकुमशाही है। हमारा अनुभव यही दिखाता है।

आपका, अमर

अंग्रेजी

पार्टी के दस्तावेज

8 जनवरी, 2020 की सर्व हिन्द आम हड़ताल को सफल करें!

मज़दूर एकता कमेटी का आह्वान

देश की दिशा पूंजीपतियों की अमीरी को बढ़ा रही है और मज़दूर, किसान व सभी मेहनतकशों को ग़रीबी में धकेल रही है। इस रास्ते का विरोध करने के लिए और देश की दौलत पर अपने अधिकार का दावा करने के लिए यह हड़ताल आयोजित की जा रही है।

मेहनतकशों का है यह नारा, हम हैं इसके मालिक! हिन्दोस्तान हमारा!

thumbपूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है। इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को। यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब, मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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