खाद्यानों की आसमान छूती क़ीमतों के बारे में क्या किया जाना चाहिए

हाल ही में खाद्यानों की क़ीमतों पर प्रकाशित आंकड़ों से पता चलता है कि दिसंबर 2018 की तुलना में दिसंबर 2019 की क़ीमतें 14 प्रतिशत अधिक थीं। और खाद्यानों में भी सब्ज़ियों की क़ीमतें क़रीब 60 प्रतिशत अधिक थीं।  

आसमान छूती क़ीमतों का हमारी ज़िंदगी पर क्या असर होता है यह समझने के लिए एक उदाहरण लेते हैं। विजय न्यूनतम वेतन पर काम करने वाला एक फैक्ट्री मज़दूर है। वह अपनी पत्नी, माता और अपने दो बच्चों के साथ एक शहर में निवास करता है। पिछले वर्ष उसका परिवार हर सप्ताह कुल 8 किलो सब्जियां खरीदने के लिए 350 रुपये खर्च करता था जो कि 1500 रुपये प्रतिमाह होता है। आज विजय का परिवार उस क़ीमत में केवल 5 किलो सब्ज़ियां ही प्रति सप्ताह खरीद पाता है। विजय के परिवार ने प्याज और उन सब्ज़ियों की खरीदी कम कर दी है, जिनके दाम आसमान छू रहे हैं। लेकिन इसके बावजूद, सब्ज़ियों पर प्रति माह उनका खर्चा 1500 रुपये से बढ़कर 2200 रुपये हो गया है।

सब्ज़ियों के अलावा, विजय को दूध, दाल, खाने का तेल, चीनी, गेहूं और चावल पर ज्यादा खर्च करना पड़ रहा है। चूंकि विजय और उसकी पत्नी दोनों ही काम करते हैं, तो उनके पास राशन की दुकान में जाकर खड़े होने का समय नहीं है। जहां वे कम क़ीमत पर सामान खरीद सकें, जो कि अक्सर बेहद खराब गुणवत्ता का मिलता है। इसके अलावा उनको पानी के लिए 1500 रुपये प्रतिमाह खर्च करना पड़ता है क्योंकि जिस इलाके में वे रहते हैं वहां पीने के साफ पानी की सुविधा नहीं है। 

दिसंबर 2018 से विजय की तनखाह में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है। उसका कंपनी मालिक कहता है कि कच्चे माल की क़ीमतें बढ़ गयी हैं और बिक्री में कमी आई है; इसलिए वह मज़दूरों को अधिक तनखाह नहीं दे सकता। दरअसल वह कुछ मज़दूरों को काम से निकालने के बारे में सोच रहा है। विजय को डर है कि यदि उसे नौकरी से निकाल दिया जाता है तो उसे नयी नौकरी आसानी से नहीं मिलेगी। रोज़गार की हालत भी बहुत ख़राब है।

खाद्यानों पर बढ़ते खर्च के मद्देनज़र विजय गैर-खाद्यानों पर खर्च को कम करने को मजबूर है। वह अपने बच्चों के लिए नयी यूनिफोर्म नहीं खरीद सकता, जबकि पुरानी यूनिफोर्म फट गयी है। खाने में पौष्टिकता के कम हो जाने की वजह से बच्चों के बीमार होने का ख़तरा बढ़ गया है। यदि परिवार का कोई सदस्य बीमार हो जाता है तो वह उसके इलाज और दवाई का खर्चा नहीं उठा पायेगा।

आज देश के लाखों करोड़ों मज़दूरों की हालत भी विजय की तरह है। लाखों-करोड़ों मज़दूरों का हाल विजय से भी खराब है, जिनका गुजर-बसर बहुत ही मुश्किल से होता है।

शहरी मज़दूरों का खाद्यानों पर खर्चा बढ़ गया है। उधर, किसानों को अपने कृषि उत्पादों के लिए मिलने वाली क़ीमत अभी भी बेहद कम है। उदाहरण के लिए पिछले मौसम में किसानों को प्याज की फसल के लिए दाम केवल 3 रुपये प्रति किलो ही मिला था। कई किसान इतनी कम क़ीमत पर भी अपनी फ़सल नहीं बेच पाए और उनको अपनी फ़सल मंडियों में ही सड़ने के लिए छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़े, क्योंकि उनके पास उसे वापस अपने गांव तक ले जाने का भी पैसा नहीं था। इस अनुभव के चलते, कई किसानों ने इस साल प्याज की फ़सल नहीं बोने का फैसला लिया। नतीजा यह हुआ कि आज बाज़ार में प्याज की भारी कमी हो गयी है।

जब कभी सब्ज़ियों और अन्य खाद्यानों की क़ीमतों में बढ़ोतरी होती है तो सरकार के प्रवक्ता इसके लिए “जमाखोरों और मुनाफ़ाखोरों” को ज़िम्मेदार बताती है। लेकिन सरकार इस बात को छुपाती है कि देश के सबसे बड़े जमाखोर और मुनाफाखोर कोई और नहीं बल्कि रिलायंस और अन्य बड़ी पूंजीपति कंपनियां हैं। ये बड़ी पूंजीपति कंपनियां केंद्र और राज्यों में सत्ताधारी राजनीतिक पार्टियों को पैसा देती हैं।

उदारीकरण और निजीकरण के नाम पर केंद्र और राज्य सरकारों ने कृषि उत्पादों की सार्वजनिक खरीदी में कटौती की है। उन्होंने कृषि व्यापार में बड़ी निजी कंपनियों के प्रसार को बढ़ावा दिया है। इन कंपनियों के पास सब्जियां, फल और अन्य खाद्यानों का बड़े पैमाने पर संचयन करने के लिए कोल्ड स्टोरेज की सुविधा और पैसा है। जब कभी बाज़ार में किसी चीज की कमी होती है तब ये कंपनियां मोटे मुनाफ़े कमाती हैं। ये कंपनियां किसानों से कृषि उत्पाद कम से कम क़ीमत पर खरीदती हैं और जब बाज़ार में क़ीमतें बढ़ जाती हैं तो उसे ऊंची क़ीमत पर बेचती हैं।

चूंकि किसानों को सरकार की ओर से कोई सहायता नहीं मिलती है इसलिए वे अपने उत्पाद को कम से कम क़ीमत पर बेचने को मजबूर हो जाते हैं। चूंकि उनके खेत के पास कोल्ड स्टोरेज की सुविधा नहीं है इसलिए जैसे ही उनकी फ़सल तैयार होती है, तो जल्दी ख़राब होने वाली फ़सल को जो भी क़ीमत मिले उस दाम पर तुरंत बेचने के अलावा, उनके पास कोई चारा नहीं रहता है। 

खाद्यानों की क़ीमतों में तेज़ी से बढ़ोतरी की वजह से मज़दूर वर्ग परिवारों को गैर-खाद्यानों पर खर्चों में कटौती करनी पड़ रही है। इसके चलते औद्योगिक वस्तुओं की मांग का संकट भी गहरा होता जा रहा है और इसकी वजह से फैक्ट्रियों को बंद करने और मज़दूरों की छंटनी करने की नौबत आ गयी है।

खाद्यानों की आसमान छूती क़ीमतों की समस्या को हल करने के लिए क्या किया जाना चाहिए?

इसके लिए कृषि व्यापार से निजी मुनाफ़ाखोरों के दबदबे को ख़त्म करना होगा। यह एकमात्र उपाय है जिससे सभी के लिए पर्याप्त मात्रा में वाजिब क़ीमत पर खाद्यान की आपूर्ति सुनिश्चित की जा सकती है और साथ ही सभी ज़मीन जोतने वालों के लिए एक स्थिर और सुरक्षित रोज़गार सुनिश्चित किया जा सकता है।

इसके लिए कृषि उत्पादों में विदेशी व्यापार और थोक एवं खुदरा देशी व्यापार का राष्ट्रीयकरण करना होगा। इन दोनों को सामाजिक नियंत्रण में लाना होगा और सभी के लिए सुख और सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में मोड़ना होगा। ऐसा करने से प्याज, टमाटर, चावल, गेहूं, दाल और अन्य कृषि उत्पादों के लिए शहरों में मज़दूरों से वसूल की जा रही क़ीमत और देहातों में किसानों को मिलने वाली क़ीमतों के बीच के अंतर को कम किया जा सकता है।

ऐसा करने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों को सभी कृषि उत्पादों की सार्वजनिक खरीदी की व्यवस्था क़ायम करने के लिए तुरंत क़दम उठाने होंगे। यह सुनिश्चित करना होगा कि किसानों को कृषि में लागत की तमाम वस्तुओं को वाजिब दाम पर मुहैया कराया जाये और तमाम कृषि उत्पादों को सार्वजनिक एजेंसियों द्वारा स्थिर और लाभकारी क़ीमत पर खरीदा जाये। जल्दी से ख़राब होने वाले कृषि उत्पादों के संचयन के लिए पर्याप्त संख्या में कोल्ड स्टोरेज बनाने के लिए निवेश करना होगा।

कृषि उत्पादों की सार्वजनिक ख़रीदी और संचयन को सार्वजनिक वितरण व्यवस्था के साथ जोड़ना होगा ताकि सभी लोगों को वाजिब क़ीमत पर तमाम ज़रूरी वस्तुओं की आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके। देहातों और शहरों में मज़दूरों और किसानों के संगठनों और लोक समितियों को इस सार्वजनिक व्यवस्था की निगरानी करनी होगी ताकि कोई भी निजी मुनाफ़ाखोर और भ्रष्ट अधिकारी इसमें सेंध न लगा सके।

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Feb 1-15 2020    Struggle for Rights    Economy     Rights     2020   

पार्टी के दस्तावेज

8 जनवरी, 2020 की सर्व हिन्द आम हड़ताल को सफल करें!

मज़दूर एकता कमेटी का आह्वान

देश की दिशा पूंजीपतियों की अमीरी को बढ़ा रही है और मज़दूर, किसान व सभी मेहनतकशों को ग़रीबी में धकेल रही है। इस रास्ते का विरोध करने के लिए और देश की दौलत पर अपने अधिकार का दावा करने के लिए यह हड़ताल आयोजित की जा रही है।

मेहनतकशों का है यह नारा, हम हैं इसके मालिक! हिन्दोस्तान हमारा!

thumbपूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है। इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को। यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब, मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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