सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी बांड पर रोक लगाने से इंकार किया

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी), एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स और कॉमन कॉज द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई याचिका पर फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एस.ए. बोबडे की अगुवाई में गठित तीन-न्यायाधीशों वाली खंडपीठ ने चुनावी बांड योजना पर रोक लगाने से इंकार कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को इस याचिका पर अपना उत्तर देने के लिए दो सप्ताह का समय दिया है।

वित्त विधेयक 2017 के तहत चुनावी बांड की योजना को 2 जनवरी, 2018 को मंजूरी दी गयी थी। इस योजना के तहत कोई भी व्यक्ति या कंपनी भारतीय स्टेट बैंक की कुछ चुनिंदा शाखाओं से चुनावी बांड खरीद सकते हैं। ये बांड एक वर्ष में चार बार खरीदे जा सकते हैं - जनवरी, अप्रैल, जुलाई और अक्तूबर में। उनकी खरीदी से 15 दिन तक ये चुनावी बांड वैध रहते हैं। इस अवधि के भीतर इनको बांडों को खरीदने वाला किसी भी ऐसी राजनीतिक पार्टी को दान कर सकता है, जिसने पिछले लोकसभा चुनाव में एक प्रतिशत से अधिक वोट हासिल किये हों। जिस पार्टी को ये बांड दान किये जाते हैं, उसे ये बांड भारतीय स्टेट बैंक के खाते में जमा करने होते हैं।

पिछले दो वर्षों में जब से यह योजना शुरू की गयी है, देश में लोकसभा चुनाव और कई राज्यों में विधानसभा चुनाव हो चुके हैं। अक्तूबर 2019 तक 6,000 करोड़ रुपये से अधिक की क़ीमत के चुनावी बांड खरीदे जा चुके हैं। इसमें से सबसे बड़ा हिस्सा, 4,444 करोड़ रुपये के बांड 2019 के लोकसभा चुनावों के अभियान के दौरान बेचे गए थे।

अक्तूबर 2019 तक जो चुनावी बांड बेचे गए थे उनसे प्राप्त कुल राशि का  91.76 प्रतिशत 1 करोड़ बांडों से मिला। 7.95 प्रतिशत राशि 10 लाख रुपये के बांडों से मिली। इन दोनों बांड के मूल्यों की कुल क़ीमत 99.7 प्रतिशत थी। 1 लाख की क़ीमत के कुल बांड केवल 0.27 प्रतिशत थे।

2018-19 के दौरान चुनावी बांड से किस पार्टी को कितने रुपये हासिल हुए इसकी अभी तक कोई जानकारी नहीं है। इस दौरान आम चुनाव में लोकसभा के लिए मतदान कई चरणों में आयोजित किये गये थे। इस जानकारी का ब्योरा अक्तूबर 2020 में मिलने की संभावना है जब भाजपा और कांग्रेस पार्टी को अपनी आमदनी और खर्चों का लेखा-जोखा जमा करना है। ओड़िशा में बिजू जनता दल, आंध्र प्रदेश में वाई.एस.आर. कांग्रेस और तेलंगाना राष्ट्रीय समिति जिन्होंने विधानसभा चुनाव जीते हैं, उन्होंने अपनी आमदनी और खर्चों का लेखा-जोखा जमा कर दिया है और उन्होंने ऐलान किया है कि 2018-19 के दौरान उनको चुनावी बांड से कुल 600 करोड़ रुपये मिले हैं। इसका मतलब है कि बाकी 80 प्रतिशत रकम भाजपा और कांग्रेस के खातों में गयी है।

जब इस योजना को लाया गया था तब उस समय के वित्त मंत्री अरुण जेटली ने दावा किया था कि इस सुधार से चुनावों के वित्त पोषण को साफ-सुथरा बनाने में मदद मिलेगी और राजनीतिक पार्टियों को बेहिसाब तौर से मिलने वाले चंदे में कमी आएगी। लेकिन आंकड़े यही दिखाते हैं कि इस योजना से चुनावी अभियानों के लिए हिन्दोस्तानी और विदेशी पूंजीपतियों से मिलने वाले चंदे में बढ़ोतरी हुई है। अब विदेशी कंपनियों द्वारा हिन्दोस्तान की राजनीतिक पार्टियों को चंदा देना और भी आसान हो गया है, क्योंकि अब उनको भारी मात्रा में नगदी नहीं रखनी पड़ती है, जिसको बांटना पड़े।

चुनावी बांड योजना को चुनौती देते हुए दायर की गयी याचिकाओं में कई बातों के अलावा यह तर्क दिया गया है कि कई विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने हिन्दोस्तान में चुनाव के नतीजों को प्रभावित करने के लिए शैल कंपनियों के माध्यम से पैसा हिन्दोस्तान में भेजा है। उनका कहना है कि नगदी में दिए जाने वाले चंदे की तरह ही चुनावी बांड के रास्ते चंदा देने वालों और उसे प्राप्त करने वालों की पहचान को सार्वजनिक नज़र से छुपाकर रखा गया है। उन्होंने बताया है कि भारतीय रिज़र्व बैंक और चुनाव आयोग ने भी इस योजना पर सवाल उठाये थे। वित्त मंत्रालय को भेजे अपने अंदरूनी दस्तावेज़ों में भारतीय रिज़र्व बैंक और चुनाव आयोग दोनों ने ही इस योजना का इस्तेमाल बेहिसाब पैसों के आदान-प्रदान के लिए दुरुपयोग किये जाने की संभावना के बारे में चिंता जताई थी। कई खोजी रिपोर्टों का मानना है कि वित्त मंत्रालय भाजपा को फायदा पहुंचाने के लिए इस कानून को लाया था। याचिकाकर्ताओं ने योजना को चुनौती देने के लिए यह तर्क पेश किया है।

चुनाव में वित्त पोषण की सबसे बड़ी समस्या यह है कि चुनावों के नतीजे तय करने में हिन्दोस्तानी और विदेशी इजारेदार पूंजीपति निर्णायक भूमिका अदा करते हैं। केवल उन्हीं राजनीतिक पार्टियों को चुनाव में बहुमत हासिल करने और सरकार बनाने का अवसर मिलता है जिनका समर्थन इजारेदार पूंजीपति करते हैं। एक बार ये पार्टियां सत्ता में आ जाती हैं तो वे इजारेदार पूंजीपतियों के कार्यक्रम को ही लागू करती हैं।

चुनावी बांड की योजना ऐसी ही एक स्कीम है जिससे इजारेदार पूंजीपतियों को चुनाव के नतीजों को प्रभावित करना आसान हो जाता है।

दरअसल इससे ठीक उल्टा काम करने की ज़रूरत है। हमें ऐसे सुधार चाहिएं जो चुनावों के नतीजों को प्रभावित करने में धनबल की ताक़त को ख़त्म करें या उन्हें न्यूनतम स्तर पर ले आयें। इसके लिए राज्य को चुनावी प्रक्रिया के लिए संसाधन मुहैया कराने होंगे। किसी भी उम्मीदवार, राजनीतिक पार्टी या किसी अन्य नागरिक द्वारा चुनाव अभियान पर किसी भी तरह का खर्च करने पर पाबंदी लगाई जाये।

इसके अलावा चुनाव के लिए उम्मीदवार का चयन करने की प्रक्रिया में भी बदलाव करने की ज़रूरत है। चुनाव के लिए उम्मीदवार का चयन करने का अधिकार राजनीतिक पार्टियों के हाथों से छीनकर मतदान क्षेत्र के लोगों के हाथों में निहित किया जाना चाहिए। चयन किये गए सभी उम्मीदवारों को अपने विचार पेश करने के समान अवसर दिये जाने चाहिएं।

चुनाव के बाद मतदाताओं को अपने सारे अधिकार पूरी तरह से चुने हुए प्रतिनिधियों के हाथों में नहीं सौंपने चाहिएं। उन्हें अपने सबसे प्रमुख अधिकारों को अपने हाथों में बरकरार रखना चाहिए। इन अधिकारों में शामिल हैं - चुने हुए प्रतिनिधि से निर्धारित समय पर उसके काम का लेखा-जोखा मांगने का अधिकार और जो प्रतिनिधि लोगों के लिए काम नहीं करता है उसे किसी भी समय वापस बुलाने का अधिकार। लोगों को नए कानून प्रस्तावित करने का अधिकार भी अपने हाथों में रखना चाहिए। इन अधिकारों का क्रियान्वयन प्रत्येक मतदाता क्षेत्र में चुनी गयी मतदाता कमेटी के ज़रिये किया जाना चाहिए। तब जाकर चुने हुए प्रतिनिधि अपने मतदाता के प्रति जवाबदेह बनेंगे।

लोगों के नाम पर राजनीतिक पार्टियों द्वारा सत्ता चलाने के बजाय, राजनीतिक पार्टियों की भूमिका लोगों को खुद अपना शासन चलाने के लिए तैयार करना है।

पूंजीपति वर्ग केवल ऐसे सुधार लाना चाहेगा जो उसको मौजूदा व्यवस्था को चलाने में मदद करे और जहां राजनीतिक प्रक्रिया पर बड़े पूंजीपतियों का दबदबा बना रहे। चुनावी बांड्स की योजना ऐसा ही एक सुधार है।

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Feb 1-15 2020    Struggle for Rights    Political Process     Rights     2020   

पार्टी के दस्तावेज

8 जनवरी, 2020 की सर्व हिन्द आम हड़ताल को सफल करें!

मज़दूर एकता कमेटी का आह्वान

देश की दिशा पूंजीपतियों की अमीरी को बढ़ा रही है और मज़दूर, किसान व सभी मेहनतकशों को ग़रीबी में धकेल रही है। इस रास्ते का विरोध करने के लिए और देश की दौलत पर अपने अधिकार का दावा करने के लिए यह हड़ताल आयोजित की जा रही है।

मेहनतकशों का है यह नारा, हम हैं इसके मालिक! हिन्दोस्तान हमारा!

thumbपूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है। इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को। यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब, मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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