सी.ए.ए. के खिलाफ देश और विदेश भर में विरोध निरंतर जारी

सी.ए.ए.-एन.आर.सी. के खिलाफ देश भर में चल रहे विरोध के 10 सप्ताह 15 फरवरी को पूरे हो जायेंगे। महत्वपूर्ण यह है इन विरोधों में सैंकड़ों महिलाओं ने दिन ब दिन सक्रियता से भाग लिया है। न तो वे राजनीतिक नेताओं या उनके गुंडों की गालियों और धमकियों से और न ही पुलिस की लाठियों और अश्रु गैस से वे पीछे हटी हैं। संवाददाताओं को अपने विरोध का कारण धैर्य से समझाते हुए वे लगातार धरने पर बैठी रही हैं।

24x7 protests

10 Feb march from Jamia

10 Feb 2020, Protest march starting at Jamia University

2 Feb 2020 Amritsar

2 Feb 2020 Amritsar

2 Feb 2020 Gaya, Bihar

2 Feb 2020 Bagha, Bihar

2 Feb 2020 Coimbattore

2 Feb 2020 Coimbattore

2 Feb 2020 Vadodara

2 Feb 2020 Vadodara

4 Feb 2020, Koderma, Jharkhand

4 Feb 2020, Koderma, Jharkhand

8 Feb 2020, Jama Masjid, Chandigarh

8 Feb 2020, Jama Masjid, Chandigarh

10 Feb 2020, Women in Kanpur demonstrating against police laathi charge on their anti-CAA peaceful demonstration

10 Feb 2020, Women in Kanpur demonstrating against police laathi charge on their anti-CAA peaceful demonstration

12 Feb 2020, Gaya, Bihar

12 Feb 2020, Gaya, Bihar

Indian diaspora in the US protesting against Indian govt linking of religion to citizenship

Indian diaspora in the US protesting against Indian govt linking of religion to citizenship

भाजपा ने दिल्ली चुनाव अभियान का इस्तेमाल शाहीन बाग की महिलाओं के खिलाफ एक के बाद एक धमकियों और लांचन की बौछार करने के लिये किया - परन्तु यह उनके कृतसंकल्प विरोध प्रदर्शनों को नहीं रोक सका। भाजपा ने चुनाव मंच का उपयोग बार-बार यह झूठ दोहराने के लिए किया कि सी.ए.ए. किसी को बाहर रखने के लिए नहीं है बल्कि देश में शरण लेने वाले लोगों को अंदर लेने के लिए है। उन्होंने यह भी झूठा आश्वासन दिया कि किसी भी हिन्दोस्तानी मुस्लिम को डरने की जरुरत नहीं है। लेकिन लोग इसी बात को लेकर चिंतित हैं - कौन हिन्दोस्तानी मुस्लिम है और कौन मुस्लिम बंगलादेश से हैं? वे यह कैसे सिद्ध कर पाएंगे कि वे हिन्दोस्तानी हैं जब उनके जन्म के समय, जन्म प्रमाणपत्र की जरुरत ही नहीं होती थी? “हम कागज नहीं दिखायेंगे” इन विरोधों में यह एक नारा बन गया है। आंदोलन में एक युवक सवाल पूछ रहा था - “हमें कब तक देश के लिए अपनी वफादारी का सबूत देते रहना पड़ेगा? हमारा जन्म तो यहीं हिदोस्तान में हुआ है!” 

प्रधानमंत्री का वक्तव्य कि देश भर में एन.आर.सी. की कोई बात नहीं हुई है, कोई आश्वासन नहीं है क्योंकि उन्होंने यह वायदा भी नहीं किया है कि उनकी सरकार बाद में एन.आर.सी. आयोजित नहीं करेगी।

सोमवार, 10 फरवरी को जामिया के छात्रों और भूतपूर्व छात्रों के संगठन, जामिया कोआर्डीनेशन कमिटी (जे.सी.सी.) के बुलावे पर जामिया से संसद तक सी.ए.ए.-विरोधी मार्च शुरू किया गया। विरोधकर्ताओं ने उनका मार्च जामिया के 7 नम्बर गेट से, विश्वविद्यालय के चारों तरफ बड़ी संख्या में सुरक्षाकर्मियों की मौजूदगी में, शुरू किया। विरोधकर्ताओं ने नारे लगाए कि “जब नहीं डरे हम गोरों से, तो क्यूं डरें हम औरों से?” क्योंकि महिलाएं आगे चल रहीं थी, पुरुषों ने उनके इर्दगिर्द एक मानवी चेन बनाई। पुलिस की कोशिशों के बावजूद विरोधकर्ताओं ने रुकावटें पार कर संसद तक अपना मार्च जारी रखा।

शाहीन बाग की महिलाओं के विरोध ने देश भर में उसी तरह के विरोधों को प्रेरित किया है, जैसे कि बिहार के गया शहर में, कलकत्ता के पार्क सर्कस में, उत्तर प्रदेश में प्रयागराज में, मुंबई और बंगलूरु में।  शहरी इलाकों के अलावा भी शाहीन बाग से प्रेरित अनेक शहरों और अर्ध-शहरी जगहों पर और ग्रामीण बिहार में भी लोग धरने पर बैठे हैं। ऐसे धरने गया शहर, पटना में सब्झी बाग से फुलवारी, बिहार शरीफ में नालंदा, नवादा, बेगुसराय और दूरंदाज किशनगंज में देखे गए।  

सी.ए.ए. के खिलाफ देशभर के अनेक शहरों में महिलाओं ने बड़ी संख्या में दिन रात सड़कों पर उतर कर विरोध प्रदर्शनों में भाग लिया है।

महिलाओं की भीड़ सुबह कम हो जाती है जब उन्हें रोजमर्रा के कामों के लिए, बच्चों को स्कूल भेजने और खाना पकाने के लिए घर जाना पड़ता है और जब वे वापिस आती हैं, तब भीड़ बढ़ जाती है। 

जब उनको पूछा गया कि इतनी सर्दी में वे क्यों विरोध कर रही है, उन्होंने कहा, “यदि दिल्ली की ठिठुरती सर्दी में महिलाऐं धरने पर बैठ सकती हैं, तो हम क्यों नहीं? हम तब तक नहीं हटेंगे जब तक इस कानून को वापिस नहीं लिया जाता है।” ‘सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है’ और अन्य गीत गाकर वे अपने को गर्म रखती हैं। सी.ए.ए. और एन.आर.सी. के खिलाफ प्रदर्शन करती महिलाओं के लिए लखनऊ का घंटाघर भी एक अड्डा बन गया है। “हमें बांटों नहीं, हमें हिन्दोस्तानी रहने दो”। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के एक विद्यार्थी का पोस्टर कहता है “इन्कलाब जिंदाबाद, सबने इसे संवारा है, जितना तुम्हारा उतना यह मुल्क हमारा है”। प्रदर्शनकारी सवाल पूछ रहे हैं, “हम भी इज्जत के अधिकारी हैं। हम कोई कागज नहीं दिखायेंगे। जो लोग सदियों से इस देश में रह रहे हैं उनके लिए क्यों हिरासत केंद्र बनने चाहिए?”  

बिहार में गया-सासाराम हाईवे के किनारे बसे शेरघाटी हमजापुर गांव के लोग सी.ए.ए. - एन.आर.सी.- एन.पी.आर. के विरोध में अनिश्चितकालीन धरना कर रहे हैं। उनका पोस्टर कहता है, “सी.ए.ए. नहीं, एन.आर.सी. नहीं, एन.पी.आर. नहीं”। एक अन्य पोस्टर कहता है, “जहां पैदा हुए, वहीं दफन भी होंगे”। यह धरना छोटा था, लेकिन वहां से 40 किलोमीटर दूर गया शहर के शांतिबाग, या काफी दूर कलकत्ता से लखनऊ में होते धरनों से कोई भिन्न नहीं था। जब 29 दिसम्बर से सभी जातियों और उम्र  की सैंकड़ों महिलाएं, कॉलेज और विश्वविद्यालय जाती लड़कियां धरने में जुड़ गयीं, गया का शांतिबाग चहकने लगा है।

कलकत्ता के पार्क सर्कस के मैदान में नमाज और पूजा दोनों के लिए पंडाल हैं। महिलाओं की उपस्थिति और उनके आसपास दौड़ते, खेलते या अपनी स्कूली किताबें पढ़ते बच्चे इन सभी धरनों की विशेषता है। भाषणों के बीच कविताएं पढ़ी जाती हैं। अनेक महिलाएं कहती हैं कि इसके पहले उन्होंने कभी किसी सार्वजानिक धरने में भाग नहीं लिया है।  

अलीगढ़ में दिल्ली गेट इलाके में ईदगाह की घड़ी के नजदीक पिछले एक सप्ताह से सैंकड़ों महिलाऐं सी.ए.ए. और एन.आर.सी. के खिलाफ शांतिपूर्ण तरीके से धरने पर बैठी हुई हैं। अलीगढ़ जिला अधिकारियों ने नोटिस जारी किया कि दिल्ली गेट इलाके में शहजमल ईदगाह के बाहर सी.ए.ए. और एन.आर.सी. के खिलाफ धरने में भाग लेने वाले प्रदर्शनकारियों की संपत्ति जब्त हो सकती है यदि वे प्रतिबंधक आदेश का उल्लंघन करने के लिए संतोषजनक जवाब नहीं देते हैं। लेकिन इस आदेश से भी महिलाऐं न तो निरुत्साहित हुईं और न ही रुकीं। 

गणतंत्र दिवस से मुंबई के नागपाडा में मोरलेंड रोड पर सी.ए.ए. और एन.आर.सी. के खिलाफ धरने में सैंकड़ों महिलाएं भाग ले रही हैं। नागपाडा पुलिस ने 300 महिलाओं सहित आयोजकों के खिलाफ केस दर्ज किया है।

ये सब धरने लोगों को बांटने, जिस देश में उनका जन्म हुआ है उस देश में उनके जीने के अधिकार को नकारने, अपने अधिकारों की रक्षा के लिए लड़ने वाले विद्यार्थियों और महिलाओं पर पुलिस अत्याचार के खिलाफ हैं।

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Repeal CAA    Feb 16-29 2020    Voice of Toilers and Tillers    Communalism     Popular Movements     Rights     2020   

पार्टी के दस्तावेज

8 जनवरी, 2020 की सर्व हिन्द आम हड़ताल को सफल करें!

मज़दूर एकता कमेटी का आह्वान

देश की दिशा पूंजीपतियों की अमीरी को बढ़ा रही है और मज़दूर, किसान व सभी मेहनतकशों को ग़रीबी में धकेल रही है। इस रास्ते का विरोध करने के लिए और देश की दौलत पर अपने अधिकार का दावा करने के लिए यह हड़ताल आयोजित की जा रही है।

मेहनतकशों का है यह नारा, हम हैं इसके मालिक! हिन्दोस्तान हमारा!

thumbपूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है। इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को। यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब, मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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