भीमा कोरेगांव मामले की जांच केंद्र सरकार ने अपने हाथों में ली

24 जनवरी को केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एन.आई.ए.) को आदेश दिए कि वह भीमा कोरेगांव मामले की जाँच महाराष्ट्र पुलिस से छीनकर अपने हाथों में ले ले। केंद्र सरकार ने यह फैसला महाराष्ट्र के साथ बिना सलाह मशवरा या जानकारी दिए बगैर ले लिया है।

केंद्र सरकार के इस कदम से केंद्र और राज्य के बीच अंतर्विरोध शुरू हो गया है। 25 जनवरी को जानकारी प्राप्त होने पर महाराष्ट्र सरकार ने केंद्र के इस फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई। महाराष्ट्र के गृहमंत्री अनिल देशमुख ने बड़े आक्रोश में कहा कि केंद्र द्वारा इस तरह से राज्य सरकार को बताये बगैर जांच को अपने हाथों में ले लेना पूरी तरह से गलत है, और इजाज़त लेना तो दूर की बात है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष शरद पवार ने भी कहा कि राज्य सरकार को इस मामले में जांच करने का पूरा अधिकार है। दरअसल उन्होंने आरोप लगाया कि भा.ज.पा. की राज्य सरकार इस मामले की असलियत को छुपाने की कोशिश कर रही थी, और उनकी गठबंधन की सरकार ने इस मामले की गहराई से जांच करने का फैसला लिया था।

भीमा कोरेगांव मामला

भीमा कोरेगांव केस वह मामला है जिसके तहत पुणे की पुलिस ने 2018 में 23 मानव अधिकार कार्यकर्ताओं के ख़िलाफ़ गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (यु.ए.पी.ए.) के तहत मामला दर्ज किया था। इनमें से 9 लोग पिछले एक वर्ष से अधिक समय से और 5 लोग जून 2018 से जेल में बंद है। इन सभी लोगों के ख़िलाफ़ पुणे पुलिस ने गंभीर आरोप लगाये हंै, जिसमें राजद्रोह और राज्य के ख़िलाफ़ जंग छेड़ने का आरोप शामिल है। पुणे पुलिस ने इन सभी लोगों पर सी.पी.आई. (माओवादी), इस प्रतिबंधित संगठन का सदस्य होने का आरोप लगाया है। उन सभी को “अर्बन नक्सल” करार दिया गया है। इसके अलावा पुलिस ने आरोप लगाया है कि उन्होंने गिरफ़्तार किये गए एक कार्यकर्ता के कंप्यूटर से भेजा गया एक ई-मेल खोज निकाला है, जिसमें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की हत्या करने की बात कही गयी है, जिस तरह से राजीव गाँधी की हत्या की गयी थी।

गिरफ़्तारी के 19 महीने बाद भी पुलिस ने अभी तक इन लोगों के ख़िलाफ़ आरोप पत्र भी दायर नहीं किया है। यु.ए.पी.ए. के मामलों में अक्सर ऐसा ही होता है। यह एक ऐसा कानून है जिसके तहत राज्य किसी भी व्यक्ति को आतंकवादी होने, राज्य का तख़्तापलट करने की साजिश करने, इत्यादि झूठे आरोपों के तहत सालों-साल अनिश्चित काल के लिए जेल में बंद रख सकता है।

अब एन.आई.ए. ने पुणे के सत्र न्यायालय में इस मामले से जुड़ी सभी फाइलों को उसके सुपुर्द करने की अपील की है।

केंद्र सरकार ने अचानक इस केस को अपने हाथों में लेने का फैसला क्यों किया?

केंद्र सरकार में बैठी भा.ज.पा. सरकार ने पिछले पांच वर्षों से उन सभी मानव अधिकार कार्यकर्ता और राजनीतिक कार्यकर्ताओं को सुनियोजित तरीके से निशाना बनाती आई है जो सरकार द्वारा अपनाये गए रास्ते का विरोध करते हैं, और उनको “अर्बन नक्सल” करार देती आई है जो “हिन्दोस्तान के टुकड़े-टुकडे़” करने की साजिश कर रहे हैं। केंद्र सरकार ने भीमा कोरेगांव मामले में जेल में गिरफ्तार 9 कार्यकर्ताओं और अन्य आरोपियों के ख़िलाफ़ जहरीला प्रचार चलाया है।

जब तक महाराष्ट्र में भा.ज.पा. की सरकार थी उस समय तक केंद्र में बैठी नरेन्द्र मोदी की सरकार अपने राजनीतिक फायदे के लिए इस मामले का इस्तेमाल बड़ी आसानी से कर पा रही थी। लेकिन नवंबर 2019 में महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की शिवसेना की अगुवाई में शिवसेना, एन.सी.पी., और कांग्रेस की गठबंधन सरकार के सत्ता में आने से हालत बदल गया है।

21 दिसंबर को राष्ट्रवादी कांग्रेस के अध्यक्ष शरद पवार ने राज्य सरकार से भीमा कोरेगांव मामले में विशेष जांच दल (एस.आई.टी.) बनाने की मांग की जो पुणे पुलिस द्वारा की गयी कार्यवाही की जांच कर सके। शरद पवार ने कहा कि “कार्यकर्ताओं को राजद्रोह के मामले में गिरफ्तार करना गलत है। किसी भी जनतंत्र में चरम विचार पेश करने की भी इजाज़त होती है। पुणे की पुलिस द्वारा की गयी कार्यवाही गलत है और बदले की भावना के साथ ली गयी है। यह पुलिस कमिश्नर और कुछ अन्य अधिकारियों द्वारा सत्ता का दुरुपयोग है। उन्होंने लोगों के बुनियादी अधिकारों पर हमला किया है और हम एक मूक दर्शक बनकर नहीं रह सकते” (ईकनाॅमिक टाइम्स, दिसंबर 22, 2019)। उन्होंने आगे कहा कि “तथ्यों को जांचा जाना चाहिए। पिछली सरकार और जांच टीम की भूमिका संदेहस्पद है। इस जांच से जुड़े पुलिस अधिकारियों को निलंबित किया जाना चाहिए, और उनके द्वारा की गयी कार्यवाही की जांच की जानी चाहिए”।

खबरों के अनुसार जनवरी 22 को महाराष्ट्र के गृहमंत्री अनिल देशमुख और उपमुख्यमंत्री अजीत पवार ने पुणे पुलिस और राज्य खुफ़िया विभाग के अधिकारियों के साथ इस मामले की समीक्षा के लिए मीटिंग की थी। मीटिंग के तुरंत बाद उन्होंने ऐलान किया कि अगले सप्ताह के भीतर उनका विभाग इस बात पर फैसला करेगा कि इस मामले की जांच के लिए विशेष जांच दल (एस.आई.टी.) बनाने की जरूरत है या नहीं। केंद्रिय गृहमंत्रालय को डर था कि ऐसा करके मानव अधिकार कार्यकर्ताओं के ख़िलाफ़ यू.ए.पी.ए. कानून लगाने के उनके खेल का पर्दाफाश हो सकता है, इसलिए केंद्रिय गृहमंत्रालय ने तुरंत इस मामले को राज्य सरकार के हाथों से निकालकर केंद्र सरकार के हाथों में लेने के लिए तेजी से कदम उठाए।  

इस समय भीमा कोरेगांव के मामले को केंद्र सरकार द्वारा अपने हाथों में लिया जाना यह दिखाता है कि केंद्र सरकार उसी रास्ते पर चलने पर अड़ी हुई जहां उनकी नीतियों पर सवाल उठाने वाले और उनका विरोध करने वाले सभी लोगों को “गद्दार”, “राष्ट्र-विरोधी”, “राष्ट्र की एकता के दुश्मन”, और “देश को तोड़ने” वाले करार दिया जायेगा।

राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एन.आई.ए.)

एन.आई.ए. का गठन 2008 में मनमोहन सिंह सरकार के दौरान संसद द्वारा बनाये गए एक कानून के जरिये किया गया था। इसका गठन 26 नवंबर 2008 में हुए मुबंई में हुए आतंकवादी हमलों के तुरंत बाद किया गया था। इसके साथ ही यू.ए.पी.ए. को और अधिक कठोर बनाने के लिए उसमें संशोधन किये गए।

एन.आई.ए. सीधे केंद्रीय गृह मंत्रालय को रिपोर्ट करता है। विमान अपहरण, बम धमाकों, परमाणु संयंत्रों पर हमलों, जनसंहार के हथियारों का हमला, समुद्री रास्ते आतंकवादी हमले, राजद्रोह, राज्य के ख़िलाफ़ जंग छेड़ने या ऐसी कोई कार्यवाही जिससे देश की संप्रभुता पर खतरा पैदा हो, ऐसे मामलों में एन.आई.ए. जांच कर सकती है।

इस तरह के मामलों में एन.आई.ए. अधिनियम, केंद्र सरकार को राज्य सरकार दरकिनार करते हुए जांच को अपने हाथों में लेने की इजाज़त देता है।

इससे पहले 15 जनवरी को छत्तीसगढ़ सरकार ने एन.आई.ए. अधिनियम की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की है। ऐसा करने वाला छत्तीसगढ़ पहला राज्य है।

खबरों के अनुसार, पूर्व केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम, जिन्होंने दिसंबर 2008 में एन.आई.ए. अधिनियम को संसद में पारित कराया था, उन्होंने एफ.बी.आई. के निदेशक रोबर्ट मुएलर के सामने स्वीकार किया था कि केंद्र और राज्यों के बीच संबंधों पर संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन करने के आधार पर एन.आई.ए. के अधिकारों को कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है (द हिन्दू अखबार, 19 मार्च 2011)। चिदंबरम के अनुसार हिन्दोस्तानी कानून व्यवस्था में “फ़ेडरल गुनाहों” की संकल्पना नहीं की गयी है, और “कानून और व्यवस्था” राज्य का विषय है।

जुलाई 2019 को नरेन्द्र मोदी सरकार ने यु.ए.पी.ए. और एन.आई.ए. कानून में संशोधन किया। यू.ए.पी.ए. में किये गए संशोधन में अब किसी व्यक्ति को भी आतंकवादी घोषित किया जा सकता है। संशोधित एन.आई.ए. को इन हालातों में इस्तेमाल किया जा सकता है - 1) उसे देश के बाहर लागू किया जा सकता है, जहां देश को या “देश हित” को ख़तरे की आशंका हो, 2) मानव तस्करी, जाली नोटों, प्रतिबंधित हथियारों का उत्पादन और बिक्री, साइबर आतंकवाद, और विस्फोटक पदार्थ अधिनियम 1908 के तहत गुनाहों के मामले में जांच लागू की जा सकती है।

 

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Bhima Koregaon    Feb 16-29 2020    Voice of the Party    Communalism     Popular Movements     Rights     2020   

पार्टी के दस्तावेज

8 जनवरी, 2020 की सर्व हिन्द आम हड़ताल को सफल करें!

मज़दूर एकता कमेटी का आह्वान

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thumbपूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है। इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को। यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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