लोगों को सत्ता में लाने के लिए गठित प्रेपरेटरी कमेटी फाॅर पीपल्स एम्पावरमेंट की 27वीं वर्षगांठ पर:

लोगों के हाथों में फैसले लेने की ताकत के संघर्ष को आगे बढ़ाएं!

पिछले कुछ महीनों से, हिन्दोस्तान के हर कोने में नागरिकता संशोधन अधिनियम (सी.ए.ए.), नागरिकों का राष्ट्रीय रजिस्टर (एन.आर.सी.), और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर के खिलाफ, लोगों ने बड़े-बड़े विरोध प्रदर्शन आयोजित किये हैं। भिन्न-भिन्न भाषाओं को बोलने वाले, भिन्न-भिन्न जातियों के और भिन्न-भिन्न धर्म को मानने वाले, लाखों लोग इन प्रदशनों में शामिल हैं।

लोग चिंता प्रकट कर रहे हैं कि सरकार द्वारा लिये गये इस तरह के फैसलों व कदमों के साथ-साथ इस्लामोफोबिया (मुस्लिमों से डर) को फैलाया जा रहा है इससे लोगों को धर्म के नाम पर बांटा जायेगा। इसका मकसद है मुस्लिम समुदाय के लाखों लोगों को नाजी कंसंट्रेशन कैम्पों की तरह, शरणार्थी कैम्पों में कैद करना।

कई राजनीतिक पार्टियों ने नागरिकता से संम्बंधित, इस तरह के कानूनों और केंद्रीय सरकार के कदमों का कड़ा विरोध किया है। छः राज्य सरकारों ने ऐलान किया है कि वे अपने राज्यों में सी.ए.ए., एन.आर.सी. और संशोधित किया हुआ एन.पी.आर. लागू नहीं करेंगे।

केंद्र सरकार और भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता लोगों के जारी संघर्ष को बदनाम करने के लिए, हर तरह की झूठी अफवाहें फैलाने और गाली गलोज का रास्ता अपना रहे हैं। प्रदर्शनकारियों को पाकिस्तानी एजेंट्स और “टुकड़े-टुकड़े” गिरोह के सदस्य बताकर, उनको बदनाम करने की कोशिश की जा रही है। अलग-अलग तरीकों से, प्रदर्शनकारियों को बदनाम करने की कोशिश की जा रही है जैसे कि  प्रदर्शनकारियों को विरोध करने के लिए पैसा दिया जा रहा है या उनको मुफ्त बिरियानी बांटी जा रही है।

दिल्ली चुनाव में, भारतीय जनता पार्टी के प्रचार का मुख्य मुद्दा यह था कि मुस्लिम समुदाय के लोग और वे सभी लोग जो सी.ए.ए. और एन.आर.सी. का विरोध कर रहें हैं, “देश के गद्दार” हैं और यदि भारतीय जनता पार्टी जीत कर आती है तो इन सबको, जहां भी प्रदर्शन हो रहे हैं, वहां से जबरन निकाल बाहर करेगी।

यहां तक कि, एक प्रेस विज्ञप्ति में, केंद्र के संसदीय कार्य मंत्री ने राज्य सरकारों को चेतावनी दी कि “संविधान के तहत, सभी राज्यों को सी.ए.ए. लागू करना पड़ेगा” और “यदि कोई भी राज्य सरकार, चाहे पश्चिमी बंगाल, केरल, राजस्थान या मध्य प्रदेश की सरकार हो, यदि वो इस अधिनियम को लागू नहीं करेंगे तो यह संविधान का उल्लंघन माना जायेगा। यह कानून संसद ने पास किया है, राज्य सरकारों को इसे लागू करना ही पडेगा। यह राष्ट्रीय हित का सवाल है”। कई और केंद्रीय मंत्रियों ने भी इसी बात को दोहराया है।

जब केंद्रीय सरकार के मंत्री इस तरह के अहंकार भरे वक्तव्य देते हैं, यह इस मौजूदा लोकतंत्र व्यवस्था में निहित उसके मूलभूत अंतर्विरोध को दर्शाता है। यह दिखाता है कि यह दावा करना कि “ लोकतांत्रिक हिन्दोस्तानी गणतंत्र” में, लोग संप्रभु हैं कितना खोखला है। वास्तव में, लोगो के पास कुछ भी ताकत नहीं है। कहने के लिए संसद और विधान सभाओं में बैठने वाले “लोगों के प्रतिनिधि” हैं पर असलियत में, उन्हें भी दिल्ली में बैठे मंत्रीमंडल के सामने घुटने टेकने पड़ते हैं।

संविधान, संसद में बहुमत से चुनी गयी सरकार को यह अधिकार देता है कि वह अपने फैसलों को सभी के ऊपर थोप सके। विडम्बना तो यह है कि लाखों लोग सड़कों पर इस लोक विरोधी कानून के खिलाफ अपना प्रत्यक्ष विरोध जता रहे है, पर उनके पास इस निर्णय को बदलने की कोई ताकत नहीं है। यह ऐसा गणतंत्र है जिसमें राज्य सरकारों और करोड़ों लोगों की मर्जी के खिलाफ, केंद्रीय सरकार संविधान के कुछ प्रावधानों के तहत, राज्य सरकारों पर अपने कानून थोप सकती है।

संविधान के ये “असाधारण” हालातों के लिए बने प्रावधानों को इतनी बार लागू किये गये हैं कि यह एक साधारण नियम बन गया है। पिछले 70 सालों में, हिन्दोस्तानी राज्य सत्ता का यह लोकतंत्र-विरोधी चरित्र बार-बार हमारे सामने आया है। 1975-77 की इमरजेंसी के दौरान प्रकट हुआ था। हिन्दोस्तानी राज्य सत्ता का लोकतंत्र-विरोधी चेहरा तब भी सामने आया जब 6 दिसम्बर 1992 को, दोनों कांग्रेस पार्टी और भारतीय जनता पार्टी ने मिलकर बाबरी मस्जिद का विध्वंस किया, साम्प्रदायिक नफरत का माहौल पैदा किया और पूरे देश में सांप्रदायिक जनसंहार आयोजित किया।

उस वक्त, हिन्दोस्तान ही नहीं बल्कि विश्व स्तर पर भी, पूंजीवादी व्यवस्था का संकट बहुत ही गहरा था। दुनिया के इजारेदार पंूजीपति सोवियत यूनियन के विघटन की खुशियां मना रहे थे। टाटा बिरला और अंबानी के नेतृत्व में, हिन्दोस्तान के पंूजीपति, हिन्दोस्तान के आर्थिक संकट के लिए, 80 के दशक तक लागू, नेहरु की समाजवादी नीतियों को दोषी ठहराना चाहते थे। उदारीकरण और निजीकरण द्वारा भूमंडलीकरण के अमरीका से प्रेरित नारे के तहत, हिन्दोस्तानी पूंजीपति, देश के सभी क्षेत्रों को अधिकतम मुनाफे बनाने और लूट के लिए खोलना चाहते थे।

दोनों, कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी ने मिलकर, हिन्दू और मुस्लिम के बीच में खून खराबा आयोजित करने की साजिश रची। सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की साजिश से दोनों ने अपने वोट बैंक्स मजबूत किये। इस तरह के हालात पैदा किये गए कि हिन्दोस्तान के इजारेदार पंूजीपतियों के समाज-विरोधी आर्थिक हमले के खिलाफ चल रहे मज़दूरों-किसानों और मेहनतकश लोगों के संघर्ष को दिशाभूल किया जा सके और बांटा जा सके।

हिन्दोस्तान के आम लोग, संसद में बैठी इन दोनों पार्टियों के द्वारा, देश के एक राष्ट्रीय स्मारक के विध्वंस किये जाने पर और सांप्रदायिक हिंसा और आतंक आयोजित किये जाने पर क्रोधित थे। 22 फरवरी, 1993 को बजट सत्र के शुरू में ही, कांग्रेस पार्टी की सरकार ने पूरी राजधानी दिल्ली में धारा 144 थोप दी। इसके बावजूद, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी ने, मजदूर एकता कमेटी, सहेली, पंजाब मानवाधिकार संगठन और पुरोगामी महिला संगठन के कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर, दिल्ली के फिरोज शाह कोटला मैदान पर एक जन विरोध प्रदर्शन आयोजित किया।

हिन्दोस्तान के उन सभी लोगों ने जो, देश में बढ़ता राजनीतिक अपराधीकरण और लोगों को सत्ता से पूरी तरह वंचित करने के बारे में चिंतित थे, उन्होंने इस साहसिक विरोध प्रदर्शन, 1993 की कोटला रैली का स्वागत किया।

27 साल पहले इस दिन जारी की गयी एक अपील पर, अनेक लोगों ने जिसमें, राजनीतिक शख्सियतों, शिक्षकों, विद्धानों, पत्रकारों, अन्य प्रोफेशनल्स, सेवानिवृत न्यायधीशों और अधिकारियों, ने अपने हस्ताक्षर किये। इस अपील ने हिन्दोस्तान की राजनीतिक प्रक्रिया में, निहित स्वार्थ के प्रभुत्व को खत्म करने का आह्वाहन दिया। इस पहल से 11 अप्रैल, 1993 को प्रिपरेटरी कमेटी फाॅर पीपुल्स एम्पावरमेंट बनी जो 1998 में लोक राज संगठन के रूप में पुनर्गठित हुई।

पिछले 27 सालों के हमारे अनुभव ने बार-बार इस सच की पुष्टि की है कि देश की अर्थव्यवस्था की दिशा में और लोकतांत्रिक प्रणाली और राजनीतिक प्रक्रिया में, एक गुणात्मक परिवर्तन की सख्त जरूरत है।

हिन्दोस्तान के 150 इजारेदार पूंजीपति घराने, देश की जनसख्या का एक बहुत ही छोटा हिस्सा हैं। पूंजीवादी अर्थव्यवस्था यह सुनिश्चित करती है कि देश की सम्पति इस छोटे से हिस्से के हाथों में केन्द्रित रहे। सामाजिक उत्पादन की दिशा और सरकार की सभी नीतियां इस मकसद से तय की जाती हैं कि हिन्दोस्तान और विदेशी इजारेदार पूंजीपतियों को अधिकतम मुनाफे की लालच को पूरा करे। मजदूरों और किसानों की, जो सही मायने में हिन्दोस्तान की सम्पति पैदा करते है, उनकी बढ़ती जरूरतों को पूरा करना हिन्दोस्तानी राज्य की प्राथमिकता नहीं है। लोगों की जरूरतें अधिकतर अधूरी ही रहती हैं। लोगों की जिंदगी, पूजीवादी व्यवस्था में मंदी या जिसको पूजीवादी “अधिक उत्पादन का संकट” बोलते हैं, उन हालातों में और भी तबाह हो जाती हैं।

सभी मेहनतकश लोगों का जीवन का अनुभव दिखाता है कि पूंजीवादी व्यवस्था में उनकी अपनी जरूरतों को पूरा करने का कोई साधन नहीं है और उदारीकरण और निजीकरण कार्यक्रम का केवल एक है ही मकसद है, देश की सम्पति का कुछ मुट्ठीभर अल्पसंख्यकों के हाथों में संकेन्द्रण। आज 2020 में बेरोजगारी, नौकरीशुदा मजदूरों का शोषण और मेहनतकश किसानों की लूट और दमन अभूतपूर्व स्तर पर पहुंच गयी है। आम हड़रतालों और जन विरोध प्रदर्शनों में बड़ी संख्या में मजदूरों और किसानों का सहभाग निजीकरण और उदारीकरण के कार्यक्रम के खिलाफ अभूतपूर्व विरोध दिखलाता है।

इस बढ़ते जन असंतोष, के सामने सांप्रदायिक नफरत फैलाना और बढ़ते शोषण और दमन के खिलाफ लोगों के एकजुट संघर्ष को तोडने के लिये, हिन्दोस्तान का शासक वर्ग, भारतीय जनता पार्टी पर भरोसा रखता है। एक के बाद एक, जम्मू और कश्मीर के विशेष दर्जे को खत्म करना, बाबरी मस्जिद के स्थान पर राम मंदिर का निर्माण करना, सी.ए.ए. बनाना और एन.आर.सी. करवाना - ये उदाहरण हैं कि शासक वर्ग लोगों को भटकाने और बांटने के लिये और सभी विरोधों को अपराध बताने के लिये हर तरह की कोशिश कर रहा है।

लोगों की एकता को तोड़ने के मकसद से उनके ऊपर एक क्रूर, सांप्रदायिक हमला हो रहा है। समय की पुकार है कि इजारेदार पूंजीपतियों की इस हुकुमशाही को, जिसको वे झूठे तरीके से दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के नाम से पुकारते हैं, खत्म किया जाये। वक्त आ गया है कि लोग समाज के हर फैसले लेने की ताकत अपने हाथों में लें।

मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था की एक मूलभूत समस्या यह है कि फैसले लेने की ताकत केवल प्रधान मंत्री के नेतृत्व में मंत्रीमंडल में संकेन्द्रित है। इजारेदार पूंजीपतियों के हितों की हिफाजत करने के लिए मंत्रीमंडल आदेशों द्वारा शासन करता है। मंत्रीमंडल वैधानिक संसद के प्रति जवाबदेह नहीं है और संसद की जवाबदेही लोगों के प्रति नहीं है।

संविधान में बनाये गए प्रावधान, जिसके अनुसार कार्यकारिणी को लोगों के अधिकारों पर “उचित प्रतिबंध“ लगाने का अधिकार है, सत्तारूढ पार्टी को, काले, कठोर कानूनों के जरिये, लोगों की नागरिक स्वतंत्रताएं, छीनने का लाइसेंस प्राप्त है। इसी प्रावधान का सहारा लेकर, यू.ए.पी.ए., एफ्स्पा, जन सुरक्षा कानून जैसे फासीवादी कानून बनाये जाते हैं और उनके द्वारा बार-बार जो लोग अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं, उनको कुचला जाता है।

हिन्दोस्तान का संविधान और लोगों का प्रतिनिधित्व अधिनियम, हिन्दोस्तानी और विदेशी इजारेदार पूंजीपतियों के समर्थन से चलने वाली पार्टियों को आम लोगों के हितों के खिलाफ काम करने की छूट होती है। चुनाव में बहुमत जीतने के बाद इन पार्टियों को “जनादेश” के नाम पर, कुछ भी मनमानी करते हैं।

समय-समय पर चुनाव के द्वारा, इजारेदार पंूजीपति ये सुनिश्चित करते हैं कि उनकी वफादार पार्टियों से कोई एक, हमेशा सत्ता में रहे। इन पार्टियों ने इजारेदार पंूजीपतियों के एजेंडा को कितनी बखूबी से लागू किया है चाहे समाज के और तबके कितने भी तबाह हो जायें।

अब समय आ गया है कि सभी चिंतित हिन्दोस्तानी साथ मिल कर, लोगों को सत्ता में लाने के सघर्ष को आगे ले जाये। लोगों के असंतोष और क्रोध को एक नयी दिशा देने की जरूरत है, हम सब को मिलकर इस लोकतंत्र व्यवस्था की एक आधुनिक परिभाषा देने के जरूरत है। हमें एक आधुनिक लोकतंत्र और राजनीतिक प्रक्रिया की स्थापना करने जरूरत है जिसमें फैसले लेने का अधिकार लोगों के पास हो।

आधुनिक लोकतंत्र का मानना है कि हिन्दोस्तान में विभिन्न राष्ट्र, राष्ट्रीयताएं और लोग रहते हैं, जिनके अपने अधिकार हैं। ऐसे लोकतंत्र का संविधान यह सुनिश्चित करेगा कि, हिन्दोस्तानी संघ के हर घटक को आत्म-निर्धारण के अधिकार की गारंटी होगी, इसमें नागरिकता की एक आधुनिक परिभाषा होगीं। यह सुनिश्चित करेगा कि लोगों के जमीर के अधिकार का उल्लंघन, किसी भी बहाने न किया जा सके।

संविधान को यह सुनिश्चित करना होगा कि संप्रभुता - फैसले लेने का अधिकार, लोगो के हाथों में हो। कार्यकारी दल को चुनी हुई वैधानिक ताकत के प्रति जवाबदेह होना होगा। चुने हुए प्रतिनिधि उन लोगों, जिन्होंने उनको चुना है, उनके प्रति जवाबदेह होना होगा। आम लोगों को नए कानून बनाने और लोक विरोधी कानूनों को नकारने का अधिकार होना होगा।

लोगों का प्रतिनिधित्व अधिनियम (रिप्रेसेन्टेशन आॅफ पीपल्स एक्ट) को हर चुनाव क्षेत्र में लोगों को चुनाव के लिए उम्मीदवार चुनने का हक देना होगा। यह अधिकार केवल कुछ राजनीतिक पार्टियों के हाई कमांड को प्राप्त विशेषाधिकार नहीं रह सकता है। जिन लोगों ने “प्रतिनिधि” को चुना है, उनको इन प्रतिनिधयों को वापस बुलाने का अधिकार भी होना चाहिए। लोगों को नये कानूनों का प्रस्ताव रखने का अधिकार और जनमत के द्वारा उनके हित का उल्लंघन करने वाले किसी भी कानून को रद्द करने का अधिकार होना चाहिए।

वो सभी राजनीतिक ताकतें, जो लोगो के हाथ में सत्ता लाने को इच्छुक हैं उन्हें लोगों के काम करने या रहने के स्थानों में लोक समितियों की स्थापना करने और उनको मजबूत करने का बीड़ा हाथ में लेना चाहिए। इन समितियों को लोगों की समस्याओं से जुड़े हुए संघर्षों को हाथ में लेना चाहिए जैसे कि पीने के पानी व साफ-सफाई की कमी, राशन की उपलब्धता, बिजली कनेक्शन आदि। लोगो को अपने सांझे हितों के लिए, छोटे, संकीर्ण मतभेदों और पार्टी दुश्मनियों से ऊपर उठकर एकजुट होना है। मेहनतकश लोगों के सांझे हितों के इर्द-गिर्द लोगों की एकता बनाने से इन समितियों को लोगों का आदर मिलेगा। ये एक आधुनिक लोकशाही व्यवस्था की नींव बन सकती हैं। एक ऐसी व्यवस्था जिसमें लोग अपने सांझे हितों के लिये सामूहिक फैसले लेने को संगठित होंगे।

पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां, लोगो के हाथ में सत्ता लाने के बिल्कुल खिलाफ हैं। यह इसलिए क्योंकि पंूजीपतियों के हितों और आम मज़दूर-किसान के हितों के बीच, परस्पर तीव्र अंतर्विरोध है। पूंजीपति वर्ग को सिर्फ ऐसी राजनीतिक व्यवस्था और प्रक्रिया की जरूरत है जिसमें मेहनतकश बहुसंख्या सत्ता से वंचित हो।

मजदूर वर्ग और समाज के सभी शोषित वर्गों की राजनीतिक पार्टियों को मिलकर, लोगों को हाथ में सत्ता लाने के संघर्ष को आगे ले जाने की जरूरत है।

कम्युनिस्टों को मौजूदा लोकतांत्रिक व्यवस्था से हर तरह के समझौतों से नाता तोड़कर अपनी एकता को पुनस्र्थापित करना होगा।

केवल एक एकीकृत कम्युनिस्ट नेतृत्व के तले, मजदूरों-किसानों का आधुनिक लोकशाही शासन संभव है जो सब तरह के शोषण और दमन का अंत करके सभी का सुख और सुरक्षा सुनिश्चित करेगा।

हम मजदूर, किसान, महिलाएं, नौजवान, हिन्दोस्तान के विभिन्न राष्ट्रों, राष्ट्रियताओं और आदिवासी समुदायें ही, मिलकर हिन्दोस्तानी समाज को बनाते हैं। यह हमारा अधिकार ही नहीं बल्कि फर्ज़ भी बनता है कि इस मौजूदा लोकतंत्र और राजनीतिक प्रक्रिया में इस तरह के बदलाव लायें जिससे हमारे हाथ में सत्ता का हस्तांतरण हो। जब हिन्दोस्तान में फैसले लेने की ताकत हमारे हाथों मे होगी, तब हम समाज के सभी उत्पादन साधनों को अपने नियंत्रण में ला सकेंगे और अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा देंगे जिससे आम लोगों की सुरक्षा, और खुशहाली सुनिश्चित हो सके।

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Feb 16-29 2020    Voice of the Party    History    Popular Movements     Rights     2020   

पार्टी के दस्तावेज

8 जनवरी, 2020 की सर्व हिन्द आम हड़ताल को सफल करें!

मज़दूर एकता कमेटी का आह्वान

देश की दिशा पूंजीपतियों की अमीरी को बढ़ा रही है और मज़दूर, किसान व सभी मेहनतकशों को ग़रीबी में धकेल रही है। इस रास्ते का विरोध करने के लिए और देश की दौलत पर अपने अधिकार का दावा करने के लिए यह हड़ताल आयोजित की जा रही है।

मेहनतकशों का है यह नारा, हम हैं इसके मालिक! हिन्दोस्तान हमारा!

thumbपूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है। इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को। यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब, मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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