देशभर में सी.ए.ए.-एन.आर.सी. के विरोध में प्रदर्शन जारी

जाफराबाद और उत्तर-पूर्वी दिल्ली में पिछले 4 दिनों से लोगों पर वहशी हमलों के बावजूद, दिल्ली के शाहीन बाग़ के साथ अन्य स्थानों पर सी.ए.ए. के ख़िलाफ़ प्रदर्शन रुकने का नाम नहीं ले रहे हैं। किसी अनहोनी का पूर्वाभास हो रहा है, लोगों के सिरों पर ख़तरा मंडरा रहा है, परन्तु फिर भी तम्बुओं में बैठी महिलाएं और पुरुष अपने लगभग सारे जागते घंटे वहीं बिता रहे हैं और जब तक न्याय के लिये उनकी मांग पूरी नहीं होती वापस घर जाने को तैयार नहीं हैं। वहां बैठी महिलाओं को स्पष्ट है कि हिंसा की वारदातें उनके प्रतिरोध को तोड़ने के लिये की जा रही हैं और यह सुनिश्चित करने के लिये कि और शाहीन बाग़ न क़ामय हो सकें। लेकिन हिंसा यहां के प्रदर्शनकारियों की हिम्मत को नहीं तोड़ सकी है - उन्होंने दृढ़ता से और एकमत से अपना जागरण जारी रखने का फैसला किया है।

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Women protesting peacefully near the Zaffrabad Metro station before communal violence was organised by the State 

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Massive demonstration in Chennai

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Students protesting against CAA-NRC in Trichi

इसी बीच, देश के एक भाग में नहीं तो दूसरे में, बिना रुके विरोध प्रदर्शन जारी हैं।

उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा सी.ए.ए. के खि़लाफ़ प्रदर्शनकारियों पर कातिलाना हमले के दो महीने के बाद भी महिलाएं सी.ए.ए. और एन.आर.सी. के खि़लाफ़ संघर्ष में आगे हैं। शाहीन बाग़ की महिलाओं के जारी संघर्ष से प्रेरित होकर, कानपुर के मोहम्मद अली पार्क में भी, जनवरी की शुरुआत से सरकार के खि़लाफ़ प्रदर्शन जारी है। इस विरोध प्रदर्शन की शुरुआत लोगों के एक छोटे से पार्क में रोज़ शाम को इकट्ठे होने से हुई थी। एक महीने के अन्दर, यह विरोध प्रदर्शन चैबीसों घंटे चलने वाले धरने में परिवर्तित हो गया जिसमें महिलाओं द्वारा भाषण और देश भक्ति के गाने भी शामिल हैं। धर्म के नाम पर नागरिकता देने के मोदी सरकार के निर्णय की सभी ने निन्दा की।

कानपुर के स्थानीय प्रशासन ने जनवरी में इस विरोध प्रदर्शन को कुचलने की बहुत कोशिश की। कम से कम दो बार, वरिष्ठ पुलिस और प्रशासन के अधिकारी पार्क में आये और प्रदर्शनकारियों के द्वारा दिये गए ज्ञापनों को स्वीकार किया - यह एक तरीक़ा है जिससे प्रदर्शनों को बंद किया जाता है। लेकिन इस समय यह तरीक़ा भी नाकाम रहा। महिलाओं ने पार्क में अपने संघर्ष को जारी रखा है।

प्रदर्शनकारियों का क्रोध और विरोध, सी.ए.ए. और एन.आर.सी. पर पहले से जारी है। जी.एस.टी. और नोटबंदी के कारण बहुत से छोटे व्यापारियों का कारोबार ठप्प हो गया, जिसका क्रोध भी लोगों में है।

देश के कई राज्यों में जैसे, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, पंजाब, तमिलनाडु, और पश्चिम बंगाल में आम लोगों ने सड़क पर आकर विशाल प्रदर्शनों द्वारा अपना गुस्सा और विरोध बार-बार दिखाया है।

15 फरवरी को, मुंबई के आज़ाद मैदान में, एक बहुत विशाल प्रदर्शन आयोजित किया गया। विभिन्न समुदायों के लोगों ने इस प्रदर्शन में भाग लिया देश की आदिवासी जनजातियों ने भी इन प्रदर्शनों में बड़ी संख्या में भाग लिया क्योंकि उनके पास अपनी नागरिकता सिद्ध करने के लिए कोई दस्तावेज़ नहीं हैं और वे अपने को बहुत ही असुरक्षित महसूस कर रहे हैं ।

15 फरवरी को पंजाब के संगरूर जिले में मलेरकोटला की अनाज मंडी में, सी.ए.ए. के खि़लाफ़ एक बहुत ही विशाल जुलूस निकाला गया। इस विरोध प्रदर्शन में अनेक मुस्लिम संगठनों ने भारतीय किसान यूनियन (एकता उग्रहण) और पंजाब खेत मज़दूर यूनियन जैसे किसान संगठनों और पंजाब स्टूडेंट्स यूनियन जैसे विद्यार्थी संगठनों के साथ मिलकर इस विरोध प्रदर्शन को आयोजित किया। भारत बचाओ दलित मंच ने एक और विरोध प्रदर्शन आयोजित किया जो देश भगत यादगार हाल से शुरू हुआ और अगले तीन घंटों तक इस इलाके में सब कुछ बंद रहा।

मध्य प्रदेश में जनवरी के अंत में, बरवानी में एक बहुत बड़े विरोध प्रदर्शन को आयोजित किया गया। बुरहानपुर और खार्गोने में भी विरोध प्रदर्शन आयोजित किये गए। इन विशाल जुलूसों और विरोध प्रदर्शनों के कारण मध्य प्रदेश सरकार को सी.ए.ए. के खि़लाफ़ एक प्रस्ताव को पारित करने के लिए मजबूर होना पड़ा।

तमिलनाडु में भी 14 फरवरी को चेन्नई में प्रदर्शनकारियों के खि़लाफ़ बर्बर पुलिस हमले के बाद पूरे राज्य में, सी.ए.ए. के खि़लाफ़ मुहिम को और भी सहयोग और सहायता की संभावनाएं बढ़ी हैं। राज्य के कई और क्षेत्रों में जैसे कन्याकुमारी, कोयंबटूर, इरोड, थिरुवान्नामलाई और चेन्नई में और कई स्थानों पर विरोध प्रदर्शन आयोजित किये गए। लोगों ने साथ आकर सी.ए.ए. को वापस लेने और तमिलनाडु विधानसभा में सी.ए.ए. के खि़लाफ़ प्रस्ताव पारित करने की मांगें उठाई हैं।

पश्चिम बंगाल में सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस और कई अन्य कार्यकर्ताओं, कलाकारों ने मिलकर, सी.ए.ए. के खि़लाफ़ विरोध प्रदर्शनों और मोर्चों में भाग लिया। सभी जगह पर, प्रदर्शनकारियों ने सभी समुदायों को एक साथ मिलाकर सी.ए.ए. के खि़लाफ़ इस मुहिम में शामिल करने का प्रयत्न किया है जिससे सरकार के झूठे प्रचार का पर्दाफ़ाश किया जा सके कि यह मुद्दा हिन्दू और मुस्लिम मतभेदों का है। इस मुद्दे पर सभी मिलकर इसका विरोध कर रहे हैं।

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Mar 1-15 2020    Struggle for Rights    Rights     2020   

पार्टी के दस्तावेज

8 जनवरी, 2020 की सर्व हिन्द आम हड़ताल को सफल करें!

मज़दूर एकता कमेटी का आह्वान

देश की दिशा पूंजीपतियों की अमीरी को बढ़ा रही है और मज़दूर, किसान व सभी मेहनतकशों को ग़रीबी में धकेल रही है। इस रास्ते का विरोध करने के लिए और देश की दौलत पर अपने अधिकार का दावा करने के लिए यह हड़ताल आयोजित की जा रही है।

मेहनतकशों का है यह नारा, हम हैं इसके मालिक! हिन्दोस्तान हमारा!

thumbपूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है। इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को। यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब, मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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