अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस, 2020 :

हिन्दोस्तान की संघर्षरत महिलाओं को लाल सलाम!

लोगों को सत्ता में लाने के संघर्ष को आगे बढ़ायें!

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति का बयान, 1 मार्च, 2020

इस वर्ष, अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस, 8 मार्च ऐसे समय पर आ रहा है जब हमारी लाखों-लाखों बहनें सड़कों पर उतर आयी हैं। गोद में छोटे बच्चों को लेकर माताएं, नानियाँ, दादियाँ, युवतियां, छात्राएं, शिक्षक, सभी इनमें शामिल हैं। दिल्ली, अलीगढ़, लखनऊ, गया, जयपुर, कोलकाता, पटना और प्रयागराज में महिलाएं दिसंबर और जनवरी की कड़ाके की ठण्ड में, अपने परिजनों व समर्थकों के साथ धरने पर बैठी रही हैं। देश के अनेक शहरों में भी, मुंबई, बेंगलुरु, चेन्नई, हैदराबाद, मंगलौर और नागरकोयल में, हमारी बहनों ने धरने आयोजित किये हैं। देशभर में महिलाएं यह मांग कर रही हैं कि राज्य धर्म के आधार पर भेदभाव किये बिना, सभी इंसानों के अधिकारों का आदर करे और उनकी रक्षा करे।

महिलाएं और नौजवान सड़कों पर उतरकर यह मांग कर रहे हैं कि इस मुल्क के नागरिक होने के नाते, हम सबको इंसान लायक इज्ज़तदार जीवन जीने का अधिकार हो। वे मांग कर रहे हैं कि नागरिकता संशोधन अधिनियम-2019 (सी.ए.ए.) को वापस लिया जाये।

हुक्मरानों ने नफ़रत भरा सांप्रदायिक अभियान चला रखा है, जिसमें सभी मुसलमानों को और सी.ए.ए. का विरोध करने वाले सभी लोगों को गद्दार बताया जा रहा है, परन्तु हमारी महिलायें और नौजवान अपनी मांग पर डटे रहे हैं और अपने संघर्ष को चलाये जा रहे हैं। हमारे संघर्ष को तोड़ने, बदनाम करने और ख़त्म करने के लिए, हुक्मरानों ने हिंसा और अराजकता फैलाने की तमाम कोशिशें कीं, लेकिन वे हमें रोकने में नाकामयाब रहे। हमारी हिम्मत और हौसले से डरकर, हुक्मरानों ने भीषण सांप्रदायिक क़त्लेआम और हिंसा आयोजित की। पर हमारा आन्दोलन अभी भी बुलंद है। इस संघर्ष के दौरान, हमारी बहनों ने बेमिसाल दृढ़ता और संगठन का परिचय दिया है।

हमारे देश की महिलाओं ने राज्य द्वारा आयोजित सांप्रदायिक हिंसा और राजकीय आतंकवाद के खि़लाफ़ संघर्ष में अगुवा भूमिका अदा की है। मणिपुर, कश्मीर, छत्तीसगढ़ आदि में, जहां सुरक्षा बल राजनीतिक जन संघर्ष को कुचलने के लिए बलात्कार का हथकंडा अपनाते हैं, वहां महिलाएं इन्साफ के लिए संघर्ष कर रही हैं।

1991 में जब उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण का कार्यक्रम शुरू किया गया था, तब उसका विरोध करने में हमारे देश की महिलाएं आगे थीं। आज कामकाजी महिलाएं संगठित होकर, बड़ी सक्रियता के साथ, आर्थिक हमलों के खि़लाफ़ संघर्ष कर रही हैं - बैंकों में, वस्त्र उद्योग में, शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में, आशा और आंगनवाड़ी कर्मी बतौर तथा तमाम प्रकार की सेवाओं में। पूंजीवादी कंपनियों द्वारा किसानों की लूट और केंद्र व राज्य सरकारों के उदारीकरण की नीतियों के खि़लाफ़, करोड़ों महिलाएं संघर्ष कर रही हैं।

आज महिलाओं और नौजवानों का गुस्सा सड़कों पर फूट पड़ा है। धर्म के आधार पर लोगों को बांटने वाला नागरिकता संशोधन कानून, देशभर में नागरिकों की राष्ट्रीय पंजी बनाने का प्रस्ताव और आन्दोलनकारी छात्रों पर बेरहम पुलिस हिंसा व आतंक के चलते, हमारी बहनें और नौजवान अब इसे और बर्दाश्त करने को तैयार नहीं हैं।

हिन्दोस्तान और दुनियाभर में, नस्लवाद और हर प्रकार की सांप्रदायिक हिंसा के खि़लाफ़ संघर्ष में महिलाएं आगे हैं। बढ़ते पूंजीवादी शोषण और लूट के खि़लाफ़, विनाशकारी साम्राज्यवादी जंग के खि़लाफ़ संघर्ष में महिलाएं सक्रिय हैं। जनता की खुशहाली और राष्ट्रों की संप्रभुता को ख़तरे में डालते हुए, इजारेदार पूंजीपतियों के मुनाफ़ों को अधिक से अधिक करने के लिए जो निजीकरण और व्यापार संधियां की जा रही हैं, उनके खि़लाफ़ महिलाएं जमकर संघर्ष कर रही हैं। महिलाएं वर्तमान लोकतंत्र पर सवाल उठा रही हैं, जिसके चलते हमारी भूमिका कुछ-कुछ सालों बाद वोट डालने तक सीमित रहती है। जबकि इजारेदार पूंजीपतियों के कार्यक्रम को लागू करने के लिए उन्हीं के पैसों से समर्थित एक या दूसरी पार्टी सत्ता चलाने आ जाती है।

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी देश और दुनिया में, पूंजीवादी हुक्मरानों के आर्थिक और राजनीतिक हमलों के खि़लाफ़ और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रही महिलाओं को लाल सलाम करती है!

हमारे देश की महिलाएं यह समझ रही हैं कि संविधान के पूर्वकथन में जो वादे किये गए हैं, और जीवन की जो हक़ीक़त है, इन दोनों के बीच में बहुत अंतर है। संविधान के पूर्वकथन में न्याय, आज़ादी, बराबरी और भाईचारे के वादे किये गए हैं, जबकि हक़ीक़त में हमें अन्याय, अत्याचार, गैर-बराबरी और राज्य द्वारा आयोजित सांप्रदायिक हिंसा ही मिलती है।

समस्या सिर्फ उन पार्टियों की ही नहीं है जो अपने तंग हितों के लिए अपराध करती हैं। समस्या यह है कि संविधान के अनुसार फैसले लेने की ताक़त सत्तासीन पार्टी के मंत्रीमंडल के हाथों में ही है, और सत्ता पर सिर्फ वही पार्टी आ सकती है जिसे हुक्मरान इजारेदार पूंजीपति वर्ग का संमर्थन प्राप्त है। संविधान को पढ़कर ऐसा लगता है कि “हम हिन्दोस्तान के लोग” फ़ैसले लेते हैं, जबकि फैसले लेने की ताक़त प्रधानमंत्री की अगुवाई में बने मंत्रीमंडल के हाथों में केन्द्रित है और राष्ट्रपति मंत्रीमंडल की सलाह मानने को बाध्य हैं।

इसके अलावा, सरकार को पूर्वकथन में किये गए वादों को और नीति-निदेशक तत्वों को लागू करने के लिए, कानूनी तौर पर बाध्य नहीं किया जा सकता है। कोई भी नागरिक इन वादों को अपना अधिकार मानकर, इन्हें लागू कराने के लिए अदालत नहीं जा सकता है। संविधान यह सुनिश्चित नहीं करता है कि हमारे अधिकारों का हनन नहीं होगा। संविधान के हर अनुच्छेद के साथ एक अपवाद का अनुच्छेद भी है, जिसके ज़रिये राज्य “राष्ट्रीय सुरक्षा को ख़तरा” या “न्याय-व्यवस्था को ख़तरा” के नाम पर हमारे “मौलिक” अधिकार का हनन कर सकता है।

संविधान और जन प्रतिनिधित्व कानून के द्वारा जिस राजनीतिक प्रक्रिया को वैधता दी जाती है, यह बेहद अपराधपूर्ण है। इस प्रक्रिया पर वही पार्टियां हावी हैं जिन्हें हिन्दोस्तानी और विदेशी इजारेदार पूंजीपतियों के धनबल का समर्थन प्राप्त है। इजारेदार पूंजीपति चुनावों के नतीजे को निर्धारित करने पर ढेर सारा धन खर्च करते हैं। लोगों को जिन प्रतिस्पर्धी पार्टियों के बीच में चुनना पड़ता है, वे पार्टियां इजारेदार पूंजीपतियों द्वारा तय किये गए कार्यक्रम को लागू करने के लिए आपस में स्पर्धा करती हैं। जब लोग बढ़ते शोषण-दमन और बंटवारे की राजनीति का विरोध करते हैं, तो उन पर लाठियां बरसाई जाती हैं और गोली चलायी जाती है। सरकार के कारनामों पर सवाल उठाने वालों को राष्ट्र-विरोधी करार दिया जाता है और उन पर राजद्रोह का आरोप लगाया जाता है। यह सब संविधान के प्रावधानों के अनुसार किया जाता है।

हमारे संघर्ष का अनुभव यह साबित करता है कि महिलाओं के शोषण-दमन की जड़ पूंजीवाद की आर्थिक व्यवस्था है। वर्तमान राज्य और उसका संविधान पूंजीवादी व्यवस्था की हिफ़ाज़त करते हैं। पूंजीवाद के चलते, मानव श्रम के शोषण, छोटे उत्पादकों की लूट और प्राकृतिक संसाधनों की लूट-खसोट के ज़रिये मुट्ठीभर शोषक निजी संपत्ति का संचय करते हैं। श्रम के शोषण पर आधारित इस व्यवस्था में महिलाओं का, घर के अन्दर और बाहर, अतिशोषण होता है। जो महिलाएं राज़ी-रोटी के लिए श्रम करती हैं, उनका दोहरा शोषण होता है, श्रमिक बतौर और महिला बतौर।

यह स्पष्ट है कि पूंजीवाद महिलाओं को इस अत्याचार से मुक्ति नहीं दिला सकता है। पूंजीवाद सभी को सुरक्षित रोज़ी-रोटी नहीं दिला सकता है। पूंजीवाद एक असहनीय व्यवस्था है, जो हमें एक संकट से दूसरे संकट की ओर धकेलती रहती है। महिलाओं को अपने उद्धार के लिए मज़दूर वर्ग और सभी दबे-कुचले लोगों के साथ एकजुट होकर, पूंजीवाद को समाजवाद में तब्दील करने के लिए संघर्ष करना होगा, ताकि कुछ इंसानों द्वारा बाकी इंसानों के शोषण का आधार ही ख़त्म हो जाये।

महिलाओं समेत, देश के सभी शोषित-उत्पीड़ित लोगों के संघर्षों को एक उद्देश्य के इर्द-गिर्द ले आना ही आगे का रास्ता है। यह उद्देश्य है लोगों को सत्ता में लाना। महिलाओं को राजनीतिक सत्ता की ज़रूरत है, ताकि शोषण-दमन को ख़त्म किया जाए और अधिकारों को सुनिश्चित किया जाये। मज़दूरों और किसानों को राज्य सत्ता की ज़रूरत है ताकि वर्ग बतौर शोषण और जातिवादी भेदभाव को ख़त्म किया जाये।

हमें एक ऐसे संविधान की ज़रूरत है जो संप्रभुता, यानी फैसले लेने की सर्वोच्च ताक़त, को लोगों के हाथों में दिलाएगा। हमें उस संविधान में मानव अधिकारों और जनवादी अधिकारों के लिए संवैधानिक गारंटी की ज़रूरत है। हमें अर्थव्यवस्था को नयी दिशा दिलानी होगी ताकि मेहनतकशों को अपने श्रम का फल मिल सके। लोगों की ज़रूरतों को पूरा करना ही सामाजिक उत्पादन का उद्देश्य होना चाहिए, न कि पूंजीपतियों की लालच को पूरा करना।

संविधान और जन प्रतिनिधित्व कानून को यह सुनिश्चित करना होगा कि चुने गए प्रतिनिधि मतदाताओं के प्रति जवाबदेह हों। इसके लिए, राजनीतिक प्रक्रिया में प्रमुख परिवर्तनों की ज़रूरत है। हर चुनाव से पहले, लोगों को उम्मीदवारों का चयन करने, उम्मीदवारों को मनोनीत करने या ख़ारिज करने का अधिकार होना चाहिए। लोगों को चुने गए प्रतिनिधियों को किसी भी समय पर वापस बुलाने का अधिकार होना चाहिए। लोगों को कानून प्रस्तावित करने और किसी प्रस्तावित कानून को जनमतसंग्रह के ज़रिये स्वीकार करने या खारिज़ करने का अधिकार होना चाहिए।

चयन और चुनाव की प्रक्रिया पर राज्य की निगरानी होनी चाहिए, उसके लिए राज्य को ही धन देना चाहिये। चुनाव अभियानों के लिए किसी अन्य धन स्रोत की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। 

महिलाओं को अपने मुहल्लों और कार्यस्थलों पर संगठित होना होगा। महिलाओं को सभी प्रकार के शोषण को ख़त्म करने के लिए, मज़दूर वर्ग के क्रान्तिकारी आन्दोलन के हिस्सा बतौर संगठित होना होगा। हम मेहनतकश महिलाओं और पुरुषों, छात्रों और छात्राओं को अपने-अपने कार्यस्थलों, कैंपसों और रिहायशी इलाकों में, अपनी समितियां बनानी होंगी। अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करते हुए, हमें हुक्मरान बनने की तैयारी करनी होगी।

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर महिलाएं फिर से प्रण लेती हैं कि एक ऐसी नयी दुनिया के लिए संघर्ष करेंगी जिसमें शोषण और दमन नहीं होंगे, नाजायज़ जंग नहीं होंगे, लिंग, जाति, धर्म या नस्ल के आधार पर इंसानों में भेदभाव नहीं होगा।

आइये बहनों, हम एकजुट होकर संघर्ष करें हिन्दोस्तान के नव-निर्माण के लिए, एक आधुनिक जनवादी राज्य के लिए, जिसमें संप्रभुता लोगों के हाथों में होगी! पूंजीवाद का तख्तापलट करने के लिए हम एकजुट हों, ताकि सामंतवाद और उपनिवेशवाद के अवशेषों को ख़त्म किया जा सके और साम्राज्यवाद का विरोध किया जा सके! क्रांति के ज़रिये समाजवाद का निर्माण करने के लिए हम एकजुट हों!

सामाजिक प्रगति के लिए संघर्ष करने वाली सभी महिलाओं से हम आह्वान करते हैं कि हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की सदस्य बनें। हिन्दोस्तान के नव-निर्माण के लिए और समाजवाद व कम्युनिज़्म की फतह के लिए, मज़दूर वर्ग के क्रांतिकारी आन्दोलन को मजबूत करें!

हिन्दोस्तान में महिलाएं पुरानी बर्बर परंपराओं की और आधुनिक पूंजीवादी शोषण की शिकार बनती हैं जैसा कि निम्नलिखित तथ्यों से देखा जा सकता है :

15 से 59 वर्ष की उम्र की श्रेणी में, महिलाओं को स्वास्थ्य सेवा और पोषक तत्वों में कमी के कारण प्रत्येक 1000 पुरुषों पर महिलाओं की संख्या सिर्फ 944 है। 6 वर्ष से कम उम्र के लिये यह लिंग अनुपात और भी खराब है और प्रत्येक 1000 लड़कों पर सिर्फ 918 ही लड़कियां हैं। यह लड़कियों की या गर्भ में बच्चियों की हत्याओं की वजह से है।

हिन्दोस्तान में प्रसव के दौरान मातृ मृत्यू दर अभी भी बहुत ज्यादा है। पैदा होने वाले एक लाख बच्चों के लिये 174 मांओं की मृत्यु हो जाती है, जिसकी तुलना में पाकिस्तान और बांग्लादेश की मातृ मृत्यु दर से की जा सकती है जो क्रमशः 178 और 176 हैं। हिन्दोस्तान की मातृ मृत्यु दर भूटान, श्री लंका, फिलीपींस और इंडोनेशिया से बहुत अधिक है।

शहरी हिन्दोस्तान में 84 प्रतिशत पुरुष साक्षरता के मुक़ाबले महिलाओं की साक्षरता सिर्फ 75 प्रतिशत है। इस आंकड़े के तहत केवल अपना नाम लिख पाने वाले को साक्षर माना गया है। जो कि साक्षरता की बहुत ही निचले स्तर की परिभाषा पर आधारित है। ग्रामीण हिन्दोस्तान में यह आंकड़ा और भी कम है - 72 प्रतिशत पुरुषों के मुकाबले मात्र 57 प्रतिशत महिलाएं साक्षर हैं।

समान वेतन का लक्ष्य बहुत ही दूर है; औसतन महिलाओं को पुरुषों के मुक़ाबले करीब 25 प्रतिशत कम वेतन मिलता है।

जो महिलाएं घर के बाहर सामाजिक श्रम करती हैं, उनमें अधिकांश को वेतनभोगी मज़दूरों के अधिकार भी प्राप्त नहीं हैं, प्रसव अवकाश व कार्यस्थलों पर बच्चों के देख-रेख की सुविधा जैसे महिला होने नाते अधिकारों की तो बात ही अलग है।

रात की पारी में हस्पतालों, बी.पी.ओ., आई.टी. कंपनियों तथा होटलों जैसी सेवाओं में काम करने वाली लाखों महिलाओं को यौन हिंसा के ख़तरों से हर दिन जूझना पड़ता है। उनकी सुरक्षा के लिये राज्य ज़िम्मेदारी नहीं लेता।

बलात्कार, अपहरण, दहेज के लिये हत्यायें और तस्करी जैसे अपराध महिलाओं के खि़लाफ़ साल दर साल बढ़ते जा रहे हैं। हर तीन मिनट में हिन्दोस्तान में किसी महिला के खि़लाफ़ एक अपराध होता है। दहेज पर महिलाओं की हत्याएं भी रुकने का नाम नहीं ले रही हैं।

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Mar 1-15 2020    Statements    Popular Movements     Rights     2020   

पार्टी के दस्तावेज

8 जनवरी, 2020 की सर्व हिन्द आम हड़ताल को सफल करें!

मज़दूर एकता कमेटी का आह्वान

देश की दिशा पूंजीपतियों की अमीरी को बढ़ा रही है और मज़दूर, किसान व सभी मेहनतकशों को ग़रीबी में धकेल रही है। इस रास्ते का विरोध करने के लिए और देश की दौलत पर अपने अधिकार का दावा करने के लिए यह हड़ताल आयोजित की जा रही है।

मेहनतकशों का है यह नारा, हम हैं इसके मालिक! हिन्दोस्तान हमारा!

thumbपूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है। इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को। यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब, मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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