धारा 144 - शांतिपूर्ण सभा करने के अधिकार पर हमला:

धारा 144 - एक बस्तीवादी अवशेष जिसे तुरंत हटाया जाना चाहिए!

केंद्र और राज्य सरकारें बिना किसी जांच पड़ताल के लोगों को शांतिपूर्वक सभा करने के बुनियादी अधिकार से वंचित करने के लिए लगातार भारतीय दंड संहिता (आई.पी.सी.) की धारा का इस्तेमाल करती आई हैं।

नागरिकता संशोधन अधिनियम (सी.ए.ए.) विरोधी प्रदर्शनों के दौरान बेंगलुरु में 19-21 दिसंबर, 2019 के बीच पुलिस कमिश्नर ने जिला मजिस्ट्रेट की भूमिका लेते हुए, पूरे शहर में धारा 144 लगाई थी।

इस क़दम के समर्थन में यह तर्क पेश किया गया कि इस धारा के तहत एक जिला मजिस्ट्रेट (डी.एम.) “मौजूदा तथ्यों का जिक्र करते हुए एक लिखित आदेश के द्वारा किसी भी व्यक्ति को कानून द्वारा नियुक्त किसी अधिकारी के काम में बाधा डालने, उसे परेशान करने, उसको कोई नुकसान पहुंचाने, किसी व्यक्ति की जान, स्वास्थ्य या सुरक्षा को ख़तरा पैदा करने, शांति भंग करने, दंगे भड़काने या हंगामा खड़ा करने” से रोकने के लिए कार्यवाही कर सकता है।

बाद में कर्नाटक उच्च न्यायालय की प्रमुख खंडपीठ ने इस आदेश को गैरकानूनी करार दिया क्योंकि जिस ख़तरे का सरकार ने दावा किया था वह तात्कालिक तौर पर मौजूद नहीं था। न्यायालय ने यह भी ऐलान किया कि लोगों के जायज़ विचारों, शिकायतों को प्रकट करने या जनतांत्रिक अधिकारों का उपयोग करने से रोकने के लिए इस कानून का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

धारा 144 के लागू होने पर, प्रभावित इलाके में 3 से अधिक लोगों को इकट्ठा होने पर पाबंदी लग जाती है। इससे सरकार को किसी भी नागरिक के साथ एक गुनहगार की तरह बर्ताव करने की अनुमति मिल जाती है, क्योंकि किसी भी तरह की सभा गैरकानूनी बन जाती है, भले ही वह शांतिपूर्ण ही क्यों न हो। दरअसल, यदि कोई पुलिस अधिकारी यह मानता है कि कोई व्यक्ति इस धारा के तहत “गैरकानूनी सभा” में हिस्सा ले रहा है, तो क्रिमिनल प्रोसीजर कोड (सी.आर.पी.सी.) की धारा 151 पुलिस को ऐसे व्यक्ति को बिना किसी वारंट के गिरफ़्तार करने का अधिकार देती है।

लोगों की आवाज़ को दबाने के लिए बनाए गए राज्य के इन तमाम कानूनों के बावजूद यदि कोई नागरिक किसी विरोध प्रदर्शन में शामिल होने की हिम्मत करता है तो उसको कड़ी सज़ा हो सकती है। इस तरह के विरोध प्रदर्शन में शामिल होने पर सी.आर.पी.सी. की धारा 143, 145 146, 147, 149, 150 और 151 भी लागू हो जाती हैं, जिनके तहत बेगुनाह, निहत्थे आदमियों, औरतों और बच्चों को भी दो वर्ष की कड़ी सज़ा दी जा सकती है।

चूंकि जिला मजिस्ट्रेट कार्यपालिका के प्रति जवाबदेह होता है, सत्ताधारी पार्टी अक्सर इस काले कानून का इस्तेमाल करती है और जिला मजिस्ट्रेट पर इस कानून के तहत कार्यवाही करने के लिए दबाव डालती है।

उदाहरण के लिए 21 मई, 2018 में तमिलनाडु के तूतीकोड़िन में धारा 144 लागू की गयी थी। इस धारा के लागू किये जाने के बाद पुलिस की गोलीबारी में 13 बेगुनाह लोगों की जानें गयीं और सैकड़ों बुरी तरह से घायल हो गए। इस शहर के लोग लंबे समय से वेदांता कॉपर स्मेल्टर प्लांट, स्टरलाईट के खि़लाफ़ संघर्ष कर रहे थे, जो वहां के पानी और हवा को प्रदूषित कर रहा था। इस बहुराष्ट्रीय कंपनी ने जिला मजिस्ट्रेट से मांग की कि इस इलाके में धारा 144 लागू की जाये क्योंकि संघर्ष कर रहे लोगों से तथाकथित तौर पर उनके कर्मचारियों, प्लांट और मशीनों को ख़तरा था। जब जिला मजिस्ट्रेट ने ऐसा करने से इंकार कर दिया, तो कंपनी ने मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरई खंडपीठ पर दबाव डाला कि वह जिला मजिस्ट्रेट को धारा 144 लागू करने का आदेश जारी करे। संघर्ष कर रहे लोगों द्वारा बांटे जा रहे एक साधारण पर्चे के आधार पर कोर्ट इस नतीजे पर पहुंचा कि वहां कानून और व्यवस्था की स्थिति बिगड़ने की संभावना है। कोर्ट ने जिला मजिस्ट्रेट को आदेश दिया कि वह शहर में धारा 144 लागू करे, वर्ना जिला मजिस्ट्रेट “अपना फर्ज़ न निभाने” का गुनहगार होगा, और “कोर्ट संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत कार्यवाही करने को मजबूर हो जायेगा”। अब विडंबना ऐसी है कि जब लोगों के बुनियादी अधिकार ख़तरे में हों तो संविधान का अनुच्छेद 226 कोर्ट को उन अधिकारों को लागू करवाने का अधिकार देता है! लेकिन इस मामले में उच्च न्यायालय ने इसी अनुच्छेद का इस्तेमाल लोगों को विरोध प्रदर्शन करने और सभा करने के बुनियादी अधिकार से वंचित करने के लिए किया।

उत्तर प्रदेश में मुरादाबाद जिला प्रशासन ने सी.ए.ए. विरोधी प्रदर्शनों में शामिल लोगों पर इस धारा का इस्तेमाल किया और “धारा 144 का उल्लंघन करने” के ज़ुर्म में उनको गिरफ़्तार किया और उनपर भारी जुर्माना लगाया। मुरादाबाद के अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट द्वारा जारी एक नोटिस में कहा गया है “रैपिड एक्शन फोर्स की एक टुकडी और पी.ए.सी. की आधी टुकडी को प्रदर्शन स्थल पर तैनात किया गया। इसका प्रतिदिन खर्च 13.42 लाख रुपये है... और सुरक्षा बलों पर कुल खर्च 1,04,08,693 रुपये है।” लोगों को बुनियादी अधिकारों से वंचित करने के लिए प्रशासन द्वारा इस तरह का बेतुका तर्क पेश किया जा रहा है!

चेन्नई में पुलिस कह रही है कि प्रदर्शन करने के लिए नागरिकों को पुलिस की “इजाज़त” लेने के लिये अर्जी देनी होगी। हाल ही में चेन्नई में पुलिस ने मद्रास सिटी पुलिस (एम.सी.पी.) अधिनियम 1888 की धारा 41 का इस्तेमाल करते हुए सी.ए.ए. विरोधी प्रदर्शनों में हिस्सा ले रहे सैकड़ों लोगों को गिरफ़्तार किया। यह बर्तानवी बस्तीवादियों द्वारा बनाया गया एक कानून है। जिसका इस्तेमाल बर्तानवी हुकूमत के खि़लाफ़ आवाज़ उठाने वालों को बेरहमी से कुचलने के लिए किया जाता था। इस कानून के तहत अक्सर, केवल प्रदर्शन का नाम सुनते ही, प्रदर्शन को धमकाने और उसे तोड़ने के लिए प्रदर्शनकारियों से भी बड़ी तादाद में पुलिस को भेजा जाता है। हाल ही में चल रहे सी.ए.ए. विरोधी प्रदर्शनों के दौरान महिलाओं को भी नहीं बक्शा गया और घर के सामने रंगोली बना रही महिलाओं को भी पुलिस ने गिरफ़्तार किया।

जब धारा 144 लागू कर दी जाती है तो उसके तहत पीड़ित लोगों के साथ गुनहगारों जैसे सुलूक किया जाता है। 26 फरवरी को गोलीबार और आगजनी की वजह से कई लोगों की जानें गयीं और दिल्ली पुलिस ने धारा 144 लागू की। एक समाचार एजेंसी ने रिपोर्ट किया “...‘अब एक महीने तक सीलमपुर में धारा 144 लागू है। यहां कोई नज़र नहीं आना चाहिए। आज हम शराफत से समझा रहे हैं, लेकिन बाद में सख़्ती की जाएगी। यहां की सारी दुकानें बंद कर दो।’... यह ऐलान पुलिस ने इलाके में गश्त लगाते हुए किया।  

यह भी सच है कि धारा 144 कुछ खास लोगों पर ही लगायी जाती है। यह धारा तब नहीं लगायी जाती जब भाजपा के नेताओं की अगुवाई में उसके गुंडे सी.ए.ए. के समर्थन में पूरे शहर में जहां-तहां रैलियां आयोजित करते हैं, लेकिन जब शांति प्रिय प्रदर्शनकारी निर्धारित जगह पर प्रदर्शन आयोजित करते हैं तो तुरंत धारा 144 लगा दी जाती है। 6 दिसंबर, 1992 को धारा 144 नहीं लगाई गयी थी, बल्कि बाबरी मस्जिद को गिराए जाने से ठीक पहले इस धारा को हटाया गया था।

धारा 144 संविधान के अनुच्छेद 19(बी) के तहत दिए गए इकट्ठा होने के बुनियादी अधिकार का उल्लंघन इसी अनुच्छेद में दिए गए प्रतिबंध उपखंड के तहत इस तरह से किया जाता है “अनुच्छेद में दी गयी कोई भी बात किसी भी मौजूदा कानून के प्रयोग को प्रभावित नहीं करेगी या फिर राज्य को भारत की संप्रभुता और अखंडता या सार्वजनिक व्यवस्था के हित में किसी भी अधिकार के प्रयोग पर उचित प्रतिबंध लगाने से नहीं रोकेगी...”

सर्वोच्च न्यायालय और कई उच्च न्यायालयों द्वारा दिए गए कई फैसलों में उचित प्रतिबंध लगाये जाने की संवैधानिक वैधता को स्वीकार किया गया है, क्योंकि यह प्रावधान संविधान द्वारा ही लगाया गया है। इन न्यायालयों ने इस कानून को निरस्त करने से इंकार करते हुए तर्क दिया है कि किसी कानून का दुरुपयोग उसे निरस्त करने का आधार नहीं हो सकता!

जबकि संविधान का पूर्वकथन आज़ादी और स्वतंत्रता की बात करता है और बुनियादी अधिकारों पर इसके कई अनुच्छेद नागरिकों के लिए जीवन, स्वतंत्रता, इकट्ठा होने, धर्म और ज़मीर के अधिकार देने का ऐलान करते हैं, अभ्यास में इन अधिकारों का उल्लंघन होता है। बुनियादी अधिकारों के उल्लंघन को सी.आर.पी.सी. की धारा 144 सहित मौजूदा कई कानून वैधता प्रदान करते हैं।

संविधान इस बात पर आधारित है कि बुनियादी अधिकारों पर उचित प्रतिबंध लगाये जा सकते हैं और देश की सुरक्षा पर ख़तरे की हालत में इन अधिकारों को बर्खास्त किया जा सकता है। केंद्र व राज्य सरकारें अपनी मनमर्ज़ी से जब चाहें देश की सुरक्षा को ख़तरा बताकर, बड़ी बेरहमी से खुल्लम-खुल्ला लोगों को बुनियादी अधिकारों से वंचित करने की सफाई देती हैं।

धारा 144 मौजूदा कानून व्यवस्था के अनेक जनतंत्र-विरोधी प्रावधानों में से एक है जो हमें बर्तानवी बस्तीवादियों से विरासत में मिले हैं। लोगों के किसी भी तबके के संघर्ष को कुचलने के लिए हमारे देश के हुक्मरान पूंजीपति वर्ग के हाथ में धारा 144 एक हथियार है। वैसे तो दिखने में ऐसा लगता है कि यह कानून हर तरह की जनसभा के आयोजन पर रोक लगाने के लिए बनाया गया है, लेकिन असलियत में यह कानून उन लोगों को इकट्ठा होने से रोकने के लिए बनाया गया है जो सत्ता में बैठे लोगों के खि़लाफ़ अपनी आवाज़ उठाते हैं। पुलिस यह कानून उन गुनहगार गुंडों के खि़लाफ़ कभी इस्तेमाल नहीं करती जो सत्ताधारी वर्ग के क़रीब होते हैं, भले ही उस समय धारा 144 क्यों न लागू हो, और इन गुनहगार गुंडों ने हिंसक वारदातें क्यों न की हों। 

धारा 144 क्या है?

1857 के ग़दर के बाद बर्तानवी राजघराने ने हिन्दोस्तान की सत्ता की बागडोर ईस्ट इंडिया कंपनी से अपने हाथों में ले ली थी। 1861 में बर्तानवी संसद में क्रिमिनल प्रोसीजर कोड (सी.आर.पी.सी.) पारित किया गया। आई.पी.सी 1860 को मजबूत बनाने के लिए इस सी.आर.पी.सी. के अधिकांश प्रावधान हिन्दोस्तान में भी तुरंत लागू किये गए। 1947 के बाद हिदोस्तानी राज्य ने 1973 में अपना सी.आर.पी.सी. बनाया और यह अप्रैल 1974 से लागू हो गया। 1973 में बने सी.आर.पी.सी. का अधिकांश हिस्सा 1861 के कानून से लिया गया था। 1861 के बर्तानवी बस्तीवादी कानून से धारा 144 को बरकरार रखा गया और कई बार इस कानून का इस्तेमाल लोगों के विरोध को कुचलने के लिए किया जाता रहा है।

धारा 144 के तहत ये प्रतिबंध किसी इलाके या पूरे शहर में लागू किये जा सकते हैं। कानून और व्यवस्था बनाये रखने के लिए धारा 144 में जो अधिकार प्रशासन को दिए गए हैं वे सर्वोपरि हैं। उनको चुनौती नहीं दी जा सकती।

एक बार किसी इलाके में धारा 144 लागू कर दी जाती है तो कोई भी नागरिक सार्वजनिक स्थल पर किसी भी तरह का हथियार नहीं रख सकता जिसमें शामिल हैं लाठी, धातु की धार-दार वस्तु, इत्यादि। धारा 144 का उल्लंघन करने से 3 साल तक की सज़ा हो सकती है।

आम तौर से धारा 144 दो महीनों के लिए लगाई जा सकती है, लेकिन उसे किस भी समय वापस लिया जा सकता है, जहां प्रशासन यह मानता है कि स्थिति सामान्य हो गयी है। यदि सरकार चाहे तो धारा 144 के तहत लगाये गए प्रतिबंध को दो महीने से अधिक समय के लिए बढ़ा सकती है, लेकिन एक समय में यह अवधि 6 महीने से अधिक नहीं हो सकती।

दिल्ली में जंतर-मंतर और चेन्नई में मरीना बीच जैसे स्थानों को बढ़ते तौर पर लोगों की पहुंच से बाहर किया जा रहा है, जहां लोग पारंपरिक तौर से प्रदर्शन करते आ रहे हैं। दिल्ली में ऐसे भी इलाके हैं जहां पूरा साल धारा 144 लागू रहती है, जैसे संसद भवन संकुल, सुप्रीम कोर्ट और कुछ अन्य इलाके।

 

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Mar 16-31 2020    Struggle for Rights    Rights     2020   

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