दिल्ली में सांप्रदायिक हिंसा:

इस हिंसा के लिए हुक्मरान ज़िम्मेदार

उत्तर-पूर्व दिल्ली में सांप्रदायिक हिंसा के बाद से पिछले दो सप्ताह में हुक्मरानों ने इसकी हक़ीक़त को छुपाने की पूरी कोशिश की है। मीडिया और सोशल मीडिया के द्वारा तमाम तरह की कहानियां फैलाई जा रही हैं, जहां इस हिंसा के लिए एक या दूसरे समुदाय को या और लोगों को ज़िम्मेदार बताया जा रहा है। एक कहानी है कि इस हिंसा के लिए मुसलमान ज़िम्मेदार हैं, कि किस तरह से वे हथियारों से लैस थे और उन्होंने पुलिसकर्मी की हत्या कर दी, दूसरी तरह की कहानी है जहां यह बताया जा रहा है कि यह हिंसा सी.ए.ए. विरोधी लोगों के ख़िलाफ़़़ हिन्दू समुदाय के लोगों की स्वतःस्फूर्त प्रतिक्रिया थी, क्योंकि सी.ए.ए. विरोधी लोगों ने शहर के कुछ इलाकों में रास्तों को बंद कर दिया था।

हिंसा के दौरान और उसके बाद पुलिसवालों का बर्ताव और कई चश्मदीद लोगों के बयानों सहित विडियो क्लिप से यह साफ़ देखा जा सकता है कि यह कोई दंगा नहीं था। और यह कोई स्वतः स्फूर्त प्रतिक्रिया भी नहीं थी। यह हिंसा उन लोगों द्वारा प्रायोजित की गयी थी जिनके हाथों में सत्ता की कमान है। यह एक राजकीय आतंकवाद की कार्यवाही थी।

चश्मदीद लोगों के अनुसार, करीब 2000 हेलमेट-धारी लोगों ने 24 घंटे के लिए शिव विहार के दो स्कूलों पर कब्ज़ा कर लिया था और पड़ोस के इलाकों में मुसलमान लोगों के घरों पर हमला करने के लिए उसे अपना अड्डा बना लिया था।

कई पत्रकारों सहित चश्मदीद लोगों ने बताया कि दिल्ली पुलिस या तो ख़ामोश सब कुछ देखती रही या कुछ ठिकानों पर वह हमलावरों के साथ हो ली और लोगों पर हमला किया। ऐसे कई विडियो सामने आये हैं जहां पुलिस मुसलमानों पर हमला करते हुए साफ़ नज़र आती है, जो चश्मदीद लोगों की रिपोर्ट की पुष्टि करती है। ऐसा भी विडियो सामने आया है जिसमें पुलिस लोगों पर पत्थरबाजी करती नज़र आ रही है। कुछ विडियो में पुलिस ज़मीन पर घायल पड़े नौजवानों को बेरहमी से पीटती नज़र आ रही है। पुलिस नौजवानों को बेरहमी से पीट रही है और उनको राष्ट्रीय गान गाने के लिए दवाब डाल रही है। इनमें से एक नौजवान की गंभीर जख़्मों के चलते मौत हो गयी।

इन सभी बातों से यह साफ़ हो जाता है कि पुलिस को मुसलमानों को “सबक सिखाने” के आदेश दिए गए थे। इसके लिए ज़रूरी था कि मुसलमानों की बेइज्ज़ती की जाये, उनको मारा जाये, उनका क़त्ल किया जाए और उनको लूटा जाये। हिंसा के उन दिनों और रातों के दौरान पुलिस कंट्रोल रूम में हिंसा का निशाना और उसके शिकार लोगों ने सहायता के लिए कई टेलीफोन कॉल किये। लेकिन लोगों की गुहार पर मदद के लिए अधिकारियों ने कोई भी कार्यवाही नहीं कीं।

मुसलमानों को गद्दार करार देते हुए उनका क़त्ल करने के लिए लोगों को उकसाने के लिए सत्ताधारी पार्टी भाजपा के नेताओं के खि़लाफ़़ कोई भी कार्यवाही नहीं की गयी है। पुलिस ने ऐसे लोगों के खि़लाफ़ एफ.आई.आर. दर्ज़ करने से इंकार किया है। इसकी जगह, सांप्रदायिक हिंसा शुरू होने के बाद मुसलमान समुदाय के जिन कार्यकर्ताओं ने खुद को और अपने पड़़ोसियों को बचाने की हिम्मत की है, पुलिस बलों ने ऐसे लोगों का जीना हराम कर दिया है। अब पुलिस इस तरह की विडियो दिखाती फिर रही है, जो तथाकथित तौर पर यह दिखाते हंै कि मुसलमान लोगों ने पुलिस पर हमला किया।

यह ध्यान देने योग्य है कि 26 फरवरी, 2020 को न्यायमूर्ती मुरलीधर की अध्यक्षता में दिल्ली उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ ने पुलिस को साम्प्रदायिक हिंसा उकसाने वाले भाषण देने वालों के खि़लाफ एफ.आई.आर. दर्ज़ न करने के लिये फटकार लगाई। आदेश में उसने दिल्ली पुलिस को याद दिलाया कि असंज्ञेय अपराध के मामले में एफ.आई.आर. दर्ज़ करना अनिवार्य है। उसी रात को 12 बजे, न्यायमूर्ती मुरलीधर को पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय स्थानांतरण का नोटिस दिया गया।

चश्मदीदों ने यह भी बताया कि कई परिवारों ने अपने धर्म से परे, अपनी जान को जोखिम में डालते हुए हिंसा के शिकार लोगों को पनाह दी और उनकी हिफ़ाज़त की। कई लोगों ने अपने घरों में 100 से अधिक लोगों को पनाह दी। एक सिख पिता और उनके बेटे ने 70 मुसलमानों को हिंसा से बचाया, जिसमें पड़़़ोस के कई बच्चे शामिल हैं और उनको सुरक्षित ठिकानों पर पहुंचाया। उन्होंने बताया “मुझे सिर्फ लोग नज़र आ रहे थे, छोटे बच्चे नज़र आ रहे थे, मुझे वे अपने बच्चों जैसे लगे और जिनका कोई नुकसान नहीं होना चाहिए। हमने यह इसलिए किया क्योंकि हम सभी को इंसान जैसा बर्ताव करना चाहिए और ज़रूरतमंदों की मदद करनी चाहिए। मैं और क्या कह सकता हूँ?” इस पिता ने 1984 में हुए सिखों के जनसंहार को खुद अपनी आंखों से देखा था।

पनाह की तलाश में आए सभी लोगों के लिए गुरुद्वारों ने अपने दरवाज़े खोल दिए। कई रिहायशी इलाकों में लोग अपनी रक्षा करने के लिए एकजुट हो गए। सीलमपुर में लोगों ने हिंसक भीड़ को रोकने के लिए रास्ते बंद कर दिए और अपने मुसलमान पड़़़ोसियों को अपने घरों में पनाह दी। भजनपुरा, चाँद बाग़ में लोगों ने अपनी हिफ़ाज़त करने के लिए सुरक्षा समितियों का गठन किया। ब्रजपुरी में लोगों ने हिंसा की निंदा करते हुए एकता जुलूस निकाला।

कई इलाकों में मुसलमान लोगों ने अपने परिवारों और संपत्तियों की हिफ़ाज़त करने के लिए गुंडों के क़ातिलाना गुटों का बहादुरी के साथ मुक़ाबला किया, जो पुलिस की सांठ-गांठ में उन पर हमला कर रहे थे। उन्होंने सांप्रदायिक हिंसा की वारदातों के अपने अनुभवों से सबक लिया कि वे अपनी सुरक्षा के लिए इस राज्य पर निर्भर नहीं रह सकते और आत्मरक्षा ही एकमात्र रास्ता है।

अपनी जान को जोखि़म में डालकर कई डॉक्टर दिन-रात लोगों की जान बचाने में लगे रहे। मुस्तफाबाद के अल हिन्द अस्पताल और कई अन्य अस्पतालों के डॉक्टरों ने इसकी मिसाल क़ायम की। आस-पास के इलाकों से सैकड़ों जख़्मी लोग इन छोटे अस्पतालों में लाये गए, जहां पर्याप्त सुविधा भी नहीं थी। कई लोग गंभीर रूप से जख़्मी थे और ज़मीन पर लिटाये गए थे, क्योंकि अस्पताल में बिस्तर कम पड़ गए थे। कुछ मुट्ठीभर डॉक्टर और नर्स रात-दिन, जितना भी मुमकिन था, घायलों का इलाज करते रहे। उन्होंने अन्य बड़े़ अस्पतालों से तुरंत एम्बुलेंस भेजने की अपील की। लेकिन पुलिस ने मुस्तफाबाद इलाके और अन्य इलाकों में एम्बुलेंस जाने के रास्ते में रुकावटें खड़ी कीं। इसके लिए डॉक्टरों को दिल्ली उच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाना पड़ा, जिसने दिल्ली पुलिस को आदेश दिया कि वह सुनिश्चित करे कि एम्बुलेंस अस्पताल पर पहुंच सके और घायलों को ले जाया जा सके।

मुसलमानों के ख़िलाफ़़ राज्य द्वारा आयोजित सांप्रदायिक हमलों के बाद दिल्ली के लोगों ने हिंसा से प्रभावित इलाकों में सहायता कैंप लगाये। इन कैम्पों में हजारों परिवारों ने पनाह ली। दिल्ली और देशभर से लोगों ने दवाइयां, खाद्य पदार्थ, कपड़े़ और अन्य ज़रूरत की चीजें पीड़ित लोगों के लिए भेजी। जामिया मिलिया इस्लामिया, दिल्ली विश्वविद्यालय, आंबेडकर विश्वविद्यालय और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्रों ने इस राहत कार्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

हिंसा में अपने क़रीबी लोगों को खो देने, अपने घर और संपत्ति के नुकसान से सदमे में आये बच्चों और उनके माता-पिता को इससे उबारने के लिए तुरंत काउंसलिंग की ज़रूरत है। इन कैंपों में पनाह लिए लोगों को इस तरह की काउंसलिंग देने के लिए, शहर में काम कर रहे और अलग-अलग विश्वविद्यालयों में पढ़ा रहे मनोचिकित्सक संगठित हुए और पीड़ितों की मदद करने के लिए आगे आये।

घरों और संपत्तियों में आग लगाये जाने से कई परिवारों के महत्वपूर्ण दस्तावेज़ नष्ट हो गए हैं। इन दस्तावेज़ों के अभाव में दिल्ली सरकार द्वारा सीमित तौर पर दी जा रही राहत का मिलना भी मुश्किल हो गया है। इस समस्या से जूझने के लिए कई वकील और कानून की पढ़ाई कर रहे छात्र उनकी मदद कर रहे हैं।

इस बीच सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में बैठी एक खंडपीठ ने इस तरह के सांप्रदायिक क़त्लेआम को रोकने में अपनी नाकामी जाहिर की है।

निष्कर्ष

मौजूदा तथ्य ये दिखाते हैं कि पिछले महीने दिल्ली में जो हुआ, वह दंगा नहीं था। यह कोई स्वतःस्फूर्त या अपने आप हुई घटना भी नहीं थी। यह सत्ता में बैठे लोगों द्वारा आयोजित हमला था। इसके लिए हिन्दू या मुसलमान लोग ज़िम्मेदार नहीं हैं। यह एक राजकीय आतंकवाद की घटना है, जिसमें मुसलमानों को निशाना बनाया गया है। इस हिंसा और क़त्लेआम के लिए सत्ता में बैठे हुक्मरान ज़िम्मेदार हैं, इसके लिये किसी भी संप्रदाय के लोगों को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

इस घटना से हिन्दोस्तानी राज्य और उसके तमाम संस्थानों का पर्दाफाश हो गया है, कि वे चंद मुट्ठीभर शोषकों के हाथों में लोगों को बांटने और उन पर राज करने का तंत्र हैं। लोगों के ज़मीर के अधिकार की हिफ़ाज़त करना तो दूर, यह राज्य धार्मिक आस्था के आधार पर लोगों के साथ भेदभाव करता है और उनको उत्पीड़ित करता है।

सभी प्रगतिशील ताक़तों और सच्चाई, इंसाफ की क़द्र करने वाले सभी हिन्दोस्तानियों को राजकीय आतंकवाद के ख़िलाफ़ एकजुट होना होगा। “एक पर हमला, सब पर हमला” इस असूल के आधार पर हमें एकजुट होना होगा।

हमें ऐसे तमाम प्रचार से सतर्क रहना होगा जो किसी एक या दूसरे समुदाय को इस हिंसा के लिए दोषी करार देता है। हमें इस गलत धारणा से भी सतर्क रहना होगा जो किसी एक पार्टी की विचारधारा को समस्या का स्रोत मानती है और यह मानती है कि यह राज्य और उसका संविधान तथाकथित तौर पर सांप्रदायिक सद्भाव की हिफ़ाज़त करते हैं।

टाटा, अंबानी, बिरला और अन्य इजारेदार पूंजीपतियों की अगुवाई में हिन्दोस्तान का पूंजीपति वर्ग मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत भड़काने के लिए अमरीका के साथ हाथ मिला रहा है। मुसलमान लोगों के ख़िलाफ़ क़ातिलाना हमले आयोजित करने और इसके शिकार लोगों को ही इसके लिए ज़िम्मेदार साबित करने के लिए हिन्दोस्तान का इजारेदार पूंजीपति वर्ग, इस सांप्रदायिक राज्य का इस्तेमाल कर रहा है। उसका मक़सद है लोगों को भटकाना, उनको बांटना और अपने साम्राज्यवादी आर्थिक हमलों और जंग की तैयारी के ख़िलाफ़ लोगों के प्रतिरोध को बलपूर्वक कुचलना।     

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Punish the Guilty    Mar 16-31 2020    Struggle for Rights    Rights     2020   

पार्टी के दस्तावेज

8 जनवरी, 2020 की सर्व हिन्द आम हड़ताल को सफल करें!

मज़दूर एकता कमेटी का आह्वान

देश की दिशा पूंजीपतियों की अमीरी को बढ़ा रही है और मज़दूर, किसान व सभी मेहनतकशों को ग़रीबी में धकेल रही है। इस रास्ते का विरोध करने के लिए और देश की दौलत पर अपने अधिकार का दावा करने के लिए यह हड़ताल आयोजित की जा रही है।

मेहनतकशों का है यह नारा, हम हैं इसके मालिक! हिन्दोस्तान हमारा!

thumbपूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है। इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को। यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब, मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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