नौजवानों को नए हिन्दोस्तान के लिए संघर्ष करना होगा!

भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की शहादत की वर्षगाँठ पर हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट गदर पार्टी की केन्द्रीय समिति का आह्वान, 23 मार्च, 2020

23 मार्च, 2020 को भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की शहादत के हुए, 90वां साल शुरू होगा। बरतानवी हुक्मरानों ने उन तीनों नौजवानों को इसलिए फांसी पर चढ़ाया था क्योंकि उन्होंने एक नए हिन्दोस्तान के लिए संघर्ष करने की जुर्रत की थी, जो उपनिवेशवादी गुलामी और हर प्रकार के शोषण और दमन से मुक्त होगा। उस समय जब पूरे उपमहाद्वीप में उपनिवेशवाद-विरोधी, आजादी का संघर्ष चल रहा था, तो वे हिन्दोस्तान के नौजवानों के सर्वोत्तम प्रतीक थे। 

आज देश के लाखों-लाखों नौजवान अपने अधिकारों के हनन के खिलाफ, सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन कर रहे हैं। नौजवान शिक्षा का अधिकार मांग रहे हैं। वे शिक्षा के निजीकरण, फीस की वृद्धि और शिक्षा पर घटते सरकारी खर्च के विरोध में अपनी आवाज उठा रहे हैं, क्योंकि इन सब के चलते, अच्छी शिक्षा कुछ मुट्ठीभर नौजवानों का विशेष अधिकार बन कर रह गया है। 

नौजवान रोजगार का अधिकार मांग रहे हैं। लाखों-लाखों नौजवान, जिन्होंने स्कूल में 12 साल और उसके बाद कालेज या तकनीकी शिक्षा में 3-5 साल गुजारे हैं, जिसके लिए उनके परिवारों ने लाखों रुपये खर्च किये हैं, अब फलदायी रोजगार की तलाश में भटक रहे हैं। सार्वजनिक क्षेत्र में बहुत कम नौकरियां हैं। निजीकरण और उदारीकरण के चलते, बहुत सारी मौजूदा नौकरियां नष्ट हो रही हैं। 

जब कि बेरोजगारी पहले से कहीं ज्यादा है, तो रोजगार की सुरक्षा पहले से बहुत कम होती जा रही है। रोजगार-शुदा नौजवानों को यह नहीं मालूम कि उनकी नौकरी कब तक रहेगी। असोचैम नामक पूंजीपतियों के एक संस्थान ने पिछले साल एक अध्ययन किया था जिसमें उन्होंने यह पाया था कि हिन्दोस्तान के निजी क्षेत्र में 43 प्रतिशत कर्मचारी निराशा और अवसाद से पीड़ित हैं। 

नौजवान आज सड़कों पर उतरकर, सत्ता की बँटवारा करने वाली सांप्रदायिक राजनीति का विरोध कर रहे हैं। नौजवान यह मांग कर रहे हैं कि सब को समान अधिकार मिलें, कि सब के साथ एक जैसा बर्ताव किया जाये, चाहे इंसान का मजहब, जाति या लिंग कोई भी हो। वे विश्वविद्यालयों में अभिव्यक्ति की आजादी मांग रहे हैं। 

घिनावने ब्रिटिश राज की तरह, हिन्दोस्तानी राज्य आज अपने अधिकारों के लिए और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने वाले नौजवानों को ‘राष्ट्र-विरोधी’ बता रहा है। एक आधुनिक जनवादी हिन्दोस्तान के लिए संघर्ष करने की जुर्रत करने वाले लड़कों-लड़कियों पर राजद्रोह का आरोप लगाया जा रहा है। छात्रों पर पुलिस द्वारा हमले करवाए जा रहे हैं। 

सत्ता में बैठे लोग न तो नौजवानों की मांगों को पूरा कर सकते हैं, न ही मजदूरों और किसानों की समस्याओं को हल कर सकते हैं। इसीलिये वे सब की आवाज को दबाने के लिए, सांप्रदायिक हिंसा और राजकीय आतंक का इस्तेमाल कर रहे हैं। वे खौफ फैला रहे हैं परन्तु नौजवान पीछे हटने से इनकार कर रहे हैं। 

साथियों,

भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने “इन्कलाब जिंदाबाद!” का नारा देते हुए, फांसी के फंदे को चूमा था। गहन अध्ययन और वैज्ञानिक विश्लेषण के आधार पर, वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि बरतानवी उपनिवेशवाद को जड़ से उखाड़ फेंकना हिन्दोस्तानी समाज की समस्याओं को हल करने में मात्र पहला कदम होगा। हर तरह के शोषण-दमन को खत्म करने के लिए एक नए किस्म की राज्य सत्ता की स्थापना करने की जरूरत है। आर्थिक व्यवस्था को पूँजीवाद से समाजवाद में तब्दील करने का संघर्ष जारी रखना जरूरी है। उन्होंने संयुक्त राज्य हिन्दोस्तान के संघीय गणराज्य की स्थापना करने का नजरिया और लक्ष्य पेश किया था, जिसमें इस उपमहाद्वीप में बसे हुए विविध लोगों के अधिकारों और आकांक्षाओं की हिफाजत की जायेगी। उन्होंने ऐलान किया था कि:

“हमारा संघर्ष तब तक जारी रहेगा जब तक कुछ मुट्ठीभर लोग, चाहे विदेशी हो या देशी या दोनों का गठबंधन, हमारी जनता के श्रम और संसाधनों का शोषण करते रहेंगे। हमें इस रास्ते से कोई नहीं हटा सकेगा।”

आज के जीवन की हालतें साफ-साफ दिखाती हैं कि जिन लक्ष्यों और जजबातों को लेकर हमारे क्रांतिकारी शहीदों ने संघर्ष किया था, वे आज भी पूरे नहीं हुए हैं। 

1947 में उपनिवेशवादी हुकूमत खत्म हुयी परन्तु शोषण की व्यवस्था और लोगों को बांटकर उन पर राज करने के लिए बनाए गए राज्य तंत्र को जड़ से उखाड़ा नहीं गया। राजनीतिक सत्ता लन्दन से नई दिल्ली को हस्तांतरित तो हुयी परन्तु वह लोगों तक नहीं पहुँची। राजनीतिक सत्ता हिन्दोस्तान के बड़े पूंजीपतियों के हाथों में आयी, जो बड़े जमींदारों और समाज के अन्य प्रतिक्रियावादी तत्वों के साथ जुड़े हुए थे। हिन्दोस्तानी पूंजीपतियों ने विदेशी पूंजीपतियों के साथ गठबंधन बनाकर, आजाद हिन्दोस्तान के श्रम और संसाधनों के शोषण को जारी रखा है। उन्होंने बरतानवी हुक्मरानों द्वारा गठित शोषण और लूट की व्यवस्था को बरकरार रखा तथा और विकसित किया है। उन्होंने उसी राजनीतिक व्यवस्था और न्याय व्यवस्था को बरकरार रखा है, जिसमें शोषण-दमन का किसी भी प्रकार से विरोध करना अपराध माना जाता है। 

संविधान के पूर्वकथन में आजादी और बराबरी जैसे शब्द डाल दिए गए थे, यह धारणा पैदा करने के लिए कि हिन्दोस्तान एक जनवादी समाज है। परन्तु हकीकत तो यह है कि हिन्दोस्तानी समाज में जाति, मजहब, लिंग, वर्ग, नस्ल, आदि के आधार पर, तरह-तरह के भेदभाव और दमन फैले हुए हैं। 

पूंजीवादी विकास हुआ है परन्तु क्रांति के बिना और उपनिवेशवादी अतीत से नाता तोड़े बिना। इसकी वजह से, वर्ग पर आधारित शोषण और तीक्ष्ण हो गया है, और उसके साथ-साथ जातिवादी भेदभाव तथा सामंती समाज के दूसरे पिछड़े तत्व भी बरकरार हैं। 

आज टाटा, अम्बानी, बिरला और अन्य इजारेदार पूंजीपतियों की अगुवाई में पूंजीपति वर्ग के हाथ में फैसले लेने की सर्वोच्च ताकत है, ठीक उसी तरह जैसे कि बरतानवी उपनिवेशवादियों के हाथों में फैसले लेने की ताकत पहले हुआ करती थी। इजारेदार पूंजीपति इस ताकत का इस्तेमाल करके, अपने निजी मुनाफों को ज्यादा से ज्यादा बढ़ाते हैं और दुनिया के अन्य इजारेदार पूंजीपतियों के साथ स्पर्धा करते हैं। वे अपने बेशुमार धनबल से चुनावों के परिणामों को प्रभावित करते हैं और अपनी पसंद की पार्टी को सत्ता पर बिठाते हैं। 

नौजवानों को बताया जाता है कि 18 वर्ष की उम्र में आप वोट दे सकते हैं और देश का भविष्य तय कर सकते हैं। परन्तु, बाकी सभी लोगों की तरह, नौजवानों की भूमिका भी सिर्फ वोट देने तक सीमित होती है। मतदाता न तो चुनाव के लिए उम्मीदवारों का चयन कर सकते हैं, न ही उन चुने गए प्रतिनिधियों को वापस बुला सकते हैं जो जनहित के नाम पर वोट जीतते हैं पर जनहित के खिलाफ काम करते हैं। जो भी सरकार आती है, वह लोगों को बुद्धू बनाने के लिए नए-नए नारे उछालती है, परन्तु अर्थव्यवस्था की दिशा वही रहती है, यानि अधिकतम जनसमुदाय के जीवन स्तर को गिराते हुए पूंजीपतियों की लालच को पूरा करना। 

हिन्दोस्तानी और विदेशी पूंजीवादी कम्पनियाँ जैसे-जैसे एक के बाद दूसरे क्षेत्र पर हावी होती जा रही हैं, वैसे-वैसे तमान छोटे और मंझोले उत्पादक तबाह होते जा रहे हैं। इन कंपनियों के पूंजीपति मालिक हर साल मोटे मुनाफे कमाते हैं परन्तु उन मुनाफों का निवेश हमेशा उत्पादन को बढ़ाने के लिए नहीं करते हैं। इस समय पूंजीपतियों के अधिकतम मुनाफे उत्पादन को बढ़ाने के लिए नहीं इस्तेमाल किये जा रहे हैं। पूंजीनिवेश घट गया है क्योंकि बिक्री घट गयी है। बिक्री इसलिए घट गयी है क्योंकि मजदूरों-किसानों का इतना शोषण-लूट किया गया है कि आज उनके पास उन चीजों को खरीदने के पैसे नहीं हैं, जो पूंजीपति बेचना चाहते हैं। पूंजीनिवेश के घटने की वजह से, नई नौकरियां नहीं पैदा हो रही हैं। इस कुचक्र के चलते, हिन्दोस्तान की अर्थव्यवस्था गहरे से गहरे संकट में धंसती जा रही है। वह अपनी नौजवान श्रम शक्ति को रोजगार नहीं दे पा रही है। जितनी नयी नौकरियां पैदा हो रही हैं, उनसे कहीं ज्यादा तादाद में नौकरियां खत्म हो रही हैं। 

साथियों, 

नौजवानों को अपनी समस्याओं की मूल वजह को समझने और उनका समाधान निकालने के लिए संघर्ष में एकजुट होने से रोकने के लिए, हुक्मरान वर्ग दुतरफा प्रचार अभियान चला रहा है। एक तरफ है भाजपा और उसके समर्थकों का प्रचार। दूसरी तरफ है संसदीय विपक्ष की पार्टियों का प्रचार।

भाजपा अर्थव्यवस्था की सारी समस्याओं के लिए भूतपूर्व कांग्रेस पार्टी की अगुवाई वाली सरकारों को दोषी ठहराती है। भाजपा मुसलमानों और कम्युनिस्टों को देश का विकास रोकने के लिए दोषी ठहराती है। मोदी की अगुवाई में भाजपा सरकार उदारीकरण और निजीकरण कार्यक्रम को और तेजी से आगे बढ़ा रही है। वह हिन्दोस्तानी और विदेशी इजारेदार पूंजीपतियों के हितों की देखरेख कर रही है, परन्तु “सब का विकास” का ड्रामा कर रही है। वह “ईज ऑफ डूइंग बिजनेस” (कारोबार चलाना आसान बनाना) के लिए वाशिंगटन में बनाये गए नुस्खों के अनुसार नीतियां बनाकर उन्हें लागू कर रही है, पर प्राचीन हिन्दोस्तान की बुद्धिमत्ता का पालन करने का ढोंग कर रही है। 

कांग्रेस पार्टी और संसद की विपक्षी पार्टियाँ भाजपा और उसके मुसलमान विरोधी अभियान को सारी समस्याओं के लिए दोषी ठहराती हैं। वे लोगों से मांग कर रही हैं कि वर्तमान राज्य और उसके संविधान को बचाएँ। वे उस झूठी सोच को बढ़ावा दे रही हैं कि वर्तमान राज्य और उसका संविधान धर्मनिरपेक्ष और जनवादी है, बस सिर्फ मोदी को सत्ता से हटाना है। 

अगर वर्तमान राज्य धर्मनिरपेक्ष और जनवादी है तो सांप्रदायिक हिंसा बार-बार क्यों होती रहती है? कत्लेआम आयोजित करने वालों को कभी सजा क्यों नहीं दी जाती? आजादी की आवाज बुलंद करने वाले नौजवान छात्रों के साथ अपराधियों की तरह बर्ताव क्यों किया जाता है? इन सब से हम इसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि वर्तमान राज्य वैसा नहीं है जैसे कि हमें बताया जाता है। 

संविधान के पूर्वकथन में न्याय, आजादी, बराबरी और भाईचारे के वादे किये गए हैं। पर नौजवान देख सकते हैं कि हकीकत इसका उल्टा ही है। हमारे समाज में घोर गैर-बराबरी है, बार-बार और सब तरफ अन्याय ही नजर आता है, अपने विचारों के अनुसार चलने की तथा अपना मत प्रकट करने की आजादी तो है ही नहीं। 

सच्चाई यह है कि वर्तमान राज्य सांप्रदायिक है और मुट्ठीभर हुक्मरानों की हुक्मशाही का तंत्र है। वर्तमान राज्य एक उपनिवेशवादी विरासत है। यह शोषित जनसमुदाय को बांटकर, उन पर राज करने के लिए मुट्ठीभर शोषकों का हथकंडा है। 

1950 में अपनाए गए संविधान में बरतानवी उपनिवेशवादी कानूनों और वेस्टमिन्स्टर नमूने के संसदीय लोकतंत्र की निरंतरता थी। पूर्वकथन में किये गए अच्छे-अच्छे वादों को लागू करने को सत्ता को बाध्य नहीं किया जा सकता है। संविधान के बाकी कार्यकारी हिस्सों में उन वादों को लागू करने की कोई गारंटी नहीं दी गयी है। सूचीबद्ध मौलिक अधिकारों को लागू करने की भी कोई गारंटी नहीं दी गयी है। लोक सभा में बहुमत प्राप्त करने वाली पार्टी को यह संविधान, राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर या कानून-व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर, लोगों के किसी भी अधिकार का हनन करने का पूरा अधिकार देता है।

उपनिवेशवादी सांप्रदायिक विरासत को बरकरार रखते हुए, इस संविधान के अनुसार, देश के लोगों को “हिन्दू बहुसंख्या” और मुसलमान व अन्य अल्पसंख्यकों में बांटा गया है। संविधान में, सत्ता पर बैठे लोगों को सांप्रदायिक अपराध करने का, और उनका विरोध करने वालों पर पुलिस की हिंसा बरसाने का पूरा अधिकार दिया गया है।

साथियों, 

आज हमारे नौजवानों के सामने दो ही रास्ते हैं। एक रास्ता वह है जो हुक्मरान वर्ग दिखा रहा है, कि नौजवान यथास्थिति को मान लें और अगले चुनावों से किसी उन्नति की उम्मीद करते रहे। दूसरा रास्ता है हिन्दोस्तान को एक आधुनिक जनवादी राज्य बतौर पुनर्गठित करना, जिसके संविधान में संप्रभुता लोगों के हाथ में हो और सभी मानव अधिकारों व जनवादी अधिकारों की गारंटी हो। 

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट गदर पार्टी का यह दृढ़ विश्वास है कि इन्कलाब ही हिन्दोस्तानी समाज की सारी समस्याओं को हल करने की अनिवार्य शर्त है। एक गहन व बहुतरफा क्रांति की जरूरत है, जो इजारेदार पूंजीपतियों की अगुवाई में पूंजीपति वर्ग की हुकूमत को खत्म करेगी और मजदूरों व किसानों की हुकूमत को स्थापित करेगी। नयी राज्य सत्ता को वे सभी कदम उठाने पड़ेंगे जिनसे यह सुनिश्चित किया जा सके कि अर्थव्यवस्था लोगों की जरूरतों को पूरा करने की दिशा में चलायी जाये, न कि पूंजीपतियों की लालच पूरी करने की दिशा में। जब समाज के सभी सदस्यों की जरूरतों को पूरा करना अर्थव्यवस्था का लक्ष्य होगा, तब सभी नौजवानों के लिए, फलदायी और लाभकारी रोजगार के तमाम अवसर पैदा होंगे।  

नौजवानों को एक आधुनिक जनवादी हिन्दोस्तान की स्थापना करने के क्रन्तिकारी कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट होना होगा, ताकि हिन्दोस्तान सभ्यता के महा मार्ग, समाजवाद और कम्युनिज्म के मार्ग पर आगे बढ़ सके। 

शहीदी दिवस 2020 के अवसर पर, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट गदर पार्टी देश के नौजवानों से आह्वान करती है कि पूंजीपति वर्ग का क्रांतिकारी तख्तापलट करके, सांप्रदायिक राज्य और सम्पूर्ण उपनिवेशवादी विरासत को खत्म करके, उस नए हिन्दोस्तान का निर्माण करें, जिसके लिए हमारे शहीदों ने संघर्ष किया था और अपनी जान की कुरबानी दी थी। 

अदालत में भगत सिंह के भाषण के कुछ अंश *

क्रांति का अर्थ यह नहीं कि खूनी हिंसा ज़रूरी हो या व्यक्तिगत बदले की भावना हो। क्रांति का अर्थ बम और पिस्तौल का प्रयोग नहीं है। क्रांति से हमारा मतलब है कि वर्तमान व्यवस्था, जो खुलेआम नाइंसाफी पर आधारित है, बदलनी चाहिये। उत्पादनकर्ता या श्रमिक, समाज के सबसे आवश्यक तत्व हैं परन्तु शोषकों द्वारा उनके श्रम के फल को लूटा जाता है और उन्हें अपने मूलभूत अधिकारों से वंचित किया जाता है। किसान, जो सबके लिये अनाज पैदा करता है, अपने परिवार सहित भूखा मरता है; बुनकर जो दुनिया के बाज़ार में कपड़ांे की सप्लाई करता है, उसके पास अपने व अपने बच्चों के तन को ढंकने के लिये कपड़े नहीं होते हैं; राजमिस्त्री, लोहार और बढ़ई, जो शानदार महल खड़े करते हैं, झुग्गी-बस्तियों में जानवरों की ज़िदंगी जीते हैं। पूंजीपति और शोषक, जो समाज के परजीवी हैं, अपनी मनमर्जी के अनुसार दसांे-लाखों रुपयों की फजूलखर्ची करते हैं। इन भयानक विषमताआंे और जबरदस्ती से बनाए रखी गई असमानता से अराजकता फैलना अनिवार्य है। यह परिस्थिति ज्यादा देर तक नहीं चल सकती और यह स्पष्ट है कि मौज-मस्ती से चलने वाली वर्तमान सामाजिक व्यवस्था एक ज्वालामुखी के मुंह पर बैठी है।

”इस पूरी सभ्यता के ढांचे को अगर समय पर न बचाया जाये तो यह गिर जायेगा। अतः एक मूलभूत परिवर्तन की आवश्यकता है और जो इस बात को समझते हैं, उनका यह फर्ज़ बनता है कि समाज को समाजवादी आधार पर पुनर्गठित करें। जब तक ऐसा नहीं किया जायेगा और इंसान द्वारा इंसान तथा किसी एक राष्ट्र द्वारा दूसरे राष्ट्रों के शोषण को खत्म नहीं किया जायेगा, तब तक मानवजाति को तड़पाने वाली पीड़ाओं और तबाही को नहीं रोका जा सकेगा। जंग को खत्म करने और विश्वव्यापी शांति का युग स्थापित करने की सारी बातें बेहद कपटी हैं।

क्रांति से हमारा मतलब है कि अंत में ऐसी सामाजिक व्यवस्था स्थापित की जाये जिसमें इस प्रकार की तबाही का खतरा न हो, और जिसमें श्रमजीवी वर्ग की संप्रभुता को मान्यता प्राप्त हो और एक विश्वव्यापी संघ हो जो मानवजाति को पूंजीवाद की जकड़ व साम्राज्यवादी जंग के दुख-दर्द से बचायेगा।

”यह हमारा आदर्श है और इस आदर्श से प्ररित होकर हमने उचित तरीके से और काफी जोर से चेतावनी दी है। परन्तु अगर हमारी चेतावनी को नहीं सुना जाता है और वर्तमान सरकार की व्यवस्था स्वाभाविक तौर पर उभरती हुई ताक़तों के रास्ते में एक रुकावट बनती रहती है, तो एक घमासान संघर्ष होगा, जिसमें सभी रुकावटों को उखाड़कर फेंक दिया जायेगा और श्रमजीवी वर्ग का अधिनायकत्व स्थापित होगा, जो क्रांति के आदर्श को पूरा करने का रास्ता खोलेगा।“

* गदारियों की पुकारः इन्कलाब (2018), पृष्ठ 59-60 से


 

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पार्टी के दस्तावेज

8 जनवरी, 2020 की सर्व हिन्द आम हड़ताल को सफल करें!

मज़दूर एकता कमेटी का आह्वान

देश की दिशा पूंजीपतियों की अमीरी को बढ़ा रही है और मज़दूर, किसान व सभी मेहनतकशों को ग़रीबी में धकेल रही है। इस रास्ते का विरोध करने के लिए और देश की दौलत पर अपने अधिकार का दावा करने के लिए यह हड़ताल आयोजित की जा रही है।

मेहनतकशों का है यह नारा, हम हैं इसके मालिक! हिन्दोस्तान हमारा!

thumbपूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है। इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को। यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब, मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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