किसी को अपनी विचारधारा के लिए गिरफ़्तार करना ज़मीर के अधिकार पर हमला है

जब लोगों को उनके राजनीतिक रुख़ और विचारधारात्मक विश्वासों के लिए गिरफ्तार किया जाता है, तो यह बहुत बड़ी चिंता की बात होती है। हाल के महीनों में हजारों लोगों को इसलिए गिरफ़्तार किया गया है कि उन्होंने नागरिकता संशोधन अधिनियम (सी.ए.ए.), जो धर्म को नागरिकता का आधार बनाता है, का विरोध किया था। इन दिनों जब कोरोना वायरस से लड़ने के लिए लॉकडाउन चल रहा है, तो इस बीच भी कुछ लोगों को तथाकथित “राष्ट्र-विरोधी” विचार फैलाने के लिए गिरफ़्तार किया जा रहा है।

साकार की किसी नीति या संसद द्वारा पास किये गए किसी कानून से कोई भी व्यक्ति सहमत या असहमत हो सकता है। सरकार के विचारों के विरोध में अपना मत प्रकट करना कोई जुर्म नहीं है। मिसाल के तौर पर, अगर कोई व्यक्ति यह मानता है कि 2019 में संसद द्वारा पास किये कानून के ज़रिये कश्मीर के लोगों के अधिकारों का हनन किया गया है, या कि सी.ए.ए. और एन.आर.सी. से मुसलमान लोग ख़तरा महसूस करते हैं, तो ऐसा मानना कोई जुर्म नहीं है। हम इस बात को कभी नहीं स्वीकार कर सकते हैं कि लोगों को अपने विचारों के लिए ‘देश के गद्दार’ करार दिया जाये और गिरफ़्तार किया जाये।

अवैध गतिविधि निरोधक अधिनियम (यू.ए.पी.ए.) या किसी दूसरे तथाकथित आतंकवाद-विरोधी कानून के तहत किसी पर निशाना साधने की असली वजह को छिपाने के लिए पुलिस ने एक तरीका विकसित किया है। पहले पुलिस एक एफ.आई.आर. लिखती है कि गिरफ़्तार किये जाने वाले व्यक्ति पर इस या उस अपराधी साज़िश में लिप्त होने का शक है। इन आतंकवाद-विरोधी कानूनों के तहत, अदालत पुलिस को पूरी छूट देता है कि तरह-तरह के मनगढ़ंत सबूत पेश करती रहे या आरोपित का मुकदमा टालता रहे, और इसके लिए कोई निर्धारित समय सीमा नहीं होती। आरोपित को कई महीनों या सालों तक लगातार बंदी रखा जा सकता है और उसे जमानत भी नहीं मिल सकती।

हमारे देश के सबसे कठोर लोकतंत्र-विरोधी कानूनों में एक है सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (ए.एफ.एस.पी.ए.)। इसके तहत, केन्द्रीय सुरक्षा बलों को पूरी छूट दी जाती है कि राज्य द्वारा “अशांत” घोषित किये गए किसी भी इलाके में मात्र शक के आधार पर, लोगों को गिरफ़्तार करे, प्रताड़ित करे, बलात्कार करे और कत्ल करे। इसके लिए सुरक्षा बलों को कानूनी कार्यवाही से पूरी सुरक्षा दी जाती है। यह एक ब्रिटिश जमाने का कानून है, जिसके जरिये पूर्वोत्तर राज्यों और कश्मीर में केन्द्रीय सुरक्षा बलों ने अनगिनत लोगों को गिरफ़्तार किया और मार डाला है। इसी प्रकार के और कानून हैं राजद्रोह कानून, राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका), तमाम राज्य स्तरीय कानून जैसे कि महाराष्ट्र और कर्नाटक में ‘संगठित अपराध निरोधक’ कानून (मकोका, ककोका), जन सुरक्षा कानून, आदि, जिन सभी के अंतर्गत निवारक निरोध की इजाज़त दी जाती है।

राजनैतिक कैदियों के मौलिक अधिकारों का किस प्रकार से हनन किया जाता है, इसका एक हाल का उदाहरण वह मामला है जिसमें महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव में 1 जनवरी, 2018 को हुयी एक जनसभा में अन्तर-जातीय हिंसा भड़काने की साज़िश के लिए कुछ लोगों को यू.ए.पी.ए. के तहत गिरफ़्तार किया गया है। ब्रिटिश सेना के दलित सैनिकों की एक टुकड़ी ने उस जगह पर मराठा सेना को परास्त किया था, जिसकी याद में वहां जनसभा की जाती है। सूचनाओं के अनुसार, उस सभा में मराठों और दलितों के बीच हिंसक झगड़े हुए थे।

सुधा भारद्वाज, शोमा सेन, सुरेन्द्र गेडलिंग, महेश राउत, अरुण फरेरा, सुधीर धावले, रोना विल्सन, वरनन गोंसाल्वेस और वरावर राव - इन 9 लोगों को 2018 में गिरफ़्तार करके, तब से जेल में बंद रखा गया है, हालांकि पुलिस उनके अपराध को साबित करने के लिए अब तक कोई विश्वसनीय सबूत नहीं पेश कर सकी है। जिस समय उन्हें गिरफ़्तार किया गया था, उस समय सरकार ने यह प्रचार किया था कि वे प्रधानमंत्री मोदी की हत्या करने की एक माओवादी साज़िश में शामिल थे। परन्तु पुलिस ने जो एफ.आई.आर. दर्ज़ किया, उसमें भीमा कोरेगांव में अंतर-जातीय हिंसा भड़काने की तथाकथित साज़िश का ही जिक्र किया गया।

दो और व्यक्तियों - गौतम नवलखा और आनंद तेल्तुम्बड़े - को भी उसी आरोप के आधार पर कुछ दिन पहले गिरफ़्तार किया गया। अब उस शक-भरे आरोप के लिए गिरफ़्तार लोगों की संख्या 9 से बढ़कर 11 हो गयी है।

हर रोज़ हजारों लोग किसी न किसी तथाकथित आतंकवाद-विरोधी कानून के तहत गिरफ़्तार किये जाते हैं। इनमें शामिल हैं पत्रकार, ट्रेड यूनियन नेता, छात्र संगठन के नेता, मानव अधिकार कार्यकर्ता, आदि। लोगों को उनके राजनीतिक रुख़ और विचारधारात्मक विश्वासों के आधार पर आतंकवादी करार दिया जाता है और गिरफ़्तार किया जाता है। जातिवादी भेदभाव, लिंग भेदभाव और राष्ट्रीय दमन से मुक्ति की मांग करना कोई आतंकवादी जुर्म नहीं है। कुछ लोगों को सिर्फ इसलिए गिरफ़्तार किया गया है कि उनके पास माक्र्स या लेनिन की किताबें मिलीं। मज़दूरों, किसानों, आदिवासियों, महिलाओं, दलितों और उत्पीड़ित राष्ट्रीयताओं के अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले अनेक लोगों को किसी न किसी आतंकवाद-विरोधी कानून के तहत गिरफ़्तार करके अनिश्चितकाल के लिए बंद रखा गया है।

संविधान के पूर्वकथन में यह ऐलान किया गया है कि राज्य सभी नागरिकों को “सोच, अभिव्यक्ति, मत, आस्था और इबादत की आज़ादी” सुनिश्चित करेगा। संविधान के अनुच्छेद 25 में कहा गया है कि “सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य को प्राथमिकता देते हुए, सभी लोगों को ज़मीर की आज़ादी और किसी भी धर्म को मानने, उसका अभ्यास करने और उसका प्रचार करने का अधिकार है”। परन्तु यही संविधान पुराने, उपनिवेशवादी कानूनों को बरकरार रखता है और संसद को निवारक निरोध के नए कानून पास करने की इजाज़त देता है।

कोई भी समाज आगे नहीं बढ़ सकता अगर उसके सदस्यों को निडरता से सोचने और अपने विचारों को प्रकट करने से रोका जाये। हर इंसान को अपने विचार रखने और उन्हें प्रकट करने का अधिकार है, जब तक इससे दूसरों के अधिकारों का हनन न हो।

ज़मीर के अधिकार को हर महिला और पुरुष के सर्वव्यापक अधिकार के बतौर स्थापित करने के संघर्ष का हिन्दोस्तानी उपमहाद्वीप में लम्बा इतिहास है। यहां कई सदियों तक भक्ति और सूफी आन्दोलन चले। बर्तानवी उपनिवेशवादी शासन के खि़लाफ़ संघर्ष में हिंदुस्तान ग़दर पार्टी और हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन समेत सारे आज़ादी के योद्धाओं ने ज़मीर के अधिकार के झंडे को फहराया था।

ज़मीर के अधिकार का मतलब है न सिर्फ अपनी धार्मिक आस्थाओं का अधिकार बल्कि अपने विचारधारात्मक विश्वासों का भी अधिकार। आज की हालतों में यह स्वीकार करना पड़ेगा कि हर इंसान को पूरा अधिकार है हिंदुत्व को मानने का या धर्मनिरपेक्षता को, माक्र्सवाद-लेनिनवाद को या माओवाद को। किसी भी राजनीतिक पार्टी को किसी विचारधारा या राजनीतिक रुख़ की हिमायत या आलोचना करने का अधिकार है। पर राज्य को यह अधिकार नहीं है कि किसी भी व्यक्ति को गिरफ़्तार कर ले, सिर्फ इसलिए कि वह किसी खास विचारधारा को मानता है या उसका प्रचार करता है। जो लोग सत्तारूढ़ पार्टी का राजनीतिक और विचारधारात्मक विरोध करते हैं, उनको कुचलने के लिए पुलिस की ताक़त का इस्तेमाल करने का मतलब है प्रतिरोध को अपराधी ठहराना। आधुनिक लोकतंत्र में इसे हम मंजूर नहीं कर सकते हैं। यह ज़मीर के अधिकार पर हमला है।

जब राज्य के अधिकारी लोगों को गिरफ़्तार करके अनिश्चितकाल तक बंद रखते हैं, सिर्फ इसलिए कि उन्होंने सरकार का विरोध किया है, तो इससे स्पष्ट होता है कि हिन्दोस्तानी राज्य और उसका “कानून का राज” कितना लोकतंत्र-विरोधी है। संविधान के पूर्वकथन में यह वादा किया गया है कि सभी नागरिकों को सोच और अभिव्यक्ति की आज़ादी सुनिश्चित की जायेगी, परन्तु हकीक़त में, ज़मीर के अधिकार का प्रतिदिन हनन होता है।

राज्य का फर्ज़ है यह सुनिश्चित करना कि ज़मीर के अधिकार का हनन न हो। इस दिशा में हमारे संघर्ष का पहला क़दम होगा यह मांग करना कि निवारक निरोध के सारे काले कानूनों को फौरन रद्द किया जाये। हमें अपने उपनिवेशवादी पश्चात से पूरी तरह नाता तोड़ने के लिए संघर्ष करना होगा। हमें एक ऐसे संविधान के लिए संघर्ष करना होगा जिसमें किसी भी व्यक्ति के राजनीतिक रुख़ और विचारधारात्मक विश्वासों की वजह से उसकी गिरफ़्तारी और निवारक निरोध की कोई इजाज़त नहीं होगी।

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May 1-15 2020    Voice of the Party    Rights     2020   

पार्टी के दस्तावेज

8 जनवरी, 2020 की सर्व हिन्द आम हड़ताल को सफल करें!

मज़दूर एकता कमेटी का आह्वान

देश की दिशा पूंजीपतियों की अमीरी को बढ़ा रही है और मज़दूर, किसान व सभी मेहनतकशों को ग़रीबी में धकेल रही है। इस रास्ते का विरोध करने के लिए और देश की दौलत पर अपने अधिकार का दावा करने के लिए यह हड़ताल आयोजित की जा रही है।

मेहनतकशों का है यह नारा, हम हैं इसके मालिक! हिन्दोस्तान हमारा!

thumbपूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है। इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को। यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब, मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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