मज़दूरों के हित बनाम पूंजीपतियों के हित

सतही तौर से देखा जाये तो ऐसा लग सकता है कि नए कोरोन वायरस के खि़लाफ़ लड़ाई में और जल्द से जल्द आर्थिक गतिविधियों को फिर से शुरू करने की इच्छा में, समाज के सभी वर्ग इस समय एकजुट हैं। लेकिन, सतह के नीचे देखें तो, मज़दूर वर्ग के हितों और पूंजीपति वर्ग के हितों के बीच तीव्र टकराव है।

जब से लॉकडाउन शुरू हुआ है, मज़दूरों को अपनी जान और रोज़ी-रोटी के साधनों को बचाने की चिंता रही है। करोड़ों मज़दूर बिना आय या बचत के और बहुत से मज़दूर बिना आवास के, अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं। ऐसे विस्थापित मज़दूर इस समय अपने गांव और घरों को जाना चाहते हैं। आगे जाकर, सभी मज़दूर काम पर वापस जाना चाहते हैं और अपनी आजीविका अर्जित करना चाहते हैं। परन्तु वे नहीं चाहते कि उन्हें ऐसी परिस्थितियों में काम करने के लिये बाध्य किया जाये जो ख़तरनाक हों या जिसमें उनका पहले से भी अधिक शोषण हो।

टाटा, अंबानी, बिड़ला और अन्य इजारेदार घरानों की अगुवाई में पूंजीपति वर्ग शुरुआत में संक्रमित होने के जोखिम के बारे में चिंतित था। अब पूंजीपतियों ने अपने और अपने परिवार की सुरक्षा के लिए पर्याप्त क़दम उठा लिए हैं। और ऐसा कर लेने पर, वे मुख्य रूप से अपने व्यवसायों को फिर से शुरू करने के बारे में चिंतित हैं। वे फिर से मुनाफ़ा कमाना शुरू करना चाहते हैं। लागत में कटौती करके और कुछ मज़दूरों को नौकरी से निकाल कर, आदि तरीकों से पूंजीपति पहले से भी ज्यादा मुनाफ़े की दर पाने के तरीकों को तलाश रहे हैं। वर्तमान असामान्य स्थिति का उपयोग अपने लाभ के लिए कैसे करें? यह पूंजीपति वर्ग की प्रमुख चिंता बन गयी है।

मज़दूर वर्ग उन परिस्थितियों में काम करना स्वीकार नहीं कर सकता है जो उनकी जान को अनावश्यक जोखिम में डालती हैं। यह राज्य का कर्तव्य है कि वह सभी क्षेत्रों में मज़दूरों के लिए सुरक्षित काम की स्थिति सुनिश्चित करे।

जब कोई भी मज़दूर कोरोना वायरस से संक्रमित हो जाता है, ऐसी स्थिति में उद्यम के मालिकों की जवाबदेही विवादास्पद मुद्दों में से एक है। पूंजीवादी इजारेदार घरानों के संघों के आग्रह पर, गृह मंत्रालय ने एक स्पष्टीकरण जारी किया है कि मालिकों को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जाएगा। इस जवाबदेही की अनुपस्थिति में, मानक संचालन प्रक्रिया (स्टैंडर्ड आपरेटिंग प्रोसीजर) में निर्धारित अन्य सभी नियम अपना व्यावहारिक महत्व खो देते हैं। कार्यस्थल पर न्यूनतम शारीरिक दूरी बनाकर रखना, दो पारियों के बीच एक घंटे का अंतर रखना, कार्यस्थल की नियमित रूप से सफाई सुनिश्चित करना जैसे नियम केवल कागज पर ही लिखे रह जायेंगे।

पूंजीवादी संस्थाओं ने केंद्र सरकार को जो प्रस्ताव दिए हैं, उनमें से एक 8 घंटे की शिफ्ट के बजाय 12 घंटे की शिफ्ट की अनुमति देना है, जो कथित तौर पर कोरोना वायरस के प्रसार को सीमित करने में मदद करेगा! कई राज्य सरकारों ने पहले ही इस आशय की अधिसूचना जारी कर दी है, जिनमें गुजरात, राजस्थान और पंजाब शामिल हैं। यह 20वीं सदी में अंतर्राष्ट्रीय मज़दूर वर्ग द्वारा जीते गए सबसे मौलिक अधिकारों में से एक पर बहुत बड़ा हमला है।

गुजरात चेंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री द्वारा प्रस्तुत की गई मांगों में से एक है, कम से कम वित्तीय वर्ष 2020-21 के लिए, औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत मज़दूरों के यूनियन बनाने के अधिकार को निलंबित करना। पूंजीपतियों की यह मांग उनकी चिंता को दर्शाता है कि वर्तमान स्थिति में पहले से भी अधिक मज़दूर अपने अधिकारों की रक्षा में लड़ने के लिए यूनियनों का गठन करना चाहेंगे।

जबकि पूंजीपति वर्ग श्रम के शोषण को और तेज़ करने के अवसर के रूप में कोरोना वायरस महामारी का उपयोग करने के लिए सभी संभव प्रयास करेगा। मुश्किलों का सामना करके जीते गए अधिकारों की रक्षा के लिए और पूंजीपति वर्ग की दुष्ट योजनाओं को टक्कर देने के लिए मज़दूर वर्ग को सभी आवश्यक क़दम उठाने होंगे। मज़दूर वर्ग की सभी पार्टियों और संगठनों को मज़दूरों के अधिकारों की रक्षा के संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए एकजुट होने होगा। इस संघर्ष का मार्गदर्शन, पूंजीवादी शासन की वर्तमान प्रणाली को उखाड़कर मज़दूरों और किसानों के शासन को लाने की तैयारी की ओर होना चाहिए।

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May 1-15 2020    Struggle for Rights    Rights     2020   

पार्टी के दस्तावेज

8 जनवरी, 2020 की सर्व हिन्द आम हड़ताल को सफल करें!

मज़दूर एकता कमेटी का आह्वान

देश की दिशा पूंजीपतियों की अमीरी को बढ़ा रही है और मज़दूर, किसान व सभी मेहनतकशों को ग़रीबी में धकेल रही है। इस रास्ते का विरोध करने के लिए और देश की दौलत पर अपने अधिकार का दावा करने के लिए यह हड़ताल आयोजित की जा रही है।

मेहनतकशों का है यह नारा, हम हैं इसके मालिक! हिन्दोस्तान हमारा!

thumbपूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है। इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को। यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब, मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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