12 घंटे की शिफ्ट लागू करने के कानूनों की निन्दा करो

हमारे देश के मज़दूरों पर पूंजीपति वर्ग ने एक बहुत बड़े हमले की शुरुआत की है। आज जब देश में स्वास्थ्य आपात स्थिति की घोषणा की जा चुकी है और देशव्यापी तालाबंदी की हालतों में, पूजीपति वर्ग, एक के बाद एक मज़दूर-विरोधी नियमों को मज़दूरों के ऊपर जबदस्ती लादने का काम कर रहा है। केवल आठ घंटे प्रतिदिन और 48 घंटे प्रति हफ्ते की मज़दूरी, मज़दूरों का एक बुनियादी हक़ माना जाता रहा है और उसको 1948 में देश में बने करखाना अधिनियम के रूप में मान्यता भी मिली है। लेकिन पिछले एक महीने में, एक के बाद एक राज्य सरकारें चाहे वे किसी भी पार्टी की हों, मज़दूरों के खि़लाफ़ कार्य दिवस को आठ घंटे से बढ़ाकर 12 घंटे और कार्य सप्ताह को 48 घंटे से बढ़ाकर 72 घंटे करने के सरकारी अध्यादेशों को पारित कर रही हैं।

7 अप्रैल, 2020 को गुजरात सरकार ने करखाना अधिनियम को संशोधित करके मज़दूरों से जबरदस्ती 12 घंटे प्रतिदिन (छह घंटे के बाद केवल आधे घंटे का ब्रेक) और 72 घंटे प्रति सप्ताह ड्यूटी करवाने का कानूनी अधिकार पूंजीपतियों को दे दिया। यह संशोधन अभी 29 अप्रैल और 19 जुलाई, 2020 के बीच लागू होगा।

1948 के करखाना अधिनियम के तहत मज़दूरों को केवल 48 घंटे प्रति सप्ताह, जिसमें हर हफ्ते एक दिन की छुट्टी और 9 घंटे प्रतिदिन की ड्यूटी (जिसमें पांच घंटे के बाद 30 मिनटों का ब्रेक) करने का प्रावधान है।

गुजरात सरकार के संशोधन अध्यादेश के अनुसार, मज़दूरों को अतिरिक्त चार घंटे की ड्यूटी के लिए ओवरटाइम दर पर वेतन नहीं मिलेगा। यह प्रावधान कारखाना अधिनियम की धारा 59 का उल्लंघन है। इस कानून के अनुसार, मज़दूरों को यदि 48 घंटे प्रति हफ्ते से ज्यादा ड्यूटी करनी पड़ती है तो उनको अतिरक्त घंटों के लिए उन्हें प्रति घंटे मिलने वाले वेतन का दुगना वेतन मिलेगा।

11 अप्रैल को राजस्थान सरकार ने भी एक अधिसूचना जारी की जिसके अनुसार, मज़दूरों को अगले तीन महीनों तक, आठ घंटे की बजाय 12 घंटे की ड्यूटी करवाने की इजाज़त दी गयी है, लेकिन अतिरिक्त चार घंटों के काम के लिए दुगने वेतन का प्रावधान भी रखा गया है। लेकिन इस ओवरटाइम के वेतन की सीमा 24 घंटे प्रति सप्ताह है - इसका मतलब है कि उनको हर सप्ताह छः दिन लगातार, प्रति दिन 12 घंटे काम करना पड़ेगा। सरकार का कहना है कि इस क़दम की ज़रूरत इसलिए है क्योंकि जिन कारखानों को इस तालाबंदी में काम फिर से शुरू करने की इजाज़त मिली है, उनको ज्यादा मज़दूरों को न लगाना पड़े।

20 अप्रैल को, पंजाब सरकार ने भी एक अधिसूचना जारी की जिसके अनुसार अगले तीन महीनों तक, मज़दूरों को आठ घंटे की बजाय 12 घंटे काम करना पड़ेगा, हालांकि उनको इन अतिरिक्त 4 घंटों के लिए अपने वेतन का दुगना वेतन भी मिलेगा।

हिमाचल प्रदेश सरकार ने 21 अप्रैल को इसी तरह का आदेश जारी किया। इसके अनुसार 21 अप्रैल से 20 जुलाई तक, मज़दूरों पर 12 घंटे प्रतिदिन और 72 घंटे प्रति सप्ताह (अतिरिक्त घंटों के लिए दुगने वेतन का प्रावधान भी है) की ड्यूटी लागू करने की इजाज़त दी गयी है।

7 मई को मध्य प्रदेश सरकार ने भी मज़दूर कानूनों में, मज़दूर-विरोधी संशोधन करके, मज़दूरों से जबरदस्ती 12 घंटे की ड्यूटी करवाने की इजाज़त पूंजीपतियों को दे दी।

उत्तर प्रदेश सरकार ने एक ऐसा अध्यादेश जारी किया है जिसके अनुसार, देश के जिन श्रम कानूनों के द्वारा कारखाना अधिनियम के तहत मज़दूरों का वेतन और उनकी काम करने के लिए दी जाने वाली सुविधाओं का निर्धारण होता है, वे अगले तीन वर्षों तक के लिए बर्खास्त कर दिए गए हैं। इसमें 8 घंटे प्रतिदिन और 48 घंटे प्रति सप्ताह ड्यूटी का हक़ भी छीन लिया गया है।

केन्द्र सरकार के सचिवों की एक कार्य समिति ने 12 घंटे प्रतिदिन की ड्यूटी के इस प्रस्ताव को पेश किया था चूँकि इस तरह के प्रस्ताव का देश की सभी ट्रेड युनियनें विरोध करेंगी, केंद्र सरकार ने स्वयं प्रस्तावित करने के बजाय, केंद्र सरकार ने कारखाना अधिनियम को संशोधित करके इस प्रस्ताव को लागू करने की गुजारिश राज्य सरकारों से की। यह पहली बार नहीं है कि केंद्र सरकार इस तरह के दांव-पेंच खेल रही है। चूँकि श्रम संबंधित मुद्दे संविधान के अनुसार, राज्य और केंद्र की समवर्ती सूची में शामिल हैं, केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों द्वारा श्रम कानूनों में मज़दूर-विरोधी संशोधनों को लागू करने की चाल, का इस्तेमाल किया है।

जाहिर है कि इन संशोधनों के पीछे यह अवधारणा है कि पूंजीपति मज़दूरों के मालिक हैं और एक बंधक मज़दूर की तरह वे जिस तरह से चाहें, मज़दूरों का शोषण कर सकते हैं। वे यह भूल रहे हैं कि वर्तमान पूंजीवादी व्यवस्था में मज़दूर अपनी श्रम शक्ति को बेचने को ज़रूर मजबूर होता है, लेकिन फिर भी वह पूंजीपति का गुलाम नहीं है कि जब चाहो और जितना चाहो, जितने समय के लिए चाहो, उसका शोषण किया जा सकता है। मज़दूर पूजीपति का चैबीस घंटे गुलाम नहीं है। एक मज़दूर अपनी श्रम शक्ति केवल कुछ घंटों के लिए पूंजीपति को बेचता है बाकी समय उसका अपना समय है। इस समय का उपयोग वह अपने लिए या अपने परिवार के लिए करता है। यह उसका बुनियादी हक़ है। इस हक़ को मज़दूर वर्ग ने पूंजीवादी व्यवस्था में लड़कर और कुर्बानियां देकर हासिल किया है। आठ घंटे प्रतिदिन मज़दूरी करने के हक़ को, दुनियाभर के मज़दूरों के लिये एक बुनियादी हक़ बतौर माना जाता है।

19वीं और 20वीं सदी में मज़दूरों ने बहुत ही बहादुरी से, पूंजीपति वर्ग के खि़लाफ़ बहुत ही लम्बे संघर्ष के बाद, आठ घंटे तक सीमित कार्यकाल का हक़ हासिल किया। इस हक़ को कैसे छीना जा सकता है। 19वीं सदी में आठ घंटे के कार्य दिवस के लिए, लाखों मज़दूरों के प्रेरणादायक संघर्षों और कुर्बानियों की याद में, दुनियाभर में हर साल मई दिवस मनाया जाता है। 19वीं सदी में यूरोप और अमरीका के मज़दूरों को प्रतिदिन 12 से 16 घंटे काम करना पड़ता था। दिन में इतनी मेहनत और फैक्ट्रियों के इतने बुरे हालात जहां पर उनको काम करना पड़ता था - इस तरह के शोषण से तबाह हजारों मज़दूर अपना दम तोड़ देते थे हजारों मज़दूरों ने इस आठ घंटे की मांग के संघर्ष में अपनी जान भी कुर्बान कर दी। 19वीं सदी के मध्य में काम करने की अवधि को कम करने का संघर्ष शुरू हुआ और 20वीं सदी की शुरुआत में कई देशों में, मज़दूरों के कार्य दिवस को आठ घंटे तक सीमित रखने के लिए कानून बनाये गए। हिन्दोस्तान में  जब 1934 के कारखाना अधिनियम को 1946 में संशोधित किया गया तब मज़दूरों को, उनके कार्य दिवस को आठ घंटे तक सीमित रखने का कानूनी हक़ हासिल हुआ।

पूंजीपतियों की कोशिश हमेशा से यही रही है कि मज़दूरों के कार्यदिवस, उनकी ड्यूटी के घंटों को, बिना वेतन बढ़ाये किस तरह से बढ़ाया जाये। हमारे देश में मज़दूर वर्ग के एक बड़े हिस्से को अभी भी हर दिन 10-12 घंटे मेहनत करनी पड़ती है। हिन्दोस्तान में अस्थाई और दिहाड़ी मज़दूरों को पूरे दिन काम करना पड़ता है। निर्माण क्षेत्र से जुड़े मज़दूरों को दिन-रात काम करना पड़ता है। उनकी ड्यूटी के कोई निर्धारित घंटे नहीं होते। पीस रेट पर काम करने वाले मज़दूरों को लम्बे समय तक काम करना पड़ता है क्योंकि उनको कोई निर्धारित वेतन नहीं मिलता। काम करके वे जितना बनाते हैं, पूंजीपति उतने उत्पादन को खरीदता है, इसलिए उनको ज़िन्दा रहने के लिए दिन-रात मेहनत करनी पड़ती है। ऑफिस में काम करने वाले श्रमिक आठ घंटे प्रतिदिन से अधिक समय काम करते हैं। सर्विस सेक्टर में काम करने वाले मज़दूरों के लिए कोई निर्धारित समय नहीं होता। काम को ख़त्म करने के लिए जितने घंटे प्रतिदिन काम करना पड़े, वह करना ही पड़ता है। हक़ीक़त तो यह है कि अपने देश में 48 घंटे प्रति सप्ताह काम की समय सीमा बहुत ही कम मज़दूरों को नसीब है। केवल वही मज़दूर जो बड़ी फैक्ट्रियों में काम करते हैं और जिनकी अपनी यूनियनें हैं, उन्हीं का इस हक़ को लागू करने का मौका मिलता है। हालांकि इन संगठित क्षेत्रों में भी, जो मज़दूर संगठित नहीं हैं, उनको आठ घंटे काम करने की सीमा का हक़ हासिल नहीं है।

श्रम कानूनों में किसी भी बहाने, संशोधन लाकर 12 घंटे के कार्य दिवस (और 72 घंटे प्रति सप्ताह) को जायज़ ठहराने की प्रक्रिया, सीधे तौर पर मज़दूरों के बुनियादी हक़, जिसको उन्होंने इतनी कुर्बानियों और कड़े संघर्षों के द्वारा जीता है उसे छीनने की साज़िश है। इसका मतलब है मज़दूरों को 19वीं सदी की अमानवीय शोषण और दमन की हालतों में धकेलना। मज़दूरों को उनके, आठ घंटे प्रतिदिन और 48 घंटे प्रति सप्ताह काम करने की सीमा के बुनियादी हक़ से वंचित करना, पूरे मज़दूर वर्ग पर एक बड़ा हमला है। हम सब मज़दूरों को एकजुट होकर इस बुनियादी हक़ की रक्षा करने के लिए संघर्ष करना होगा। चाहे कोई भी मज़दूर हो और चाहे किसी भी प्रकार का काम हो, हमें हर मज़दूर के आठ घंटे के सीमित कार्य दिवस के बुनियादी हक़ के लिए अपने संघर्ष को जारी रखना होगा।

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May 16-31 2020    Struggle for Rights    Rights     2020   

पार्टी के दस्तावेज

8 जनवरी, 2020 की सर्व हिन्द आम हड़ताल को सफल करें!

मज़दूर एकता कमेटी का आह्वान

देश की दिशा पूंजीपतियों की अमीरी को बढ़ा रही है और मज़दूर, किसान व सभी मेहनतकशों को ग़रीबी में धकेल रही है। इस रास्ते का विरोध करने के लिए और देश की दौलत पर अपने अधिकार का दावा करने के लिए यह हड़ताल आयोजित की जा रही है।

मेहनतकशों का है यह नारा, हम हैं इसके मालिक! हिन्दोस्तान हमारा!

thumbपूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है। इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को। यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब, मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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