समय पर अनाज की खरीद न किये जाने पर किसानों ने अपना आक्रोश जाहिर किया

असम, कर्नाटक, केरल, ओडिशा और पंजाब सहित देश के कई राज्यों में किसानों ने हजारों लीटर दूध और हजारों किलो की तादाद में सड़ती हुई सब्जियां और फल सड़क पर फेंक दिए। यह किसानों की सदियों पुरानी मान्यता के खि़लाफ़ है जहां ऐसा माना जाता है कि “किसान अपने लिए पैदा नहीं करता और अपना पैदा किया कभी नाश नहीं करता”। लेकिन उनकी यह कार्यवाही यह दिखाती है कि केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा कोविड-19 के चलते लागू लॉक डाउन के दौरान समय पर इन चीजों की खरीद आयोजित न किये जाने से किसानों का आक्रोश किस कदर बढ़ गया है।

पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और बिहार में रबी की फसल गेहूं, चना और सरसों की कटाई मार्च के मध्य से अप्रैल के अंत तक की जाती है। लॉक डाउन का ऐलान उस समय किया गया जब फसलों की कटाई बस शरू ही हुई थी। लेकिन सरकार ने इन फसलों को समय पर खरीदने के लिए कोई इंतजाम नहीं किया। और न ही इन उत्पादों को किस तरह से एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जायेगा इस बारे में कोई घोषणा की। इस गुनहगारी लापरवाही की वजह से देशभर में लाखों किसान भयंकर संकट में आ गए हैं।

लॉक डाउन की वजह से न केवल कृषि उत्पादों की बिक्री पर असर पड़ा बल्कि आने वाली खरीफ की फ़सल के लिए लगने वाली सामग्री बीज, खाद इत्यादि की खरीद पर भी भारी असर पड़ा हुआ, जिसमें धान, मक्का, दालें और मूंगफली शामिल हैं।

केंद्र और राज्य सरकारों के प्रवक्ताओं ने किसानों के बैंक खातों में पैसे डाले जाने और फ़सल की खरीद और यातायात के लिए तमाम तरह के इंतजाम किये जाने के बड़े-बड़े दावे किये हैं। लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त उनके झूठे प्रचार की पोल खोल रही है।

17 अप्रैल को केंद्रीय कृषि मंत्री ने “किसान रथ” या ट्रांसपोर्ट अग्रीगेटर (यातायात समूहक) का ऐलान किया। यह दावा किया गया कि यह किसान रथ किसानों की फ़सलों को खेतों से बाज़ार तक लाने की समस्या को हल करेगा। इससे दो दिन पहले कृषि मंत्री ने “आल इंडिया एग्री-ट्रांसपोर्ट कॉल सेंटर” का उद्घाटन किया, जिसके बारे में बताया गया था कि यह लॉक डाउन के समय में किसानों की जल्दी ख़राब होने वाली फ़सलों की अंतर-राज्य आवाजाही को आसान बनाएगा। लेकिन यह एप किस जगह और किस तरह से काम कर रहा है और हक़ीक़त में किसानों को कौन-सी सेवाएं मिल रही हैं, इसकी कोई भी रिपोर्ट अभी तक सामने नहीं आई है।

ज़मीनी हक़ीक़त तो यह है कि गेहूं, दालें, सरसों, सब्जियां, दूध और कपास की रबी फ़सल के उत्पादक किसानों को अपनी फ़सल को लागत की कीमत से बहुत कम दाम पर बेचने के लिए मजबूर होना पड़ा है। बाग़बानी और फूलों की खेती करने वाले किसानों की हालत तो इससे भी बुरी है। फल और फूलों की पैदावार करने वाले किसान तो लॉक डाउन के दौरान आवाजाही पर लगी पाबंदी और घटती मांग के चलते जल्दी से खराब होने वाली अपनी फसलों के लिए कोई बाज़ार खोज ही नहीं पाए। इस वजह से उनका माल जमा होता गया और उसकी कीमतों में भारी गिरावट आई।

ख़बर मिली है कि दिल्ली के पड़ोस में उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले में तो किसानों ने अपनी कद्दू की फ़सल को मुफ्त में ही बांटना शुरू कर दिया था। उन्होंने अपनी फसल को दिल्ली की गाजीपुर मंडी में भेजने से इंकार कर दिया क्योंकि मंडी उनको मिलने वाली क़ीमत फ़सल की कटाई और उसे मंडी तक ले जाने के खर्चे से भी कम थी। जिन किसानों ने फ़सल उगाने के लिए ज़मीन किराये पर ली है, उनके सामने अब उसका किराया चुकता करने की समस्या खड़ी हो गयी है।

20 अप्रैल को केंद्र सरकार ने कृषि, दूध और मछली के उत्पादों की आवाजाही पर लगी पाबंदी में कुछ छूट दी। लेकिन यातायात और ग्राहकों की कमी की वजह से किसानों को अभी भी कई मुसीबतों का सामना करना पड़ रहा है। उनको बहुत अधिक समय लग रहा है और यातायात के लिए बहुत ज्यादा दाम चुकाना पड़ रहा है। अपने उत्पादों की ढुलाई के लिए पहले जहां 20 रुपये प्रति क्विंटल खर्चा होता था, अब उसके लिए 70 रुपये देना पड़ रहा है।

भारतीय किसान यूनियन ने बताया है कि उत्तर प्रदेश के बिजनौर जनपद में जहां 43 खरीद केंद्र हैं, उनमें से केवल 5 केंद्र काम कर रहे हैं। भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता ने बताया कि “बाकी केंद्र या तो बंद हैं या फिर ख़रीद नहीं कर रहे हैं। यह पूरी ख़रीद व्यवस्था केवल लोगों की आंखों में धूल झोंकने के लिए है”।

आल इंडिया किसान संघर्ष कोआर्डिनेशन कमेटी (ए.आई.के.एस.सी.सी.) ने बताया कि ख़रीद केंद्र या तो बंद हैं, या फिर वे केवल निजी व्यापारियों से फ़सल खरीद कर रहे हैं, और फ़सल उगाने वाले किसानों से नहीं। इस अफरातफरी की स्थिति और भरोसेमंद जानकारी के अभाव का फ़ायदा उठाते हुए व्यापारियों ने किसानों से फ़सल को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एम.एस.पी.) से बहुत कम दाम पर ख़रीद लिया है और फिर उसे इन ख़रीद केन्द्रों में एम.एस.पी. पर बेचा है।

राजस्थान में भारतीय खाद्य निगम (फूड कारपोरेशन ऑफ़ इंडिया - एफ.सी.आई.) और राजस्थान राज्य कोआपरेटिव मार्केटिंग फेडरेशन सामान्य तौर पर रबी फ़सल की खरीद 15 अप्रैल से शुरू करते हैं। लेकिन इस साल इसे 1 मई तक टाल दिया गया। पर्याप्त मात्रा में भंडारण के अभाव के चलते किसान अपनी फ़सल को एम.एस.पी. से बहुत कम क़ीमत पर स्थानीय दुकानदारों को बेच रहे हैं। उदाहरण के लिए राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में किसान सरसो को 3,800 रुपये प्रति क्विंटल, चना 4,000 रुपये प्रति क्विंटल और गेहूं 1,800 रुपये प्रति क्विंटल पर बेचने को मजबूर हैं, जबकि उनकी एम.एस.पी. क्रमशः 4425 रुपये, 4875 रुपये और 1925 रुपये प्रति क्विंटल है।

हरियाणा में वैसे तो राज्य सरकार ने 20 अप्रैल से सार्वजनिक ख़रीद का ऐलान कर दिया लेकिन यह जून के अंत से पहले ख़त्म नहीं हो पायेगी। लेकिन उस समय तक ग़रीब किसानों के पास कुछ भी नहीं बचेगा क्योंकि उनके पास अपनी फ़सल के भंडारण की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है और वे सार्वजनिक ख़रीद के लिए रुक नहीं सकते। उनकी फ़सल अभी खेतों में पड़ी हुई है और बरसात और ओलों से बर्बाद होने का ख़तरा बना हुआ है। इसके अलावा ख़रीद के इंतजार में खरीफ फ़सल की धान बुआई में देरी हो सकती है।

इसके अलावा भुगतान में भी देरी होने की समस्या है। उदाहरण के लिए हरियाणा सरकार द्वारा गेहूं की खरीद के लिए क़दम उठाने के दो दिन बाद मुख्यमंत्री ने दोहराया कि वे “गेहूं का एक-एक दाना ख़रीद लेंगे” और बिना किसी देरी के किसानों को उसका भुगतान कर दिया जायेगा। लेकिन इस घोषणा के 16 दिन बाद, 5 मई तक 50 लाख टन गेहूं की ख़रीद करने के बाद 20 प्रतिशत का भी भुगतान नहीं किया गया है।

अखिल भारतीय किसान सभा के अनुसार गेहूं की खरीद के 72 घंटे में जो भुगतान हो जाना चाहिए था वो 12 मई तक भी नहीं किया गया है। किसान सभा ने फैसला किया है कि यदि 16 मई तक भुगतान नहीं किया जाता है, तो वे विरोध प्रदर्शन शुरू करेंगे।

महाराष्ट्र में करीब एक-चैथाई कपास की फ़सल आज भी ख़रीद नहीं गयी है। इसकी कुल क़ीमत 5,500 रुपये है। अप्रैल तक केवल 16 खरीद केंद्र खोले गए थे। जिस फ़सल की कटाई जनवरी के अंत तक की जा चुकी थी, उसके अधिकतम हिस्से की बिक्री नहीं हुई है। अब तक जितनी फ़सल की ख़रीद हुई है उसे न्यूनतम समर्थन मूल्य से बहुत कम क़ीमत पर ख़रीदा गया है।

देश के अधिकांश इलाकों में ऐसी ही स्थिति है।

इस सबके चलते किसानों का गुस्सा बिलकुल जायज़ है। इसी तरह से उनके द्वारा राज्य से अपनी फ़सल की स्थिर एवं लाभकारी मूल्य पर सार्वजनिक ख़रीद की गारंटी की मांग करना पूरी तरह से जायज़ है।

कृषि व्यापार में उदारीकरण और निजीकरण की निति के तहत सीमित सार्वजनिक ख़रीद की व्यवस्था को सुनियोजित तरीके से बर्बाद किये जाने की वजह से पिछले कुछ वर्षों में किसानों के बीच असहनीय कर्ज़दारी और आत्महत्या के मामले सामने आ रहे हैं।

अब सरकार ने इस संकट की घड़ी का इस्तेमाल कृषि व्यापार में उदारीकरण और निजीकरण कार्यक्रम को आगे बढ़ाने के लिए करने की योजना का ऐलान किया है। “संकट को अवसर में बदलने” के नाम पर सरकार ने इस विस्तारित लॉक डाउन की स्थिति को कृषि व्यापार में इजारेदार पूंजीपति कंपनियों को और अधिक घुसने का अवसर देने की योजना बनाई है।

जो किसान ज़मीन को जोतता है और पूरी आबादी का पेट भरता है उनको सुरक्षित रोज़गार और खुशहाली पर पूरा अधिकार है। और यह इसकी गारंटी केवल एक सर्वव्यापी सार्वजनिक ख़रीद व्यवस्था के द्वारा ही दी जा सकती है, जिसमें सभी कृषि उत्पादों को लाभकारी मूल्य पर ख़रीदा जायेगा और इस क्षेत्र से निजी मुनाफ़ाखोरों की भूमिका को पूरी तरत से मिटा दिया जायेगा।

हिन्दोस्तान के किसानों का शोषण और नाइंसाफी के खि़लाफ़ संघर्ष का लंबा इतिहास है। अब उनके सामने यह चुनौती है कि वे इस संकट को अपनी एकता को मजबूत करने और अपने संघर्ष को तेज़ करने के अवसर में बदल डालें। उनके इस संघर्ष में उन्हें पूरे मज़दूर वर्ग और इंसाफ-पसंद लोगों का पूरा समर्थन हासिल है।

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Jun 1-15 2020    Voice of Toilers and Tillers    Struggle for Rights    Rights     2020   

पार्टी के दस्तावेज

8 जनवरी, 2020 की सर्व हिन्द आम हड़ताल को सफल करें!

मज़दूर एकता कमेटी का आह्वान

देश की दिशा पूंजीपतियों की अमीरी को बढ़ा रही है और मज़दूर, किसान व सभी मेहनतकशों को ग़रीबी में धकेल रही है। इस रास्ते का विरोध करने के लिए और देश की दौलत पर अपने अधिकार का दावा करने के लिए यह हड़ताल आयोजित की जा रही है।

मेहनतकशों का है यह नारा, हम हैं इसके मालिक! हिन्दोस्तान हमारा!

thumbपूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है। इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को। यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब, मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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