लॉकडाउन जारी:

देशभर के मज़दूर अपनी रोज़ी-रोटी और अधिकारों पर हमलों का विरोध कर रहे हैं

उत्तर प्रदेश राज्य सरकार के कर्मचारियों के भत्तों को रद्द करने के आदेश के खि़लाफ़ विरोध

12 मई को उत्तर प्रदेश राज्य सरकार ने, कोरोना महामारी के दौरान “खर्चे कम करने के उपायों” के तहत कर्मचारियों के सभी भत्तों को ख़त्म करने के अपने फै़सले का ऐलान किया। इस सरकारी आदेश से लगभग 16 लाख कर्मचारी प्रभावित होंगे और कम से कम छः भत्तों, जिसमें शहर मुआवज़ा भत्ता, सचिवालय कर्मचारियों और पुलिस कर्मियों को दिए जाने वाले विशेष भत्ते, सिंचाई विभाग के कर्मचारियों और जूनियर इंजिनीयर के लिए भत्ते और सार्वजनिक कार्यों के कर्मचारियों के लिए भत्ते शामिल हैं, ये सभी अगले महीने से नहीं दिए जायेंगे। खर्चे कम करने के अभियान के तहत, उप्र सरकार ने पिछले महीने ही कर्मचारियों के महंगाई भत्ते में बढ़ोत्तरी को अगले डेढ़ साल तक निलंबित करने का फ़ैसला किया था।

सरकारी कर्मचारियों की दो यूनियनें, राज्य कर्मचारी संयुक्त परिषद (एस.ई.जे.सी.) और यूपी सचिवालय संघ (यू.पी.एस.ए.), ने यूपी सरकार के इस फैसले के खि़लाफ़ एक आंदोलन शुरू करने का ऐलान किया है। उन्होंने इस हक़ीक़त को उजागर किया है कि कोरोनावायरस महामारी के बावजूद, राज्य सरकार के कर्मचारी विशेष रूप से पुलिस कर्मी, डॉक्टर, नर्स, शिक्षक, तकनीशियन, आदि पूरी मेहनत से अपनी ड्यूटी कर रहे हैं। अक्सर ड्यूटी के अतिरिक्त और भी अधिक कार्यभार संभाल रहे हैं। उन्होंने सरकार के निर्णय को ”अमानवीय, अव्यावहारिक और निरंकुश“ बताया है और इस बात पर भी सरकार का ध्यान आकर्षित करने की कोशिश की है कि कर्मचारियों के भत्ते में प्रस्तावित कटौती, तालाबंदी की स्थिति में, मज़दूरों और उनके परिवारों पर बहुत बुरा असर डालेगी।

बकाया वेतन के भुगतान के लिए लम्बे संघर्ष में पुणे के सफाई कर्मचारियों के की विजय

पुणे के पिंपरी चिंचवड म्युनिसिपल कारपोरेशन के लगभग 500 कांट्रेक्ट सफाई कर्मचारियों ने अपने बकाया वेतन के भुगतान के लिए जारी लम्बे सघर्ष के बाद सफलता प्राप्त की। सफाई कर्मचारियों के अनुसार, पी.सी.एम.सी. ने उनको 13,000 रुपये प्रति महीने वेतन देने का वादा किया था लेकिन उनको वेतन केवल 8,000 रुपये प्रति माह ही मिला। इस बकाया वेतन के भुगतान के लिए और ठेका मज़दूरों को परमानेंट करने के लिए मज़दूर, मुंबई उच्च अदालत में कानूनी लड़ाई लड़ रहे थे।

इस साल मार्च में उच्च अदालत ने आखिकार पी.सी.एम.सी. को आदेश दिया कि वह तुरन्त पिछले 14 सालों की बकाया रकम मज़दूरों को दे।

जोमाटो ने ले-ऑफ और वेतन में कटौती की घोषणा की

ऑनलाइन खाद्य वितरण एप्लिकेशन कम्पनी जोमाटो ने अपने मौजूदा कर्मचारियों की संख्या के 13 प्रतिशत हिस्से के मज़दूरों को ले-ऑफ करने का और शेष कर्मचारियों के वेतन में 50 प्रतिशत की कटौती का ऐलान किया है। जोमाटो के सी.ई.ओ. ने इस क़दम के पीछे, कोरोना महामारी के कारण हुई आर्थिक मंदी का हवाला दिया है।

करोना महामारी के कारण लंबे समय तक जारी तालाबंदी से कई तरह की सेवाएं प्रदान करने वाली कई कंपनियां बुरी तरह से प्रभावित हुई हैं। इनमें से ज्यादातर कम्पनियां मज़दूरों को ठेके पर रखती हैं। कई कंपनियों में श्रमिकों को लॉकडाउन अवधि के लिए, अपना वेतन भी नहीं मिला है और वे पहले से ही भारी कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं। केंद्र और राज्य सरकारों ने मालिकों को लॉकडाउन अवधि के दौरान अपने कर्मचारियों को उनके वेतन का भुगतान करने की “सलाह” दी है। लेकिन हक़ीक़त तो यह है कि यह सुनिश्चित करने के लिए देश में कोई व्यवस्था नहीं है कि मज़दूरों का वेतन सुनिश्चित हो।

तमिलनाडु में बी.एस.एन.एल. के ठेका मज़दूरों को नौकरी से निकाला गया

तमिलनाडु टेलीकॉम कैजुअल एंड कॉन्ट्रैक्ट वर्कर्स यूनियन (टी.टी.सी.सी.डब्ल्यू.) और बी.एस.एन.एल. एम्पलाइज यूनियन (बी.एस.एन.एल.ई.यू.) ने करोना महामारी के दौरान बी.एस.एन.एल. प्रबंधन द्वारा की गयी ठेका मज़दूरों की छंटनी के खि़लाफ़ 14 मई से कई विरोध प्रदर्शनों को आयोजित किया है।

अकेले तमिलनाडु में इस अवधि में 22 से अधिक मज़दूरों को नौकरी से निकालने की सूचना मिली है और उनका काम विभिन्न निजी एजेंसियों को आउटसोर्स किया गया है।

इसे बी.एस.एन.एल. के निजीकरण - जैसे कि जो प्राइवेट एजेंसी सबसे ज्यादा बोली लगाने को तैयार है, उसको सौंपने के प्रयासों के हिस्से के रूप में भी देखा जा रहा है। इसके अलावा 6,000 से अधिक ठेका मज़दूरों को अभी तक अपने आठ से पंद्रह महीनों का वेतन मिलना बाकी है - ऐसी सूचना यूनियनों ने प्रेस को दी है।

बी.एस.एन.एल. सार्वजनिक क्षेत्र की एक कंपनी है करोना महामारी और तालाबंदी के दौरान मज़दूरों की छंटनी और वेतन में कटौती पर केंद्रीय श्रम मंत्री की सलाह का यह खुल्लम- खुला उल्लंघन है। और मालिकों को मज़दूरों के ले-ऑफ और वेतन में कटौती का सहारा न लेने के लिए प्रधानमंत्री के ”अनुरोध“ का भी मजाक बनाना है।

यह कॉरपोरेट घरानों और निजी पूंजीपतियों को एक स्पष्ट संकेत भेजता है कि वे अपने मुनाफ़े को बनाए रखने के लिए, वे मज़दूरों को नौकरी से निकाल फैंकने और उनके वेतन में कटौती करने के लिए “आज़ाद” हैं।

ट्रक ट्रांसपोर्टरों की बीमा कवर और राहत पैकेज की मांग

ऑल इंडिया मोटर ट्रांसपोर्ट कांग्रेस (ए.आई.एम.टी.सी.), जो लगभग 95 लाख ट्रक ट्रांसपोर्टरों का प्रतिनिधित्व करती है उसने आवश्यक सेवाओं और कार्गो परिवहन में लगे ड्राइवरों और सह-कर्मचारियों के लिए तत्काल करोना बीमा कवर की मांग की है।

अप्रैल के अंत में जारी एक बयान में, ए.आई.एम.टी.सी ने कहा कि ”कार्गो और यात्री परिवहन से जुड़ी, आवश्यक सेवाओं में लगे ड्राइवरों और मज़दूरों के लिए करोना बीमा की घोषणा का अभी भी इन्तज़ार है। हमारे सदस्यों को अपने ड्राइवरों और मज़दूरों को करोना के संक्रमण के डर के कारण काम पर वापस लाना मुश्किल लग रहा है“। इसमें ड्राइवरों और कर्मचारियों के साथ-साथ माल की आवाजाही पर स्थानीय प्रतिबंधों के लिए ई-पास प्राप्त करने की समस्याओं का भी खुलासा किया गया। इसमें स्थानीय प्रशासन द्वारा ड्राइवरों और सह-चालकों के उत्पीड़न की भी शिकायत की गई थी।

यह कहते हुए कि अधिकांश छोटे परिवहन ऑपरेटरों को गंभीर वित्तीय कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है, ए.आई.एम.टी.सी. ने सड़क परिवहनकर्ताओं के लिए सरकार से राहत पैकेज के साथ-साथ टोल को हटाने और डीजल की कीमतों में कमी की मांग की है।

इन समस्याओं के अलावा, ए.आई.एम.टी.सी. ने बंदरगाहों पर परिवहन सेवाएं प्रदान करने की समस्याओं को उठाया है, जहां कंटेनर इकट्ठा हो रहे हैं क्योंकि उनको खाली नहीं किया जा रहा है और यह सब इसलिए क्योंकि फैक्ट्ररियों ने अभी तक उत्पादन का काम शुरू नहीं किया है।

अंतर-राज्यीय सीमाओं पर स्क्रीनिंग प्रक्रिया के दौरान, अक्सर 6-7 किमी लंबी कतारें होती हैं, जिसके कारण ड्राइवर और सह कर्मचारी घंटों बिना भोजन और पानी के फंसे रहते हैं।

आई.आई.टी. हैदराबाद कैंपस में निर्माण मज़दूरों की दुर्दशा

आई.आई.टी. हैदराबाद कैंपस में सैकड़ों निर्माण मज़दूर करोना तालाबंदी में, अपने गांवों में घर लौटने के लिए बेताब हैं इन मज़दूरों को एल. एंड टी. प्रबंधन द्वारा तेलंगाना के संगारेड्डी जिले के कंडी गांव में स्थित आई.आई.टी. हैदराबाद कैंपस की 644 करोड़ रुपये की निर्माण परियोजना के फेज-2 से जुड़े हुए काम के लिए नियुक्त किया गया है।

24 मार्च की तालाबंदी से पहले बिहार, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड के विभिन्न जिलों के 3,000 से अधिक मज़दूर आई.आई.टी. हैदराबाद परिसर में निर्माण स्थल पर काम कर रहे थे। काम के प्रकार के आधार पर, इन श्रमिकों को 15,000 से 25,000 रुपये प्रति माह का वेतन मिलता है। एल. एंड टी. मैनेजमेंट ठेकेदार को पैसा देता है और फिर ठेकेदार मज़दूरों को वेतन देता है। ठेकेदार यह सुनिश्चित करता है कि मज़दूरों के कई सप्ताह तक के वेतन किसी भी समय उनके पास ही रहें, ताकि मज़दूर बंधुआ मज़दूरों की तरह उन पर निर्भर हों।

24 मार्च को लॉकडाउन के बाद, मज़दूरों को केवल 21 मार्च तक ही वेतन मिला था, हालांकि केंद्र और राज्य सरकार ने मालिकों और ठेकेदारों को लॉकडाउन अवधि के लिए, सभी मज़दूरों के वेतनों का भुगतान करने के लिए कहा था।

मज़दूरों के कैम्पों में उनको बिना पंखे के, टिन की छत वाली खोलियों में, 15 से 20 लोग एक कमरे में, इतनी कड़ी तपती गर्मी में, रहने के लिए छोड़ दिया गया था। उनके पास मुश्किल से केवल ज़िन्दा रहने के लिए ही पैसे जुटाना दूभर है, अपने घर-परिवार को भेजने के लिए पैसे तो बहुत दूर की बात है।

29 अप्रैल को निर्माण स्थल पर मज़दूरों के कैंप में सैकड़ों उत्तेजित मज़दूर एल. एंड टी. मैनेजमेंट के साथ भिड़ गए, उन्होंने पिछले बकाया वेतन के भुगतान की मांग की। अगले दिन, एल. एंड टी. मैनेजमेंट ने आंशिक रूप से ठेकेदार के साथ बकाया राशि देने की मांग को मंजूरी दी, जिसने तब मज़दूरों को पैसा देने का इंतजाम किया।

मज़दूरों के इस संघर्ष ने सरकार को 1 मई को हैदराबाद से झारखंड के लिए एक विशेष ट्रेन का इंतजाम करने के लिए मजबूर किया। कुछ मज़दूर इस ट्रेन पर चढ़ सके। इसके बाद, हालांकि 4 मई को निर्माण स्थल पर काम फिर से शुरू किया गया था, शेष 600 श्रमिकों में से अधिकांश काम पर लौटने के मूड में नहीं थे। उन्होंने महसूस किया कि वे बस एक और अनिश्चितकालीन बंद का सामना नहीं कर सकते, जिसमें उनके पास न कोई काम होगा और न ही उनको वेतन मिलेगा और वह भी घर से दूर एक अनजाने वातावरण में रहने के लिए मजबूर। वे मांग करते रहे हैं कि सरकार उनके अपने गांव जाने के लिए कुछ इंतजाम करे।

ये सब उन सैकड़ों हजारों मज़दूरों में से हैं जो विभिन्न निर्माण प्रोजेक्ट्स पर काम करने के लिए बिहार, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड से आए हैं। वे एक ऐसी जानलेवा स्थिति में हैं कि न तो उनके पास कोई काम है और न तो ज़िन्दा रहने का सहारा, वेतन और रहने की जगह के लिए मोहताज। उन्हें स्वयं को रजिस्टर करने और घर वापस जाने के लिए टिकट प्राप्त करने के लिए, स्थानीय पुलिस स्टेशनों और रेलवे स्टेशन पर, यहां से वहां दर-दर भटकने के लिए मजबूर किया जा रहा है। जैसा कि उनका गुस्सा और हताशा बढ़ रही है, उनको विभिन्न स्थानों पर पुलिस और सरकारी अधिकारियों से भिड़ने के अलावा और कोई रास्ता भी नहीं बचा है।

कर्नाटक के प्राइवेट कॉलेज और स्कूल शिक्षक वेतन के भुगतान की मांग कर रहे हैं

स्कूल शिक्षकों, कॉलेज शिक्षकों और कर्नाटक के कई निजी शिक्षण संस्थानों के गैर-शिक्षण कर्मचारियों को पिछले दो महीनों से, (मार्च-अप्रैल) का वेतन अभी तक नहीं मिला है - जिससे उनके और उनके परिवारों को बहुत परेशानी हो रही है, यह हक़ीक़त ऑल इंडिया सेव एजुकेशन कमेटी द्वारा उजागर की गयी है। कमेटी ने मांग की है कि सरकार निजी स्कूलों और कॉलेजों में काम करने वाले सभी शिक्षकों के लिए एक राहत पैकेज की घोषणा करे, जिसमें सरकारी/सहायता प्राप्त कॉलेजों और स्कूलों में काम करने वाले सभी कर्मचारी (जो प्रोफेशनल कोर्से को पढ़ाते हैं और गेस्ट फैकल्टी की ड्यूटी करते है) भी शामिल हैं ।

हजारों सरकारी और निजी शिक्षण संस्थानों के साथ, कर्नाटक देश का एक प्रमुख शिक्षा केंद्र है। राज्य में इस तरह के 3 लाख से अधिक कर्मचारी हैं। इनमें बिना मान्यता प्राप्त संस्थानों में कार्यरत शिक्षक, सरकारी स्कूलों और कॉलेजों में गेस्ट फैकल्टी का काम करने वाले और निजी कालेजों में काम करने वाले शिक्षक भी शामिल हैं इनको 3,000 से 15,000 रुपये प्रति माह का वेतन मिलता है। इन शिक्षकों की हालत वास्तव में दयनीय है उनकी तनख्वाह पहले से ही बहुत कम है और लॉकडाउन अवधि के लिए वेतन का भुगतान न करने से उनके परिवार की आमदनी में भारी गिरावट आई है।

शिक्षक इस बात से भी चिंतित हैं कि जब स्कूल और कॉलेज कई महीनों के बाद फिर से खुलेंगे, तो प्राइवेट कालेजों में करोना महामारी के कारण आर्थिक मंदी के बहाने को लेकर, शिक्षकों की बड़े पैमाने पर छंटनी होगी, उन पर अतिरिक्त काम का बोझ डाला जायेगा और उन्हें बिना वेतन के कई महीनों तक काम करने के लिए मजबूर किया जायेगा। बहुत से शिक्षक इस समय अपनी नौकरी को भी खो देने के डर से कुछ भी बोलने से भी डरते हैं।

अधिकांश डिग्री कॉलेजों में लगभग 50 प्रतिशत अतिथि शिक्षक हैं। कॉलेज मैनेजमेंट अतिथि शिक्षकों को नियमित करने से बचने के लिए, प्रत्येक सेमेस्टर के अंत में, उनको नौकरी से निकाल देते हैं। ऐसी परिस्थितियों में सबसे पहले ये अतिथि शिक्षकों को ही नौकरी से निकाला जाता है। स्थाई शिक्षक भी जो लॉकडाउन की अवधि में ऑन-लाइन कक्षाएं ले रहे हैं, उन्हें भी 40 प्रतिशत कम वेतन लेने के लिए मजबूर किया जा रहा है, जबकि गैर-शिक्षण कर्मचारियों के वेतन में 60 प्रतिशत की कटौती हुई है।

प्राइवेट स्कूल के शिक्षकों को भी वेतन में कटौती और कहीं तो वेतन के बिना भी काम करने के लिए मजबूर किया जा रहा है। कई लोगों से कहा गया है कि उनको स्कूलों के फिर से खुलने के बाद ही उनका वेतन मिलेगा जिससे उनकी ज़िन्दगी में अनिश्चितता और असुरक्षा और भी बढ़ गयी है।

तमिलनाडु में नर्स मज़दूरी और वेतन बढ़ोतरी में समानता की मांग कर रहीं है

तमिलनाडु के निजी और सरकारी अस्पतालों में नर्स, जो कोविड-19 के खि़लाफ़ लड़ाई में अग्रिम पंक्ति के योद्धाओं में शामिल हैं, उन्हें अस्पताल के मैनेजमेंट द्वारा उनके वेतन और भत्ते से वंचित करने के प्रयासों के खि़लाफ़, इन कठिन परिस्थितियों में संघर्ष करना पड़ रहा है। राज्य के निजी अस्पतालों में नर्स मांग कर रही हैं कि उन्हें बिना किसी कटौती के अपना वेतन और भत्ता समय पर मिले। सरकारी अस्पतालों में जो नर्सें ठेके पर काम कर रहीं हैं उन्होंने अपने इतने कम वेतन के खि़लाफ़ शिकायत दर्ज़ की है और वे मांग कर रहीं हैं कि उनको देश के अन्य हिस्सों में काम करने वाली अपनी तरह की और नर्सों के बराबर वेतन दिया जाये।

समाचार रिपोर्टों के अनुसार, तमिलनाडु के कई प्राइवेट अस्पतालों ने सभी नर्सों, चाहे वे स्थाई या ठेके पर काम कर रहीं हैं, उनके वेतन में कटौती शुरू कर दी है। यहां तक कि जो करोना ग्रस्त रोगियों का इलाज कर रही हैं, उनके वेतन में भी कटौती की जा रही है। स्थाई या ठेके पर काम करने वाली नर्सें जिनका 12,000 से 25,000 रुपये प्रति माह का वेतन है, उनको इस तालाबंदी की हालतों में उनके वेतन में 15 प्रतिशत से 50 प्रतिशत तक की कटौती के लिए मजबूर किया जा रहा है। अस्पताल के मैनेजमेंट इसका कारण यह बता रहे हैं कि अस्पतालों में रोगियों की संख्या में कमी आयी है। नर्सों को ओवरटाइम भत्ते और रात की शिफ्ट के भत्ते से भी वंचित किया जा रहा है। बहुत सी नर्सों को इस्तीफा देने के लिए भी मजबूर किया गया है।

12 मई को कई प्राइवेट अस्पतालों में काम करने वाली सभी नर्सों ने एक विरोध प्रदर्शन किया और यह मांग की कि उन्हें उनका पूरा वेतन, बिना किसी कटौती के दिया जाए। उन्होंने यह भी मांग की कि उन्हें उनके ओवरटाइम भत्ते और रात की शिफ्ट के भत्ते और सभी भत्तों के भुगतान के लिए व्यवस्था को पुनस्र्थापित किया जाये।

सरकारी अस्पतालों में ठेके पर काम करने वाली नर्सों को 2015 में यह वादा किया गया था कि दो साल में वे स्थाई हो जायेंगी। लेकिन पांच साल तक काम करने के बाद भी न तो उनको स्थाई किया गया है और न ही उनके वेतन में वृद्धि हुई है। ठेके पर काम करने वाली नर्सों को केवल 14,000 रुपए प्रति माह का वेतन मिलता है और उनके वेतन में पिछले 2 सालों में कोई वृद्धि नहीं हुई है, जबकि उनको भी स्थाई नर्सों की तरह कोरोना रोगियों के इलाज के लिए ड्यूटी करनी पड़ती है तमिलनाडु सरकार एम.आर.बी. नर्सेज़ एम्पावरमेंट एसोसिएशन ने स्थाई और ठेके पर काम करने वाली सभी नर्सों के लिए समान काम के लिए समान वेतन की मांग की है और ठेके पर काम करने वाली सभी नर्सों को तत्काल स्थाई किये जाने की भी मांग की है।

रक्षा कर्मचारियों की यूनियनें कॉरपोरेटीकरण का सख्त विरोध करती हैं

रक्षा कर्मचारियों की तीन यूनियनें - अखिल भारतीय रक्षा कर्मचारी महासंघ (ए.आई.डी.ई.एफ.), भारतीय राष्ट्रीय रक्षा कर्मचारी महासंघ (आई.एन.डी.डब्ल्यू.एफ.) और भारतीय प्रतिरक्षा मज़दूर संघ (बी.पी.एम.एस.) - ने मिलकर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की घोषणाओं का कड़ा विरोध किया है जिनमें ऑर्डनेन्स फैक्ट्री बोर्ड (ओ.एफ.बी.) का कॉरपोरेटीकरण और रक्षा सामग्री के उत्पादन में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफ.डी.आई.) को बढ़ाकर 74 प्रतिशत कर दिया गया है। ये सभी घोषणायें आत्मानिर्भर भारत की पहल के चैथे अध्याय के हिस्से के रूप में पेश की गयी है।

वित्त मंत्री ने घोषणा की कि रक्षा सामग्री के उत्पादन में प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश (एफ.डी.आई.) की सीमा को 49 प्रतिशत से बढ़ाकर 74 प्रतिशत कर दिया गया है ऑर्डनेन्स फैक्ट्रियों का कॉरपोरेटीकरण, इस सरकार की प्राथमिकताओं में सबसे आगे था। यह क़दम, जिसको रिफार्म बोला जाता है, वर्तमान सरकार के पहले 100 दिनों में कार्यान्वयन के लिए घोषित प्रमुख परिवर्तनों में से एक महत्वपूर्ण क़दम की तरह पेश किया गया था। सरकार की घोषणा के अनुसार यह क़दम ”आयुध कारखानों की दक्षता में सुधार, गुणवत्ता बढ़ाने और उनके उत्पादों को प्रतिस्पर्धी बनाने“ कि लिए ज़रूरी है।

रक्षा कर्मचारियों की यूनियनों ने सरकार के इस एक-तरफा फ़ैसले की आलोचना की है, जो मज़दूरों के प्रतिनिधि संगठनों से परामर्श किए बिना लिया गया है, खासकर इस समय, जब सभी प्रकार के सामूहिक विरोध प्रदर्शनों पर पूर्ण प्रतिबंध है। उन्होंने स्पष्ट रूप से यह भी कहा है कि ऑर्डनेन्स फैक्ट्री बोर्ड (ओ.एफ.बी.) का कॉरपोरेटीकरण, ऑर्डनेन्स फैक्ट्रियों के निजीकरण के रास्ते में पहला क़दम है और जिसका वे शुरू से ही कड़ा विरोध करते रहे हैं उन्होंने ने ये चेतावनी भी दी है कि सरकार के इस क़दम से, बहुत से मज़दूरों को अपनी नौकरी खोने का भी ख़तरा है। उन्होंने सरकार से यह मांग की है कि वह तुरंत इस फ़ैसले को वापस ले, नहीं तो उनको एक देशव्यापी विरोध और हड़ताल के लिए सभी मज़दूरों को लामबंध करना होगा।

यूनियनों ने यह भी स्पष्ट किया है कि सरकार की एक और घोषणा जिसको “रक्षा क्षेत्र और सिविल एयरक्राफ्ट मेंटेनेंस, रिपेयर और ओवरहाल (एम.आर.ओ.) के बीच एकीकरण” बोला जा रहा है, वह भारतीय वायु सेना के बेस रिपेयर डिपो के निजीकरण के रास्ते में पहला क़दम है। उन्होंने सरकार की इस घोषणा की भी सख़्त आलोचना की है। बेस रिपेयर डिपो हार्डवेयर को बनाए रखने और वायुसेना के कई ट्रेड सीक्रेट्स (खुफिया जानकारी) को सुरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। मज़दूर यूनियनों ने आगाह किया है कि इस महत्वपूर्ण क्षेत्र को निजीकरण के लिए खोलने से देश की सुरक्षा को बहुत बड़ा ख़तरा है।

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Jun 1-15 2020    Struggle for Rights    Rights     2020   

पार्टी के दस्तावेज

8 जनवरी, 2020 की सर्व हिन्द आम हड़ताल को सफल करें!

मज़दूर एकता कमेटी का आह्वान

देश की दिशा पूंजीपतियों की अमीरी को बढ़ा रही है और मज़दूर, किसान व सभी मेहनतकशों को ग़रीबी में धकेल रही है। इस रास्ते का विरोध करने के लिए और देश की दौलत पर अपने अधिकार का दावा करने के लिए यह हड़ताल आयोजित की जा रही है।

मेहनतकशों का है यह नारा, हम हैं इसके मालिक! हिन्दोस्तान हमारा!

thumbपूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है। इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को। यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब, मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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