महान अक्तूबर क्रांति की 96वीं सालगिरह

सोवियत अनुभव से प्राप्त सबक लोकतंत्र की जंग जीतने में मजदूर वर्ग के लिये अतिआवश्यक हैं

7 नवंबर, 1917 को रूस के मजदूर वर्ग ने पूंजीपतियों और जमीनदारों की हुकूमत का तख्ता पलट किया था और मेहनतकश किसानों के साथ गठबंधन बनाकर अपना राज स्थापित किया था। मजदूरों और किसानों की सोवियतों ने अपने हाथ में सत्ता ली थी। रूस के मजदूर वर्ग को इस ऐतिहासिक काम में बोल्शेविक पार्टी ने अगुवाई दी थी।

रूसी समाजवादी संघीय सोवियत गणराज्य (रशियन सोशलिस्ट फेडरेटेड सोवियत रिपब्लिक) के प्रथम संविधान को 1918 में पांचवें सर्वरूसी सोवियत कांग्रेस ने अपनाया था। उसने ऐलान किया था कि रूस “मजदूरों, किसानों और सैनिकों के प्रतिनिधियों की सोवियतों का गणराज्य है। सभी केंद्रीय और स्थानीय ताकतें इन सोवियतों के हाथ में हैं।” उसने ऐलान किया था कि रूसी सोवियत गणराज्य “मुक्त राष्ट्रों के मुक्त संगम, मुक्त राष्ट्रीय गणराज्यों के संघ” के रूप में संगठित किया गया है। उस संविधान में इंसानों द्वारा इंसानों के शोषण को मिटाने की दिशा में, क्रांतिकारी सरकार द्वारा पारित किये गये सभी कानूनों को वैधता दी थी।

रूस के मजदूरों और किसानों की मिसाल से प्रेरित होकर, ज़ार के शासन तले दूसरे दबे-कुचले राष्ट्र भी मुक्त राष्ट्रों के इस मुक्त संगम में जुड़ गये। सोवियत समाजवादी गणराज्य संघ के 1924 के संविधान में इस वास्तविकता की झलक है।

सोवियत राज्य श्रमजीवी अधिनायकत्व - अपनी हिरावल पार्टी के नेतृत्व में, मजदूर वर्ग की अगुवाई में मेहनतकश बहुसंख्या का शासन - का तंत्र था। वह श्रमजीवियों की राजनीतिक सत्ता थी, इंसान द्वारा इंसान के सभी प्रकार के शोषण को मिटाने वाली सत्ता थी, वर्गहीन कम्युनिस्ट समाज की रचना की तैयारी करने वाली सत्ता थी। उसमें सभी मेहनतकशों की आज़ादियों और अधिकारों को सुनिश्चित किया गया और साथ ही साथ, सभी व्यक्तियों को किसी दूसरे के श्रम का शोषण करने के “अधिकार” से वंचित किया गया। वह एक नये प्रकार का लोकतंत्र था, श्रमजीवी लोकतंत्र।

लोकतंत्र एक विशेष प्रकार की राजनीतिक सत्ता है, वर्ग शासन का एक रूप है। वर्तमान युग में या तो पूंजीवादी लोकतंत्र हो सकता है या श्रमजीवी लोकतंत्र। जब बोल्शेविक पार्टी ने सोवियत संघ के मजदूर वर्ग को श्रमजीवी लोकतंत्र स्थापित करने और समाजवाद का निर्माण करने में अगुवाई दी, उस समय से दुनिया के साम्राज्यवादी पूंजीपतियों ने सोवियत लोकतंत्र और समाजवादी व्यवस्था को बदनाम करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।

आज लोकतंत्र के सवाल पर पूंजीपतियों और श्रमजीवियों के बीच में तीक्ष्ण टक्कर है। इस संघर्ष का केंद्रीय सवाल यह है कि किस वर्ग को समाज की दिशा निर्धारित करने का अधिकार होना चाहिये? क्या उस वर्ग को जो मुट्ठीभर शोषकों की अगुवाई करता है, या उस वर्ग को जो शोषित और उत्पीड़ित बहुसंख्या की अगुवाई करता है?

जब पूंजीपति वर्ग समाज का नेता बना, तो उसने संसदीय लोकतंत्र समेत नाना प्रकार की सत्ताओं को स्थापित किया। संसदीय लोकतंत्र में एक निर्वाचित निकाय को सर्वोच्च फैसले लेने का अधिकार दिया जाता है। पूंजीपतियों के अलग-अलग तबके अपनी-अपनी राजनीतिक पार्टियां बनाते थे और इस निर्वाचित निकाय पर नियंत्रण करने के लिये आपस में स्पर्धा करते थे।

अधिकांश लोगों, मजदूरों और मेहनतकश किसानों को प्रतिनिधित्ववादी लोकतंत्र की इस प्रक्रिया से पूरी तरह बाहर रखा जाता था।

जैसे-जैसे पूंजीवाद का विकास हुआ, वैसे-वैसे मजदूर वर्ग की संख्या और ताकत बढ़ती गई। पूंजीवादी शोषण के खिलाफ़ एकजुट संघर्ष करने की ज़रूरत से प्रेरित होकर मजदूर वर्ग एक संगठित ताकत के रूप में विकसित हुआ, उसने काम की जगहों पर अपने यूनियन बनाये, फिर समय के साथ-साथ अपनी राजनीतिक पार्टियां बनाईं और यह मांग रखी कि प्रतिनिधित्व की प्रक्रिया का विस्तार करके मेहतनकश बहुसंख्या को भी उसमें शामिल किया जाये।

20वीं सदी के आरंभ में सर्वव्यापी बालिग मतदान का अधिकार मजदूर वर्ग और महिला आंदोलन की ओर से एक प्रगतिशील मांग थी। यह उस समय कहीं भी हासिल नहीं हुआ था। संयुक्त राज्य अमरीका में जिनके पास कोई जायदाद न थी, जो अश्वेत या महिला थी, उन्हें मतदान करने या चुनाव के लिये नामांकित किये जाने के अधिकार से वंचित रखा जाता था।

रूस में मजदूरों, किसानों और सैनिकों के प्रतिनिधियों के सोवियत बोल्शेविक पार्टी की अगुवाई में किये गये क्रांतिकारी संघर्षों के दौरान उभर कर आये थे। वे ज़ार की हुकूमत के खिलाफ़ वर्ग संघर्ष के तंत्र बतौर उभर कर आये थे। वे ज़ार की सत्ता का तख्ता पलट करने के संघर्ष में आगे थे। ज़ार की सत्ता का तख्ता पलट करने के बाद यह सवाल उठा कि क्या सोवियतों को सत्ता अपने हाथों में लेनी चाहिये या क्या किसी पूंजीवादी संसद को सत्ता सौंप देनी चाहिये।

सोवियतों के बीच में, बोल्शेविकों का यह विचार था कि सोवियतों को अपने हाथों में सत्ता लेनी चाहिये। मेनशेविकों और सोशलिस्ट रेवोल्यूशनरियों ने इसका विरोध किया। बोल्शेविक अधिकतम मजदूरों, किसानों और सैनिकों को “सोवियतों के हाथ में पूरी सत्ता!”, इस नारे के पक्ष में लामबंध करने में कामयाब हुये। अक्तूबर क्रांति, जब मजदूर वर्ग और उसकी सेना ने शीत महल पर धावा बोला था, से यह नारा वास्तविकता में तब्दील हो गया।

1918 के संविधान में मतदाताओं को चुने गये प्रतिनिधि को किसी समय वापस बुलाने के अधिकार की संवैधानिक गारंटी दी गई। आज तक किसी भी पूंजीवादी देश में यह अधिकार नहीं दिया जाता है। हालांकि आज सभी को मतदान का अधिकार दिया गया है, परन्तु बाकी सभी अधिकार सिर्फ चुने गये प्रतिनिधियों के विशिष्ट समूह तक ही सीमित हैं।

बोल्शेविक पार्टी ने वर्ग संघर्ष को सफलतापूर्वक अगुवाई दी और समाजवादी उद्योग तथा सामूहिक कृषि के तेज़ गति से विकास के ज़रिये, समाजवाद के आर्थिक आधार का निर्माण पूरा किया। किसी भी रुकावट या संकट के बिना, सामाजिक और मानवीय विकास के क्षेत्र में बहुत बड़ी प्रगतियां की गईं। 30 के दशक तक सामाजिक उत्पादन के साधनों में कोई निजी जायदाद न रही, अतः एक वर्ग द्वारा दूसरे वर्ग के शोषण का आर्थिक आधार न रहा।

1918 के संविधान में शोषक वर्गों के सदस्यों को मतदान के अधिकार से वंचित किया गया था। 1936 में सोवियत संघ के लोगों ने पूरी चर्चा के बाद एक नया संविधान अपनाया, जिसमें यह माना गया कि उस देश में कोई शोषक वर्ग अब नहीं बचे थे। सिर्फ मजदूरों और सहकारी किसानों के मित्रतापूर्ण वर्ग थे तथा जनता के बुद्धिजीवियों का तबका। नये संविधान में, वर्ग के आधार पर कोई भेदभाव किये बिना, सभी बालिग नागरिकों को राजनीतिक अधिकार दिये गये।

1936 के सोवियत संविधान में एक ऐसी राजनीतिक प्रक्रिया का आधार स्थापित किया गया, जिसमें मतदाता अपने उम्मीदवारों का चयन करते थे। निर्वाचन क्षेत्र में हर प्रकार का जन संगठन - कम्युनिस्ट पार्टी की स्थानीय शाखा, मजदूर यूनियन, किसान संगठन, महिला संगठन, छात्र संगठन या नौजवान क्लब - विधान सभाओं के चुनाव के लिये अपना उम्मीदवार नामांकित कर सकता था। सभी नामांकनों की लंबी और विस्तृत चयन प्रक्रिया होती थी, जिसमें मतदाताओं को अपना विचार प्रकट करने और अपने अधिकारों का इस्तेमाल करने की पूरी क्षमता दी जाती थी। चयन प्रक्रिया के बाद मतदाताओं की सहमति प्राप्त उम्मीदवारों की सूची बनाई जाती थी। उसके बाद ही जनता द्वारा चयनित उम्मीदवारों की इस सूची के आधार पर मतदान किया जाता था।

सभी चुने गये प्रतिनिधियों से विधान सभा का गठन किया जाता था, जो सामूहिक रूप से फैसला लेती थी और जिसमें सत्ता पक्ष और विपक्ष का कोई बंटवारा नहीं होता था। कार्यकारिणी का काम था यह सुनिश्चित करना कि विधान सभा द्वारा लिये गये फैसलों को लागू किया जा रहा है। कार्यकारिणी को निर्वाचित विधान सभा के सामने जवाब देना पड़ता था और निर्वाचित विधान सभा कार्यकारिणी के सदस्यों को अपने पदों से वापस बुला सकती थी। विधान सभा के सदस्यों को मतदाता किसी भी समय वापस बुला सकते थे।

1936 के संविधान को अपनाये जाने के कुछ ही समय बाद, इस प्रक्रिया के अनुसार सोवियत संघ में चुनाव हुये। सोवियत पार्टी और राज्य के अंदर निहित स्वार्थों के विरोध पर काबू पाकर और जनता की जागरुकता को बढ़ाकर, इस नई राजनीतिक प्रक्रिया को स्थापित और मजबूत करने के संघर्ष को बोल्शेविक पार्टी ने अगुवाई दी। 1939 में दूसरे विश्व युद्ध की वजह से इस संघर्ष में रुकावट आई। जब जंग समाप्त हुई और अर्थव्यवस्था तथा ढांचागत व्यवस्था का पुनर्निर्माण पूरा हुआ, तब सोवियत पार्टी को इस नई राजनीतिक प्रक्रिया को मजबूत करने के काम पर ध्यान देना चाहिये था। परन्तु 50 के दशक में क्रुश्चेववादियों ने सत्ता में अगुवा स्थान लिया और उन्होंने इस काम को अनिश्चित काल तक स्थगित कर दिया। उन्होंने इसकी जगह पर अपना दूसरा कार्यक्रम चलाया, जिसका उद्देश्य था मेहनतकशों को सत्ता से वंचित करना और फैसले लेने के अधिकार को संशोधनवादी पार्टी के उच्चस्तरीय नेताओं के हाथों में ही संकेंद्रित करना।

60 और 70 के दशकों तक आर्थिक आधार में पूंजीवादी व्यवस्था की पुनःस्थापना हो चुकी थी जबकि राजनीतिक ढांचे का बाहरी रूप सोवियत सत्ता के जैसा रहा। वास्तव में सभी ताकत नये संशोधनवादी पूंजीपतियों के हाथों में संकेंद्रित थीं। लोगों को समाज के फैसलों से बाहर रखने वाली राजनीतिक प्रक्रिया के खिलाफ़ जनता का असंतोष बढ़ता गया और पूंजीपतियों के एक तबके ने जनता की इन भावनाओं के साथ खिलवाड़ करके, अपना दांवपेच चलाकर, समाजवाद के सभी अवशेषों को मिटा दिया। गोरबाचोव ने ग्लासनोस्त और पेरेस्त्रोइका के नाम से पूंजीवादी सुधार लागू किये, जिससे आगे चलकर येल्तसिन ने सोवियत राज्य का अंतिम विनाश किया और उसके स्थान पर संपूर्णतया पूंजीवादी लोकतंत्र की स्थापना की।

सोवियत लोकतंत्र के उत्थान और पतन के अनुभव की समीक्षा करते हुये हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि आधुनिक श्रमजीवी लोकतंत्र में संप्रभुता संपूर्ण जनता के हाथ में होनी चाहिये। समाज के प्रत्येक बालिग सदस्य को चुनने और चुने जाने, यानि उम्मीदवारों के चयन में निर्णायक भूमिका अदा करने का पूरा अधिकार सुनिश्चित होना चाहिये। यह सुनिश्चित होना चाहिये कि कार्यकारिणी निर्वाचित विधान सभा के प्रति जवाबदेह हो तथा उसके आदेशानुसार काम करे और विधान सभा मतदाताओं के प्रति जवाबदेह हो तथा उनके आदेशानुसार काम करे।

कम्युनिस्टों को “पार्टीवादी शासन” के सिद्धांत और अभ्यास को खारिज करना होगा, चाहे यह मतपेटी से हो या बंदूक की गोली से, चाहे यह किसी एक पार्टी का राज हो या समय-समय पर अलग-अलग पार्टियों के स्थानांतरण से हो। इतिहास में यह देखने में आता है कि पार्टीवादी शासन पूंजीपतियों के अधिनायकत्व की सत्ता को ही बरकरार रखने का तरीका है।

किसी एक पार्टी या गठबंधन जिसे विधान सभा में बहुमत मिलता है, उसके हाथ में सर्वोच्च ताकत देना और बाकी निर्वाचित सदस्यों को ‘विपक्ष’ की छावनी में डाल देना, यह राज्य का स्वरूप और राजनीतिक प्रक्रिया पूंजीपति वर्ग के अधिनायकत्व के लिये उपयुक्त है, क्योंकि पूंजीपति वर्ग स्वाभाविकतः आपस में स्पर्धा करने वाले मोर्चों में बंटा हुआ होता है। परन्तु मजदूर वर्ग की यह विशेषता है कि उसके वर्ग का एक हित है और एक उद्देश्य है - सभी प्रकार के शोषण और दमन को खत्म करना। मजदूर वर्ग के शासन में यह ज़रूरी है कि संपूर्ण निर्वाचित निकाय अपने सभी फैसलों तथा उनके कार्यान्वयन के लिये मतदाताओं के प्रति जिम्मेदार और जवाबदेह हो। सत्ता पक्ष और विपक्ष के विभाजन का मजदूर वर्ग के शासन में कोई स्थान नहीं है। निर्वाचित प्रतिनिधियों को जवाबदेह ठहराकर, मतदाताओं को सर्वोच्च ताकत का इस्तेमाल करने में सक्षम बनाने की भूमिका को निभाने के लिये, एक राजनीतिक पार्टी की आवश्यकता है।

राजनीतिक सत्ता में प्रमुख सवाल यह है कि संप्रभुता, यानि सर्वोच्च फैसले लेने की ताकत किसके हाथ में है। संसदीय लोकतंत्र जैसी पुरानी प्रकार की सत्तायें अल्पसंख्यक शोषकांे के अधिनायकत्व के पुराने प्रकार के शासन के उपयुक्त हैं। नये प्रकार के शासन - श्रमजीवी अधिनायकत्व, बहुसंख्यक श्रमिकों के राज - को नये प्रकार के प्रतिनिधित्व की आवश्यकता है। इसके लिये आधुनिक संस्थानों तथा एक ऐसी राजनीतिक प्रक्रिया की आवश्यकता है, जिसमें संप्रभुता किसी एक पार्टी या अनेक पार्टियों के गठबंधन के हाथों में न हो बल्कि समाज के सभी बालिग सदस्यों के हाथों में हो और उन्हें चुनने व चुने जाने का अधिकार हो।

सोवियत लोकतंत्र के उत्थान और पतन के अनुभव की समीक्षा से हम इन निष्कर्षों पर पहुंचते हैं। कम्युनिस्टों को साम्राज्यवाद और पूंजीपतियों के उस दावे को चुनौति देनी होगी कि बहुपार्टीवादी प्रतिनिधित्ववादी लोकतंत्र का कोई विकल्प नहीं हो सकता। हमें जनता के हाथों में संप्रभुता दिलाने वाले संविधान के साथ, श्रमजीवी लोकतंत्र स्थापित करने के संघर्ष को अगुवाई देनी होगी।

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पार्टी के दस्तावेज

8 जनवरी, 2020 की सर्व हिन्द आम हड़ताल को सफल करें!

मज़दूर एकता कमेटी का आह्वान

देश की दिशा पूंजीपतियों की अमीरी को बढ़ा रही है और मज़दूर, किसान व सभी मेहनतकशों को ग़रीबी में धकेल रही है। इस रास्ते का विरोध करने के लिए और देश की दौलत पर अपने अधिकार का दावा करने के लिए यह हड़ताल आयोजित की जा रही है।

मेहनतकशों का है यह नारा, हम हैं इसके मालिक! हिन्दोस्तान हमारा!

thumbपूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है। इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को। यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब, मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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