महान अक्तूबर क्रांति की 98वीं सालगिरह

आने वाले इंकलाबी तूफानों के लिये तैयारी करें!

हिन्दोस्तान समेत पूरी दुनिया में एक ज्वालामुखी जैसी स्थिति है, जिसका कभी भी विस्फोट हो सकता है।

25 वर्षों से अधिक समय से पूंजीपति और साम्राज्यवादी यह दोहराते रहे हैं कि पूंजीवादी व्यवस्था का कोई विकल्प नहीं है। हिन्दोस्तान और पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया के दूसरे सभी देशों में मजदूर वर्ग और मेहनतकश जनसमुदाय लगातार बढ़ते शोषण और दमन के असहनीय बोझ तले कराह रहे हैं। 20वीं सदी के दौरान, मजदूर वर्ग ने बहादुर संघर्षों और कुर्बानियों के ज़रिये जिन अधिकारों को हासिल किया था, उन पर अब हमले किया जा रहे हैं। हमारे देश में और सारी दुनिया में “आतंकवाद के खिलाफ़ जंग”, “राष्ट्रीय सुरक्षा” और “राष्ट्रीय एकता व क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा” के नाम पर, मेहनतकश जनसमुदाय पर तेज़ी से फासीवादी हमले किये जा रहे हैं।

सबसे शक्तिशाली साम्राज्यवादी राज्य आर्थिक संकट के बोझ को बलपूर्वक कमज़ोर राज्यों पर लाद रहे हैं, इस बात की कोई परवाह किये बिना कि उन देशों के लोगों के लिये इसके परिणाम कितने तबाहकारी होंगे। अमरीकी साम्राज्यवाद दुनिया के विभिन्न देशों में गृहयुद्ध आयोजित कर रहा है, तरह-तरह के आतंकवादी गिरोहों को संगठित कर रहा है, हथियार सप्लाई कर रहा है और वैत्तिक सहायता दे रहा है तथा सीधे तौर पर सैनिक दखलंदाजी भी कर रहा है। वह अपनी प्रधानता के सामने हर चुनौती को कमजोर करके, पूरी दुनिया पर अपना निर्विरोध वर्चस्व जमाने की पूरी कोशिश कर रहा है।

साथ ही साथ, मजदूर वर्ग और व्यापक जनसमुदाय अपनी असहनीय हालतों के खिलाफ़ बहुत गुस्से में है। हिन्दोस्तान और सारी दुनिया में मजदूर बढ़ते पूंजीवादी शोषण के खिलाफ़, अपनी राष्ट्रीय संप्रभुता के हनन के खिलाफ़ और फासीवाद व साम्राज्यवादी जंग के खिलाफ़ बड़े-बड़े विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। परन्तु इसके बावजूद, मजदूर साम्राज्यवादियों और पूंजीपतियों को अपने रास्ते पर बेलगाम आगे बढ़ने से नहीं रोक पा रहे हैं। मजदूर यह समझ रहे हैं कि सरकार चाहे किसी भी पार्टी के हाथ में हो, उसका अजेंडा पूंजीपतियों और साम्राज्यवादियों द्वारा तय किया जाता है और मजदूर वर्ग व मेहनतकश जनसमुदाय पर हमले बढ़ते ही रहते हैं।

हमारे देश में मजदूर और मेहनतकश जनसमुदाय एक विकल्प को तलाश रहे हैं। वह विकल्प श्रमजीवी क्रांति है, जो पूंजीवाद, सामंतवाद के अवशेषों, उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद को खत्म करेगी और एक आधुनिक समाजवादी हिन्दोस्तान का निर्माण करेगी, जो इंसान द्वारा इंसान के हर प्रकार के शोषण से मुक्त होगा।

98 वर्ष पहले, लेनिन की बोल्शेविक पार्टी की अगुवाई में, रूस के मजदूर वर्ग ने वहां ठीक ऐसी ही क्रांति लायी थी। असहनीय पूंजीवादी शोषण और अंतर-साम्राज्यवादी विश्वयुद्ध, जिसमें पूंजीपतियों के मुनाफ़ों के खातिर मजदूर वर्ग को दूसरे देशों के अपने भाइयों-बहनों का कत्ल करने के लिये संगठित किया गया था, रूस के मजदूरों ने ऐलान किया कि “बस, अब बहुत हो गया है”। रूस के मजदूरों ने क्रांतिकारी बग़ावत की, पहले ज़ार के घिनावने शासन का तख़्तापलट किया और फिर रूस के पूंजीपतियों और जमीनदारों के शासन का तख़्तापलट किया। 7 नवम्बर, 1917 को मजदूरों, किसानों और सैनिकों की क्रांतिकारी समितियों (जो सोवियत के नाम से जाने जाते थे) ने राजनीतिक सत्ता अपने हाथों में ले ली। उन्होंने इन क्रांतिकारी समितियों की नींव पर एक नये राज्य की स्थापना की।

वह नया राज्य श्रमजीवी वर्ग के अधिनायकत्व का राज्य था - यानी मेहनतकश किसानों के साथ मजदूर वर्ग के गठबंधन का शासन था। वह मुट्ठीभर शोषकों पर व्यापक बहुसंख्या का शासन था। जब क्रांतिकारी मजदूर, किसान और सैनिक पूंजीपतियों और जमीनदारों की सेनाओं के खिलाफ़ संघर्ष कर रहे थे, तो साथ ही साथ, क्रांतिकारी राज्य ने कई कानून पास किये जिनसे यह स्पष्ट हो गया कि मजदूर और किसान अपने ही कार्यों के ज़रिये इस धरती पर स्वर्ग की रचना कर सकते हैं। क्रांतिकारी सरकार ने किसानों को सामंती गुलामी के सभी अवशेषों से मुक्त कराया। उसने ऐलान किया कि इससे पहले जिन राष्ट्रों पर रूस के ज़ार की सरकार दमन करती थी, वे अब मुक्त होंगे और खुद अपना भविष्य तय कर सकेंगे। ये राष्ट्र खुद अपना स्वतंत्र रास्ता चुन सकेंगे या नव-निर्मित सोवियत समाजवादी गणराज्य संघ के साथ जुड़ सकेंगे और उन्हें अलग होने तक, आत्म-निर्धारण का अधिकार होगा।

मजदूरों और किसानों की इस क्रांति को कुचलने के लिये, 14 साम्राज्यवादी ताकतों ने मिलकर, रूस के पूंजीपतियों और जमीनदारों की सेनाओं का समर्थन करने के लिये अपनी सेनाएं भेजीं। चार वर्षों तक खूनी गृहयुद्ध के बाद, अंत में साम्राज्यवादियों और पूंजीपतियों व जमीनदारों को पराजित किया गया। अपने संघर्ष से स्थापित नये क्रांतिकारी राज्य की हिफ़ाज़त करने के लिये, रूस के सभी शोषित और दबे-कुचले लोग बोल्शेविक पार्टी के मार्गदर्शन तले, मजदूर वर्ग की अगुवाई में एकजुट हो गये।

नये राज्य में मजदूरों और किसानों की ज़रूरतों को पूरा करने के लिये, अर्थव्यवस्था को नयी दिशा में चलाने के उद्देश्य से, फौरन कई कदम उठाये। सभी बड़े-बड़े कारखानों, खदानों, बैंकों और रेलवे का राष्ट्रीयकरण किया गया। उत्पादन और विनिमय के सभी मुख्य साधनों को राज्य ने अपने हाथों में ले लिया और उन्हें समाज के नियंत्रण में रखा। विदेश व्यापार और थोक घरेलू व्यापार का राष्ट्रीयकरण किया गया।

सोवियत राज्य ने मेहनतकश जनसमुदाय के जीवन की हालतों में उन्नति लाने के कदम उठाये। एक सार्वजनिक वितरण व्यवस्था स्थापित की गई, यह सुनिश्चित करने के लिये कि मजदूरों को भूखा न रहना पड़े। स्कूल की शिक्षा को सर्वव्यापी और बाध्यकारी बनाया गया, और ऐसी हालतें पैदा की गईं ताकि सभी बच्चे स्कूल जा सकें। मजदूरों और किसानों के नये राज्य ने महिलाओं को मतदान के अधिकार समेत, सभी मामलों में समान अधिकार सिर्फ औपचारिक तौर पर ही नहीं दिये, बल्कि उन अधिकारों को हक़ीकत में बदलने के कदम भी लिये। विवाह के बाहर जन्मे बच्चों को बाकी सभी बच्चों के समान अधिकार दिये गये। बच्चों के लिये शिशु पालन केन्द्र स्थापित किये गये ताकि माताएं काम पर जा सकती थीं। कारखानों और काम की जगहों पर सार्वजनिक भोजनालय स्थापित किये गये। आवास की समस्या को हल किया गया।

सोवियत कानून के तहत ज़मीर के अधिकार की गारंटी दी गई। सोवियत संघ के नागरिकों को खुलकर अपने विचार रखने, जनसभाएं आयोजित करने और अखबारों में अपने विचार प्रकट करने की आज़ादी दी गयी। सिर्फ मजदूरों के श्रम का शोषण करने के पूंजीपतियों के “अधिकार” को खारिज़ किया गया। रूस के जो राष्ट्र स्वेच्छा से सोवियत संघ में जुड़े थे, उनके अपने-अपने संविधान, अपनी-अपनी सेनाएं, अपने-अपने प्रशासन और सोवियत संघ के झंडे के साथ-साथ अपने-अपने झंडे थे। सोवियत संघ के विविध लोगों की भाषाओं और संस्कृतियों का तेज़ी से विकास हुआ। सोवियत संघ के भ्रात्रीय लोगों की आपसी मित्रता भी तेज़ी से विकसित हुई।

युद्ध से हुये विनाश की हालतों से अर्थव्यवस्था का पुनरुत्थान करने के बाद, सोवियत राज्य ने किसानों को सामूहिकीकरण करने के लिये प्रोत्साहित करने का काम उठाया। मजदूरों और किसानों के राज्य ने कृषि-समूहों को टैªक्टर व दूसरी मशीनों, उर्वरक, बिजली और दूसरी ज़रूरी चीजों की भरपूर सहायता दी। इसके बदले में कृषि समूह अपनी उपज के कुछ हिस्से को मजदूरों और किसानों के राज्य को सौंपा करते थे। उद्योग और कृषि, दोनों में क्या व कितना उत्पादन होगा, यह राज्य की योजना के अनुसार किया जाता था और मजदूरों व किसानों की हालतों में लगातार उन्नति लाने के उद्देश्य से किया जाता था। 1935 तक वहां शहरों और गांवों में समाजवादी समाज का निर्माण हो चुका था। इसे हासिल करने में बहुत संघर्ष और कुर्बानी करनी पड़ी, क्योंकि मजदूरों और किसानों के अंदरूनी और बाहरी दुश्मनों ने पूंजीवाद तथा मजदूरों-किसानों के शोषण और लूट की पुनःस्थापना करने के अपने सपने नहीं त्यागे।

1936 में सोवियत संघ ने एक नया संविधान अपनाया। पूरे सोवियत संघ ने संविधान के मसौदे पर चर्चा में भाग लिया, जिसके बाद उस पर सहमति प्राप्त की गई। सोवियत संघ का 1936 का संविधान आज भी दुनिया में कहीं भी अपनाया गया सबसे अगुवा संविधान माना जाता है।

उस संविधान में न सिर्फ सर्वव्यापक प्रौढ़ मताधिकार को सुनिश्चित किया गया, बल्कि ऐसे तंत्र स्थापित किये गये ताकि संप्रभुता वास्तव में लोगों के हाथ में हो। लोग चुनाव से पहले अपने उम्मीदवारों का चयन कर सकते थे और अपना फ़र्ज न निभाने वाले प्रतिनिधियों को वापस बुला सकते थे। लोगों को कानून प्रस्तावित करने का अधिकार भी था।

1930 के दशक में जब पूरी पूंजीवादी दुनिया घोर संकट में फंसी थी, तो उस दौर में सोवियत संघ एक से दूसरी कामयाबी की ओर आगे बढ़ता रहा। दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान सोवियत लोगों की प्रबल अंदरूनी एकता नज़र आयी। नाज़ी फासीवाद को हराने में सोवियत संघ ने दुनिया के लोगों को अगुवाई देने की निर्णायक भूमिका निभाई। इस जीत के बाद दुनिया के अनेक देश अक्तूबर क्रांति द्वारा दिखाये गये रास्ते पर चल पड़े।

सोवियत संघ के विघटन और सारी दुनिया में क्रांति के पीछे हटने की अवधि की शुरुआत के बाद, आज 25 वर्ष बीत गये हैं। सोवियत संघ का पतन इसलिये हुआ क्योंकि क्रुश्चेव की अगुवाई में सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व ने समाजवाद के निर्माण के प्रारंभिक पड़ाव के बाद, समाजवादी समाज में पैदा होने वाली नयी समस्याओं को हल करने से इंकार कर दिया था।

यह तथ्य था कि सोवियत समाज में शोषक वर्ग खत्म हो गये थे। इस तथ्य का दुरुपयोग करके सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी ने 1956 में हुये अपने 20वें महाअधिवेशन में ऐलान कर दिया कि अब वर्ग संघर्ष विकास का आधार नहीं रहा। लोगों को सत्ता में लाने के जिस उद्देश्य के साथ 1936 के संविधान को अपनाया गया था, उसे हासिल करने के लिये श्रमजीवी नेतृत्व को मजबूत करने के बजाय, क्रुश्चेव की अगुवाई में सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी ने संपूर्ण जनता की पार्टी” और संपूर्ण जनता का राज्य” जैसी अवधारणाओं को प्रस्तुत किया। इन नारों को बढ़ावा देकर मेहनतकश लोगों को नींद की गोली खिलाई गई और विशेष अधिकार वाले राजनेताओं की एक नई श्रेणी पैदा की गई, जिससे पूंजीवाद की पुनः स्थापना का रास्ता खुल गया। राष्ट्रों के आत्म-निर्धारण के अधिकार का आदर करने तथा उसे सुनिश्चित करने के बजाय सोवियत नेताओं ने देश के भीतर रूसी शोवींवाद को बढ़ावा दिया और वारसा संधि के अन्य सदस्य राज्यों के लिये सीमित संप्रभुता” की अवधारणा को बढ़ावा दिया। आगामी दशकों में सोवियत संघ को क्रमशः एक समाजवादी मुखौटा पहनी हुई साम्राज्यवादी महाशक्ति में बदल दिया गया, जो दुनिया पर अपना वर्चस्व जमाने के लिये अमरीकी साम्राज्यवाद के साथ होड़ लगाने लगी।

आज जब हम आने वाले इंकलाबी तूफानों के लिये तैयारी कर रहे हैं, तो महान अक्तूबर क्रांति के सबकों को सीखकर उनका पालन करना बहुत महत्वपूर्ण है। सोवियत संघ में समाजवादी निर्माण के प्रारंभिक पड़ाव में प्राप्त की गई सफलताओं की कुंजी यह थी कि मजदूर वर्ग की अडिग क्रांतिकारी पार्टी की अगुवाई में मजदूरों, किसानों और सैनिकों के प्रतिनिधियों की सोवियतों के हाथों में पूरी ताकत सौंपी गई थी। जब 1936 का संविधान अपनाया गया, तो आगे की प्रगति का रास्ता भी स्पष्ट हो गया था। वह रास्ता था एक तरफ मजदूर वर्ग की पार्टी की हिरावल भूमिका को और विकसित करना तथा दूसरी तरफ, शासन चलाने में मेहनतकश लोगों की भूमिका को बढ़ाना, ताकि लोगों द्वारा खुद अपना शासन करने का अंतिम उद्देश्य हासिल हो सके। परन्तु 1956 के बाद पार्टी और उसकी पॉलिट ब्यूरो के हाथों में फैसले लेने की पूर्ण ताकत को संकेंद्रित कर दिया गया, जिसकी वजह से विशेष अधिकारों वाली एक नई श्रेणी पैदा हुई, बेरोजगारी और पूंजीवाद की अन्य बीमारियां फिर से पनपने लगीं तथा मेहनतकश लोगों का राज्य पर से भरोसा उठने लगा और आगे चलकर सोवियत संघ का ही विघटन हो गया।

आज पूंजीवादी और साम्राज्यवादी ताकतें दुनिया को जिस तबाहकारी रास्ते पर धकेल रही हैं, उससे दुनिया को बचाने के लिये श्रमजीवी क्रांतियों के दूसरे दौर की सख्त ज़रूरत है। हिन्दोस्तान में क्रांति के ज़रिये समाजवाद का रास्ता खोलने के लिये, हम सब मार्क्सवाद-लेनिनवाद के झंडे तले एकजुट होकर आगे बढ़ें। कम्युनिस्टों की एकता की पुनः स्थापना करने और लोगों को सत्ता में लाने के साधन बतौर हिन्दोस्तानी मजदूर वर्ग की अटूट हिरावल पार्टी की स्थापना करने के लिये मिलकर काम करें।

महान अक्तूबर क्रांति ज़िन्दाबाद!

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पार्टी के दस्तावेज

8 जनवरी, 2020 की सर्व हिन्द आम हड़ताल को सफल करें!

मज़दूर एकता कमेटी का आह्वान

देश की दिशा पूंजीपतियों की अमीरी को बढ़ा रही है और मज़दूर, किसान व सभी मेहनतकशों को ग़रीबी में धकेल रही है। इस रास्ते का विरोध करने के लिए और देश की दौलत पर अपने अधिकार का दावा करने के लिए यह हड़ताल आयोजित की जा रही है।

मेहनतकशों का है यह नारा, हम हैं इसके मालिक! हिन्दोस्तान हमारा!

thumbपूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है। इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को। यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब, मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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