मोदी सरकार के मज़दूर-विरोधी, किसान-विरोधी, समाज-विरोधी और राष्ट्र-विरोधी अजेंडा को हराने के लिये संगठित हों!

2 सितंबर की आम हड़ताल को सफल बनाएं!

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति का बयान, 28 अगस्त, 2016

साथियों,

देशभर के मज़दूर अपने अधिकारों तथा देश के सभी शोषित और उत्पीड़ित लोगों के अधिकारों की हिफाज़त में 2 सितंबर को सड़कों पर उतरेंगे। राज्यों की राजधानियों और जिलों में, अलग-अलग औद्योगिक क्षेत्रों में, इस हड़ताल को सफल बनाने के लिये देशव्यापी स्तर पर, पार्टी संबंधों से ऊपर उठकर, सैंकड़ों ट्रेड यूनियनें  मिलकर काम कर रही हैं। इस आम हड़ताल के ज़रिये हम मोदी सरकार के मज़दूर-विरोधी, किसान-विरोधी, समाज-विरोधी और राष्ट्र-विरोधी अजेंडा, जो हमारे जनसमुदाय के जीवन को नरक बना रहा है, इसको पराजित करने के लिये संगठित होने का अपना संकल्प प्रकट करेंगे।

पिछले साल इसी दिन पर 10 करोड़ मज़दूरों ने देशव्यापी आम हड़ताल में भाग लिया था। उसके बाद हमने देश भर में कई हड़तालें व विरोध प्रदर्शन आयोजित किये हैं। परन्तु मज़दूर वर्ग के अडिग विरोध के बावजूद, भाजपा नीत राजग सरकार उदारीकरण व निजीकरण के ज़रिये वैश्वीकरण के कार्यक्रम को बड़े हमलावर तरीके से लागू करती रही है। भाजपा, कांग्रेस और सत्ता पर आयी दूसरी पार्टियों द्वारा 25 वर्ष तक इस कार्यक्रम को लागू करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि इस कार्यक्रम का एक ही उद्देश्य है - सबसे बड़े हिन्दोस्तानी और विदेशी इज़ारेदार पूंजीपतियों के अधिकतम मुनाफ़ों की अमिट भूख को पूरा करना। सरकार ने अपने कार्यों से यह ऐलान कर दिया है कि मज़दूरों और पूरे समाज पर इस कार्यक्रम का जो भयानक परिणाम होगा, इसके बारे में उसे थोड़ी सी भी चिंता नहीं है।

मेक इन इंडिया” और ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस (कारोबार चलाना आसान बनाना)” के नारों के साथ सरकार ऐसी हालतें पैदा करने में लगी है, जिनमें हिन्दोस्तानी और विदेशी पूंजीपति हमारे लोगों की भूमि, श्रम और प्राकृतिक संसाधनों के शोषण और लूट को और बढ़ा सकेंगे। सरकार ने अनेक वर्षों के संघर्षों के ज़रिये जीते गये मज़दूरों के अधिकारों पर वहशी हमले शुरू कर दिये हैं। अधिक से अधिक मज़दूरों को तरह-तरह के श्रम कानूनों के दायरे से बाहर निकाला जा रहा है, जिनसे पहले उन्हें थोड़ी-बहुत सुरक्षा मिलती थी। सरकार मज़दूरों को अपनी पसंद की यूनियनों में संगठित होने के अधिकार से वंचित करने की कोशिश कर रही है। यह सरकार हायर एंड फायर” को कानूनी दर्ज़ा देने की कोशिश कर रही है। सरकार यह सुनिश्चित करने का प्रयास कर रही है कि अधिक से अधिक मज़दूर जीवनभर पूंजीपतियों के गुलाम बनकर, किसी भी अधिकार के बिना, ठेके पर काम करते रहें। महिला मज़दूरों को रात्रि पाली में काम करने को मजबूर किया जायेगा। नौजवान मज़दूरों का “कौशल विकास” के नारे के साथ, कोई अधिकार दिये बिना, प्रशिक्षु बतौर अतिशोषण किया जायेगा।

मज़दूर अधिक से अधिक संख्या में, अपने अधिकारों पर हो रहे इन हमलों का विरोध करने के लिये सड़कों पर उतर रहे हैं। हमारे एकजुट संघर्ष के कारण केन्द्र सरकार कई मज़दूर-विरोधी कानूनों को पास नहीं कर पायी है। इन हालतों में केन्द्र सरकार ने यह सुनिश्चित किया है कि राज्य सरकारें मज़दूरों के अधिकारों पर हमले करने में एक दूसरे के साथ स्पर्धा करें। इसके साथ-साथ, स्टार्टअप, वस्त्र उद्योग, इत्यादि के मज़दूरों के लिये क्षेत्र विशेष कानून बनाकर, सरकार अलग-अलग क्षेत्रों के मज़दूरों पर एक के बाद एक हमले कर रही है। मिसाल के तौर पर, वस्त्र उद्योग में अब मज़दूरों को “निर्धारित समय के ठेकों” पर रखा जायेगा। स्टार्टअप उद्योगों में मज़दूरों को 5 वर्ष तक यूनियन बनाने का अधिकार नहीं होगा।

मज़दूरों का शोषण तेज़ करने के साथ-साथ, केन्द्र सरकार बड़े पूंजीपतियों द्वारा देश के प्राकृतिक संसाधनों - जल, जंगल और खनिज - की लूट को और आसान बना रही है। केन्द्र सरकार ने पूंजीपतियों को किसानों और आदिवासियों की भूमि का बलपूर्वक अधिग्रहण करने की इजाज़त देने के लिये एक कानून पास करने की कोशिश की थी। परन्तु व्यापक जन-विरोध के कारण वह कानून पास नहीं हो सका। अब राज्य सरकारों द्वारा वही कानून पास किया जा रहा है।

सन् 2000 में, कुल जनसंख्या के सबसे अमीर 1 प्रतिषत के पास देश की 37 प्रतिषत दौलत हुआ करती थी। जो बढ़कर सन् 2015 में देष की कुल दौलत का 53 प्रतिषत हो गयी है। उसी दौरान, जनसंख्या के सबसे गरीब आधे भाग के पास देश के कुल धन का हिस्सा 5.3 प्रतिषत से गिरकर अब 4.1 प्रतिषत हो गया है। इस तरह, जो लोग देश में अपने श्रम से दौलत पैदा करते हैं, वे और गरीब होते जा रहे हैं, जबकि बड़ा पूंजीपति वर्ग साल दर साल और ज्यादा अमीर बनता जा रहा है। अमीरों को और अमीर तथा गरीबों को और गरीब बनाने का यह कार्यक्रम अब और तेज़ी से लागू किया जा रहा है।

 

साथियों,

पूंजीपति वर्ग राज्य सत्ता पर नियंत्रण करता है। वह इस राज्य सत्ता का इस्तेमाल करके पूरे समाज पर अपनी हुक्मशाही चलाता है। कार्यकारिणी, विधायिका और न्यायपालिका इसी राज्य सत्ता के अंग हैं। बहुपार्टीवादी, प्रतिनिधित्ववादी लोकतंत्र की राजनीतिक व्यवस्था और प्रक्रिया यह सुनिश्चित करती है कि सरकार चलाने का दायित्व सिर्फ उन पार्टियों को ही दिया जाता है जो वफादारी से सरमायदारों के शासन की हिफाज़त करेंगी और सरमायदारों का कार्यक्रम लागू करेंगी।

कांग्रेस पार्टी, भाजपा और अन्य सरमायदारी राजनीतिक पार्टियां जो बारी-बारी से केन्द्र और राज्य सरकारों को चलाती हैं, वे आपस में होड़ लगाती हैं कि कौन सरमायदारों के कार्यक्रम को बेहतरीन तरीके से लागू करेगी और साथ ही साथ, लोगों को बुद्धू बनाने में सबसे ज्यादा कामयाब होगी।

ऐसी पार्टियां मज़दूर वर्ग को बांटने, अपने पीछे लामबंध करने और अपने नियंत्रण में ट्रेड यूनियनों के ज़रिये मज़दूरों को सरमायदार वर्ग के अजेंडा के पीछे लामबंध करने का काम करती हैं। हम मज़दूरों को सचेत होना होगा कि सरमायदार वर्ग ही इन पार्टियों का अजेंडा तय करता है। ट्रेड यूनियनें, जिन्हें हमारे वर्ग की हिफाज़त करनी चाहिये, वे ही हमारे खिलाफ़ इस्तेमाल हो रही हैं।

हमारे वर्ग पर सरमायदारों की विचारधारा और राजनीति का भारी प्रभाव ट्रेड यूनियनों की बहुतायत में देखा जा सकता है। एक तरफ, बड़ी संख्या में मज़दूर यूनियनों में संगठित नहीं हैं। दूसरी ओर, एक ही फैक्टरी या उद्योग के अंदर मज़दूर इस या उस पार्टी से संबंधित बहुत सारी यूनियनों में बंटे हुए हैं। सरमायदारों के कार्यक्रम को हराने के लिये हमें खुद को और अपनी यूनियनों को सरमायदारी पार्टियों तथा उनकी राजनीति और विचारधारा की जकड़ से मुक्त कराना होगा।

सरमायदार वर्ग बार-बार यह भ्रम फैलाते हैं कि हमारा भविष्य इस पर निर्भर है कि कौन सी पार्टी सत्ता में आती है। सरमायदार हम मज़दूरों को यह झूठी आशा दिलाता रहता है कि इस या उस पार्टी को सत्ता में लाकर हमारे हितों की रक्षा हो सकती है। परन्तु सच तो यह है कि आज भाजपा मज़दूर वर्ग पर हमला कर रही है, ठीक इसी तरह जब कांग्रेस पार्टी सत्ता में थी तो वह भी मज़दूरों पर हमला करती थी और सरमायदार कल किसी और पार्टी को लाकर इसी कार्यक्रम को चला सकते हैं।

सच तो यह है कि इस बहुपार्टीवादी, प्रतिनिधित्ववादी लोकतंत्र में आज 150 इजारेदार पूंजीवादी घरानों की अगुवाई में 2 लाख पूंजीपति 125 करोड़ हिन्दोस्तानी लोगों पर राज कर रहे हैं। वे प्रत्यक्ष रूप से और राज्य पर अपने नियंत्रण के ज़रिये उत्पादन और विनिमय के सभी प्रमुख साधनों पर नियंत्रण करते हैं। इसीलिये हम मज़दूर जो अपने श्रम से समाज की दौलत को पैदा करते हैं, हम गरीबी और भुखमरी के शिकार बने रहते हैं जबकि हमारा शोषण करने वाले पूंजीपति दिन-ब-दिन और अमीर होते रहते हैं। हम मज़दूर जो मेहनतकश किसानों के साथ मिलकर आबादी की बहुसंख्या में हैं, हमें इस अल्पसंख्यक वर्ग के राज को खत्म करना होगा। हमें देश के शासक बनने के नज़रिये के साथ अपना संघर्ष आगे बढ़ाना होगा। हमें मज़दूर वर्ग को एक ऐसी राजनीतिक ताक़त बनाना होगा जो मेहनतकश किसानों के साथ गठबंधन बनाकर, समाज की बागडोर को अपने हाथों में ले सकेगी।

हमें हिन्दोस्तान के नव-निर्माण के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द सभी मज़दूरों और किसानों को एकजुट करना होगा। हमें सरमायदारों और उनकी पार्टियों के दबदबे को टक्कर देनी होगी और राजनीतिक प्रक्रिया में ऐसे मूलभूत परिवर्तन लाने होंगे ताकि मजदूर-मेहनतकश खुद अपने उम्मीदवारों का चयन कर सकें, चुने गये प्रतिनिधियों से जवाबदेही मांग सकें, उन्हें जनता के खिलाफ़ काम करने पर अपने पदों से वापस बुला सकें, जनता के हित में कानून प्रस्तावित कर सकें तथा अपने जीवन से संबंधित मुख्य फैसले लेने में सशक्त हों। मज़दूर वर्ग और मेहनतकश किसानों के गठबंधन के हाथों में राज्य सत्ता के ज़रिये हम सरमायदारों से उत्पादन और विनिमय के मुख्य साधनों को अपने हाथों में ले सकेंगे और उन्हें सामाजिक नियंत्रण में ला सकेंगे। हम अर्थव्यवस्था की दिशा को बड़े पूंजीपतियों के मुनाफ़ों को सुनिश्चित करने की दिशा से बदलकर, उसे समाज के प्रत्येक सदस्य की सुख-सुरक्षा और खुषहाली को सुनिष्चित करने की दिषा में चला सकेंगे।

साथियों,

बीते कुछ वर्षों में हमारे आंदोलन ने बहुत प्रगति की है। अलग-अलग ट्रेड यूनियनों और मज़दूर संगठनों में संघर्ष कर रहे मज़दूरों के बीच में यह समझ बढ़ रही है कि हम सरमायदारों और उनकी राजनीतिक पार्टियों को हमारे बीच में बंटवारे को जारी रखने की इजाज़त नहीं दे सकते। देशभर में औद्योगिक क्षेत्रों में मज़दूर एकता समितियां बन रही हैं, जिनमें अलग-अलग पार्टियों और यूनियनों के कार्यकर्ता एकजुट होकर मज़दूर वर्ग के स्वतंत्र कार्यक्रम की हिफाज़त कर रहे हैं तथा उसे आगे बढ़ा रहे हैं।

हमें और भी बहुत सारी ऐसी समितियां स्थापित करनी होंगी और उन्हें मजबूत करना होगा - देशव्यापी स्तर पर, राज्यों व जिलों के स्तर पर, औद्योगिक क्षेत्रों, फैक्टरियों, काम के स्थानों तथा मज़दूरों के रिहायशी इलाकों में। इन समितियों में हमें मज़दूरों को एकजुट करना होगा और एक लड़ाकू ताक़त बनने के लिये तैयार करना होगा। हमें इन समितियों में मज़दूर वर्ग के स्वतंत्र कार्यक्रम पर चर्चा करनी होगी और उसे विकसित करना होगा। सभी कम्युनिस्टों और मज़दूर वर्ग कार्यकर्ताओं के सामने यही कार्य है।

साथियों,

आइये, इस आम हड़ताल को सफल बनाकर सरमायदारों के मज़दूर-विरोधी, किसान-विरोधी, समाज-विरोधी और राष्ट्र-विरोधी कार्यक्रम का मुंहतोड़ जवाब दें। आइये, अपने अधिकारों की हिफाज़त करने के लिये पूंजीपतियों के कार्यक्रम को चुनौती देने के काबिल एक मजबूत, एकजुट ताक़त बनायें। ऐसी एकता बनाकर मज़दूर वर्ग हिन्दोस्तान के नव-निर्माण के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द मज़दूरों, किसानों और सभी उत्पीड़ित वर्गों को अगुवाई देने का रास्ता खोल सकेगा।

इंक़लाब ज़िन्दाबाद!

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पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

 

5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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