ऑपरेशन ब्लू स्टार की 33वीं बरसी पर : धार्मिक स्थान पर राज्य के हमले का कोई औचित्य नहीं हो सकता!

एक पर हमला, सब पर हमला!

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के केंद्रीय समिति का बयान, 22 मई, 2017

6 जून, 1984 को हिन्दोस्तान की सेना ने भारी टैंकों और तोपों की गोलाबारी के साथ अमृतसर में स्वर्ण मंदिर पर हमला किया। सिख धर्म के इस सबसे पवित्र मंदिर पर हथियारबंद हमले को ऑपरेशन ब्लू स्टार नाम दिया गया। यह हमला ठीक उस दिन किया गया जिस दिन सिखों के पांचवें गुरु, गुरु अर्जन देव का शहादत दिन था। गुरु अरजन देव ने सिख समुदाय के लोगों के सम्मान की रक्षा में सदियों पहले अपनी जान कुर्बान की थी। सेना ने स्वर्ण मंदिर की घेराबंदी करके इस अवसर पर वहां इकट्ठा हुए हजारों लोगों को बंदी बना लिया और उसके बाद मंदिर पर हथियारों से निर्णायक हमला शुरू कर किया। आधिकारिक रूप से सरकार द्वारा जारी श्वेत पत्र के अनुसार, स्वर्ण मंदिर पर इस हमले में 4,712 लोग मारे गए। 

यह एक सांप्रदायिक हमला था और राज्य द्वारा लोगों के धार्मिक समारोह में खुल्ल-खुल्ला दखलंदाजी थी। यह एक भयंकर गुनाह था और शासन चलाने के सभी असूलों का सरासर उल्लंघन था। राज्य, जिसका फर्ज़ है कि वह सभी नागरिकों के जीवन की रक्षा करे और उनको  अपने धर्म को किसी भी तरीके से मानने के अधिकार की रक्षा करे, उसी राज्य ने एक धार्मिक स्थान पर इकट्ठा हुये लोगों पर हमला कर दिया, जिसमें हजारों नागरिक मारे गए।

मानवता के खिलाफ़ इस हमले की तुलना जलियांवाला बाग में अंग्रेजों द्वारा किये गए कत्लेआम से की जा सकती है। लेकिन सरकारी दस्तावेज़ों में इस हमले को देश की एकता और अखंडता की हिफाज़त में किये गए एक जायज़ कार्य के रूप में मान्यता दी गयी है। 

ऑपरेशन ब्लू स्टार को अंजाम देने से पहले हिन्दोस्तान के लोगों के बीच हर रोज़ यह प्रचार चलाया जाता था कि “सिख आतंकवादी” स्वर्ण मंदिर में छुपकर बैठे हैं, उन्होंने बड़े पैमाने पर हथियार इकट्ठा किये हुये हैं और वे बड़े पैमाने पर हिन्दुओं का कत्लेआम करने की योजना बना रहे हैं। यह दावा किया गया था कि स्वर्ण मंदिर से “आतंकवादियों को बाहर निकालने के लिए” ऑपरेशन ब्लू स्टार करना ज़रूरी था। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने यह दावा किया कि उनके पास सेना द्वारा हमला करने के अलावा “कोई और विकल्प नहीं था”।

ये सारे आधिकारिक सरकारी दावे सरासर झूठे साबित हुए हैं। मंदिर के परिसर से जो हथियार बरामद हुए, वे द्वितीय विश्व युद्ध के जमाने की कुछ पुरानी रायफलें थीं। पंजाब सरकार द्वारा नियुक्त बेंस कमीशन को ऑपरेशन ब्लू स्टार के दौरान गिरफ्तार किये गए व्यक्तियों के खिलाफ़ आतंकवादी वारदात में शामिल होने का कोई भी सबूत नहीं मिला।

इसके ठीक विपरीत, ऐसे विश्वसनीय सबूत सामने आये हैं, जिससे यह पता चलता है कि हिन्दोस्तानी सेना द्वारा स्वर्ण मंदिर पर हमले की तैयारी जून में किये गए हमले के कई महीने पहले से की जा रही थी। ये सबूत भी सामने आये हैं कि इंदिरा गांधी की सरकार ने ब्रिटेन की प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर से स्वर्ण मंदिर पर हमले की योजना के लिये शुरुआती चरण में मदद की मांग की थी, और उनसे यह मदद मिली भी थी।

पंजाब और पूरे हिन्दोस्तान में सिख धर्म के लोगों के खिलाफ़ सुरक्षा बालों द्वारा बड़े पैमाने पर आतंक फैलाने की शुरुआत का ऑपरेशन ब्लू स्टार एक संकेत था। अमृतसर में खून-खराबा करने के तुरंत बाद ऑपरेशन वुड रोज़ चलाया गया, जिसके तहत पूरे पंजाब के गांवों में सैकड़ों गुरुद्वारों पर सेना द्वारा हमले किये गए। हजारों सिख नौजवानों को मनमाने ढंग से गिरफ्तार किया गया और उनको जेलों में तड़पाया गया। इनमें से कई नौजवानों को फर्ज़ी मुठभेड़ों में मार डाला गया।

यह सब होने के कुछ समय बाद पंजाब पुलिस के कई वरिष्ठ अधिकारियों ने यह स्वीकार किया कि ऐसे कई विशेष “आतंकवाद-विरोधी” दस्ते पुलिस द्वारा बनाये गए थे जो हिन्दुओं का मनमाने ढंग से कत्ल करते थे और इसका इल्जाम सिख आतंकवादियों पर लगाया जाता था। अब यह साबित हो गया है कि 1980 के दशक में पंजाब में ऐसे कई आतंकवादी गिरोह थे जो केंद्रीय खुफिया एजंेसियों की सीधी और करीबी से निगरानी में काम किया करते थे।

ऑपरेशन ब्लू स्टार का असली उद्देश्य

स्वर्ण मंदिर पर किये गए ऑपरेशन ब्लू स्टार का असली उद्देश्य था सिख धर्म के लोगों की बेइज्ज़ती करना, पंजाबी लोगों की एकता को तोड़ना और पंजाब और देशभर में आर्थिक और राजनीतिक अधिकारों के लिए चल रहे संघर्षों को अपराधी करार देना। इसका उद्देश्य राज्य द्वारा अपने ही नागरिकों पर व्यापक तौर से बर्बरता किये जाने के पक्ष में जनमत बनाना भी था।

1970 के दशक के अंत तक पूंजीपति वर्ग की सत्ता में अस्थिरता का दौर शुरू हो गया था। इस दौर में मज़दूरों, किसानों और दबी-कुचली राष्ट्रीयताओं के संघर्षों में तेज़ी से उभार आये। ज़रूरी सार्वजनिक सेवाओं में काम कर रहे मज़दूर अपने लिए हड़ताल के अधिकार की मांग को लेकर लड़ रहे थे। अपने उत्पादों के लाभकारी दाम पाने के लिए किसानों का संघर्ष पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र और तमिलनाडु में जोर पकड़ रहा था। अपने राष्ट्रीय अधिकारों को हासिल करने के लिए पंजाब के लोग मांग उठा रहे थे। इन मांगों में नदियों के पानी और केंद्रीय वित्तीय संसाधनों में उनकी हिस्सेदारी की मांग भी शामिल थी।

पूंजीवादी इज़ारेदार घराने राज्य सत्ता पर अपनी पकड़ को मजबूत करना चाहते थे और अपने साम्राज्यवादी मंसूबों को हासिल करने के रास्ते में आ रहे हर प्रकार के विरोध को खत्म करना चाहते थे। अपने इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए देश की सुरक्षा के नाम पर सिखों के सांप्रदायिक उत्पीड़न और व्यापक पैमाने पर राजकीय आतंकवाद को जायज़ ठहराने के लिए “सिख आतंकवाद” का हव्वा, इज़ारेदार घरानों का एक पसंदीदा हथियार बन गया। धनवान वर्गों के असंतुष्ट गुटों को दबाने के लिए, जन आंदोलनों को बांटने और भटकाने के लिये, राज्य-आयोजित सांप्रदायिक हिंसा सहित राजकीय आतंकवाद, इज़ारेदार पूंजीपतियों के लिए कारगर साबित हुआ।

पंजाब में बंटवारे और भटकावे तथा छल-कपट की राजनीति तब शुरू हुई जब केंद्रीय खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों ने जन आंदोलनों के भीतर ही हथियारबंद गिरोहों को खड़ा करना और उनको वित्तीय सहायता देना शुरू किया। उस दौर में कई जन आंदोलन बड़ी तेज़ी से उभर रहे थे। इन आतंकवादी गुटों का बहाना देते हुए, जिन्हें खुद केंद्रीय खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों ने पैदा किया था, हुक्मरान वर्गों ने पंजाबी लोगों के संघर्ष को “सिख चरमपंथी” और “सिख आतंकवादी” करार देने का जोरदार प्रचार शुरू किया। ऐसा बताया गया कि “सिख चरमपंथी” और “सिख आतंकवादी” हिन्दोस्तान की एकता और अखंडता के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं। इस तरह से सिखों को उत्पीड़ित करते हुए, हमारे देश के हुक्मरान पंजाबी लोगों और देश के सभी लोगों के संघर्ष पर हमला करने, उनको बांटने और सही राह से भटकाने में कामयाब रहे।

राजनीतिक और आर्थिक संघर्षों को देश-विरोधी करार दिया गया और उन्हें कानून और व्यवस्था का मामला बना दिया गया। विशिष्ट राष्ट्रीयताओं के लोगों पर सेना का राज कायम किया गया और उनके सारे बुनियादी अधिकार मिट्टी में मिला दिए गए। सिख धर्म के लोगों को निशाना बनाया गया और उन्हें बदनाम किया गया। सच्चाई को झुठलाते हुए आतंकवाद के शिकार लोगों को खलनायक के रूप में पेश किया गया, ताकि नाजायज़ कार्यवाहियों को भी जायज़ साबित किया जा सके - यानी यह बताया जा सके कि पवित्र स्वर्ण मंदिर पर राज्य द्वारा हमला करना और हजारों बेगुनाह सिख लोगों का कत्लेआम करना जायज़ था।

हिन्दोस्तान की राजनीति में ऑपरेशन ब्लू स्टार एक अहम मोड़ साबित हुआ। इससे यह साफ हो गया कि हुक्मरान वर्ग अब पुराने तरीके से राज नहीं कर पा रहा है। इसलिए आने वाले समय में आतंकवाद, राजकीय आतंकवाद और राज्य द्वारा आयोजित सांप्रदायिक कत्लेआम, राज करने का स्थायी और पसंदीदा साधन बन जायेंगे। इसके साथ-साथ विशाल जनसमुदाय पर मुट्ठीभर पूंजीपतियों की हुकूमशाही को जायज़ ठहराने के लिए समय-समय पर चुनाव भी कराये जाते रहेंगे।  

पिछले 33 वर्षों में बड़े पैमाने पर राज्य द्वारा आयोजित सांप्रदायिक कत्लेआम और धार्मिक स्थानों पर बढ़ते हुये हमले यह साफ दिखाते हैं कि अब ये इज़ारेदार पूंजीपतियों के राज करने के पसंदीदा हथियार बन गये हैं। ऐसे कई अपराध राज्य ने आयोजित किये हैं - नवम्बर 1984 में सिखों का जनसंहार, हजरतबल मस्जिद पर हमला, बाबरी मस्जिद के गिराए जाने के बाद हिन्दुओं और मुसलमानों के खिलाफ़ सांप्रदायिक हिंसा, गुजरात में मुसलमानों का जनसंहार, ओडिशा और अन्य स्थानों के गिरजाघरों पर हमले, मुजफ्फरनगर में मुसलमानों पर हमले और कई सैकड़ों ठिकानों पर सांप्रदायिक हिंसा और राज्य द्वारा प्रायोजित आतंकवाद। 

बार-बार और बढ़ते पैमाने पर राजकीय आतंकवाद और सांप्रदायिक हिंसा का इस्तेमाल किये जाने से, इसके विपरीत धारा ने जन्म लिया है - राज्य की इन कार्यवाहियों के खिलाफ़ आम जनसमुदाय के बीच मानव और जनतांत्रिक अधिकारों की हिफाज़त में और आम तौर से ज़मीर के अधिकार की हिफाज़त में एक मजबूत आंदोलन उभर कर आया है।

कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी को इस बात पर गर्व है कि अपनी स्थापना के समय से ही उसने हमेशा ज़मीर के अधिकार की हिफाज़त में और राजकीय आतंकवाद के खिलाफ़ बिना किसी समझौते के एक असूलन भूमिका अपनाई है। पिछले 33 वर्षों में इस असूलन भूमिका के इर्द-गिर्द प्रगतिशील और जनतांत्रिक ताक़तें मजबूत हुई हैं। सभी लोगों और नागरिकों के मानव अधिकारों की हिफाज़त में इस राजनीतिक एकता को और मजबूत करना निहायत ज़रूरी है। राज्य द्वारा आयोजित सांप्रदायिक हिंसा और राज्य के आतंकवाद को खत्म करने के रास्ते पर आगे बढ़ने के लिए यही एकमात्र रास्ता है।

ऑपरेशन ब्लू स्टार की 33वीं बरसी एक सही अवसर है जब हम राजकीय आतंकवाद की खिलाफ़ और ज़मीर के अधिकार की हिफाज़त में पिछले तीन दशकों से चलाये गए आंदोलन की समीक्षा करें और उससे सबक लें।

आंदोलन के महत्वपूर्ण सबक

सभी इंसानों के मानव बतौर अधिकार हैं। एक जनतांत्रिक राज्य में सभी नागरिकों के नागरिक बतौर समान अधिकार हैं। एक बहु-राष्ट्रीय संघ के सभी घटकों के राष्ट्र बतौर अधिकार हैं। राज्य किसी भी व्यक्ति के मानव अधिकार, जनतान्त्रिक अधिकार और राष्ट्रीय अधिकार, किसी भी हालत में न तो दे सकता है और न ही छीन सकता है। इन सभी अधिकारों को मान्यता देना और उनकी हिफाज़त करना हर एक राज्य का फर्ज़ है।

अधिकारों की इस आधुनिक परिभाषा की हिफाज़त में संघर्ष से ही हमें राजकीय आतंकवाद और राज्य द्वारा आयोजित सांप्रदायिक हिंसा के खिलाफ़ संघर्ष चलाने का ठोस सैद्धांतिक आधार और विश्वास की ताक़त हासिल हुई है।

1980 के दशक में सबसे अहम सवाल जो उभरकर आया था वह है, ज़मीर के अधिकार की रक्षा की ज़रूरत। यदि समाज के हर एक व्यक्ति को अपनी आस्था और अपनी पूजा या इबादत के तरीके को चुनने का अधिकार है, तो बिना किसी भी अपवाद के इस अधिकार की हिफाज़त करना राज्य का फर्ज़ है। यह बात मान लेना कि किसी भी बहाने से राज्य किसी के ज़मीर के अधिकार को छीन सकता है, तो यह सबसे बड़े अन्याय के साथ समझौता करने जैसा होगा। सबसे अहम ध्यान देने योग्य बात यह है कि मौजूदा हिन्दोस्तानी राज्य अपने नागरिकों की सुरक्षा करने में न केवल नाकामयाब है बल्कि यह राज्य खुद ही ज़मीर के अधिकार पर हमले करता है। 

जिन लोगों पर धर्म के आधार पर हमले किये जा रहे हैं, वे स्वाभाविक तौर से अपने धार्मिक स्थानों पर इकट्ठा होंगे तथा खुद अपनी हिफाज़त व अपनी धार्मिक आस्थाओं और रीति-रिवाज़ों की हिफाज़त के लिए संगठित होंगे। उनको ऐसा करने का पूरा अधिकार है; और यह किसी भी तरह से “सांप्रदायिक” कार्यवाही नहीं है। दरअसल, सांप्रदायिक तो यह राज्य है, जो लोगों के धार्मिक मामलों में दखलंदाजी करता है और खास धर्म के लोगों को आतंकवादी करार देते हुए उनको धर्म के आधार पर उत्पीड़ित करता है।

इस सबक को बार-बार और हर बार दोहराने की ज़रूरत है कि आतंकवाद और सांप्रदायिक हिंसा लोगों की धार्मिक आस्था का नतीजा नहीं हैं। आतंकवाद और सांप्रदायिक हिंसा का असली स्रोत इज़ारेदार पूंजीपतियों की हुकूमत और यह मौजूदा राज्य है, जिसका चरित्र ही सांप्रदायिक और बस्तीवादी है। ज़मीर का अधिकार केवल धर्म के मामलों में ही लागू नहीं होता है। यह राजनीतिक विचार के मामले में भी उतना ही लागू होता है। हिन्दोस्तान के हर व्यक्ति का यह अधिकार है कि वह हिन्दोस्तान के सामने हर एक समस्या पर अपनी राय दे और उसे हल करने के लिए संभावित समाधान पेश करे। हम इस बात को कभी भी स्वीकार नहीं कर सकते कि राज्य उन लोगों से ज़मीर के अधिकार को छीन ले, जिनके विचार सत्ता में बैठे लोगों को पसंद नहीं हैं।

1984 में खालिस्तान के विचार को इस तरह से पेश किया गया, जैसे कि वह हिन्दोस्तान के लिए सबसे बड़ा खतरा है। आज के समय में “कश्मीर की आज़ादी” के विचार को सबसे बड़ा खतरा बताकर पेश किया जा रहा है। ऐसा दावा किया जा रहा है कि जो कोई भी इस तरह के विचार पेश करता है उसे कोई भी अधिकार नहीं हैं और उसे “देश का दुश्मन” माना जाना चाहिए। ये राजकीय आतंकवाद और फासीवादी दमन को जायज़ ठहराने के अलग-अलग विचारधारात्मक तरीके हैं। हम इस तरह के तर्कों के साथ समझौता नहीं कर सकते। ज़मीर का अधिकार इस बात पर निर्भर नहीं हो सकता कि किसी व्यक्ति के विचार राज्य को स्वीकार हैं या नहीं। 

हमारी पार्टी कभी भी सिख लोगों के लिये अलग देश बनाने के विचार से सहमत नहीं रही। लेकिन हमने कभी भी राज्य की इस आधिकारिक लाइन के साथ समझौता नहीं किया है कि इस विचार को पेश करना या उससे सहानुभूति रखना कोई जुर्म है। यदि कोई यह मान सकता है और उसकी पैरवी करता है कि हिन्दोस्तान में राम राज्य होना चाहिए, तो कोई और, यदि सिख लोगों के लिए अलग देश में विश्वास रखता है तो यह किस तरह से अपराध माना जा सकता है? 1984 में हर एक राजनीतिक पार्टी पर यह दबाव था कि वह यह माने कि खालिस्तान की मांग, यह पंजाब की मुख्य समस्या है और उस मांग की निन्दा करे। कुछ पार्टियों ने सरकारी लाइन के साथ समझौता किया और कहा कि दोनों ही पक्ष इसके लिए दोषी हैं। हमारी पार्टी कभी भी इस असूलन भूमिका से पीछे नहीं हटी कि पंजाब में हिंसा और आतंकवाद के लिए राज्य और हुक्मरान जिम्मेदार हैं। हमने लगातार सभी तबकों के बीच प्रचार चलाया और उन्हें यह बात समझाने की कोशिश की कि राजकीय आतंकवाद प्रमुख खतरा है और हम सभी को इसके खिलाफ़ एकजुट होना चाहिए।

कश्मीर का राष्ट्रीय प्रश्न, इसी तरह से आज हमारे सामने आ रहा है। यदि किसी को यह दावा करने का अधिकार है कि “कश्मीर हिन्दोस्तान का अभिन्न अंग है”, तो फिर किसी और को यह अधिकार क्यों नहीं हो सकता कि वह कहे कि कश्मीर के लोगों का यह अधिकार है कि जनमत संग्रह द्वारा वे अपने भविष्य का फैसला करें, और यह समस्या के समाधान का एक तरीका है?

हम किसी एक के ज़मीर के अधिकार को मान्यता दें और किसी अन्य के अधिकार को छीन लें, ऐसा नहीं चल सकता। हमें हर किसी के ज़मीर के अधिकार की हिफाज़त करनी होगी और राज्य द्वारा किसी के ज़मीर के अधिकार के हनन का विरोध करना होगा। एक पर हमला, सब पर हमला! यह हमारे संघर्ष में मार्गदर्शन के लिये सबसे ज़रूरी नारा है।   

हिन्दोस्तान की एकता को उन लोगों से कोई खतरा नहीं है जो हिन्दोस्तानी संघ के भीतर अपने राष्ट्रीय अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। हिन्दोस्तान की एकता को खतरा इस संघ की बस्तीवादी नीति से है, जो हर एक राष्ट्रीय आंदोलन को कानून और व्यवस्था की समस्या मानता है और उनके अधिकारों के संघर्ष को बर्बरतापूर्वक दबाने के लिए हिंसा और ताक़त का इस्तेमाल करता है। समस्या की जड़ इस बात में है कि मौजूदा हिन्दोस्तानी संघ “एक हिन्दोस्तानी राष्ट्र” के सांप्रदायिक और साम्राज्यवादी विचार पर आधारित है जो “हिन्दू बहुसंख्यक” लोगों और कई धार्मिक अल्पसंख्यक लोगों से बना हुआ है। 

मानव अधिकारों तथा लोकतांत्रिक और राष्ट्रीय अधिकारों की पुष्टि करने के संघर्ष को अधिकारों की आधुनिक परिभाषा के आधार पर चलाना चाहिये। यह संघर्ष हमें इस नज़रिये से चलाना होगा कि मौजूदा साम्प्रदायिक व आतंकवादी राज्य के स्थान पर स्वेच्छा पर आधारित एक नया हिन्दोस्तानी संघ स्थापित करना होगा जो, बिना किसी अपवाद के, सभी के मानव अधिकारों व लोकतांत्रिक अधिकारों की सुनिश्चिति के लिये वचनबद्ध होगा।

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पार्टी के दस्तावेज

8 जनवरी, 2020 की सर्व हिन्द आम हड़ताल को सफल करें!

मज़दूर एकता कमेटी का आह्वान

देश की दिशा पूंजीपतियों की अमीरी को बढ़ा रही है और मज़दूर, किसान व सभी मेहनतकशों को ग़रीबी में धकेल रही है। इस रास्ते का विरोध करने के लिए और देश की दौलत पर अपने अधिकार का दावा करने के लिए यह हड़ताल आयोजित की जा रही है।

मेहनतकशों का है यह नारा, हम हैं इसके मालिक! हिन्दोस्तान हमारा!

thumbपूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है। इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को। यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब, मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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