यह गणराज्य हमारे अधिकारों की रक्षा नहीं, बल्कि हनन करता है! यह गणराज्य सांप्रदायिक और जातिवादी बंटवारे तथा पूंजीपतियों की हुक्मशाही को बनाये रखने का साधन है!

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति का बयान, 10 जनवरी, 2018

इस वर्ष की 26 जनवरी को हिन्दोस्तान का गणराज्य 68 वर्ष का हो जायेगा। बीते लगभग सात दशकों का अनुभव साफ दिखाता है कि यह गणराज्य समाज के सभी सदस्यों की रोज़-रोटी के अधिकार, ज़मीर के अधिकार, जीने के अधिकार और दूसरे मानवीय व लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा नहीं करता है। हिन्दोस्तानी राजधर्म के अनुसार, अगर राजा अपनी प्रजा की खुशहाली और सुरक्षा सुनिश्चित करने में नाकामयाब हो जाता है तो उसे राज करने का अधिकार खोना पड़ता है। इस असूल के आधार पर देखा जाये तो हिन्दोस्तानी गणराज्य की कोई वैधता नहीं है।

यह गणराज्य एक पूंजीवादी आर्थिक व्यवस्था की हिफ़ाज़त करता है जिसमें उत्पादन के साधनों की मालिकी कम से कम हाथों में संकेन्द्रित होती जा रही है। लगभग 150 इज़ारेदार पूंजीवादी घराने आज हिन्दोस्तान की अधिकतम दौलत के मालिक हैं और उस पर नियंत्रण करते हैं। दूसरी ओर, आबादी का सबसे बड़ा हिस्सा, मज़दूर और किसान अधिक से अधिक शोषण तथा रोज़गार की बढ़ती असुरक्षा का सामना कर रहे हैं। लाखों-लाखों परिवार कर्जे़ में डूबते जा रहे हैं और प्रतिवर्ष हजारों लोग आत्महत्या कर रहे हैं।

भूमंडलीकरण, उदारीकरण और निजीकरण का कार्यक्रम बीते तीन दशकांे से अपनाया गया है। इसका मकसद है धन और इज़ारेदारी का अधिक से अधिक और तेज़ गति से संकेंद्रण करना। केन्द्र और राज्य स्तरों पर इस गणराज्य का प्रबंधन करने वाले मंत्रियों और अफ़सरों को इन तथाकथित मुक्त बाज़ार सुधारों के कार्यक्रम को लागू करने का पूरा प्रशिक्षण दिया गया है।

इस वर्ष, दक्षिण-पूर्वी एशियाई राष्ट्र संघ (आसियान) के नेताओं को गणतंत्र दिवस पर मुख्य अतिथि बतौर आमंत्रित किया गया है। इसका असली मकसद एशिया में शांति की रक्षा करना नहीं है। इसका असली मकसद है हिन्दोस्तानी शासक वर्ग के साम्राज्यवादी इरादों को बढ़ावा देना। अमरीका, इस्राइल और दूसरे जंग-फरोश देशों के साथ गठबंधन बनाकर, हिन्दोस्तानी गणराज्य का तेज़ गति से सैन्यीकरण किया जा रहा है। इस सच्चाई पर कोई विवाद नहीं हो सकता कि अमरीकी साम्राज्यवाद ही हाल की अवधि में, एशिया में सबसे ज्यादा देशों को तबाह करने तथा नाजायज़ जंग फैलाने के लिये ज़िम्मेदार रहा है। इन परिस्थितियों में हिन्दोस्तान के लिये अमरीका का रणनैतिक सांझेदार बनने का मतलब है इस इलाके में शांति के हित के साथ विश्वासघात करना।

हिन्दोस्तानी गणराज्य बहुत ही ख़तरनाक रास्ते पर आगे बढ़ रहा है - यह देश के अंदर फासीवादी दमन और विदेश में साम्राज्यवादी हमले का रास्ता है।

विशाल इज़ारेदार कंपनियों के वर्चस्व में हो रहे पूंजीवादी संवर्धन की वजह से, नष्ट होने वाली नौकरियों की संख्या ज्यादा और नई नौकरियों कम पैदा हो रही हैं। कृषि की तबाही के कारण जो किसान उस क्षेत्र से बाहर धकेले जा रहे हैं, उनके लिये उद्योग और सेवा क्षेत्रों में पर्याप्त रोज़गार नहीं हैं। नौकरियों का अभाव तथा रोज़गार की असुरक्षा - ये अधिकतम हिन्दोस्तानी लोगों के लिये गंभीर समस्यायें बन गई हैं। शासक वर्ग और उसकी पार्टियां इन समस्याओं के साथ दांव-पेंच करके, लोगों के बीच में जातिवादी दुश्मनी और सांप्रदायिक नफ़रत भड़का रही हैं, ताकि सांझे शोषकों के खिलाफ़ शोषित जनसमुदाय को एकजुट होने से रोका जा सके।

चुनावों के अवसर पर पूंजीपति वर्ग की प्रतिस्पर्धी पार्टियां नफ़रत और द्वेष की भावना भड़काने के लिये ज़हर-भरा झूठा प्रचार करती हैं। इस प्रकार का झूठा प्रचार फैलाया जाता है कि कुछ खास जातियों या धार्मिक समुदायों को अनुचित लाभ मिला है। सांप्रदायिक और जातिवादी लामबंधी के आधार पर चुनाव जीतना अब एक पेशेवर धंधा बन गया है, जिसमें भाजपा, कांग्रेस पार्टी और अन्य पार्टियां एक दूसरे से आगे निकलने के लिये दौड़ रही हैं।

हिन्दोस्तानी गणराज्य, जहां मानवीय और लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन करता है, तो वहीं विशेष अधिकारों का आबंटन करने का साधन है। जबकि हर हिन्दोस्तानी को यह हक होना चाहिये कि वह एक नागरिक और एक मानव होने के नाते अपने अधिकारों की मांग करे, परन्तु इस गणराज्य के चलते हर हिन्दोस्तानी से यह उम्मीद की जाती है कि वह अपनी जाति या धार्मिक पहचान के आधार पर विशेष अधिकारों का दावा करे।

आरक्षित कोटे के आधार पर विशेष अधिकारों के आबंटन को सही ठहराने के लिये यह कहा जाता है कि इससे समाज के सबसे दबे-कुचले तबकों का हित होगा। परन्तु इससे दमनकारी और भेदभावकारी जाति प्रथा का बोझ न तो खत्म हुआ है और न ही कम हुआ है। इससे जातिवादी और सांप्रदायिक पहचान और मजबूत हो गई है तथा शासन की राजनीतिक व्यवस्था में विभिन्न जातियों और धार्मिक समुदायों के विशिष्ट सदस्यों को शामिल कर लिया गया है।

उपनिवेशवादी शासन के दौरान, बर्तानवी सरमायदार अपने राज्य के संस्थानों और विधानसभाओं में गिनी-चुनी जातियों और समुदायों से विशिष्ट हिन्दोस्तानियों को शामिल करने के लिये विशेष अधिकारों का आबंटन करते थे। वे अपने शासन को मजबूत करने के लिये ऐसा करते थे। उपनिवेशवाद के बाद की अवधि में, हिन्दोस्तानी इज़ारेदार पूंजीवादी घरानों ने उसी तरीके को अपनाया है। आज भी हिन्दोस्तानी राज्य सरमायदार वर्ग की हुक्मशाही को मजबूत करने के लिये, जनता को सांप्रदायिक और जातिवादी आधार पर बांटने का साधन है।

हिन्दोस्तानी गणराज्य का संविधान सांप्रदायिक और जातिवादी पहचान को मान्यता देता है परन्तु हिन्दोस्तान में मौजूद अनेक राष्ट्रों, राष्ट्रीयताओं व लोगों के अस्तित्व को मान्यता नहीं देता है। राष्ट्रीय अधिकारों की जायज़ मांगों और आंदोलनों को कानून और व्यवस्था की समस्या तथा हिन्दोस्तान की एकता और अखंडता के लिये ख़तरा माना जाता है। इस तरह यह गणराज्य देश के लोगों की एकता को तोड़ने का काम करता है।

संविधान में यह दावा किया गया है कि यह गणराज्य जनता की सत्ता है और जनता इसे चलाती है, परन्तु संविधान लोगों के हाथों में संप्रभुता नहीं देता है। 1950 में बने इस संविधान के अंदर सर्वव्यापक बालिग मताधिकार को तो माना गया है परन्तु इसके साथ-साथ, इसमें बर्तानवी सरमायदार असूल का अनुमोदन किया जाता है कि संसद ही संप्रभु है। इस असूल के अनुसार, लोगों को देश का कानून बनाने का संप्रभु अधिकार नहीं है। यह अधिकार सिर्फ संसद के निर्वाचित सदस्यों को है। लोग मतदान करने के साथ-साथ अपने सभी राजनीतिक अधिकारों को त्याग देते हैं।

इस गणराज्य का मूल सिद्धांत यह है कि लोगों को अपनी संप्रभुता, कानून बनाने और नीति निर्धारण करने की ताक़त को उन गिन-चुने नेताओं, पार्टियों और संस्थानों के हाथों में सौंप देना चाहिये, जिन्हें पूंजीवादी शोषण की व्यवस्था को बरकरार रखने तथा पूंजीवादी शोषण और लूट को और तीव्र करने के लिये तथाकथित सुधारों को लागू करने का प्रशिक्षण मिला हुआ है। संप्रभुता निर्वाचित विधायिकी में निहित है और कार्यकारिणी, यानी मंत्रीमंडल के हाथों में संकेंद्रित है, जिसकी सलाह पर चलने को राष्ट्रपति बाध्य है।

संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि यह गणराज्य न तो जनता की राजनीतिक सत्ता है, न ही लोग इसका संचालन करते हैं और न ही यह लोगों के हित में काम करता है। यह गणराज्य इज़ारेदार पूंजीवादी घरानों की अगुवाई में, पूंजीपति वर्ग की हुक्मशाही को बनाये रखने का साधन है। इस समय “मुक्त बाज़ार” और “सुशासन” के झंडे तले जो नीतिगत और संस्थागत सुधार लागू किये जा रहे हैं, उनका उद्देश्य है यह सुनिश्चित करना कि यह गणराज्य सिर्फ सबसे बड़े इज़ारेदार पूंजीपतियों के हितों की ही सेवा करे और हर हालत में ज्यादा से ज्यादा मुनाफे़ कमाने के उनके “अधिकार” की रक्षा करे।

इज़ारेदार पूंजीपतियों का शासन कभी मतपेटी से चलता है तो कभी बंदूक की गोली से। उनका वर्चस्व न सिर्फ उत्पादन के साधनों पर है बल्कि संचार माध्यम यानी मीडिया पर भी छाया हुआ है। सबसे बड़े-बडे़ अख़बारों और टीवी चैनलों पर उन्हीं की मालिकी है। वे जनमत को ढालते हैं, तथाकथित घमासान वाद-विवाद आयोजित करते हैं और तरह-तरह की चालें चलकर यह सुनिश्चित करते हैं कि चुनावों का वही नतीजा हो, जो उन्हें चाहिये। वे ही यह फैसला करते हैं कि उनकी वफादार पार्टियों में से किसके हाथ में कब सत्ता दी जायेगी। जिस पार्टी को सत्ता दी जाती है, वह फिर दावा करती फिरती है कि उसे इज़ारेदार पूंजीपतियों के जन-विरोधी कार्यक्रम को लागू करने का “जनादेश” मिला है।

सिर्फ हमारे देश में ही नहीं बल्कि सारी दुनिया में, बहु-पार्टीवादी प्रतिनिधित्ववादी लोकतंत्र राजनीतिक व्यवस्था दिन-ब-दिन बदनाम होती जा रही है। अधिक से अधिक लोग यह समझ रहे हैं कि जो भी पार्टी सत्ता में आती है, वह बडे़ सरमायदारों के कार्यक्रम को ही लागू करती है। सब लोग यह देख सकते हैं कि चुनाव जीतने के लिये धनबल की निर्णायक भूमिका होती है। आजकल देश में हर चुनाव के बाद यह आरोप लगाया जा रहा है कि इ.वी.एम. के साथ हेराफेरी की जा रही है।

इस समय इज़ारेदार पूंजीवादी घराने नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में भाजपा पर निर्भर कर रहे हैं। वे यह चाहते हैं कि पूंजीपति परस्त श्रम सुधारों और किसान-विरोधी भूमि अधिग्रहण कानूनों समेत, बेहद जन-विरोधी कदमों को थोपने के लिये भाजपा के बहुमत का इस्तेमाल किया जाये। पर साथ ही साथ, वे कांग्रेस पार्टी की गिरती हुई छवि को उठाकर फिर से खड़ा करने की भी कोशिश कर रहे हैं, ताकि जब भाजपा पूरी तरह बदनाम हो जायेगी तो उनके पास एक विकल्प तैयार रहेगा।

हमारे लिये आगे का रास्ता क्या है?

कुछ लोगों का कहना है कि हिन्दोस्तान का गणराज्य और उसका संविधान सही है, कि सिर्फ यह या वह पार्टी सारी समस्याओं के लिए ज़िम्मेदार है। हमें इस विचार को ख़ारिज करना होगा और इसका विरोध करना होगा। भाजपा और कांग्रेस पार्टी ऐसा ही कहती हैं और सभी समस्याओं के लिए एक दूसरे पर आरोप लगाती हैं। कुछ और पार्टियां हैं जो भाजपा और कांग्रेस पार्टी, दोनों को ही दोषी ठहराती हैं परन्तु यह दावा करती हैं कि वर्तमान गणराज्य सही है, कि उसकी हिफ़ाज़त करनी चाहिए, कि उसे बचाए रखना चाहिए।

कम्युनिस्टों का फर्ज़ है मज़दूर वर्ग और दूसरे दबे-कुचले लोगों को हकीक़त के बारे में जागरुक बनाना। हमें लोगों को यह सच बताना चाहिए कि वर्तमान गणराज्य पूंजीवादी हुक्मशाही का साधन है और हमें एक नए गणराज्य के लिए संघर्ष करना होगा, जो मज़दूरों और किसानों के शासन का साधन होगा। अगर कम्युनिस्ट कांग्रेस पार्टी की पूंछ बने रहते हैं और वर्तमान गणराज्य के बारे में भ्रम फैलाते रहते हैं, तो वे मज़दूरों और किसानों के हितों के साथ विश्वासघात करते हैं। इसी ख़तरनाक लाइन पर चलने की वजह से आज बड़े सरमायदारों के फासीवादी समाज-विरोधी हमले के लिये हालतें तैयार की गई हैं।

समस्याओं को हल करने का एक ही रास्ता है, कि वर्तमान गणराज्य की जगह पर एक ऐसा नया राज्य स्थापित किया जाये जो लोगों के हाथों में संप्रभुता दिलायेगा और सभी की खुशहाली और सुरक्षा सुनिश्चित करेगा।

नये गणराज्य के संविधान को अधिकारों की पुरानी परिभाषा और समझ के साथ नाता तोड़ना होगा। वर्तमान संविधान में यह माना जाता है कि राज्य लोगों को अधिकार कभी दे सकता है और कभी उनसे छीन सकता है। इसे नकारते हुये, नये गणराज्य के संविधान को इस नयी परिभाषा पर आधारित होना होगा कि मानव अधिकार हर एक व्यक्ति को मिलना चाहिये क्योंकि वह मानव है और इन मानव अधिकारों की रक्षा को सुनिश्चित करना राज्य का फ़र्ज़ है। ज़मीर का अधिकार, काम करने का अधिकार, सुरक्षित रोज़गार, रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और सम्मानजनक मानव जीवन की दूसरी सभी ज़रूरतें मानव अधिकारों में गिनी जाती हैं।

अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलानी होगी जिसका मकसद होगा पूरी आबादी की बढ़ती भौतिक और सांस्कृतिक ज़रूरतों को अधिक से अधिक हद तक पूरा करना। इस मकसद को हासिल करने के लिये नये राज्य को फौरन बैंकिंग, बीमा, विदेश व्यापार, घरेलू थोक और बड़े खुदरा व्यापार का राष्ट्रीयकरण व सामाजिकीकरण करना होगा। नये राज्य को एक आधुनिक सर्वव्यापक सार्वजनिक वितरण व्यवस्था स्थापित करनी होगी, जिसमें घरेलू उपभोग की सारी ज़रूरी वस्तुएं उपलब्ध होंगी और उगायी गयी सभी फसलों की सरकारी खरीदी की व्यवस्था इसके साथ जुड़ी होगी।

नये राज्यों को धर्म, जाति, लिंग, राष्ट्रीयता या नस्ल के आधार पर देश के किसी भी भाग में किसी भी इंसान के अधिकारों का हनन करने वालों को कड़ी से कड़ी सज़ा देनी होगी। नये राज्य को जातिवादी दमन से पीड़ित लोगों को उनके साथ हुई ऐतिहासिक नाइंसाफी पर काबू पाने के लिये, सबतरफा कदम उठाने होंगे।

नये संविधान को यह मान्यता देनी होगी कि हिन्दोस्तानी समाज के अंदर बहुत सारे राष्ट्र, राष्ट्रीयताएं और लोग हैं, जिनके अपने-अपने आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक अधिकार हैं। नये संविधान को इन सभी राष्ट्रीय अधिकारों तथा संघ से अलग होने के अधिकार की भी गारंटी देनी होगी। इस प्रकार का स्वेच्छा पर आधारित हिन्दोस्तानी संघ एशिया और पूरी दुनिया में शांति और साम्राज्यवाद-विरोधी एकता का कारक होगा।

नये संविधान को लोगों के हाथों में संप्रभुता सौंपनी होगी। चुने गये प्रतिनिधियों को पूरी ताक़त देने के बजाय, लोगों को कुछ ताक़त अपने पास रखनी होगी। हर निर्वाचन क्षेत्र में लोगों को चुनाव से पहले अपने उम्मीदवारों का चयन करने का अधिकार होना चाहिए। लोगों को अपने चुने गये प्रतिनिधि से काम का हिसाब मागंने तथा किसी भी समय पर उसे वापस बुलाने का अधिकार होना चाहिये। बाकी सभी ताक़तें तथा संविधान में संशोधन करने या उसे दोबारा लिखने का अधिकार लोगों के हाथों में होने चाहिएं।

यह नव-निर्माण का कार्यक्रम है, जिसके इर्द-गिर्द मज़दूर-किसान गठबंधन को बनाना व मजबूत करना होगा। बड़े सरमायदारों के समाज-विरोधी और फासीवादी हमले का विरोध करने के दौरान इस मज़दूर-किसान गठबंधन को बनाना व मजबूत करना होगा। सभी मानवीय और लोकतांत्रिक अधिकारों की संवैधानिक गारंटी की मांग करने तथा उसके लिये आंदोलन चलाने के दौरान, इस मज़दूर-किसान गठबंधन को बनाना व मजबूत करना होगा।

हिन्दोस्तान के नव-निर्माण के संघर्ष को आगे बढ़ाएं!

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सत्ता का हस्तांतरण - 1947 से 1950 तक

बहादुर शाह ज़फर, जिन्हें 1857 के महान ग़दर ने गद्दी पर बिठाया था, उन्होंने कहा था कि हिन्दोस्तान के लोग ही यह तय करेंगे कि यहां किस तरह की व्यवस्था होगी। ऐसे सिद्धांत पर अटल रहने के कारण अंग्रेजों ने उन्हें देश से निकाल दिया था और जेल में डाल दिया था। ब्रिटिश संसद द्वारा बनाये सत्ता के हस्तांतरण (ट्रांसफर ऑफ पावर) के कानून ने यह तय किया कि 1947 में, रस्मी आज़ादी के इस दौर में, दक्षिण एशिया में किस प्रकार की व्यवस्था होगी।

संविधान सभा का चुनाव जुलाई 1946 में प्रांतीय विधानसभाओं के सदस्यों में से अप्रत्यक्ष रूप से किया गया था। प्रांतीय विधानसभाओं का चुनाव आयकर भुगतान, सम्पत्ति और शिक्षा के आधार पर सीमित मताधिकार से किया गया था। मज़दूरों, किसानों, छोटे दुकानदारों व व्यापारियों को मतदान से वंचित रखा गया था। हरेक प्रांतीय विधानसभा में सदस्यता को प्रांत की धार्मिक जनगणना के आधार पर सिख, मुस्लिम व अन्य धार्मिक समुदायों के बीच बांटा गया था। इन समुदायों के प्रतिनिधियों का चुनाव सिर्फ उसी समुदाय के लोग करते थे। विभिन्न धर्मों के ऐसे प्रतिनिधियों ने ही संविधान सभा को चुना था।

संविधान सभा में 389 सदस्य थे। कांग्रेस पार्टी को 210 जनरल सीटों में से 203 सीटों पर सफलता मिली। मुस्लिम लीग को मुस्लिमों की 78 सीटों में से 72 सीटों पर सफलता मिली। सिखों, अनुसूचित जातियों तथा छोटे समूहों को 16 सीटें मिली। रजवाड़ों के 93 प्रतिनिधि थे।

संविधान सभा के अंदर से ही, 2 सितम्बर, 1946 को हिन्दोस्तान की एक अंतरिम सरकार बनाई गयी। इसके प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू बने, जो वाइसराय की कार्यकारिणी परिषद के उपाध्यक्ष थे। लार्ड माउंटबेटन जो वाइसराय थे, उन्हें गवर्नर जनरल बनाया गया। जून 1947 में सिंध, पूर्वी बंगाल, बलूचिस्तान, पश्चिमी पंजाब तथा उत्तर-पश्चिमी सीमांत प्रांत के मुस्लिम लीग के सदस्यों ने

संविधान सभा से निकल कर पाकिस्तान की संविधान सभा बनाई। देश के विभाजन के पश्चात, जो सदस्यता छोड़कर कराची नहीं गये थे, उन्होंने हिन्दोस्तान की अस्थाई संसद बनाई और साथ ही संविधान बनाने का काम किया। हिन्दोस्तान ब्रिटिश डोमिनियन बना रहा जब तक 26 जनवरी, 1950 को इसे एक गणराज्य नहीं घोषित किया गया।

अंतरिम सरकार ने हिन्दोस्तानी संघ में रजवाड़ों को जोड़ने का काम किया। हैदराबाद, जूनागढ़ और कश्मीर के शासकों को जबरदस्ती से शामिल किया गया, इस चेतावनी के साथ कि अन्यथा अगर उनके लोग बग़ावत करेंगे तो हिन्दोस्तानी सरकार उनकी मदद के लिये फौज़ नहीं भेजेगी। मणिपुर के राजा को शिलांग ले जाया गया और उससे जबरदस्ती एक विलयन समझौते पर दस्तख़त कराया गया।

संविधान सभा में चर्चा तब चल रही थी जब साम्प्रदायिक हिंसा में जनसमूहों के कत्लेआम हो रहे थे, पंजाबी और बंगाली राष्ट्रों के दो-दो टुकड़े कर दिये गये थे और मनमाने ढंग से सीमा तय करके, करोड़ों लोगों को एक तरफ से दूसरी तरफ जाने के लिये मजबूर किया जा रहा था। संविधान की स्वीकृति के लिये लोगों के सामने इसका मसौदा कभी पेश ही नहीं किया गया। उनसे कोई सलाह नहीं ली गयी। इसके बावजूद, लोगों का प्रतिनिधित्व नहीं करने वाली संविधान सभा ने, न केवल संविधान लिखा बल्कि उसे लागू भी किया और यह सब लोगों के नाम पर किया गया।

संविधान सभा ने अतीत से नाता न तोड़ने का फैसला किया। उसने एक ऐसा संविधान बनाया जिसका मकसद हिन्दोस्तानी बड़े पूंजीपतियों और जमीनदारों के, यानी कि नये शासक वर्ग के हित में उपनिवेशवादी राज्य को और मज़बूत बनाना था।

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संविधान लोगों के अधिकारों की गारंटी नहीं देता है

1950 के संविधान में जानबूझकर सभी वयस्क लोगों के नौकरी करने व उपजीविका सुनिश्चित करने के अधिकार को बुनियादी अधिकारों की सूची से बाहर रखा गया है। उपजीविका के अधिकार को राज्य के नीति निर्देशक तत्वों के तहत शामिल किया गया, जो न्यायोचित नहीं हैं। “निर्देशक तत्व” मात्र नीतिगत उद्देश्य हैं, जिनके लिये राज्य को सलाह दी जाती है कि इनका पालन करना चाहिये। कोई भी व्याक्ति जिसे नौकरी नहीं मिल पाती है, वह न्यायालय में जाकर यह मांग नहीं कर सकता कि नौकरी पाना उसका अधिकार है।

जिन अधिकारों को बुनियादी अधिकारों की सूची में शामिल किया गया है, उन सब धाराओं में ऐसे प्रावधान हैं जिनके ज़रिये राज्य लोगों को उन अधिकारों से वंचित कर सकता है।

उदाहरण के लिये, धारा 15 में घोषणा है कि धर्म, नस्ल, जाति या लिंग के आधार पर भेदभाव करना मना है। इसके बाद की उपधारा में कहा गया है कि इस धारा में कुछ भी क्यों न कहा गया हो, राज्य को किसी भी निश्चित जाति या समुदाय के लिये खास प्रावधान बनाने पर कोई पाबंदी नहीं है। इसका उपयोग करके, एक के बाद एक आने वाली सरकारों ने साम्प्रदायिक व जातिवादी भावनाएं भड़कायी हैं।

धारा 16 में घोषणा है कि सरकारी नौकरियों के मामले में सभी के लिये बराबरी का मौका होगा। इसके बाद की उपधारा राज्य को अनुमति देती है कि राज्य किसी निश्चित जाति के लोगों को नौकरी में आरक्षण दे सकता है। जबकि दिखावा किया जाता है कि इसका उद्देश्य जातिगत भेदभाव से पीड़ित लोगों का “उत्थान” करना है, पिछले 68 वर्षों का अनुभव दिखाता है कि इन उपधाराओं के ज़रिये मौजूदा गणतंत्र में सीटों के लिये लड़ने वाली प्रतिस्पर्धी पार्टियां साम्प्रदायिक व जाति के आधार पर वोट बटोरने का काम करती हैं।

धारा 25 की पहली उपधारा कहती है, “सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता व स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए, ... सभी व्यक्तियों को धार्मिक आस्था रखने, उसका अनुपालन करने व उसका प्रचार करने की एक जैसी ज़मीर की आज़ादी है”। धारा 25 की दूसरी उपधारा राज्य को हिन्दू धार्मिक स्थानों के प्रबंधन में दखलंदाजी करने की आज़ादी देती है। साथ ही इसमें एक फुटनोट है जिसमें कहा गया है कि “हिन्दुओं का संदर्भ उन सभी व्यक्तियों को शामिल करता है जो सिख, जैन या बौद्ध धर्म में आस्था रखते हैं”। एक ही झटके में, इससे विभिन्न धर्मों में भेदभाव करने का रास्ता खुल जाता है और यह उन सभी के ज़मीर के अधिकारों का उल्लंघन करता है जो सिख, जैन और बौद्ध धर्म में आस्था रखते हैं परन्तु अपने आप को हिन्दू नहीं मानते हैं।

अभ्यास के तौर पर राज्य ज़मीर के अधिकार की रक्षा नहीं करता है। उसने सभी हिन्दोस्तानियों को किसी भी धर्म में आस्था रखने या किसी भी धर्म में आस्था न रखने के अधिकार की रक्षा नहीं की है। इसके विपरीत, राज्य धर्म के आधार पर लोगों पर हिंसा प्रायोजित करने व ऐसी हिंसा करने का समर्थन करने के लिये अपराधी है। वह धार्मिक स्थानों और ऐतिहासिक स्मारकों पर हमले करने का भी अपराधी है।

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जातिवादी बंटवारे    गणराज्य    सांप्रदायिक    Jan 16-31 2018    Statements    Communalism     Rights     2018   

पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

 

5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

(Click thumbnail to download PDF)

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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