महिला मुक्ति में समाज की मुक्ति है

संपादक महोदय,

देश को आज़ाद हुए 71 वर्ष हो चुके हैं। परन्तु क्या हम सच में आज़ाद हैं! सच कहूं तो मुझे नहीं लगता कि हम आज़ाद हैं। वह कौन-सी आज़ादी है, जहां हम अपनी मर्ज़ी से अपनी ही ज़िन्दगी न जी सकें। अपनी मर्ज़ी का व्यवसाय न चुन सकें और यहां तक कि अपनी मर्ज़ी के कपड़े भी न पहन सकें। हमें अपनी मर्ज़ी से अपना जीवन साथी चुनने और अपनी ज़िन्दगी के अहम फैसले लेने की आज़ादी नहीं है। समाज को पीछे ले जाने वाले कितने ही नियम हमारे पर थोपे गये हैं। इनके अनुसार, लड़कियों के साथ जब कोई हादसा होता है तो कहा जाता है कि लड़की गलत होगी, उसने गलत कपड़े पहने होंगे या उसने कुछ ऐसी-वैसी हरकत की होगी, तभी उसके साथ ऐसा हुआ। लेकिन 5-6 साल की बच्ची - क्या उसने गलत कपड़े पहने होंगे, कि उसके साथ बलात्कार जैसी घटना हो जाती है।

ये उपरोक्त बातें, 4 फरवरी, 2018 को आयोजित गोष्ठी में हमारे समूह में चर्चा के दौरान आयीं। गोष्ठी का विषय था - “शोषण पर आधारित समाज को ख़त्म करके ही महिलायें अपनी मुक्ति हासिल कर पायेंगी”। यह गोष्ठी काफी अच्छी थी। इस तरह की समूह-चर्चा से आत्मविश्वास तो बढ़ता ही है, अन्य साथियों के विचार सुनकर हमारे ज्ञान में वृद्धि भी होती है। इसमें हर साथी के विचार सामने आए, जो समाज की कड़वी हक़ीक़त से हमें रूबरू करते हैं।

हमारे समूह में यह बात भी सामने आयी कि यूं तो संविधान में बहुत सी बातें हैं लेकिन हक़ीक़त से दूर।

संविधान की प्रस्तावना मे लिखा है कि - हम भारत के लोग, भारत को एक संप्रभुता-सम्पन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक...। क्या इनमें आए बड़े-बड़े शब्द हमारी व्यवहारिक ज़िन्दगी से मेल खाते हैं, बिल्कुल नहीं! सरकार और न्यायपालिका हैं, इसके बावजूद लड़कियों के साथ बलात्कार, शोषण, लूट और छेड़छाड़ चलते रहते हैं।

क्या, महिलाओं को आज़ादी है? लड़कों को घर से बाहर जाने की छूट होती है, जबकि लड़कियों से कहा जाता है कि अपनी हद में रहो। यानी लिंग के आधार पर भेदभाव होना। एक कार पर सवार व्यक्ति को हम सर व बाबूजी बोलकर संबोधित करते हैं, वहीं दूसरी तरफ एक रिक्शेवाले को धिक्कार देते हैं - ये सब समाज की गैर-बराबरी को दिखाता है। जाति के आधार पर भेदभाव तो यहां आम है। बेरोज़गारी का मामला हो या वेतन देने के मामले में भेदभाव करना - ये सभी पूंजीवादी प्रणाली की ही देन हैं।

पूंजीवादी प्रणाली ने समाज में सदियों पुरानी पिछड़ी सोच को 21वीं सदी में भी बनाकर रखा हुआ। पूंजीपति वर्ग अपनी प्रणाली के ज़रिये इन भेदभावों और गैर-बराबरी को बनाये रखकर, लोगों की एकता तोड़ते हैं और अपना राज करते हैं। हमें पूरे दम के साथ, अपनी पार्टी को मजबूत करना चाहिये जो मज़दूर वर्ग की सत्ता लाने के लिए काम कर रही है। पूंजीवाद की वर्तमान प्रणाली, जो कि सड़ियल, पुरानी सोच, गैर-बराबरी और भेदभावों की जननी है, हमारी पार्टी उससे मुक्ति के लिए संघर्ष कर रही है।

फरज़ाना ख़ातून

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महिला मुक्ति    समाज की मुक्ति    Mar 1-15 2018    Letters to Editor    Rights     2018   

पार्टी के दस्तावेज

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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