राष्ट्रीय स्वास्थ्य रक्षा योजना : निजी अस्पतालों का विस्तार और स्वास्थ्य सेवा के सर्वव्यापक अधिकार से इनकार

2018-19 के केन्द्रीय बजट को प्रस्तुत करते हुए, वित्त मंत्री जेटली ने सरकार के बहु-प्रचारित आयुष्मान भारत कार्यक्रम के तहत, स्वास्थ्य क्षेत्र में दो मुख्य पहलकदमों की घोषणा की। ये हैं हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर तथा राष्ट्रीय स्वास्थ्य रक्षा योजना।

हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर (स्वास्थ्य और खुशहाली केन्द्र) को ‘हिन्दोस्तान की स्वास्थ्य व्यवस्था की नींव’ बताया जा रहा है। सरकार ने घोषणा की है कि इस प्रकार के 1.5 लाख केन्द्र स्थापित किए जाएंगे, जो ‘स्वास्थ्य सेवा को जनता के करीब लाएंगे’। सरकार यह दावा कर रही है कि ये केन्द्र सब-तरफा स्वास्थ्य सेवा प्रदान करेंगे, जिसमें गैर-संक्रामक बीमारियों का इलाज तथा मातृत्व और शिशु स्वास्थ्य सेवाएं भी शामिल होंगी। यह भी दावा किया जा रहा है कि ये केन्द्र ज़रूरी दवाइयां और जांच सेवाएं मुफ्त में प्रदान करेंगे। यह योजना राज्य सरकारों के सहारे लागू की जाएगी। बजट में इस कार्यक्रम के लिए 1200 करोड़ रुपए निर्धारित किए गए हैं। इसका यह मतलब है कि प्रत्येक हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर पर मात्र 80,000 रुपए का निवेश किया जाएगा, जो कि जरूरी स्वास्थ्य सेवा मुहैया कराने के लिए बहुत ही कम है।

राष्ट्रीय स्वास्थ्य रक्षा योजना (एन.एच.पी.एस.) एक नया स्वास्थ्य बीमा कार्यक्रम है। इस योजना में बाह्य रोगी सेवाएं शामिल नहीं की जायेंगी। सरकार ने वादा किया है कि इसके तहत देश के 10 करोड़ गरीब परिवारों को निःशुल्क स्वास्थ्य सेवा मिलेगी। वित्त मंत्री ने दावा किया है कि यह “दुनिया का सबसे बड़ा स्वास्थ्य सेवा कार्यक्रम” होगा।

सरकार यह दावा कर रही है कि वह आबादी के सबसे गरीब 40 प्रतिशत के हित में काम कर रही है। परंतु कई ऐसे तथ्य सामने आए हैं जो दिखाते हैं कि इस नयी योजना के पीछे कुछ शक्तिशाली निजी स्वार्थ हैं।

इस पूरी योजना की रचना नीति आयोग ने की है। इसकी रचना बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन की सांठगांठ में की गई है, जिसके मालिक अमरीका के सबसे अमीर पूंजीपतियों में से एक हैं। कोई अमरीकी पूंजीवादी अरबपति हमारे देश के गरीब लोगों की सेवा के लिए, सरकारी धन पर चलने वाले स्वास्थ्य बीमा कार्यक्रम को समर्थन देने में क्यों रुचि ले रहा है?

स्वास्थ्य बीमा योजना के विस्तार से निजी अस्पतालों और निजी बीमा कंपनियों के मुनाफे़दार धंधे बहुत बढ़ जाएंगे। यही कारण है कि अमरीकी पूंजीवादी अरबपति सरकारी धन पर चलने वाले स्वास्थ्य बीमा कार्यक्रम को बढ़ावा देने में रुचि रखते हैं, क्योंकि इससे निजी अस्पतालों में भर्ती होने वाले मरीजों की संख्या में खूब वृद्धि होगी।

स्वास्थ्य सेवा - एक सर्वव्यापक मानव अधिकार

आयुष्मान भारत योजना की घोषणा ऐसे समय पर की गई है जब प्रतिदिन सरकारी अस्पतालों में बुनियादी सुविधाओं के अभाव के कारण बच्चों की मौत और निजी अस्पतालों में मरीजों की लूट के बारे में चैंकाने वाली खबरें मिल रही हैं। अधिकतम लोगों को कोई स्वास्थ्य सेवा मिलती ही नहीं है। हिन्दोस्तान में शिशुओं के मरने की दर तथा जन्म देती हुई माताओं के मरने की दर को दुनिया में सबसे ऊंची दरों में गिना जाता है। हर साल लाखों-लाखों बच्चे ऐसी बीमारियों से मर जाते हैं, जो लाइलाज नहीं हैं बल्कि जिन्हें पूरी तरह रोका जा सकता है।

गांव में लोगों को छोटी-से-छोटी स्वास्थ्य सेवा के लिए, निकटतम अस्पताल तक पहुंचने के लिए कभी दसों तो कभी सैकड़ों किलोमीटर चलना पड़ता है। प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र या तो हैं ही नहीं, या अगर हैं तो उनमें ढांचागत सुविधाओं, मेडिकल सामग्रियों व सेवाओं, डाक्टरों व नर्सों की भारी कमी है। शहरों में सरकारी अस्पतालों के बाहर इलाज के लिए इंतजार करने वाले बीमार लोगों की लंबी लाइनें, सरकारी अस्पतालों में भीड़ तथा आक्सीजन सिलिंडर जैसी बुनियादी सेवाओं की कमी, ये राज्य द्वारा लोगों को उपलब्ध करायी जा रही स्वास्थ्य सेवा की असली छवि को दर्शाती हैं।

इन सब कारणों की वजह से, हमारे देश के लोग दूसरे देशों की तुलना में, ज्यादा बीमार पड़ते हैं। अनुमान लगाया गया है कि हिन्दोस्तान में “बीमारी का बोझ” चीन और पश्चिम एशिया की तुलना में दुगुना है। परंतु स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च बहुत कम है। स्वास्थ्य सेवा, सार्वजनिक स्वास्थ्य, पेयजल और शौच प्रबंध, इन सबको मिलाकर केन्द्र और राज्य सरकारों का सम्मिलित खर्च 1991 से आज तक सकल घरेलू उत्पाद का मात्र 1.25 प्रतिशत पर ही टिका रहा है।

हिन्दोस्तानी राज्य ने जनता की स्वास्थ्य सेवा की इन जघन्य हालतों को सुधारने के लिए कोई गंभीर कदम नहीं उठाये हैं। हिन्दोस्तान में सर्वव्यापक सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा का स्तर दुनिया के दूसरे देशों की तुलना में बेहद घटिया है। मज़दूर वर्ग, महिलाएं और समाज के अन्य तबके बार-बार यह मांग करते रहे हैं कि स्वास्थ्य सेवा को एक सर्वव्यापक मानव अधिकार माना जाए, जिसे मुफ्त या मुनासिब दामों पर सुनिश्चित करना राज्य का फर्ज़ हो।

प्रस्तावित राष्ट्रीय स्वास्थ्य रक्षा योजना उन परिवारों के लिए होगी, जिन्हें गरीबी रेखा से नीचे होने का प्रमाणपत्र मिलेगा। राज्य सरकार द्वारा जारी किए गए बी.पी.एल. कार्ड धारक परिवार इसमें दर्ज हो सकते हैं। जिन्हें इसमें दर्ज किया जाएगा, वे स्थायी बीमारियों की निर्धारित सूची में लिखी हुई किसी बीमारी के इलाज के लिए निजी अस्पताल में जा सकेंगे। उनके इलाज का खर्चा बीमा योजना से पूरा किया जाएगा, जिसका प्रीमियम सरकार देगी। इस बीमा योजना के प्रीमियम के लिए ज़रूरी धन सभी मेहनतकशों की लूट को और बढ़ाकर वसूला जाएगा। इस लूट को बढ़ाने के लिए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों तथा राज्य द्वारा धन वसूली के अन्य तरीकों को खूब बढ़ा दिया जाएगा।

लाखों-लाखों गरीब परिवार, जिन्हें बी.पी.एल. कार्ड नहीं मिलेगा, इस योजना का फायदा नहीं उठा पाएंगे। जो परिवार इस नयी योजना में दर्ज हो जायेंगे, उन्हें भी मात्र कुछ गिनी-चुनी बीमारियों के लिए ही अस्पताल सेवा का खर्च दिया जाएगा। बाह्य रोगी सेवा (ओ.पी.डी.) के लिए तथा डाक्टर द्वारा लिखी गई दवाइयों के लिए, इस योजना के तहत, एक रुपया भी नहीं मिलेगा।

सरकार द्वारा अस्पताल में भर्ती होकर इलाज कराने का खर्च देने और ओ.पी.डी. सेवाओं का खर्च न देने के पीछे क्या कारण है? इसका कारण यह है कि बड़े पूंजीपति निजी अस्पतालों के मुनाफ़ों को खूब बढ़ाना चाहते हैं, सिर्फ मेट्रो शहरों में ही नहीं बल्कि देश के बहुत सारे छोटे शहरों और नगरों में भी।

पीपीपी के नाम पर निजीकरण

इस प्रस्तावित नयी स्वास्थ्य बीमा योजना को स्वास्थ्य क्षेत्र में सार्वजनिक-निजी सांझेदारी (पीपीपी) के तहत लिए गए कई अन्य पहल कदमों के संबंध में देखना होगा। एक ऐसा पहल कदम वह विश्व बैंक परियोजना है जिसके तहत जिला अस्पतालों की बहुत सारी जगह और ढांचागत सुविधाएं निजी कंपनियों को किराए पर दी जाएंगी।

देश के हर जिले में, सरकारी अस्पतालों, सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों और उप-केन्द्रों को जनता के धन का निवेश करके स्थापित किया गया था। उनका तथाकथित उद्देश्य था समाज के सभी सदस्यों के लिए मुफ्त स्वास्थ्य सेवा सुनिश्चित करना। परंतु यह सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा व्यवस्था आज बहुत ही घटिया हालत में है क्योंकि पूंजीपति वर्ग की एक के बाद दूसरी सरकार ने जानबूझकर इसकी उपेक्षा की है और इस पर कम से कम खर्च किया है।

स्वास्थ्य कर्मचारियों और सामग्रियों तथा सेवाओं की कमी के बावजूद, सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा व्यवस्था ही देश के लाखों-लाखों लोगों के लिए स्वास्थ्य सेवा का एकमात्र स्रोत है। इसीलिए जिला अस्पतालों से लेकर नई दिल्ली स्थित एम्स तक, सभी सरकारी अस्पतालों के सामने लंबी-लंबी लाइनें लगती हैं। मज़दूरों, किसानों और अधिकतम लोगों की यही सांझी इच्छा है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा व्यवस्था को मजबूत किया जाए तथा उस पर पर्याप्त धन लगाया जाए। न सिर्फ अस्पतालों को बल्कि गांवों में उपकेन्द्रों तक, पूरी व्यवस्था को मजबूत करने की ज़रूरत है।

अगर सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा व्यवस्था में उन्नति लाई जाए और उसे अच्छी स्वास्थ्य सेवा दिलाने के काबिल बनाया जाए, तो यह जन हित में बहुत बड़ा कदम होगा। इसके लिए केन्द्र व राज्य सरकारों के मिले-जुले बजट में बहुत वृद्धि करनी होगी तथा स्वास्थ्य सेवा की गुणवत्ता पर बहुत ध्यान देना होगा।

परंतु हमारी सरकार इसकी उल्टी दिशा में आगे बढ़ रही है। वह इस मंत्र को जपती रहती है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा व्यवस्था फेल हो चुकी है और निजी स्वास्थ्य सेवा व्यवस्था का विस्तार करना ही इसका समाधान है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य रक्षा योजना का असली मकसद है सरकारी अस्पतालों के अंदर घुसी हुई निजी कंपनियों के लिए बड़े तथा लगातार बढ़ते हुए बाज़ार को सुनिश्चित करना।

“सार्वजनिक-निजी सांझेदारी” के झंडे तले, सार्वजनिक संसाधनों को निजी पूंजी में बदल दिया जा रहा है। सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा व्यवस्था को जनता को मुफ्त में या सस्ते दामों पर अच्छी स्वास्थ्य सेवा दिलाने के योग्य बनाने के बजाय, उसे अधिक से अधिक मुनाफ़ों की लालच करने वाली कंपनियों को सौंपा जा रहा है।

खबरों के अनुसार, इस प्रस्तावित राष्ट्रीय स्वास्थ्य रक्षा योजना की रचना करने में नीति आयोग ने उन सब बड़ी-बड़ी पूंजीवादी कंपनियों से सलाह की थी, जो देश में तमाम निजी अस्पतालों को चला रही हैं।

निष्कर्ष

आयुष्मान भारत योजना, समाज के सभी सदस्यों को एक बुनियादी अधिकार बतौर, मुफ्त या सस्ते दाम पर स्वास्थ्य सेवा सुनिश्चित कराने की दिशा में कदम नहीं है। सर्वव्यापक स्वास्थ्य सेवा के लिए जनता की मांग को पूरा करना उसका उद्देश्य नहीं है। बल्कि, उसका उद्देश्य है कुछ गिनी-चुनी बीमारियों के निजी अस्पतालों में इलाज की सुविधाओं का विस्तार करने के लिए जनता का धन लूटना। यह पूंजीवादी अरबपतियों के अधिक से अधिक निजी मुनाफों को सुनिश्चित करने के लिए, सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा व्यवस्था को नष्ट करने की दिशा में एक और कदम है।

संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि यह तथाकथित आयुष्मान भारत देश के लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सेवा नहीं देगी, न ही देश के लोगों को बीमारियों से बचाएगी। यह एक जन-विरोधी और पूंजीपतियों के हित में चलायी जाने वाली योजना है।

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पार्टी के दस्तावेज

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ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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