अदालत के इस्तेमाल के ज़रिये परिवहन कर्मचारियों पर हमले

नागपुर शहर में बस सर्विस के कंडक्टरों तथा ड्राइवरों द्वारा अनिश्चितकालीन हड़ताल शुरू करने के बाद राज्य से ऐसी प्रतिक्रिया देखने को मिली जो आज पूरे देश में आम है। देश के किसी भी कोने में और किसी भी पार्टी के राज में यही प्रतिक्रिया देखी जा सकती है। एसेंशियल सर्विसेज़ मेंटेनेंस एक्ट (एस्मा) का प्रयोग कर इस हड़ताल को गैर-कानूनी घोषित किया गया है।

आपली बस (अपनी बस) एक ऐसी बस सेवा है जिसका नागपुर नगर निगम क्षेत्र में 123 मांगों पर परिचालन होता है। दरअसल यह सेवा लोगों तक पहुंचाना नागपुर नगर निगम (एन.एम.सी.) की ज़िम्मेदारी है। तकरीबन 1080 ड्राइवरों और 1120 कंडक्टरों के साथ, 4 बस ऑपरेटर और 2 टिकट एजेंसियां मिलकर इस बस सेवा को चला रही हैं। उनकी प्रतिनिधि यूनियन ‘भारतीय कामगार सेना’ ने 19 जनवरी, 2018 को महानगर कमिश्नर को एक मांगपत्र दिया है।

उस मांगपत्र में कुछ मुख्य मांगें हैं, न्यूनतम वेतन एक्ट लागू किया जाये, सभी बस ऑपरेटरों तथा टिकट एजेंसियों में जांच पड़ताल समिति बने, ‘वंश निमय’ इन्फ्रा प्रोजेक्ट से बेरोज़गार हुए सभी कर्मचारियों को फिर से रोज़गार दिया जाये तथा सभी बस ऑपरेटरों के तहत काम करने वाले सभी कर्मचारियों को स्थायी नौकरियां दी जायें। एन.एम.सी. परिवहन के अधिकारी, विभिन्न मज़दूर विभाग और मज़दूर यूनियन के पदाधिकारियों के बीच हुई मीटिंग से भी कोई हल नहीं निकला। एन.एम.सी. के कमिश्नर, प्रेस के सामने इसी बात पर अड़े रहे कि कर्मचारियों को न्यूनतम वेतन मिल रहा था। लेकिन यूनियन इस दावे को झूठा ठहराते हुए एक निष्पक्ष जांच समिति बनाने की मांग रख रही है।

मज़दूरों ने एन.एम.सी. अधिकारियों से इन सभी मसलों पर बात करने की पूरी कोशिश की लेकिन एन.एम.सी. ने कोई सहयोग नहीं किया। जब मज़दूरों ने साथ आकर हड़ताल घोषित की, तब बस आॅपरेटरों ने औद्योगिक अदालत में जाकर मज़दूरों की हड़ताल को गैर-कानूनी घोषित करवाया। साथ ही साथ एन.एम.सी. ने हड़ताल पर जानेवाले मज़दूरों के खिलाफ़ एसेंशियल सर्विसेज़ मेंटेनेंस एक्ट (एस्मा) का भी प्रयोग किया। एन.एम.सी. अधिकारियों ने तो सभी सक्रिय कार्यकर्ताओं की सूची पुलिस को दे दी ताकि उन कार्यकर्ताओं को एस्मा के तहत जेलों में बंद किया जा सके। बस ऑपरेटरों ने हड़ताल में सक्रिय 18 मज़दूरों को तुरंत नौकरी से निष्कासित कर दिया। एस्मा लागू करने के बाद, यूनियन ने हड़ताल को रोकने का फैसला किया लेकिन उन्होंने अपना संघर्ष भूख हड़ताल के रूप में आगे ले जाने का फैसला भी किया।

चाहे चंडीगढ़ या महाराष्ट्र के डॉक्टर हों, तमिलनाडु की नर्से हों या ठाणे, मुंबई तथा तमिलनाडु के परिवहन मज़दूर हों या अलग-अलग नगर निगमों के कर्मचारी हों, स्कूलों तथा विश्वविद्यालयों के शिक्षक हों, भारतीय रेल के इंजन चालक हों, देशभर में सभी मज़दूर एक जैसी हालतों से पीड़ित हैं। सबसे पहले तो मज़दूरों को उनके सबसे मूलभूत अधिकार, न्यूनतम वेतन पाने के हक़ से वंचित रखा जाता है, उसके बाद उनके वेतन में सुधार लाने वाले समझौतों में जानबूझकर रुकावट पैदा की जाती है। मज़दूरों की काम की जगहों पर सुरक्षा तथा खराब काम की हालतों के बारे में आगे रखी गई मांगों पर भी कोई ध्यान नहीं दिया जाता है। पदाधिकारियों से बातचीत करके मज़दूरों के सामने आने वाली तकलीफों को हल करने की मज़दूरों की कोशिश को कभी भी कोई सहयोग नहीं मिलता है। अंत में जब कोई आसार नहीं बचते और मज़दूर हड़ताल पर उतरते हैं, तब विभिन्न अदालतें और स्थानीय/राज्य/केंद्रीय सरकारें जाग उठती हैं। पर तब उनके उठाए गये कदम मज़दूर विरोधी होते हैं जैसे कि मज़दूरों के संघर्ष को एस्मा जैसे काले कानून का इस्तेमाल कर गैरकानूनी घोषित करना तथा उन पर रोक लगाना।

मज़दूर एकता लहर एन.एम.सी. परिवहन मज़दूरों पर औद्योगिक अदालत तथा एन.एम.सी. द्वारा किए गए हमलों की कड़ी निंदा करती है।

सभी विभागों के मज़दूरों को एकजुट होकर इन बर्बर हमलों का कड़ा विरोध करने की ज़रूरत है। मज़दूरों को काले कानूनों को ख़त्म करने की मांग करनी चाहिए। उन्हें ऐलान करना चाहिए कि कोई भी राजनैतिक पार्टी जो एस्मा जैसे काले कानून की वकालत करती है वह मज़दूर वर्ग विरोधी है। उन्हें यह मांग रखनी चाहिए कि जो मज़दूर लोगों को सभी ज़रूरी सेवाएं देते हैं, उन मज़दूरों की देखभाल सरकारों की प्राथमिक ज़िम्मेदारी है। क्योंकि मज़दूरों की देखभाल से ही लोगों तक पहुंचने वाली इन सभी ज़रूरी सेवाओं की उच्चतम गुणवत्ता सुनिश्चित की जा सकती है।

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पार्टी के दस्तावेज

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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