शहीदों का पैगाम - क्रांति द्वारा समाजवादी हिन्दोस्तान की स्थापना

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केंद्रीय समिति का बयान, 10 मार्च, 2018

हर वर्ष 23 मार्च को शहीदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। 1931 में इसी दिन बर्तानवी राज ने शहीद भगत सिंह, शहीद सुखदेव और शहीद राजगुरु को फांसी पर चढ़ाया था।

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1857 के महान ग़दर और उससे भी पहले से बर्तानवी राज ने पूरे हिन्दोस्तानी उपमहाद्वीप में अनगिनत देशभक्तों को इसी तरह मौत के घाट उतरा था। बर्तानवी राज ने इन सभी देशभक्तों को “राज्य का दुश्मन” करार दिया था। शहीदी दिवस एक ऐसा मौका है जब हम इस बात को याद करते हैं कि हमारे शहीद किस लक्ष्य के लिए लड़े थे और बर्तानवी हुक्मरानों ने उनको किस वजह से मौत के घाट उतारा था।

हमारे इतिहास की किताबों में ऐसी कई राजनीतिक शख़्सियतों का ज़िक्र है जिन्हें “आज़ादी का सिपाही” कहा गया है। लेकिन बर्तानवी हुक्मरानों ने इन सभी को “राज्य का दुश्मन” नहीं करार दिया। उन सभी को फांसी नहीं दी।

असलियत यह है कि बस्तीवाद-विरोधी आंदोलन में दो तरह की पार्टियां थीं और दो तरह की राजनीतिक शख़्सियतें थीं। ये दो तरह की पार्टियां और दो तरह के राजनीतिक व्यक्ति दो परस्पर विरोधी धाराओं का प्रतिनिधित्व करते थे - एक धारा थी क्रांतिकारी धारा और दूसरी धारा थी बर्तानवी हुक्मरानों के साथ समझौते की धारा। ये दोनों धाराएं दो अलग-अलग हितों के साथ मेल खाती थीं जिनमें एक धारा हिन्दोस्तानी समाज में बहुसंख्य शोषित लोगों के हित में थी और दूसरी धारा चंद मुट्ठीभर अल्पसंख्यक शोषकों के हित में थी।

क्रांतिकारी धारा का अनुसरण करने वालों में 1857 के शहीद, हिन्दोस्तान ग़दर पार्टी और हिन्दोस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के कार्यकर्ता थे। हिन्दोस्तान ग़़दर पार्टी हिन्दोस्तानियों की पहली क्रांतिकारी पार्टी थी, जिसकी स्थापना 1913 में सशस्त्र जन क्रांति के द्वारा बर्तानवी बस्तीवादी हुकूमत को उखाड़ फेंकने के मकसद से हुुई थी। भगत सिंह और उनके साथियों को हिन्दोस्तान ग़दर पार्टी से प्रेरणा मिली थी और उसकी लाइन से मार्गदर्शन मिला था। उन्होंने रूस की महान समाजवादी अक्तूबर क्रांति से और 1920 के दशक में सोवियत संघ में समाजवाद की जीत के अनुभव से भी बहुत कुछ सीखा।

क्रान्ति पर भगत सिंह के विचार

क्रांति शब्द का मतलब क्या होता है, इस सवाल का जवाब देते हुए भगत सिंह ने अपने मुकदमे के दौरान कहा था कि: “क्रांति का अर्थ यह नहीं कि खूनी हिंसा ज़रूरी हो या व्यक्तिगत बदले की भावना हो। क्रांति का अर्थ बम और पिस्तौल का प्रयोग नहीं है। ‘क्रांति’ से हमारा मतलब है कि वर्तमान व्यवस्था, जो खुलेआम नाइंसाफी पर आधारित है, बदलनी चाहिये। उत्पादक या श्रमिक समाज के सबसे आवश्यक तत्व हैं परन्तु शोषकों द्वारा उनके श्रम के फल को लूटा जाता है और उन्हें अपने मूलभूत अधिकारों से वंचित किया जाता है। किसान, जो सबके लिये अनाज पैदा करता है, अपने परिवार सहित भूखा मरता है; बुनकर जो दुनिया के बाज़ार में कपड़ों की सप्लाई करता है, उसके पास अपने व अपने बच्चों के तन को ढकने के लिये कपड़े नहीं होते हैं; राजमिस्त्री, लोहार और बढ़ई, जो शानदार महल खड़े करते हैं, झुग्गी-बस्तियों में जानवरों की जिंदगी जीते हैं। पूंजीपति और शोषक, जो समाज के परजीवी हैं, अपनी मनमर्जी के अनुसार दसों-लाखों रुपयों की फिजूलखर्ची करते हैं। इन भयानक विषमताओं और जबरदस्ती से बनाए रखी गई असमानता से अराजकता फैलना अनिवार्य है। यह परिस्थिति ज्यादा देर तक नहीं चल सकती और यह स्पष्ट है कि मस्ती से चलने वाली वर्तमान सामाजिक व्यवस्था एक ज्वालामुखी के मुंह पर बैठी है।

“इस पूरी सभ्यता के ढांचे को अगर समय पर न बचाया जाये तो यह गिर जायेगा। अतः एक मूलभूत परिवर्तन की आवश्यकता है और जो इस बात को समझते हैं, उनका यह फर्ज़ बनता है कि समाज को समाजवादी आधार पर पुनर्गठित करें। जब तक ऐसा नहीं किया जायेगा और इंसान द्वारा इंसान तथा किसी एक राष्ट्र द्वारा दूसरे राष्ट्रों के शोषण को ख़त्म नहीं किया जायेगा, तब तक मानवजाति को तड़पाने वाली पीड़ाओं और तबाही को नहीं रोका जा सकेगा। जंग को ख़त्म करने और विश्वव्यापी शांति का युग स्थापित करने की सारी बातें बेहद कपटी हैं।

“क्रांति से हमारा मतलब है कि अंत में ऐसी सामाजिक व्यवस्था स्थापित की जाये जिसमें इस प्रकार की तबाही का ख़तरा न हो, और जिसमें श्रमजीवी वर्ग की संप्रभुता को मान्यता प्राप्त हो और एक विश्वव्यापी संघ हो जो मानवजाति को पूंजीवाद की जकड़ व साम्राज्यवादी जंग के दुख-दर्द से बचायेगा।

“यह हमारा आदर्श है और इस आदर्श से प्ररित होकर हमने उचित तरीके से और काफी जोर से चेतावनी दी है। परन्तु अगर हमारी चेतावनी को नहीं सुना जाता है और वर्तमान सरकार की व्यवस्था स्वाभाविक तौर पर उभरती हुई ताक़तों के रास्ते में एक रुकावट बनती रहती है, तो एक घमासान संघर्ष होगा, जिसमें सभी रुकावटों को उखाड़कर फेंक दिया जायेगा और श्रमजीवी वर्ग का अधिनायकत्व स्थापित होगा, जो क्रांति के आदर्श को पूरा करने का रास्ता खोलेगा।”

हिन्दोस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन जो आगे चलकर हिन्दोस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन बना, यह संगठन बस्तीवादी बर्तानवी हिन्दोस्तानी राज्य को पूरी तरह से उखाड़ फेंकने और उसकी जगह पर संपूर्ण रूप से एक नये राज्य का गठन करने के लिये प्रतिबद्ध था। हिन्दोस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के 1925 के घोषणापत्र ने इंकलाब का राजनीतिक मकसद एक ऐसे हिन्दोस्तानी संयुक्त राज्य संघ का निर्माण करना बताया था, जो बर्तानवी बस्तीवादी शासन से आज़ादी के लिए संघर्ष में साथ आये हुए तमाम राष्ट्रों, राष्ट्रीयताओं तथा लोगों के संप्रभु अधिकारों का आदर करेगा।

बर्तानवी राज के साथ समझौते की धारा का अनुसरण करने वालों में कांग्रेस पार्टी, मुस्लिम लीग और अन्य संगठन थे जो बड़े पूंजीपतियों और बड़े जमींदारों के अलग-अलग तबकों के हितों का प्रतिनिधित्व करते थे। पूंजीवादी-साम्राज्यवादी व्यवस्था और बस्तीवादी राज में अपने प्रतिनिधियों को शामिल करने के लिये उन्होंने बर्तानवी शासकों के साथ सौदेबाजी की। वे मौजूदा राज्य को बरकरार रखना चाहते थे और अपने खुदगर्ज़ हितों के मुताबिक उसमें कुछ सुधार लाना चाहते थे।

क्रांतिकारी राजनीतिक सत्ता के चरित्र में अमूलचूल परिवर्तन के लिये लड़ रहे थे। समझौताकारी शोषण की व्यवस्था और राज्य के चरित्र व लोगों में फूट डालकर राज करने की उसकी साम्प्रदायिक नींव में बिना किसी मूलभूत परिवर्तन के एक शोषक की जगह पर दूसरे शोषक को सत्ता में लाने के लिए लड़ रहे थे।

भक्ति व सूफी लहर से आये प्रगतिशील विचारों को आगे बढ़ाते हुए, क्रांतिकारी समाज के प्रत्येक व्यक्ति के ज़मीर के अधिकार को मानते थे। उन्होंने सही पहचाना था कि साम्प्रदायिकता व साम्प्रदायिक हिंसा की जड़ बस्तीवादी राज्य में है। उन्होंने उस प्रचार को नकारा और उसका पर्दाफाश किया जो लोगों और उनकी आस्थाओं को इनके लिये ज़िम्मेदार ठहराता था। उन्होंने धर्म, जाति या भाषा की परवाह किये बिना, लोगों को विदेशी व दमनकारी बस्तीवादी राज के खिलाफ़ एकजुट करने का काम किया था।

कांग्रेस पार्टी, मुस्लिम लीग, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आर.एस.एस.), हिन्दू महासभा व अन्य ने हिन्दोस्तान की बस्तीवादी संकल्पनाओं से समझौता किया जिसके अनुसार हिन्दोस्तान “हिन्दू बहुसंख्या” तथा अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों से बना है। इनमें से कुछ ने हिन्दुओं को मुस्लिमों से बदला लेने का बुलावा दिया। कुछ ने मुस्लिमों को एक अलग राज्य के लिये लड़ने का बुलावा दिया।

धर्म निरपेक्षता के नाम पर कुछ ने हिन्दुओं को बुलावा दिया कि वे अल्पसंख्यकों को सहन करें।

बर्तानवी हुक्मरान, क्रांतिकारी और समझौताकरी धाराओं के सदस्यों के साथ अलग तरह का बर्ताव करते थे। क्रांतिकारियों के खि़लाफ़ उन्होंने वहशी दमनचक्र चलाया। समझौताकारी धारा के सदस्यों को उन्होंने तमाम तरह की सहूलियतें, विशेषाधिकार और धन मुहैया कराया। उन्होंने दोनों तरह के संगठनों को समर्थन दिया  - जो खुल्लम-खुल्ला साम्प्रदायिक संगठन थे और जो धर्म निरपेक्षता के झंडे तले सहनशीलता का उपदेश देते थे।

1947 में किया गया “सत्ता का हस्तांतरण” राज्य के चरित्र और अर्थव्यवस्था में  अमूलचूल परिवर्तन नहीं था। शोषकों के एक झुण्ड की जगह शोषकों के दूसरे झुण्ड ने ले ली। बर्तानवी पूंजीपतियों की हुकूमत की जगह पर बड़े जमींदारों और अन्य शोषकों की सांझेदारी में हिन्दोस्तान के बड़े पूंजीपतियों की हुकूमत कायम की गयी। लोगों की पीठ पीछे बर्तानवी साम्राज्यवादियों और हिन्दोस्तानी सरमायदारों के बीच किया गया यह एक सौदा था, इसके तहत राजनीतिक आज़ादी तो हासिल की गयी, लेकिन राज्य और सामाजिक व्यवस्था में एक क्रांतिकारी परिवर्तन को रोक दिया गया।

पिछले सात दशकों में क्रांति की राह को रोकने के लिए बर्तानवी राज्य मशीनरी, उसके “कानून का राज” और उसकी साम्प्रदायिक नींव को बरकरार रखा गया है। राज्य का लक्ष्य रहा है कि शोषण और लूट की व्यवस्था को बनाये रखना, लोगों को बांटकर रखना और हर कीमत पर क्रांति को रोकना।

जब प्रधानमंत्री यह दावा करते हैं कि उनकी सरकार एक “नए हिन्दोस्तान” का निर्माण करने के प्रति कटिबद्ध है, तो वे उस झूठ को दोहरा रहे हैं कि क्रांति के बगैर गुणात्मक परिवर्तन लाया जा सकता है। जवाहरलाल नेहरू के जमाने से आज तक यही झूठ अलग-अलग रूपों में हमारे देश के लोगों को परोसा गया है।

शोषण और दमन से मुक्त एक आज़ाद हिन्दोस्तान हमारे देश के बहुसंख्य जनसमुदाय का सपना रहा है। लेकिन हक़ीक़त तो यह है कि क़रीब 70 साल पहले बस्तीवादी राज का अंत होने के बावजूद, हमारे देश के बहुसंख्यक लोग आज़ादी की सांस नहीं ले पा रहे हैं। मज़दूर आज़ाद नहीं हैं, बेरोज़गारी, महंगाई और काम की जगहों पर अत्यधिक शोषण से। किसान आज़ाद नहीं हैं, रोज़ी-रोटी की बढ़ती असुरक्षा से और पूंजीवादी हितों की खातिर अपनी भूमि का अधिग्रहण किये जाने के ख़तरे से। महिलाएं आज़ाद नहीं हैं, उनके खि़लाफ़ भेदभाव तथा पुराने और नये तरीक़े के दमन और हिंसा से। विश्वविद्यालय और शिक्षा संस्थानों में राजनीतिक मसलों पर चर्चा करने के लिए विद्यार्थियों को आज़ादी नहीं है। राजकीय और व्यक्तिगत आतंकवाद और गुंडागर्दी के वातावरण से समाज आज़ाद नहीं है। जाति के आधार पर भेदभाव और सामाजिक अलगाव से, लोग आज़ाद नहीं हैं। सांप्रदायिक हिंसा के ख़तरे से, हम आज़ाद नहीं हैं।

क्या वजह है कि तमाम तरह की गुलामी से मुक्त एक नए आज़ाद हिन्दोस्तान का वादा अभी तक अधूरा रहा? इसकी वजह है कि पुराने को नष्ट किये बगैर नए को जन्म नहीं दिया जा सकता। पुरानी शोषणकारी पूंजीवादी व्यवस्था और इस व्यवस्था की रक्षा करने वाले राज्य का क्रांतिकारी तख़्तापलट किये बिना, एक नए हिन्दोस्तान का निर्माण नहीं किया जा सकता जिसके लिए हमारे क्रांतिकारियों ने संघर्ष किया था। हिन्दोस्तान क्रान्ति के लिए पुकार रहा है, जो पूंजीवाद का तख्तापलट कर देगी, सामंतवाद और बस्तीवाद के अवशेषों को मिटा देगी और हिन्दोस्तान को साम्राज्यवादी बेड़ियों से आज़ाद करेगी। यह क्रांति मज़दूरों और किसानों की हुकूमत क़ायम करेगी। सरमायदारों की मौजूदा हुकूमशाही को हटाकर, उसकी जगह पर पूरी तरह से एक नए राज्य, श्रमजीवियों की हुकूमशाही की स्थापना करनी होगी। यह स्वेच्छा पर आधारित एक हिन्दोस्तानी संघ राज्य होगा, जिसका सपना हमारे क्रांतिकारी शहीदों ने देखा था।

मज़दूर वर्ग की हुकूमशाही का यह नया राज्य, मेहनतकश लोगों को तमाम तरह के शोषण से आज़ाद करेगा, ज़मीन जोतनेवालों को असुरक्षा से आज़ाद करेगा, जाति और लिंग के आधार पर भेदभाव, राष्ट्रीय दमन तथा तमाम तरह के उत्पीड़न से आज़ाद करेगा। यह नया राज्य सुनिश्चित करेगा कि राष्ट्र की सारी संपत्ति से सभी मेहनतकश लोगों को फायदा होगा। इसके लिये दूसरों की मेहनत के फल पर जीने वाले अल्पसंख्यक शोषकों के आर्थिक आधार का अंत किया जायेगा। यह नया राज्य बड़े पैमाने पर उत्पादन के साधनों को चंद मुट्ठीभर लोगों की सम्पत्ति से बदलकर उसे सभी लोगों की सामाजिक सम्पत्ति में बदल देगा। यह नया राज्य साम्राज्यवादी व्यवस्था के साथ पूरी तरह से रिश्ता तोड़ देगा और एक आत्म-निर्भर समाजवादी अर्थव्यवस्था का निर्माण करेगा।

शहीद भगत सिंह और अन्य क्रांतिकारियों की राह पर चलने का मतलब है इस सरासर झूठे दावे को ठुकराना कि क्रान्ति के बगैर नए हिन्दोस्तान का निर्माण संभव है। बर्तानवी बस्तीवादी हुक्मरानों से विरासत में मिली इस सड़ी-गली और शोषण पर आधारित पूंजीवादी व्यवस्था और उसके राज्य को बरकरार रखकर उसमें सुधार करने से नए राज्य का निर्माण कतई नहीं किया जा सकता।

शहीदों की पुकार को मानने का अर्थ है हिन्दोस्तान की धरती पर व्यापक क्रांति की जीत के लिए काम करना।

इंकलाब जिंदाबाद!

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पार्टी के दस्तावेज

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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