एन.एम.सी. विधेयक के ख़िलाफ़ डाक्टरों व मेडिकल छात्रों का आंदोलन

2 अप्रैल, 2018 को पूरे देश में युवा डाक्टरों और मेडिकल छात्रों ने अपने-अपने मेडिकल कालेजों और अस्पतालों में एक हल्ला बोल धरने का आह्वान किया। धरने का आयोजन, केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित, राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एन.एम.सी.) विधेयक के विरोध में किया गया था। मेडिकोस यूथ नेशनल एक्शन कौंसिल (एम.वाई.एन.ए.सी.) के बैनर के तहत धरने का आयोजन किया गया था।

2 अप्रैल को दोपहर 12 बजे से, 500 से अधिक रेजिडेंट डाक्टर और अंडर-ग्रेजुएट (पूर्व-स्नातक) तथा पोस्ट-ग्रेजुएट (स्नातकोत्तर) मेडिकल छात्र, नई दिल्ली में आल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस (एम्स) के मुख्य द्वार पर इकट्ठा हुए। अस्पताल के वरिष्ठ डाक्टर तथा शिक्षक और इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के पदाधिकारी भी इस धरने में शामिल हुए। अन्य सरकारी और गैर-सरकारी स्वास्थ्य कार्यक्रमों से जुड़े डाक्टरों ने भी धरने में भाग लिया। महाराष्ट्र, तमिलनाडु, केरल, राजस्थान और अन्य राज्यों के डाक्टरों ने भी विरोध प्रदर्शन में भाग लिया।

अस्पताल के द्वार पर स्थापित मंच के पीछे का विशाल बैनर, डाक्टरों की मांगों पर प्रकाश डाल रहा था। उस बैनर पर लिखे नारे कुछ इस तरह थे: “एन.इ.एक्स.टी. नहीं चलेगा!”, “अनियमित फीस नहीं चलेगी!”, “डाक्टरों के खि़लाफ़ हिंसा नहीं चलेगी!” रेजिडेंट डाक्टर एसोसिएशन ऑफ एम्स के प्रतिनिधि, मेडिकल छात्रों और अन्य डाक्टरों ने एन.एम.सी. विधेयक को राष्ट्र-विरोधी, लोक-विरोधी विधेयक के रूप में निंदा करते हुए जबरदस्त नारेबाजी की। उन्होंने समझाया कि इस विधेयक का असली उद्देश्य है स्वास्थ्य सेवा और मेडिकल शिक्षा के निजीकरण को बढ़ावा देना। जिसके कारण अधिकतम जनता को अच्छी स्वास्थ्य सेवाओं से और युवाओं को अच्छी मेडिकल शिक्षा से वंचित किया जाएगा।

आई.एम.ए. के राष्ट्रीय अध्यक्ष डाक्टर रवि वानखेड़कर, आई.एम.ए. के महासचिव डाक्टर आर.एन. टंडन और आई.एम.ए. के अन्य प्रतिनिधियों ने आंदोलनकारी डाक्टरों और मेडिकल छात्रों को संबोधित किया। रेजिडेंट डाक्टरों के नेताओं ने और मेडिकल छात्रों के प्रतिनिधियों ने भी सभा को संबोधित किया।

वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि एन.एम.सी. विधेयक के माध्यम से सरकार का मुख्य एजेंडा स्वास्थ्य सेवाओं और मेडिकल शिक्षा को बड़ी निजी कंपनियों के लिए एक मुनाफ़ा कमाने वाले व्यवसाय में परिवर्तित करना है। उन्होंने बताया कि देश के सभी हिस्सों में एक व्यापक और अच्छी सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की स्थापना करने के बजाय, सरकार व्यवस्थित रूप से मौजूदा सार्वजनिक स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली को नष्ट कर रही है और निजी अस्पतालों को बढ़ावा दे रही है। उन्होंने सरकारी अस्पतालों की कमी और ग्रामीण इलाकों तथा देश के दूर-दराज के इलाकों में दवाखानों और सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्रों की दुःखद परिस्थितियों पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि किस तरह सरकारी अस्पतालों में बेकार सुविधाओं और सड़ता हुआ बुनियादी ढांचा है और उसके साथ-साथ बहुत की कम सरकारी डाक्टरों पर बहुत सारे रोगियों को संभालने की जिम्मेदारी है। उन्होंने डाक्टरों द्वारा सामना की गई असुरक्षा के बारे में बताया, जहां रोगी के परिवार वालों का गुस्सा, जो कि निराशाजनक स्वास्थ्य प्रणाली के ख़िलाफ़ है, कभी-कभी डाक्टरों और चिकित्सा कर्मचारियों पर निकलता है। उन डाक्टरों और कर्मचारियों पर जो कि खुद कठिन परिस्थितियों का सामना करते हुए रोगियों का इलाज करते हैं।

धरने में प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए, आंदोलनकारी डाक्टरों ने मेडिकल शिक्षा के निजीकरण को बढ़ाना देने और निजी मेडिकल कालेजों द्वारा अत्यधिक फीस लगाए जाने की निंदा की। सरकार निजी मेडिकल कालेजों द्वारा लगाए गई फीस के सभी नियमों को दूर करने की कोशिश कर रही है। उन्होंने उत्तराखंड जैसे कुछ राज्यों के उदाहरणों पर प्रकाश डाला, जहां निजी मेडिकल कालेजों में केवल एक ही साल के अंदर फीस लगभग 4 गुना बढ़ी है! रेजिडेंट डाक्टरों के एक प्रतिनिधि ने कहा कि, “मेडिकल छात्रों को अपनी शिक्षा पर करोड़ों रुपए खर्च करने के लिए मजबूर करके, सरकार युवाओं को उस दिशा की ओर धकेल रही है, जहां युवा लोगों की निस्वार्थ सेवा करने के बारे में नहीं बल्कि गरीब लोगों की खराब परिस्थितियों में भी उनसे अधिकतम मुनाफ़े निचोड़ने के बारे में सोचेगा”।

आगे चलकर डाक्टरी करने के लिए सरकार एक नई लाइसेंसधारी परीक्षा “एन.ई.एक्स.टी.” को लागू करने की कोशिश कर रही है, जो कि छात्रों को अपने एम.बी.बी.एस. के अंतिम वर्ष में पास करनी होगी। वक्ताओं ने इसका भी कड़ा विरोध किया। उन्होंने नए प्रस्तावित एन.एम.सी. के गठन का विरोध किया, जिसमें बड़े पैमाने पर सरकार द्वारा नियोजित डाक्टरों की बजाय नियुक्त नौकरशाहों का वर्चस्व दिखता है। ये सभी ऐसे लोग हैं जो मेडिकल शिक्षा और स्वास्थ्य देखभाल के निजीकरण के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए काम करेंगे, जनता के लिए स्वास्थ्य सेवाओं में विस्तार और सुधार के लिए नहीं।

इसी तरह की रैलियों को देश के कई हिस्सों में सरकारी अस्पतालों और मेडिकल कालेजों में आयोजित किया गया था।

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के कार्यकर्ताओं ने नई दिल्ली के एम्स के धरने में भाग लिया और डाक्टरों और मेडिकल छात्रों के संघर्ष में अपने समर्थन और एकता को व्यक्त किया। उनके संघर्ष के समर्थन में कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी द्वारा जारी किए गए बयान को बड़ी संख्या में वितरित किया। आंदोलनकारी डाक्टरों, छात्रों और जनता ने उस बयान का तहे दिल से स्वागत किया।

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पार्टी के दस्तावेज

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ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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