जस्टिस राजिंदर सच्चर की याद में जनसभा

प्रसिद्ध मानव अधिकार कार्यकर्ता जस्टिस राजिंदर सच्चर का निधन 20 अप्रैल, 2018 को नयी दिल्ली में हो गया। वे 94 वर्ष के थे। लोक राज संगठन ने 24 अप्रैल, 2018 को उनकी याद में एक स्मारक सभा आयोजित की। इसमें राजनीतिक कार्यकर्ताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं, वकीलों, मजदूरों, छात्रों और नौजवानों ने हिस्सा लिया।

Rajinder-sachar MTGजाने-माने वकील श्री शांति भूषण ने सभा की अध्यक्षता की। सभा को संबोधित करने वालों में थे - प्रकाश राव, शांति भूषण, कुलदीप नय्यर, पोपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया से अब्दुल रहमान, अधिवक्ता शाहिद अली, एस.यू.सी.आई.(सी) से रितु कौशिक, सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया से डाक्टर निजामुद्दीन खान, हिन्द मजदूर सभा से राजिंदर सिंह, बिगुल मजदूर दस्ता से विशाल, अधिवक्ता राजेंद्र पाठक और सिटीजन्स फॉर डेमोक्रेसी से एन.डी.पंचोली।

लोक राज संगठन की ओर से सुचरिता ने सभा का संचालन किया। शुरू में उन्होंने जस्टिस राजिंदर सच्चर के जीवन और काम का संक्षिप्त विवरण दिया। उन्होंने बताया कि जस्टिस राजिंदर सच्चर ने लोक राज संगठन द्वारा आयोजित कई कार्यक्रमों में बड़ी रूचि के साथ भाग लिया था। सांप्रदायिक हिंसा आयोजित करने वाले, सरकार और प्रशासन के पदों पर बैठे लोगों को सजा देने तथा कमान की जिम्मेदारी स्थापित करने के लिए एक नए कानून को लाने के विषय पर उन्होंने अपने अनमोल विचार व अनुभव हमें बताये।

उसके बाद, सभी लोग जस्टिस सच्चर की याद में दो मिनट मौन खड़े हुए।

अपने भाषण में प्रकाश राव ने कहा कि जस्टिस राजिन्दर सच्चर उन सभी महान गुणों के प्रतीक थे, जिनका हिन्दोस्तानी लोग आदर करते हैं। वे जनता की एकता और भाईचारे को बनाये रखने के लिये एक झुझारू योद्धा थे।

प्रकाश राव ने बताया कि जस्टिस राजिन्दर सच्चर और उनके परिवार को पंजाब तथा हिन्दोस्तान के खूनी बंटवारे के भयानक कांड का सामना करना पड़ा। उनके परिवार के कई सदस्य पाकिस्तान में जनसंहार में मारे गये। जब उनका परिवार शरणार्थी बतौर हिन्दोस्तान आया तो उन्हें मुसलमान लोगों के भयानक कत्लेआम का दृश्य अपनी आंखों से देखने को मिला। उन्हीं दर्दनाक दिनों से, जस्टिस राजिन्दर सच्चर ने राज्य द्वारा आयोजित सांप्रदायिकता और सांप्रदायिक हिंसा का पर्दाफाश और विरोध करने पर अपना जीवन अर्पित कर दिया। जब भी किसी समुदाय का धर्म के आधार पर उत्पीड़ित किया जाता था, तो जस्टिस सच्चर दिलेरी के साथ उनकी हिफ़ाज़त करते थे।

प्रकाश राव ने कहा कि मानवता के लिये उनका प्यार उनकी आखिरी इच्छा में झलकता है। उनकी यह इच्छा थी कि उनके देहान्त के पश्चात, गुरबाणी पाठ के अलावा, मौलवी और पंडित दोनों की प्रार्थना हों। इसके जरिये वे हिन्दोस्तानी लोगों के सामने अपना पक्का विश्वास पेश करना चाहते थे कि हम, हिन्दोस्तान के लोग, एक हैं, चाहे हमारे धर्म अलग-अलग हों। उनके परिजनों ने पूरी श्रद्धा के साथ उनकी इस आखिरी इच्छा को पूरा किया, जिससे वहां उपस्थित सभी लोगों की आंखों में आंसू भर गये। यह जस्टिस सच्चर की ओर से एक विदाई संदेश था, सभी हिन्दोस्तानी लोगों को, कि हमें अपनी जनता की एकता को आंखों का तारा जैसा, बचाये रखना होगा।

जस्टिस सच्चर का जीवन पंजाबियत और हिन्दोस्तानियत की सच्ची मिसाल थी। ये हमारे शासक ही हैं जो धर्म के आधार पर इस या उस समुदाय के खिलाफ़ वहशी अपराध आयोजित करते हैं और फिर लोगों को सांप्रदायिक बताकर दोषी ठहराते हैं। उनका जीवन इस सच्चाई का सबूत है कि पंजाबी लोग, चाहे उनका धर्म कोई भी हो, हमेशा ही सांप्रदायिकता और सांप्रदायिक हिंसा के खिलाफ़ उठ खड़े हुये हैं। ये हमारे शासक ही हैं जो धर्म के आधार पर इस या उस समुदाय के खिलाफ़ वहशी अपराध आयोजित करते हैं और फिर लोगों को सांप्रदायिक बताकर दोषी ठहराते हैं।

अपनी बातों को समाप्त करते हुए, प्रकाश राव ने कहा कि जस्टिस सच्चर ने एक ऐसे हिन्दोस्तान के लिये संघर्ष किया था, जिसमें धर्म, जाति या किसी और आधार पर लोगों के साथ भेदभाव नहीं किया जायेगा और लोगों को उत्पीड़ित नहीं किया जायेगा। आइये, हम सब ऐसा ही हिन्दोस्तान बनाने के लिये अपना एकजुट संघर्ष तेज़ करें, जिसमें राज्य पूरी जनता को सुरक्षा और खुशहाली सुनिश्चित करने का अपना दायित्व पूरा करेगा। इन शब्दों के साथ उन्होंने अपना व्यक्तव्य समाप्त किया।

वरिष्ठ सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता और भूतपूर्व कानून मंत्री शांति भूषण ने बड़ी भावुकता के साथ जस्टिस राजिंदर सच्चर के जीवन और काम के बारे में बताया। उन्होंने जस्टिस सच्चर की बेइन्तेहा ऊर्जा शक्ति की बात की, जिसकी वजह से वे अपनी असली उम्र से कहीं कम उम्र के लगते थे। हाई कोर्ट के जज होने के बावजूद तथा पंजाब के भूतपूर्व मुख्य मंत्री के पुत्र होने के बावजूद, वे बहुत ही विनम्र थे। वे झुग्गी बस्तियों और मजदूर बस्तियों में जाते थे और मेहनतकशों की समस्याओं के बारे में बहुत ध्यान से सुनते थे।

वरिष्ठ पत्रकार और भूतपूर्व सांसद कुलदीप नय्यर ने जस्टिस सच्चर के बारे में अपने दिल की बात रखी। उनका आपसी सम्बन्ध लाहौर में उनके कालेज के दिनों से शुरू हुआ था और जीवन भर चलता रहा। छात्र कार्यकर्ता बतौर, उन्होंने मोहम्मद अली जिन्नाह को देश के बंटवारे के बाद होने वाले भयानक अंजाम के बारे में अपनी आशंकाएं बताई थीं। उन्होंने बताया कि वे दोनों कई सालों से, बंटवारे की वर्षगाँठ, 14 अगस्त को, बाघा बॉर्डर पर शांति सभाएं आयोजित करते थे। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि जस्टिस सच्चर ने कश्मीर की समस्या के जायज़ और जनवादी समाधान के लिए कई पहलकदमियां की थीं।

कुलदीप नय्यर ने उस अवसर को याद किया जब जस्टिस सच्चर और राम मनोहर लोहिया दोनों साथ-साथ जेल में थे। उन्हें प्रधान मंत्री नेहरु की तरफ से आमों से भरी टोकरी मिली। जब लोहिया ने उसमें से आम जस्टिस सच्चर को दिए, तो उन्होंने उसे खाने से इनकार कर दिया।

पोपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया के अब्दुल रहमान ने कहा कि जस्टिस सच्चर एक दुर्लभ इंसान थे। उन्होंने बताया कि कई नेता, जो बंटवारे के कारण पाकिस्तान से यहां आये थे, मुसलामानों के प्रति शत्रुता की भावना रखते थे, परन्तु जस्टिस सच्चर वैसे नहीं थे। वे हमेशा ही हिन्दोस्तान के मुसलमान समुदाय की समस्याओं के प्रति संवेदनशील होते थे और उनकी हिफाजत में हमेशा उठ खड़े होते थे।

अधिवक्ता शाहिद अली ने बताया कि सच्चर कमेटी रिपोर्ट में न सिर्फ हिन्दोस्तान में मुसलमान समुदाय की दुर्दशा का खुलासा किया गया है, बल्कि यह भी समझाया गया है कि ऐसा क्यों और कैसे हुआ। रिपोर्ट में इस हालत को बदलने के लिए, सरकार को कई सुझाव दिये गए हैं, परन्तु किसी भी सरकार ने उन्हें लागू नहीं किया है। 2014 में, राजग सरकार के आने के तुरंत बाद, उन्होंने जस्टिस सच्चर के साथ अपनी एक चर्चा याद की। जस्टिस सच्चर ने कहा था कि “वे कुछ लोगों को सत्ता में शामिल कर लेंगे, वे आपको डराने-धमकाने और कमजोर करने की कोशिश करेंगे। पर आप नहीं डरना। आप बहादुर लोग हैं। आप इन्साफ के लिए संघर्ष कर रहे हैं। अपना संघर्ष जारी रखना।”

सोशलिस्ट यूनिटी सेंटर ऑफ इंडिया (कम्युनिस्ट) की और से, रितु कौशिक ने महिलाओं के लिए जस्टिस सच्चर की चिंता के बारे में अपना अनुभव बताया। वे अपने स्वास्थ्य की समस्याओं की परवाह किये बिना, विरोध प्रदर्शनों में भाग लेते थे। एक बार, जब किसी सभा का आयोजन करते समय, उसने कहा था कि जस्टिस सच्चर बीमार होने के बावजूद वहां उपस्थित थे, तो उन्होंने उसे डांटकर कहा था कि “मैं कमजोर नहीं हूँ। जब भी मेरी किसी बेटी पर कोई हमला होता है, तो मैं हमेशा उसकी हिफाजत के लिए पहुंचूंगा।”

वरिष्ठ अधिवक्ता और मानव अधिकार कार्यकर्ता एन.डी. पंचोली ने बताया कि जस्टिस सच्चर ने हमेशा मजदूरों के अधिकारों की रक्षा की थी, वकील बतौर, ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता बतौर और जज बतौर। 1970 के दशक के आखिरी वर्षों में, जब पुलिस हिरासत में किसी व्यक्ति की मौत पर बहुत शोर मचा था, तो तत्कालीन जनता पार्टी सरकार ने पुलिस में सुधारों के प्रस्ताव के लिए एक कमेटी बिठाई थी। उस कमेटी ने जब तक अपनी रिपोर्ट पेश की, तब तक इंदिरा गाँधी सत्ता में वापस आ गयी थी और रिपोर्ट को ठन्डे बस्ते में डाल दिया गया। जस्टिस सच्चर ने सरकार को उस रिपोर्ट को प्रकाशित करने को मजबूर किया।

सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया की तरफ से, डाक्टर निजामुद्दीन खान, बिगुल मजदूर दस्ता से विशाल और राजेंद्र पाठक ने इन्साफ और अधिकारों के संघर्ष में जस्टिस सच्चर के योगदान के बारे में बड़े भावुक शब्दों में अपनी बातें रखीं। राजिंदर सिंह ने मजदूरों के अधिकारों के लिए और हिन्द मजदूर सभा को बनाने व मजबूत करने में उनके योगदान को याद किया।

जस्टिस राजिंदर सच्चर

जस्टिस राजिन्दर सच्चर, जुझारू मानव अधिकार कार्यकर्ता के निधन पर जनता के लोकतांत्रिक और मानव आधिकारों की हिफ़ाज़त के लिये संघर्ष करने वाले सभी लोग बहुत दुःखी हैं।

अपनी जवानी में जस्टिस राजिन्दर सच्चर एक राजनीतिक व ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता बतौर कई बार गिरफ्तार हुये और जेल भी गये। बाद में, वे सुप्रीम कोर्ट में वकालत करने लगे। 1970 में उन्हें दिल्ली हाई कोर्ट का अतिरिक्त जज नियुक्त किया गया। सेवानिवृत्ति से पूर्व, वे 1985 तक हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस रहे।

जस्टिस सच्चर ने हमेशा ही मानव अधिकारों के हनन के खिलाफ़ अपनी आवाज़ उठाई। उन्हें किसी से डर न था, सरकार से भी नहीं। उन्होंने 1975 में इंदिरा गांधी द्वारा लागू की गई “एमरजेंसी” के खिलाफ़ अपनी आवाज़ बुलंद की थी। उस समय सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह एमरजेंसी को वैधता दी थी, उसकी राजिन्दर सच्चर जी ने खुलेआम कड़ी आलोचना की थी।

1984 में सिख समुदाय के कत्लेआम के पीड़ितों के मामले दिल्ली हाई कोर्ट में जब-जब जस्टिस सच्चर के सामने आये, तो उन्होंने पीड़ितों के लिये गहरी हमदर्दी जताई। उन भयानक हादसों की गवाही देने वालों के एफीडेविट के आधार पर जस्टिस सच्चर ने दिल्ली पुलिस को उन अपराधों को अंजाम देने वाले नेताओं के खिलाफ़ कार्यवाही करने का नोटिस जारी किया। परन्तु उन मामलों को जल्दी ही उनकी पीठ से हटा दिया गया, जिस पर उन्हें बहुत गुस्सा था।

जब-जब राज्य द्वारा सांप्रदायिक हत्याकांड और हिंसा आयोजित की जाती रही, तब-तब उन्होंने हिंसा को अंजाम देने में प्रशासन की भूमिका के खिलाफ़ अपनी आवाज़ उठाई और सक्रियता से पीड़ितों का पक्ष लिया। 1984 का सांप्रदायिक खून-खराबा, 1992-1993 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद हत्याकांड, 2002 में गुजरात के हत्याकांड तथा अन्य सांप्रदायिक हत्याकांडों से उन्हें बहुत दुख महसूस होता था।

सेवानिवृत्ति के बाद, 1986 में जस्टिस सच्चर पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज़ (पी.यू.सी.एल.) के अध्यक्ष चुने गये और 1995 तक उन्होंने उस पद पर अपनी जिम्मदारियां पूरी निष्ठा के साथ निभाईं। 1990 में पी.यू.सी.एल. द्वारा जारी “कश्मीर की स्थिति पर रिपोर्ट” के वे एक लेखक थे। पी.यू.सी.एल. के अध्यक्ष बतौर, उन्होंने जनता के मानव अधिकारों और जनवादी अधिकारों की हिफाज़त के लिये सुप्रीम कोर्ट में कई पी.आई.एल. दर्ज किये। इनमें प्रमुख है 2003 में जब पोटा को मानव अधिकारों का घोर हनन बताकर, उसे खारिज़ करने के पक्ष में उन्होंने अपना तर्क पेश किया। अंत में, नवंबर 2004 में पोटा को वापस लिया गया।

2000 में इंडियन पीपल्स ह्यूमन राइट्स ट्राइब्यूनल के तहत मुम्बई में बड़े पैमाने पर झुग्गी-झोपड़ियों को हटाने की मुहिम की जांच तथा 2002 में एक जन अदालत के तहत, कोलकाता में उसी तरह से झुग्गी-झोपड़ियों को हटाने की मुहिम की जांच में जस्टिस सच्चर की अहम भूमिका थी।

हिन्दोस्तान के मुसलमान समुदाय के सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति पर गहरी खोजबीन के बाद, 2006 में जारी सच्चर कमेटी रिपोर्ट के लिये वे प्रसिद्ध हैं। ठोस तथ्यों और आंकड़ों के साथ उस रिपोर्ट ने दिखाया कि आज़ादी के साठ बरस बाद भी हिन्दोस्तान में मुसलमान समुदाय की हालतें कितनी दुखद हैं। उन्होंने सत्ता द्वारा फैलाई जा रही धारणा, कि मुसलमान समुदाय को तथाकथित “तुष्टीकरण” की नीतियों से फायदा हुआ है, का खंडन किया और उसे झूठा साबित किया।

एक सही अंतर्राष्ट्रीयतावादी बतौर, उन्होंने 2003 में इराक पर अमरीकी हमले का विरोध किया। जन अधिकारों के तमाम मामलों के लिये, देश तथा विदेश में संघर्ष कर रहे कार्यकर्ताओं और संगठनों को हमेशा ही जस्टिस सच्चर से पूरा समर्थन मिला। बढ़ती उम्र के बावजूद वे हमेशा ही जनता के अधिकारों के लक्ष्य के लिये विरोध प्रदर्शनों और आंदोलनों में भाग लेते रहे।

 

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जस्टिस राजिंदर सच्चर    राजनीतिक    सामाजिक    May 1-15 2018    Struggle for Rights    Rights     2018   

पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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