भारतीय रेल के निजीकरण पर दिल्ली में चर्चा

दिल्ली में 13 मई, 2018 को भारतीय रेल के निजीकरण के मुद्दे पर चर्चा करने के लिए, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के सदस्यों और समर्थकों की एक बैठक आयोजित की गई। इस बैठक में पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, “भारतीय रेल के निजीकरण को हराने के लिए एकजुट हों”, इस विषय पर एक लेख प्रस्तुत किया गया। प्रस्तुति के बाद चर्चा हुई जिसमें सदस्यों और समर्थकों ने भाग लिया। उस चर्चा में पेश की गई प्रस्तुति पर सभी ने अपने विचार व्यक्त किए और रेलवे से संबंधित अपने अनुभव भी सामने रखे। चर्चाओं का सारांश यहां प्रस्तुत किया गया है।

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भारतीय रेल देश का सबसे बड़ा सार्वजनिक उद्यम और सबसे बड़ा नियोक्ता है। रेलवे के निजीकरण से उसके 17 लाख मज़दूरों के हितों को ही धोखा नहीं है बल्कि उन करोड़ों लोगों को भी ख़तरा है जो रेल सेवा का नियमित रूप से उपयोग करते हैं। निजीकरण के कार्यक्रम के परिणाम स्वरूप अब तक भारतीय रेल में लाखों नौकरियां ख़त्म की जा चुकी हैं। इसका सीधा-सीधा परिणाम मज़दूरों और यात्रियों की सुरक्षा पर होने वाले हानिकारक प्रभाव के रूप में हमें देखने को मिल रहा है।

कई उदाहरण देकर यह सिद्ध किया जा सकता है कि किस प्रकार चोरी-चोरी भारतीय रेल के निजीकरण का कार्यक्रम लागू किया जा रहा है और यह निरंतर चल रहा है। एक के बाद एक आई सरकारों ने कई समितियां बनाईं। इन समितियों के उद्देश्य हैं भारतीय रेल द्वारा परंपरागत रूप से की जाने वाली विभिन्न गतिविधियों तथा उसके विभिन्न विभागों को तोड़ना और पूंजीपति के निजी लाभ के लिए खोलना है।

उदाहरण के लिए, राजग सरकार द्वारा 2001 में स्थापित विशेषज्ञ समिति ने सिफारिश की कि रेलवे के ‘गैर-बुनियादी’ कार्यों को आउटसोर्स किया जाना चाहिए या उनका निगमीकरण किया जाना चाहिए। आउटसोर्सिंग का मतलब है कि रेलवे के कुछ कार्यों को निजी ठेकेदारों को सौंपना। निगमीकरण का मतलब है सरकारी नियंत्रण के तहत किसी निगम के कुछ कार्यों को पूंजीपतियों को सौंपना। आगे चलकर जब वह निगम लाभ बनाने लगेगा तो उसे किसी निजी बोलीदाता को बेचा जा सकेगा। इस सिफारिश के अनुसार, सफाई, धुलाई, खानपान, एयर कंडीशनिंग कोच का रख-रखाव करना, आदि कार्यों को आउटसोर्स किया गया था और बाद के वर्षों में उनका निगमीकरण भी किया गया।

कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व वाली संप्रग सरकार द्वारा 2011 में बनाई गई एक अन्य समिति ने सार्वजनिक-निजी-साझेदारी (पीपीपी) के रूप में निजीकरण की सिफारिश की। स्टेशनों के रख-रखाव और रेल गलियारों के निर्माण तथा संचालन जैसे कार्यों को पीपीपी के तहत दे दिया गया है। पीपीपी के तहत निजी ‘सांझेदार’ कंपनी को लाभ की पूरी गारंटी दी जाती है जबकि होने वाले नुकसान की भरपाई सार्वजनिक ‘सहभागी’ से की जाती है। भाजपा की अगुवाई वाली राजग सरकार ने एक और उच्चस्तरीय समिति बनाई, जिसने भारतीय रेल के निजीकरण के कार्यक्रम को आगे बढ़ाने के लिए एक योजना तैयार की है।

प्रस्तुति ने सरकारी नीतियों और कार्यों के कारण रेल परिचालन की सुरक्षा को गंभीर रूप से कमजोर किए जाने वाले मुद्दों पर रोशनी डाली। प्रस्तुति में बताया गया कि सुरक्षित संचालन के लायक पटरियों को बनाए रखने के लिए आवश्यक तीन लाख ट्रैकमेन में से, लगभग 70,000 ट्रकमेन के पद रिक्त हैं। ट्रैकमेन को भर्ती करने के बजाय, सरकारें पटरियों के रख-रखाव का काम निजी ठेकेदारों को दे रही हैं। ये ठेकेदार ऐसे लोगों को नियुक्त करते हैं जिन्हें पटरी के रख-रखाव का कोई भी प्रशिक्षण नहीं दिया जाता है। इससे न केवल हाल के वर्षों में रेल दुर्घटनाओं की संख्या में गंभीर वृद्धि देखने को मिली है, बल्कि पटरियों का रख-रखाव करते समय चैंकाने वाली संख्या में ट्रैकमेन मर रहे हैं (एक वर्ष में लगभग 600)। रेल चालकों और गार्डों के रिक्त पदों के कारण भी सुरक्षा कम होती जा रही है। क्योंकि फिलहाल जो रेल चालक नियुक्त हैं उनसे अमानवीय तरीके से और लंबे समय तक काम करवाया जा रहा है। सरकार मालगाड़ियों में गार्डों की जगह ‘एन्ड ऑफ ट्रेन टेलीमेट्री’ (ई.ओ.टी.टी.) मशीनों को लगाने की योजना पर भी विचार कर रही है।

सरकार की नीतियां रेल यात्रियों के हितों के भी ख़िलाफ़ हैं। केवल लाभदायक मार्गों पर निवेश को प्रोत्साहित करने की सरकारी नीति अनिवार्य रूप से कम यात्री वाले मार्गों पर सेवाओं को बंद करने से और उन पर बढ़ते किराए का कारण बन जाएगी। यह रेल के निजीकरण के अंतर्राष्ट्रीय अनुभव को देखते हुए कहा जा सकता है। अर्जेंटीना में ऐसी ही नीतियों की वजह से आज वहां रेल लाइनें, जो कि 1958 में 7000 किमी हुआ करती थीं, घटकर अब केवल 820 किलोमीटर बची हैं। अब वहां रेल सेवा केवल बड़े शहरों के बीच चलने वाली ट्रेनों तक ही सीमित है। दुर्घटनाओं की बारंबारता और गंभीरता भी बढ़ गई है।

प्रस्तुति ने रेल मज़दूरों के सभी तबकों की यूनियनों और संघों द्वारा निजीकरण के कार्यक्रम के ख़िलाफ़ किए जाने वाले विरोध पर भी रोशनी डाली। इस कड़े विरोध के कारण विभिन्न केंद्र सरकारें अब तक भारतीय रेल के निजीकरण की वकालत खुलेआम नहीं कर पा रही हैं। सरकारें निजीकरण के कार्यक्रम को सुव्यवस्था बनाने और नवीनीकरण के पीछे छुपाती रही हैं। पूरे देश में एफ.डी.आई., पीपीपी, निगमीकरण और आउटसोर्सिंग के खि़लाफ़ रेल मज़दूरों के बहादुर और संयुक्त विरोध ने सरकार को अपने कुछ कदमों को वापस लेने के लिये मजबूर कर दिया है। दूसरी ओर हिन्दोस्तानी शासक वर्ग भारतीय रेल को निजी लाभ के लिए खोलने पर तुला हुआ है और रेल मज़दूरों की एकता तोड़ने के लिए अपनी पूरी ताक़त लगा रहा है।

आज़ादी से पहले या आज़ादी के बाद, शासक वर्ग के ख़िलाफ़ लड़ने का भारतीय रेल मज़दूरों का हमेशा से ही गौरवशाली इतिहास रहा है। 1974 में 122 रेल यूनियनों और 14 लाख रेल मज़दूरों ने एकजुट होकर सर्व हिन्द हड़ताल की थी। शासक वर्ग यह सुनिश्चित करना चाहता है कि मज़दूर-विरोधी, समाज-विरोधी तथा राष्ट्र-विरोधी उनकी नीतियों के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए रेल मज़दूर कभी भी संगठित न हों। वे रेल मज़दूरों के विभिन्न तबकों में एक दूसरे के बीच शत्रुता पैदा के लिये और रेल यात्रियों को रेल मज़दूरों के खि़लाफ़ भड़काने के लिये, प्रचार के प्रत्येक साधन का उपयोग करते हैं।

प्रस्तुति और चर्चा का निष्कर्ष स्पष्ट था कि - भारतीय रेल का निजीकरण एक मज़दूर-विरोधी, सामाज-विरोधी और राष्ट्र-विरोधी कार्यक्रम है।

भारतीय रेल के निजीकरण के कार्यक्रम का विरोध करना सभी रेल मज़दूरों और यात्रियों के हित में है। मज़दूरों और किसानों के शासन को स्थापित करने के क्रांतिकारी लक्ष्य के साथ मज़दूरों और लोगों के सभी तबकों को निजीकरण, उदारीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम के ख़िलाफ़ एकजुट होना होगा!

प्रस्तुत किए गए लेख को पार्टी द्वारा एक पुस्तिका के रूप में प्रकाशित किया गया है।

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पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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