ईरान पर अमरीकी प्रतिबंध : हिन्दोस्तान पर अमरीकी दबाव का धिक्कार करें

संयुक्त राष्ट्र के अमरीकी राजदूत, निकी हैली ने जून के अंत में हिन्दोस्तान का दौरा किया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अन्य वरिष्ठ मंत्रियों के साथ बातचीत की। उनकी यात्रा के मुख्य उद्देश्यों में से एक था, यह सुनिश्चित करना कि हिन्दोस्तान ईरान के साथ अपने वर्तमान संबंधों को तोड़ दे और उस देश से तेल का आयात तुरंत बंद कर दे।

हैली ने हिन्दोस्तान की सरकार को ईरान के साथ संबंध तोड़ने की “सलाह” के रूप में दरअसल धमकी दी है। न्यूज चैनलों के साथ एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा: “हम सभी को पुनर्विचार करना है कि हम किसके साथ व्यापार करते हैं। मुझे लगता है कि दोस्त होने के नाते हिन्दोस्तान को भी सोचना चाहिए की क्या वह ऐसे देश के साथ व्यापार जारी रखना चाहता है। मेरी प्रधानमंत्री मोदी के साथ बातचीत हुई। यह एक रचनात्मक बातचीत थी। मुझे लगता है कि हिन्दोस्तान के भविष्य के लिए, हिन्दोस्तान के संसाधनों के भविष्य के लिए, हम उन्हें ईरान के साथ अपने रिश्ते पर पुनर्विचार करने के लिए प्रोत्साहित करेंगे।”

हैली की यात्रा की पूर्व संध्या पर, अमरीका ने घोषणा की कि 4 नवंबर के बाद ईरान से तेल आयात करने वाले सभी देश प्रतिबंधों का सामना करेंगे। अमरीका द्वारा, ईरान के साथ अपने संबंधों के बारे में “पुनर्विचार” करने के लिए, हिन्दोस्तान को “प्रोत्साहित” किया जा रहा है। अमरीका मांग कर रहा है कि हिन्दोस्तान ईरान को दुश्मन राष्ट्र के रूप में देखे और ईरान को ख़त्म करने के लिए अमरीका के साथ वहां आर्थिक हलचल मचाने में जुट जाए। अन्यथा, हिन्दोस्तान को भी अमरीका द्वारा लगाए जाने वाले प्रतिबंधों का सामना करना पड़ेगा। यह हिन्दोस्तानी सरकार को हैली द्वारा दिया गया संदेश था।

अमरीका को यह तय करने का कोई अधिकार नहीं है कि हिन्दोस्तान को किस देश के साथ व्यापार करना चाहिए। हिन्दोस्तान पर प्रतिबंध लगाने की धमकी हिन्दोस्तान की संप्रभुता पर एक खुला हमला है। यह एक शत्रुतापूर्ण कार्य है जिसका विरोध और निंदा की जानी चाहिए।

हिन्दोस्तान ने ईरान के साथ पारंपरिक रूप से अच्छे संबंध रखे हैं। ईरान हिन्दोस्तान के लिए तेल आयात का तीसरा सबसे बड़ा स्रोत है। चीन के बाद, हिन्दोस्तान ईरान से तेल खरीदने वाला दूसरा सबसे बड़ा देश है। फरवरी 2018 में, ईरानी राष्ट्रपति रोहानी की हिन्दोस्तान यात्रा के दौरान, दोनों देशों ने कई रणनीतिक समझौतों पर हस्ताक्षर किए। हिन्दोस्तान चाबहार, ईरान में एक प्रमुख बंदरगाह का निर्माण कर रहा है, जो अफ़गानिस्तान, मध्य एशियाई गणराज्य और रूस के साथ हिन्दोस्तान के लिए व्यापार मार्ग खोल देगा। हिन्दोस्तान ईरान से 25 प्रतिशत तक अपनी तेल खरीद बढ़ाने के लिए सहमत हो गया।

यह बताया गया है कि निकी हैली की यात्रा के बाद तुरंत, सरकार ने तेल शोधन कंपनियों को नवंबर ख़त्म होने से पहले ही ईरान से आयात को पूरी तरह से बंद करने के निर्देश दिये हैं।

यह निर्णय इस बात को साफ करता है कि हिन्दोस्तान ईरान में आर्थिक रोड़े लाने में अमरीका का साथ देगा। ईरान के साथ अपने वर्तमान अच्छे संबंधों को ख़त्म करने और आर्थिक रोड़ों के माध्यम से उस देश को ख़त्म करने के लिए अमरीका का साथ देने में हिन्दोस्तान का बिलकुल हित नहीं है।

दरअसल अमरीकी रणनीति पूरी दुनिया में अपने अद्वितीय प्रभुत्व को स्थापित करना है। वह ईरान में सत्ता परिवर्तन करने के लिए काम कर रहा है। क्योंकि वह तेल समृद्ध पश्चिम एशिया पर अपने प्रभुत्व को स्थापित करने के इरादे के खि़लाफ़ ईरान को प्रमुख ख़तरे के रूप में देखता है। 2015 में ईरान के साथ अमरीका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, चीन और जर्मनी के बीच हस्ताक्षर किए गए, संयुक्त व्यापक योजना (जे.सी.पी.ओ.ए.), जो कि एक बहुपक्षीय परमाणु समझौता था। मई में, अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने उस समझौते से उनकी सरकार की एकपक्षीय वापसी की घोषणा की। इसको आगे ले जाते हुए अमरीका ने “कॉउंटरिंग अमेरिकाज़ एडवर्सरीज थ्रू सैंक्शंस एक्ट (सी.ए.ए.टी.एस.ए.)” के तहत उन सभी देशों पर प्रतिबंध लगाने की धमकियां दीं जो ईरान के साथ व्यापार जारी रखेंगे। ईरान को अपना निशाना बनाते हुए अमरीका रूस, चीन, हिन्दोस्तान और अन्य देशों को भी निशाना बना रहा है। यह उन सभी देशों को कमजोर करना चाहता है जिनके ईरान के साथ संबंध हैं।

ईरान परमाणु समझौते से बाहर निकलने का अमरीकी साम्राज्यवाद का एकतरफा निर्णय, इसके बाद ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों के खि़लाफ़ प्रतिबंध लगाने के निर्णय का विरोध, समझौता करने वाले पांच अन्य देशों ने तथा कई दूसरे देशों ने भी किया है।

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने मई में घोषित कर दिया था कि हिन्दोस्तान सिर्फ संयुक्त राष्ट्र द्वारा किसी भी देश पर लगाए गए प्रतिबंधों को लागू करेगा, न कि अमरीका द्वारा लगाए गए एकतरफा प्रतिबंधों को। सरकार ने इस बारे में कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया है कि अब वे इस वादे से क्यों मुकर रहे हैं। दरअसल वे अपने इस क़दम को किसी भी तरह से हिन्दोस्तान के हित में लिए गए क़दम के रूप में जायज़ नहीं ठहरा सकते हैं।

वर्षों से, अमरीका और हिन्दोस्तान सैन्य रणनीतिक संबंधों को मजबूत कर रहे हैं। अमरीका इससे क्या हासिल करना चाहता है यह स्पष्ट है। अमरीका हिन्दोस्तान को, चीन को घेरने, रूस के साथ लंबे समय से चले आ रहे अच्छे संबंधों को कमजोर करने और ईरान के साथ अच्छे संबंधों को तोड़ने के लिए, उकसा रहा है। यह एशिया पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने के लिए अमरीकी रणनीति का हिस्सा है।

इनमें से कुछ भी हिन्दोस्तानी लोगों के हित में नहीं है। वह हिन्दोस्तान और एशिया के अन्य देशों के बीच अविश्वास बढ़ाने का काम कर रहा है। अपनी साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाओं से प्रेरित, पूंजीवादी एकाधिकार जो हिन्दोस्तानी राज्य को नियंत्रित करते हैं, वे हिन्दोस्तान को एक ख़तरनाक रास्ते पर ले जा रहे हैं। इतिहास गवाह है कि जिस भी देश ने अमरीकी साम्राज्यवाद को गले लगाया उसने अपना सर्वनाश अपने हाथों से लिख दिया। पाकिस्तान के दशकों से अमरीका के साथ रणनीतिक सैन्य संबंध थे। अमरीका ने एशिया में अपनी महत्वाकांक्षाओं को आगे बढ़ाने के लिए पाकिस्तान का इस्तेमाल किया। इस गलती की भारी कीमत आज पाकिस्तान के लोगों को चुकानी पड़ रही है।

लोग इतिहास से सीखे सबकों को भूल नहीं सकते हैं। ईरान की नाकाबंदी में शामिल होने के लिए हिन्दोस्तान पर डाला गया दबाव एक बार फिर यह साफ दिखाता है कि हिन्दोस्तान और अमरीका की रणनीतिक सांझेदारी न तो हिन्दोस्तान के लोगों के हित में है और न ही एशिया के सभी लोगों के हित में। द

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अमरीकी प्रतिबंध    दुश्मन राष्ट्र    Jul 16-31 2018    World/Geopolitics    Rights     War & Peace     2018   

पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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