मज़दूरों के आंदोलन पर हमलों के ख़िलाफ़ एकजुट हों और संघर्ष करें

देशभर में मज़दूरों के आंदोलन पर पूंजीपति वर्ग का जबरदस्त हमला हो रहा है। अपने आपको यूनियनों में संगठित करने के मज़दूरों के अधिकार पर यह हमला किया जा रहा है।

केन्द्र व प्रांतों की सरकारों तथा अदालतों समेत, राज्य की मशीनरी पूंजीपति वर्ग के आदेश पर, अपने अधिकारों के लिये संगठित होने की कोशिश कर रहे मज़दूरों को कुचलती हैं। मज़दूरों की यूनियनों को गैरकानूनी घोषित किया जा रहा है और ट्रेड यूनियन संगठन बनाने वाले नेताओं पर झूठे आरोप लगाकर सालों-साल जेलों में बंद किया जा रहा है।

Mazdoor sangathan samiti

झारखंड में मज़दूर संगठन समिति पर प्रतिबंध के विरोध में प्रेस वार्ता (फाइल फोटो)

झारखंड की मज़दूर संगठन समिति नामक ट्रेड यूनियन, जो 1985 से मज़दूरों को संगठित कर रही है, उसे झारखंड सरकार ने सन 1908 के आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम (सी.एल.ए.) के तहत, 21 दिसम्बर, 2017 को अवैध घोषित (बैन) कर दिया था। यह यूनियन कोयला खान मज़दूरों, ताप बिजलीघर मज़दूरों, कारखाना मज़दूरों, डोली मज़दूरों और भूमिहीन मज़दूरों के अधिकारों के लिये लड़ रही थी। प्रांत के अलग-अलग शहरों में स्थित यूनियन के सभी कार्यालयों व उसके बैंक खाते को बंद कर दिया गया है। यहां तक कि, इस यूनियन द्वारा चलाये जाने वाले एक अस्पताल को बंद करने के आदेश भी दिये जा चुके हैं, जहां मज़दूरों को निशुल्क स्वास्थ्य सेवा मिलती थी। यूनियन के 18 नेताओं को जेलों में डाल दिया गया है। सबसे हाल में गिरफ़्तार किये जाने वाले नेता इसके सचिव और संगठक सचिव थे, जिन्हें 31 मई, 2018 को सी.एल.ए. और यू.ए.पी.ए. के तहत गिरफ्तार किया गया है।

मज़दूर संगठन समिति के अलावा, मज़दूरों के बहुत से अन्य संगठनों को प्रांत में बैन कर दिया गया है। इनमें शामिल हैं, मज़दूर एकता संघ, मधुबन, मज़दूर एकता मंच, बोकारो, उल्गुलन मज़दूर मंच, रांची तथा मज़दूर एकता संघ, बोकारो थर्मल।

झारखंड की सरकार प्रांत की भूमि व खनिज संसाधनों को और बोकारो थर्मल जैसे सार्वजनिक उद्यमों को सबसे बड़ी हिन्दोस्तानी और विदेशी इजारेदार कंपनियों के हाथों में सौंप रही है। मज़दूरों के संगठन इसका पर्दाफाश और विरोध करते आये हैं। इस मज़दूर-विरोधी, समाज-विरोधी कार्यक्रम के विरोध को कुचलने के लिये इन संगठनों को बैन किया गया है।

उदारीकरण व निजीकरण के ज़रिये वैश्वीकरण के रास्ते, जिस पर हिन्दोस्तानी सरमायदार पिछले 25 वर्षों से चल रहे हैं, इसके चलते, मज़दूरों की रोज़ी-रोटी और अधिकारों पर हमले बढ़ रहे हैं। इस कार्यक्रम का विरोध पूरे देश के मज़दूरों ने किया है। सरमायदारों और उनके राज्य द्वारा मज़दूरों को संगठिन होने से वंचित करने की बेहताशा कोशिशों के बावजूद, मज़दूरों ने अपने अधिकारों और यूनियन बनाने के संघर्ष को त्यागने से इनकार किया है। इस परिस्थिति में सरमायदारों ने मज़दूरों की यूनियनों को तहस-नहस करने के लिये और मुख्य नेताओं को निशाना बनाने के लिये राज्य की मशीनरी का इस्तेमाल किया है। सरमायदारों ने  घोषणा कर दी है कि जो भी अर्थव्यवस्था की मौजूदा दिशा का विरोध करते हैं वे सब “देशद्रोही” और “विकास-विरोधी” हैं। ट्रेड यूनियनों और मज़दूर संगठनों पर हमला करने के लिये वे व्यापक प्रचार करते हैं कि यूनियन और मज़दूरों के नेता “माओवाद के समर्थक” हैं।

हरियाणा के मानेसर में स्थित मारुति- सुज़ुकी के 148 मज़दूरों को मनगढ़ंत आरोपों के तहत 4 साल से ज्यादा समय तक जेलों में तड़पाया गया। अतिरिक्त सत्र अदालत को इनमें से 135 को रिहा करना पड़ा क्योंकि इनके ऊपर बिल्कुल ही झूठे आरोप लगाये गये थे। परन्तु इसी अदालत ने यूनियन के 12 संगठनकर्ताओं समेत 13 मज़दूरों को आजीवन कारावास की सज़ा दी।

कोयम्बटूर की प्रिकोल कंपनी के यूनियन के आठ संगठनकर्ताओं को दोहरा आजीवन कारावास दिया गया था। बाद में, अनेक साल जेल में बिताने के बाद, उच्च अदालत ने उनमें से 6 को रिहा कर दिया। परन्तु अदालत ने दो मज़दूरों की सज़ा को बरकरार रखा जबकि उनके खि़लाफ़ भी सबूत नहीं थे। सर्वोच्च अदालत ने बिना सुनवाई किये इन दो मज़दूरों की अपील ख़ारिज़ कर दी, जबकि उसने उच्च अदालत द्वारा 6 मज़दूरों को रिहा करने के फैसले के खि़लाफ़ प्रिकोल प्रबंधन की अपील को स्वीकार किया।

ऐसे दर्जनों मामले हैं जिनमें अपने अधिकारों के लिये लड़ने वाले मज़दूरों को जेल का सामना करना पड़ रहा है। अपनी पसंदीदा यूनियन में संगठित होने के लिये मज़दूरों को अत्याधिक मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। “कारोबार सुगम बनाने” के नाम पर, केन्द्र और प्रांतों की सरकारें औद्योगिक संबंध कानून, फैक्टरी कानून, ट्रेड यूनियन कानून और अन्य ऐसे कानूनों में संशोधन ला रही हैं ताकि मज़दूरों द्वारा जीते गये पहले के किसी भी अधिकार पर हमला किया जा सके।

सभी कम्युनिस्टों व मज़दूर वर्ग के सभी संगठनकर्ताओं को, मज़दूर आंदोलन पर हो रहे हमलों का एकजुट होकर मुकाबला करने की ज़रूरत है।     द

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झूठे आरोप    मज़दूर संगठन समिति नामक ट्रेड यूनियन    Jul 16-31 2018    Struggle for Rights    Rights     2018   

पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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