मानव अधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ़्तारी की निंदा करें!

6 जून को पुणे की पुलिस ने भारतीय दंड संहिता और यू.ए.पी.ए. (गैरकानूनी गतिविधियों की रोकथाम अधिनियम) की विभिन्न दफाओं के तहत, पांच मानव अधिकार कार्यकर्ताओं - प्रोफेसर शोमा सेन, रोना विल्सन, महेश राउत, सुधीर धावले और सुरेन्द्र गेडलिंग - को गिरफ्तार किया।

इन पांचों को तथाकथित “गैरकानूनी गतिविधियों” में भाग लेने के आरोप पर गिरफ्तार किया गया है, परन्तु उनके किसी भी अपराध का कोई भी सबूत नहीं पेश किया गया है। उन पर यह आरोप लगाया जा रहा है कि 1 जनवरी, 2018 को भीमा कोरेगांव में आयोजित एक दलित जनसभा में हुयी हिंसात्मक घटनाओं में उनका हाथ था। उनकी गिरफ्तारी को उचित ठहराने के लिए सरकार यह प्रचार कर रही है कि वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के विचारों के तथाकथित समर्थक हैं।

कोई भी व्यक्ति या राजनीतिक दल किसी भी खास विचारधारा से सहमत या असहमत हो सकता है, चाहे वह मार्क्सवाद हो या माओवाद, हिंदुत्व हो या कुछ और। परन्तु एक आधुनिक लोकतंत्र में हम यह नहीं मान सकते कि अगर कोई व्यक्ति किसी खास विचारधारा का पालन करता हो, तो राज्य उसे “गैरकानूनी गतिविधि” करार कर दे। किसी भी व्यक्ति को उसके विचारों की वजह से गिरफ्तार करना, यह ज़मीर के अधिकार पर घोर हमला है।

जो भी मज़दूरों, किसानों, आदिवासियों और जातिवादी दमन के पीड़ितों के अधिकारों की हिफ़ाज़त के लिए संघर्ष कर रहे हैं, उन सब के साथ हिन्दोस्तानी राज्य ऐसे बर्ताव करता है जैसे कि वे अपराधी और “राष्ट्र-विरोधी” हैं। सभी प्रकार के राजकीय आतंकवाद का पर्दाफाश और विरोध करने वालों, जनता के अधिकारों की हिफ़ाज़त करने वालों को फर्ज़ी आरोपों के आधार पर गिरफ्तार किया जा रहा है।

यू.ए.पी.ए. के तहत गिरफ्तार हजारों बेकसूर लोग इस समय जेलों में सड़ रहे हैं। यू.ए.पी.ए. पुलिस को यह इज़ाज़त देता है कि मनमानी से किसी भी व्यक्ति को अनिश्चित का के लिए गिरफ्तार करके बंद रखा जा सकता है, और इसके लिए किसी कानूनी अदालत के सामने कोई सबूत पेश करने की ज़रूरत नहीं है कि ऐसा कोई अपराध किया भी गया है।

1950 के निवारक हिरासत अधिनियम (प्रिवेंटिव डिटेंशन एक्ट) से लेकर आज तक, हिन्दोस्तान की संसद ने अनगिनत फासीवादी कानून बनाए हैं, जो अपनी-अपनी निष्ठुरता में एक से बढ़कर एक हैं। आतंरिक सुरक्षा अधिनियम (मीसा), राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका), आतंकवादी और विघटनकारी गतिविधियाँ अधिनियम (टाडा) और गैरकानूनी गतिविधियों की रोकथाम अधिनियम (यू.ए.पी.ए.) - ये सभी जनता के अधिकारों को छीनने वाले कानूनों के उदाहरण हैं। सशस्त्र बल (विशेष अधिकार) अधिनियम को उपनिवेशवादी काल से बरकरार रखा गया है और बीते कई दशकों से यह कानून पूर्वोत्तर के राज्यों व कश्मीर में अनवरत लागू है।

इन सभी कानूनों के ज़रिये शासक वर्ग जनसमुदाय को डरा-धमका कर रखता है, ताकि लोग अपने अधिकारों के लिए संघर्ष न करें।

इन हालतों में, हिन्दोस्तान के भविष्य के बारे में चिंतित सभी लोगों को एकजुट होकर, राजकीय आतंकवाद के ख़िलाफ़ तथा मानव अधिकारों, जनवादी अधिकारों और राष्ट्रीय अधिकारों की हिफ़ाजत़ में संघर्ष करना होगा।

देश के सभी प्रगतिशील और जनवादी संगठनों को फर्ज़ी आरोपों के आधार पर इन पाँचों मानव अधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी और उसे उचित ठहराने के लिए इनके माओवाद के समर्थक होने के राज्य के प्रचार की कड़ी निंदा करनी चाहिए।

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मानव अधिकार    राष्ट्र-विरोधी    Jul 16-31 2018    Political-Economy    Popular Movements     Rights     2018   

पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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