1975-1977 के राष्ट्रीय आपातकाल के सबक

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति का बयान, 11 जुलाई, 2018

25 जून “राष्ट्रीय आपातकाल” (एमरजेंसी) की घोषणा की 43वीं वर्षगांठ थी। तत्कालीन राष्ट्रपति फख़रुद्दीन अली अहमद ने अंदरूनी उपद्रवों से खतरे का बहाना देकर, संविधान की धारा 352 के तहत एमरजेंसी की घोषणा की थी। एमरजेंसी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को हुक्मनामा जारी करके शासन करने का अधिकार दे दिया था। बोलने और एकत्रित होने की आज़ादी समेत सारी नागरिक आज़ादियां निलंबित की गयीं। मज़दूरों की हड़तालों पर रोक लगाई गयी और ट्रेड यूनियन कार्यकर्ताओं को जेल में बंद कर दिया गया। अख़बारों पर सेंसरशिप लगाई गयी। शहरों को साफ करने के नाम पर, बड़े शहरों में झुग्गी-बस्तियों को तोड़कर हटाया गया। जनसंख्या नियंत्रण के नाम पर, लाखों-लाखों मज़दूरों, किसानों और नौजवानों की बलपूर्वक नसबंदी करायी गयी। विपक्ष के राजनीतिक नेताओं को जेल में बंद कर दिया गया। संसद की अवधि को बढ़ाने और चुनावों को टालने के लिए संविधान में संशोधन किया गया। एमरजेंसी 21 मार्च, 1977 तक लागू रही।

एमरजेंसी ने यह स्पष्ट कर दिया कि बहुपार्टीवादी, प्रतिनिधित्ववादी लोकतंत्र की यह व्यवस्था एक पर्दा है, जिसके पीछे हिन्दोस्तानी राज्य पर नियंत्रण करने वाले और अपना वर्चस्व जमाने वाले बड़े इजारेदार पूंजीपति घरानों का वहशी अधिनायकत्व छिपा हुआ है। बड़े पूंजीवादी घरानों के शासन को जब-जब बढ़ते जन-विरोध से ख़तरा महसूस होता है, तब-तब संविधान राष्ट्रीय सुरक्षा को बचाने के बहाने, जनता के अधिकारों को कुचलने की इजारेदार पूंजीवादी घरानों की ताक़त को वैधता देता है। यह ताक़त संविधान की धारा 352 के ज़रिये लागू की जाती है। यह धारा प्रधानमंत्री की अगुवाई में मंत्री मंडल को यह इज़ाज़त देती है कि राष्ट्रपति को राष्ट्रीय आपातकाल घोषित करने की सलाह दी जा सकती है। इस तरह, हड़ताल करने, बोलने और एकत्रित होने की आज़ादी तथा दूसरी जनवादी आज़ादियों व नागरिक आज़ादियों को छीन लिया जा सकता है।

एमरजेंसी ने यह स्पष्ट कर दिया कि संप्रभुता संसद में, और उसके अन्दर मंत्री मंडल के हाथों में संकेंद्रित है। इजारेदार पूंजीवादी घराने मंत्री मंडल के सहारे अपनी राजनीतिक सत्ता को लागू करते हैं। लोग अपने अधिकारों से वंचित किये जाने पर, उसके बारे में कुछ नहीं कर सकते हैं। हिन्दोस्तान के लोग संप्रभु नहीं हैं।

राष्ट्रीय एमरजेंसी की घोषणा ऐसे समय पर हुयी जब मेहनतकश और दबे-कुचले जनसमुदाय के बीच बहुत असंतोष और अशांति फैली हुयी थी। मज़दूर, किसान और कई उत्पीड़ित राष्ट्रों व राष्ट्रीयताओं के लोग अपनी भूमि और श्रम के शोषण का विरोध कर रहे थे। 1974 में भारतीय रेल में सबसे बड़ी हड़ताल हुयी थी। उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, पंजाब, महाराष्ट्र, राजस्थान, पश्चिम बंगाल और अन्य राज्यों में किसान आन्दोलन फैल रहे थे। गुजरात, बिहार और अन्य जगहों पर छात्रों के आन्दोलन चल रहे थे। जनता अपनी अतिशोषण, बेरोज़गारी और गुरबत की हालतों को स्वीकार करने को तैयार नहीं थी।

हालांकि यह दावा किया गया था कि हिन्दोस्तानी गणराज्य “समाजवादी नमूने के समाज” का गठन कर रहा था, परन्तु असलियत में, शहरों और गांवों में पूंजीवाद बढ़ रहा था। पूंजीवाद की वृद्धि की वजह से, मुट्ठीभर लोगों की दौलत खूब बढ़ रही थी जब कि अधिकतम जनता की हालतें बद से बदतर होती जा रही थीं।

गांवों में पूंजीवाद के फैलने से, कई प्रांतीय सरमायदार अपने हितों को बढ़ावा देने के लिए आगे आने लगे। वे अपने-अपने राज्यों के स्तर पर, सार्वजनिक संसाधनों और राज्य सत्ता में अपना हिस्सा मांगने लगे। देश को अलग-अलग दिशाओं में खींचने वाली इन ताक़तों और इजारेदार पूंजीवादी घरानों के केन्द्रीय नियंत्रण के बीच तनाव बढ़ने लगा। इस तनाव के और तीक्ष्ण होने का एक और कारण था दोनों महाशक्तियों, अमरीकी साम्राज्यवादियों और सोवियत सामाजिक साम्राज्यवादियों की हिन्दोस्तानी उपमहाद्वीप पर आपसी स्पर्धा।

1971 में हिन्द-सोवियत शांति, मित्रता और सहयोग संधि पर हस्ताक्षर करने के बाद, हिन्दोस्तानी राज्य ने पाकिस्तान पर जंग छेड़ी, जिसकी वजह से उस देश का बंटवारा हुआ और बांग्लादेश की स्थापना हुयी। इंदिरा गांधी की कांग्रेस सरकार ने मज़दूरों, किसानों और राजनीतिक विपक्ष के सभी दलों के ख़िलाफ़ अपने दमनकारी क़दम खूब बढ़ा दिए। राष्ट्रीय हितों और “समाजवादी नमूने के समाज” को “दक्षिण पंथी प्रतिक्रिया” के ख़तरे से बचाने के नाम पर, मज़दूरों की हड़तालों और जन आन्दोलनों को बेरहमी से कुचल दिया जाने लगा। बरतानवी-अमरीकी साम्राज्यवादियों ने सक्रियता से एक “जनवाद परस्त” और “भ्रष्टाचार विरोधी” आन्दोलन को समर्थन देना शुरू किया, ताकि इंदिरा गांधी की सरकार को गिराया जाए और हिन्दोस्तान पर अमरीकी प्रभाव को बढ़ाया जाए। कई राजनीतिक ताक़तें जयप्रकाश नारायण की अगुवाई में इकट्ठी होकर, “सम्पूर्ण क्रांति” का नारा देने लगीं।

बड़े सरमायदारों के लिए, पुराने तरीके से शासन करना मुश्किल हो रहा था, इसलिए उन्होंने “राष्ट्रीय एमरजेंसी” को लागू किया। इसमें उनका मुख्य उद्देश्य था अपने शासन को स्थाई करने के लिए सभी प्रकार के जन-विरोधों को अपराधी ठहराना और कुचलना।

कम्युनिस्ट आन्दोलन के सामने यह चुनौती थी कि मज़दूरों, किसानों और सभी शोषित और उत्पीड़ित लोगों को बड़े सरमायदारों के ख़िलाफ़ संघर्ष में अगुवाई दे, ताकि इस शोषण-दमन के राज को ख़त्म किया जा सके। कम्युनिस्टों का काम था व्यापक जनसमुदाय को एक नए संविधान पर आधारित एक नए राज्य की स्थापना करने के राजनीतिक उद्देश्य के इर्द-गिर्द एकजुट करना - एक ऐसा राज्य जो लोगों को संप्रभुता देगा, मानव अधिकारों और जनवादी अधिकारों की गारंटी देगा और सबकी खुशहाली व सुरक्षा सुनिश्चित करेगा।

परन्तु कम्युनिस्ट आन्दोलन ऐसा करने में असमर्थ रहा। वह तमाम पार्टियों और गुटों में बंटा हुआ था। यह सिद्धांत और विचारधारा के क्षेत्र में उसकी प्रौढ़ता की कमी तथा सरमायदारों की विचारधारा के सामने उसके घुटने टेक देने का अंजाम था।

कम्युनिस्ट आन्दोलन के कुछ प्रभावशाली तबके पूंजीवादी राज्य और संसदीय लोकतंत्र के बारे में भ्रम पैदा कर रहे थे। एक तबके ने अमरीका समर्थित दाएं पंथी प्रतिक्रिया के ख़तरे से बचने के बहाने, कांग्रेस पार्टी द्वारा एमरजेंसी की घोषणा का खुलेआम समर्थन किया। दूसरे तबके ने विपक्षी दलों की अगुवाई में “सम्पूर्ण क्रांति” के आन्दोलन के साथ समझौता किया। मज़दूर वर्ग को अपने स्वतंत्र कार्यक्रम के इर्द-गिर्द लामबंध करने के बजाय, कम्युनिस्ट आन्दोलन के प्रमुख तबकों ने मज़दूर वर्ग को बांटने और उसे शासक पूंजीपति वर्ग की अलग-अलग पार्टियों के पीछे लामबंध करने का काम किया।

एमरजेंसी को लागू करने से सरमायदारों को थोड़े समय के लिए अपने शासन को स्थाई करने में मदद मिली। पर साथ ही साथ, सभी नागरिक आज़ादियों के छीने जाने के ख़िलाफ़ सभी तबकों का जन-विरोध भी बढ़ने लगा। इन हालतों में, बड़े सरमायदारों ने मार्च 1977 में एमरजेंसी को ख़त्म किया और संसदीय चुनावों को आयोजित किया। बदनाम हो चुकी कांग्रेस पार्टी की जगह पर, जनता पार्टी गठबंधन को सत्ता पर लाया गया। इसे “लोकतंत्र की पुनस्र्थापना” बताकर इसका खूब ढिंढोरा पीटा गया।

शोषण-दमन के ख़िलाफ़ मज़दूरों- किसानों का संघर्ष चलता रहा। जनता पार्टी की सरकार ने मज़दूरों और किसानों के संघर्षों को कुचलने के लिए राज्य तंत्र का इस्तेमाल करके, वहशी दमन का प्रयोग किया। वह जल्दी ही जनता की नज़रों में बदनाम हो गयी।

इजारेदार पूंजीवादी घरानों ने 1980 में, राष्ट्रीय एकता और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा करने के झंडे तले, कांग्रेस पार्टी को फिर से केंद्र सरकार में वापस लाने का आयोजन किया। असम और पंजाब के लोगों के संघर्षों को चकनाचूर करने के मकसद से, वहां सांप्रदायिक और सामुदायिक बंटवारे थोप दिए गए। केन्द्रीय खुफिया दलों ने कई आतंकवादी हरकतें आयोजित कीं, जिनके लिए जनता के इस या उस तबके को दोषी ठहराया गया। पंजाब, मणिपुर और कश्मीर में राजकीय आतंकवाद छेड़ दिया गया।

संविधान मज़दूरों, किसानों और सभी दबे-कुचले लोगों के अधिकारों का हनन करने और उन पर इजारेदार पूंजीवादी घरानों की हुक्मशाही को थोपने का काम लगातार करता रहा है। धारा 352 अभी भी जारी है, 1978 में उसमें बस कुछ मामूली तब्दीलियां की गयी थीं। एमरजेंसी घोषित करने के लिए मंत्री मंडल द्वारा दिये गए कारणों में, “अंदरूनी उपद्रवों” की जगह पर “सशस्त्र बग़ावत” के शब्द डाल दिए गए। एक वाक्यांश जोड़ दिया गया कि मंत्री मंडल के फैसले को राष्ट्रपति को लिखित रूप में बताना पड़ेगा। धारा 352 के अलावा, संविधान में कई और आपातकालीन प्रावधान भी हैं।

ये सारे आपातकालीन प्रावधान अभी भी बरकरार हैं। इनके अलावा, संसद ने कई नए कानून बनाये हैं तथा मौजूदा कानूनों में संशोधन लाये हैं, ताकि विस्तृत पैमाने पर मानव अधिकारों व जनवादी अधिकारों का हनन किया जा सके। सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम, आवश्यक सेवाएं रखरखाव अधिनियम और अन्य फासीवादी कानूनों के अलावा, टाडा, पोटा और गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (यू.ए.पी.ए.) जैसे कानूनों के सहारे, शासक वर्ग को मनमानी से लोगों को गिरफ़्तार करने, फ़र्ज़ी मुठभेड़ों में लोगों को मार डालने और अलग-अलग प्रकार से लोगों के अधिकारों का घोर हनन करने की कानूनी छूट मिली हुयी है।

1980 के दशक के बीच से और 1990 के दशक से ज्यादा खुले रूप से, इजारेदार पूंजीवादी घराने उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण का कार्यक्रम लागू करते आ रहे हैं। इस कार्यक्रम का उद्देश्य है मज़दूर वर्ग के शोषण और किसानों की लूट को बढ़ाकर, इजारेदार पूंजीवादी घरानों के हाथों में दौलत के संकेन्द्रण की गति को और तेज़ कर देना। यह कार्यक्रम हिन्दोस्तान के इजारेदार पूंजीवादी घरानों की, दुनिया की सबसे बड़ी ताक़तों के गिरोह में शामिल होने की साम्राज्यवादी आकांक्षाओं को भी बढ़ावा देता है। इस मज़दूर-विरोधी, किसान-विरोधी, राष्ट्र-विरोधी और समाज-विरोधी आर्थिक कार्यक्रम के साथ-साथ, इजारेदार पूंजीवादी घरानों ने शासन करने के बेहद अपराधी तरीके अपनाए हैं, जिनमें राज्य द्वारा आयोजित सांप्रदायिक हिंसा, गुप्त व्यक्तिगत आतंकवाद और खुलेआम राजकीय आतंकवाद शामिल हैं।

इजारेदार पूंजीवादी घराने बैलट और बुलेट, दोनों के ज़रिये समाज पर अपना शासन थोपते हैं। समय-समय पर चुनाव कराने के साथ-साथ, सांप्रदायिक हिंसा और दूसरे प्रकार के राजकीय आतंकवाद का भी सहारा लिया जाता है। समय-समय पर चुनाव करवाकर, इजारेदार पूंजीवादी घराने ज़रूरत होने पर अपने प्रबंधक दल में परिवर्तन लाते हैं। जो भी सरकार आती है, वह इजारेदार पूंजीवादी घरानों की हुक्म्शाही के ख़िलाफ़ जन-विरोध को कुचलने के लिए वहशी बलप्रयोग करने में और बढ़-चढ़कर काम करती है।

इस समय, इजारेदार पूंजीवादी घरानों के समाज-विरोधी हमले को भाजपा अगुवाई दे रही है। जो भी उसका विरोध करता है, उसे “राष्ट्र-विरोधी” करार दिया जाता है। कांग्रेस पार्टी और संसदीय विपक्ष की अन्य पार्टियां संविधान और संसदीय लोकतंत्र को भाजपा और आर.एस.एस. के ख़तरे से बचाने का नारा दे रही हैं। दोनों कांग्रेस पार्टी और भाजपा लोगों को बांटने और बहकाने और इस भ्रम में फंसाए रखने में, कि संसदीय लोकतंत्र और मौजूदा संविधान उनके हितों की रक्षा कर सकते हैं, मिलजुलकर अपनी-अपनी भूमिकाएं निभा रही हैं।

लोकतंत्र की वर्तमान व्यवस्था वास्तव में पूंजीपति वर्ग का क्रूर अधिनायकत्व ही है। इसकी अगुवाई इजारेदार पूंजीवादी घराने कर रहे हैं, जिन्हें सिर्फ अपने निजी मुनाफ़ों के बारे में चिंता है, न कि किसी राष्ट्र हित के बारे में। वर्तमान संविधान इस वर्ग के अधिनायकत्व को वैधता देता है। वह न तो लोगों के अधिकारों की गारंटी देता है, न ही लोगों को संप्रभुता देता है। इसी संविधान के अनुसार चलकर, 1975 में एमरजेंसी की घोषणा करना मुमकिन था और राज्य द्वारा आयोजित सांप्रदायिक हिंसा समेत राजकीय आतंकवाद शासन का पसंदीदा तरीका बन सका है।

वर्तमान लोकतंत्र की व्यवस्था लोगों को सत्ता से दूर रखती है और लोगों को अपने अधिकारों से वंचित करती है। उसे बदलकर, उसकी जगह पर एक उन्नत व्यवस्था स्थापित करनी होगी। हमें एक ऐसे संविधान और राज्य की ज़रूरत है, जो मानव अधिकारों और जनवादी अधिकारों की गारंटी दे सकेगा और जिसकी राजनीतिक प्रक्रिया में संप्रभुता लोगों के हाथों में होगी।

अगर लोगों को संप्रभु होना है, तो हर नागरिक के चुनने और चुने जाने के अधिकार को हक़ीक़त में बदलना होगा। काम की जगहों और रिहायशी स्थानों में जनसंगठनों को अपने बीच में से उम्मीदवारों का चयन करने की ताक़त देनी होगी। राजनीतिक पार्टियों का काम होगा यह सुनिश्चित करना कि लोग खुद अपना शासन कर सकें, न कि लोगों के नाम पर पार्टी ही शासन करे। लोगों को कानून प्रस्तावित करने का अधिकार होना चाहिए, चुने गए प्रतिनिधियों को जवाबदेह ठहराने का अधिकार होना चाहिये और अयोग्य प्रतिनिधियों को किसी भी समय वापस बुलाने का अधिकार होना चाहिये। बाकी सभी ताक़तों को लोगों के हाथों में होना चाहिए, जिनमें संविधान को बदलने और फिर से लिखने का अधिकार भी होना चाहिए।

वर्तमान संसद की जगह पर एक निर्वाचित और फैसले लेने वाला निकाय गठित करना होगा, जो अपने फैसलों को लागू करने के लिए भी ज़िम्मेदार होगा। कार्यकारिणी को निर्वाचित विधायिकी के प्रति जवाबदेह होना होगा और चुने गए प्रतिनिधियों को मतदाताओं के प्रति जवाबदेह होना होगा।

जब राजनीतिक सत्ता लोगों के हाथ में होगी, तब मेहनतकश बहुसंख्या अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिला सकेगी ताकि सभी की खुशहाली और सुरक्षा सुनिश्चित हो। आज अर्थव्यवस्था और सरकारी नीतियां पूंजी-केन्द्रित हैं, उनका मकसद है पूंजीवादी मुनाफ़ों को अधिकतम बनाना। इन्हें बदलकर, अर्थव्यवस्था और सरकारी नीतियों को मानव-केन्द्रित बनाना होगा। पूरी आबादी की बढ़ती भौतिक और सांस्कृतिक ज़रूरतों को अधिक से अधिक हद तक पूरा करना - इसे ही सामाजिक उत्पादन और विनिमय की सम्पूर्ण प्रक्रिया का मकसद बनाना होगा। आत्म-निर्भरता के असूल का पालन करके और दूसरे देशों के साथ मित्रतापूर्ण सम्बन्ध व साम्राज्यवाद-विरोधी एकता बनाकर, देश की आर्थिक और राजनीतिक आज़ादी की रक्षा करनी होगी। यह राज्य और राजनीतिक प्रक्रिया के नव-निर्माण का कार्यक्रम होगा और अर्थव्यवस्था को एक नयी, मानव-केन्द्रित दिशा दिलाने का कार्यक्रम होगा। 

आज इस नव-निर्माण के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द मज़दूरों, किसानों और सभी दबे-कुचले लोगों का संयुक्त मोर्चा बनाने की फ़ौरी ज़रूरत है। आइये, हम एकजुट होकर उस नए हिन्दोस्तान के लिए संघर्ष करें, जिसके मालिक सभी राष्ट्रीयताओं के मज़दूर, किसान, औरत और जवान मिलकर होंगे और जिसमें सभी की खुशहाली और सुरक्षा की गारंटी होगी!

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राष्ट्रीय आपातकाल    एमरजेंसी    Jul 16-31 2018    Statements    Communalism     Rights     War & Peace     2018   

पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

 

5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

(Click thumbnail to download PDF)

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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