यू.जी.सी. की जगह नये निकाय का गठन : उच्च शिक्षा के निजीकरण की दिशा में एक और कदम

29 जून को केन्द्र सरकार ने यह घोषणा की कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यू.जी.सी.) को ख़त्म करके, उसकी जगह पर एक नये भारतीय उच्च शिक्षा आयोग (एच.ई.सी.आई.) का गठन किया जाएगा, जो देश में उच्च शिक्षा का अब नया नियामक बनेगा।

एच.ई.सी.आई. की ज़िम्मेदारी होगी सिर्फ शिक्षा संबंधी मामलों पर ध्यान देना। उसके पास कालेजों और विश्वविद्यालयों को अनुदान प्रदान करने की ताक़त नहीं होगी। इसके साथ-साथ, एच.ई.सी.आई. को ढेर सारी और ताक़तें दी गयी हैं, जैसे कि उच्च शिक्षा के संस्थानों में शिक्षा, जांच-मूल्यांकन व शोध के मापदंडों को निर्धारित करना तथा संस्थानों के काम-काज का मूल्यांकन करना। एच.ई.सी.आई. “संस्थानों को बंद करने” का आदेश दे सकता है। अगर कोई विश्वविद्यालय एच.ई.सी.आई. द्वारा निर्धारित किसी नियम को तोड़ता है, तो उसे जुर्माना भरना पड़ेगा। जुर्माना न देने पर, उस संस्थान के प्रमुख को तीन साल तक की जेल की सज़ा हो सकती है।

सरकार ने यू.जी.सी. को ख़त्म करके, उसकी जगह पर एच.ई.सी.आई. का गठन करने के कदम को उचित ठहराते हुए, यह कहा है कि इसका लक्ष्य है “हिन्दोस्तान को शिक्षा अर्थव्यवस्था में तब्दील करने” के भाजपा के वादे को पूरा करना। सरकार दावा कर रही है कि इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए वह “उच्च शिक्षा में जो प्रमुख सुधार” लाना चाहती है, उसके रास्ते में यू.जी.सी. एक रुकावट है।

परन्तु उच्च शिक्षा में कार्यरत शिक्षाविदों और शिक्षकों ने यह चेतावनी दी है कि एच.ई.सी.आई. का असली मकसद है उच्च शिक्षा से संबंधित सभी फैसलों को लेने की ताक़त को मानव संसाधन विकास मंत्रालय के ज़रिये केंद्र सरकार के हाथों में संकेंद्रित करना। इसका मकसद है उच्च शिक्षा में सुधारों को प्रस्तावित करने में शिक्षकों और उच्च शिक्षा संस्थानों के शैक्षणिक प्रमुखों की भूमिका को बहुत कम कर देना। एच.ई.सी.आई. की प्रस्तावित संरचना से यह स्पष्ट होता है कि - आयोग के 12 सदस्यों में सिर्फ 2 शिक्षक या शिक्षाविद होंगे, जबकि ऊंचे सरकारी अफ़सरों और मुख्य पूंजीवादी घरानों के प्रतिनिधियों का पलड़ा ज्यादा भारी होगा।

एक के बाद दूसरी सरकार उच्च शिक्षा में जिस दिशा में सुधार लाने की कोशिश कर रही है व ला रही है, उसी के सन्दर्भ में एच.ई.सी.आई. के गठन को समझना होगा। यह बात छिपी नहीं है कि हरेक नयी सरकार, पिछली सरकार से ज्यादा हमलावर तरीके से, उच्च शिक्षा के निजीकरण के कार्यक्रम को लागू करती आ रही है।

हिन्दोस्तानी राज्य देश के हर कोने में पर्याप्त संख्या में उच्च शिक्षा के संस्थान बनाकर, उन्हें आवश्यक धन देकर, अच्छी गुणवत्ता के शिक्षक, कर्मचारी व अन्य सुविधायें सुनिश्चित करके, नौजवानों को अच्छी और कम शुल्क पर उच्च शिक्षा दिलाने की अपनी ज़िम्मेदारी से क्रमशः पीछे हटता जा रहा है। सरकारी वक्ता खुलेआम कह रहे हैं कि “उच्च शिक्षा में निवेश करने के लिए धन की उपलब्धता बहुत कम है”। एक तरफ, सरकारी कालेजों और विश्वविद्यालयों में उच्च शिक्षा में सरकारी फंडिंग की कटौती के कारण धन की बहुत कमी है, नए शिक्षकों की भर्ती पर रोक लगाने, शिक्षकों को पूरा वेतन व सुविधायें न देने की सरकारी नीति के कारण शिक्षकों की भारी कमी है। दूसरी तरफ, सरकार बड़ी सक्रियता से, उच्च शिक्षा में “निजी पूंजी निवेश” को बढ़ावा दे रही है। बड़े-बड़े इजारेदार पूंजीवादी घरानों को निजी विश्वविद्यालय खोलने में पूरी मदद दी जा रही है। अगुवा इजारेदार पूंजीवादी घरानों को “श्रेष्ठ” उच्च शिक्षा संस्थान खोलने और चलाने के लिए सरकार विशेष अनुदान भी दे रही है।

जबकि एच.ई.सी.आई. के मसौदे में उच्च शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के तथाकथित उद्देश्य के अनुसार, कई नियामक ज़िम्मेदारियां निर्धारित की गयी हैं (जैसा कि पहले विस्तारपूर्वक समझाया गया है), तो इसमें “राज्य के नियंत्रण” को कम करने पर भी ज़ोर दिया गया है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अधिकारी खुलेआम कह रहे हैं कि एच.ई.सी.आई. के गठन से उच्च शिक्षा में निवेश करने वाले निजी पूंजीपतियों पर राजकीय नियंत्रण बहुत सीमित होगा और उन्हें अपनी मर्ज़ी से काम करने की पूरी छूट दी जायेगी।

अच्छी उच्च शिक्षा पाने की समस्या का एक और “समाधान”, जिसे सरकार काफी बढ़-चढ़कर पेश कर रही है, वह है कालेजों और विश्वविद्यालयों को “स्वायत्तता” दिलाना। इस वर्ष मार्च के महीने में, यू.जी.सी. ने स्वायत्त कालेज नियामन अधिनियम (ऑटोनोमस कॉलेज रेगूलेशन एक्ट) के तहत, 62 उच्च शिक्षा संस्थानों को स्वायत्तता देने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी थी। इनमें 5 केन्द्रीय विश्वविद्यालय, अलग-अलग राज्यों के 21 विश्वविद्यालय, 26 निजी विश्वविद्यालय तथा 10 अन्य कालेज शामिल हैं।

जिन संस्थानों को “स्वायत्तता” दी गयी है, उनका अनुभव यह दिखाता है कि जब किसी कालेज या विश्वविद्यालय को स्वायत्तता मिल जाती है, जब वह राज्य के नियमों और कानूनों से मुक्त हो जाता है, तो उसके प्रबंधकों के पास, निरंकुश अधिकार होता है, कि अपनी मनमर्ज़ी से छात्रों का चयन करें, फीस तय करें, शिक्षकों को नियुक्त करें, पाठयक्रम तय करें और अपने काम के लिए धन जुटाएं। इन संस्थानों के पूंजीवादी निजी प्रबंधक अवश्य ही “उच्च शिक्षा दिलाने” के नाम पर, इन संस्थानों को अधिकतम मुनाफ़ों के लिए चलाएंगे, जैसा कि निजी विश्वविद्यालयों में किया जाता है। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए, छात्रों की फीस तय की जाएगी और मज़दूरों-किसानों व दूसरे ग़रीब तबकों के अधिकतम नौजवानों को बाहर रखा जायेगा। पूंजीवादी निजी प्रबंधकों के मुनाफ़ों को बढ़ाने के लिए शिक्षकों का ज्यादा से ज्यादा शोषण किया जायेगा। इन “स्वायत्त” कालेजों और विश्वविद्यालयों में पूंजी निवेश करने वाले बड़े इजारेदार पूंजीवादी घराने नौजवानों को समाज की समस्याओं को हल करने और सामाजिक परिवर्तन लाने के लिए शिक्षा और ज्ञान देने के उद्देश्य से पाठयक्रम नहीं तय करेंगे, बल्कि इस मकसद से कि बड़े इजारेदार घराने नौजवानों का कैसे सबसे ज्यादा शोषण कर सकें।

उच्च शिक्षा संस्थानों के शिक्षक उच्च शिक्षा के निजीकरण और संस्थानों को “स्वायत्तता” दिलाने के इन क़दमों का विरोध करने के संघर्ष में आगे रहे हैं। उन्होंने बार-बार बताया है कि “उच्च शिक्षा में उन्नति लाने” के नाम पर जो क़दम उठाये जा रहे हैं, उनकी वजह से मज़दूर-किसान परिवारों के अधिक से अधिक नौजवानों की पहुंच से उच्च शिक्षा बाहर हो जायेगी। परन्तु एच.ई.सी.आई. में उच्च शिक्षा के निजीकरण का विरोध करने वाले शिक्षकों के लिए बहुत कम भूमिका होगी। अतः शिक्षकों का यह मानना है कि अब “स्वायत्तता” की मांग करने वाले शिक्षा संस्थानों की गवर्निंग बॉडीज में बैठे इजारेदार पूंजीपति सत्ता के गलियारों में अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके बड़ी आसानी से इसके लिए अनुमति प्राप्त कर लेंगे।

दिल्ली विश्वविद्यालय, जे.एन.यू., जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय तथा देशभर के तमान केन्द्रीय और राज्यों के विश्वविद्यालयों के शिक्षक एच.ई.सी.आई. अधिनियम, उच्च शिक्षा के निजीकरण की दिशा में लिए जा रहे क़दमों और उच्च शिक्षा संस्थानों को “स्वायत्तता” दिलाने के इन सभी क़दमों का विरोध करने के लिए सड़कों पर उतर आये हैं। एच.ई.सी.आई. की आलोचना करते हुए, उन्होंने कहा है कि सरकार इसके ज़रिये उच्च शिक्षा के निजीकरण के कार्यक्रम को लागू करना चाहती है, जबकि देश के नौजवानों को पर्याप्त मात्रा में व कम दाम पर, अच्छी गुणवत्ता की उच्च शिक्षा से वंचित किया जा रहा है। उन्होंने बताया है कि एच.ई.सी.आई. के स्थापित होने से, उच्च शिक्षा के मामलों में फैसले लेने में शिक्षकों को बहुत कम मौका मिलेगा। उन्होंने समझाया है कि एच.ई.सी.आई. के ज़रिये, उच्च शिक्षा के मामलों में फैसले लेने के अधिकार पूरी तरह राज्य के हाथों में संकेंद्रित हो जायेंगे।

कई राज्य सरकारों ने इस बात का भी विरोध किया है कि उच्च शिक्षा संस्थानों पर केन्द्र सरकार का दबदबा बहुत बढ़ा दिया जा रहा है। इसकी वजह से सरकार को धन के आबंटन को मानव संसाधन विकास मंत्रालय के हाथों में सौंपने के प्रावधान को वापस लेना पड़ा है। अब यह प्रस्ताव किया जा रहा है कि उच्च शिक्षा संस्थानों को धन देने का काम विशेषज्ञों के एक स्वतंत्र निकाय को सौंपा जायेगा।

बड़े इजारेदार पूंजीपति शासक वर्ग की सत्ता पर बैठी सरकार के सहारे, उच्च शिक्षा के निजीकरण को बढ़ावा देने की कोशिशों की हमें कड़ी निंदा करनी चाहिए तथा इनका डटकर विरोध करना चाहिए। कम शुल्क के साथ, अच्छी गुणवत्ता की उच्च शिक्षा हमारे नौजवानों का अधिकार है। हमें मांग करनी चाहिए कि उच्च शिक्षा के निजीकरण को वापस लिया जाये। हमें यह मांग करनी चाहिए कि राज्य देश के हर कोने में नौजवानों को कम शुल्क के साथ, अच्छी गुणवत्ता की उच्च शिक्षा मुहैया कराने की अपनी ज़िम्मेदारी पूरी करे।  

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यू.जी.सी.    भारतीय उच्च शिक्षा आयोग    Aug 16-31 2018    Political-Economy    Privatisation    Rights     2018   

पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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